हिंदी उपन्यास का आरंभ भारतेंदु युग में हुआ। लाला श्रीनिवासदास का परीक्षा गुरु (1882) अंग्रेज़ी ढंग का पहला मौलिक हिंदी उपन्यास माना जाता है। प्रेमचंद ने उपन्यास को समाज के यथार्थ से जोड़कर शिखर पर पहुँचाया। उनके बाद मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, आंचलिक और समकालीन उपन्यासों की समृद्ध परंपरा विकसित हुई।
मुख्य बिंदु
पूर्व-प्रेमचंद युग: उपदेशात्मक और सामाजिक उपन्यास (परीक्षा गुरु, श्रद्धाराम फुल्लौरी का 'भाग्यवती'); देवकीनंदन खत्री के तिलिस्मी-ऐयारी उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति, जिन्हें पढ़ने के लिए बहुत लोगों ने हिंदी सीखी; किशोरीलाल गोस्वामी के सामाजिक-ऐतिहासिक उपन्यास।
प्रेमचंद युग: सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला, गबन और गोदान (1936)। किसान, स्त्री, दहेज, शोषण और राष्ट्रीय आंदोलन का यथार्थ चित्रण।
मनोवैज्ञानिक उपन्यास: जैनेंद्र कुमार (परख, सुनीता, त्यागपत्र), इलाचंद्र जोशी, अज्ञेय (शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप)।
समकालीन उपन्यास में दलित, स्त्री, आदिवासी जीवन, विभाजन, भूमंडलीकरण और ग्रामीण संकट प्रमुख विषय हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
उपन्यास – जीवन का विस्तृत, समग्र चित्र देने वाली लंबी गद्य कथा।
तिलिस्मी-ऐयारी – जादुई महलों और चालाक जासूसों की कल्पनात्मक कथाएँ।
आंचलिक उपन्यास – किसी एक अंचल (क्षेत्र) का जीवन, बोली और संस्कृति ही जिसका नायक हो।
मनोवैज्ञानिक उपन्यास – पात्रों के अंतर्मन और मानसिक संघर्ष पर केंद्रित।
उपन्यास के तत्व – कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल-वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
1882 – परीक्षा गुरु (लाला श्रीनिवासदास)।
देवकीनंदन खत्री – चंद्रकांता।
प्रेमचंद – गोदान (1936), गबन, निर्मला, रंगभूमि।
जैनेंद्र कुमार – त्यागपत्र, सुनीता।
अज्ञेय – शेखर: एक जीवनी।
फणीश्वरनाथ रेणु – मैला आँचल (1954)।
श्रीलाल शुक्ल – राग दरबारी।
भीष्म साहनी – तमस।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास किसे माना जाता है?
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार लाला श्रीनिवासदास का 'परीक्षा गुरु' (1882) अंग्रेज़ी ढंग का पहला मौलिक हिंदी उपन्यास है। कुछ विद्वान श्रद्धाराम फुल्लौरी के 'भाग्यवती' को भी पहला उपन्यास मानते हैं।
Q2. आंचलिक उपन्यास किसे कहते हैं? एक उदाहरण दीजिए।
जिस उपन्यास में किसी विशेष अंचल का जीवन, लोक-संस्कृति, बोली और समस्याएँ केंद्र में हों, उसे आंचलिक उपन्यास कहते हैं। रेणु का 'मैला आँचल' इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।
हिंदी नाटक का वास्तविक विकास भारतेंदु युग से हुआ। भारतेंदु ने रंगमंच के योग्य, सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों वाले नाटक लिखे। जयशंकर प्रसाद ने ऐतिहासिक नाटकों से इसे ऊँचाई दी, लक्ष्मीनारायण मिश्र ने समस्या नाटक लिखे और स्वतंत्रता के बाद मोहन राकेश ने आधुनिक हिंदी रंगमंच को नई दिशा दी।
मुख्य बिंदु
भारतेंदु के अनुसार उनके पिता गोपालचंद्र 'गिरिधरदास' का 'नहुष' हिंदी का पहला नाटक है।
भारतेंदु युग: अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी; प्रहसन और व्यंग्य; पारसी रंगमंच के मनोरंजक नाटकों के मुकाबले सार्थक नाटक।
प्रसाद युग: जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, अजातशत्रु, ध्रुवस्वामिनी। इनमें राष्ट्रीयता, भारतीय संस्कृति का गौरव और काव्यात्मक भाषा है।
प्रसाद के नाटकों पर अभिनेयता (मंच पर खेलने में कठिनाई) को लेकर आलोचना भी हुई।
प्रसादोत्तर युग: लक्ष्मीनारायण मिश्र के समस्या नाटक (संन्यासी, राक्षस का मंदिर, सिंदूर की होली); हरिकृष्ण 'प्रेमी' (रक्षाबंधन); सेठ गोविंददास; उपेंद्रनाथ अश्क (अंजो दीदी); जगदीशचंद्र माथुर (कोणार्क)।
स्वातंत्र्योत्तर युग: मोहन राकेश के आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस और आधे-अधूरे; धर्मवीर भारती का काव्य-नाटक अंधा युग।
अन्य: लक्ष्मीनारायण लाल, सुरेंद्र वर्मा (सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक), भीष्म साहनी (हानूश, कबिरा खड़ा बाज़ार में), हबीब तनवीर (चरणदास चोर) – लोकनाट्य शैली के प्रयोग।
आधुनिक नाटक में मध्यवर्गीय जीवन, टूटते संबंध, अस्तित्व का संकट और लोक-रंगमंच के प्रयोग प्रमुख हैं।
एकांकी का भी विकास हुआ: रामकुमार वर्मा, उदयशंकर भट्ट, भुवनेश्वर।
महत्वपूर्ण शब्द
नाटक – रंगमंच पर अभिनय के लिए लिखी दृश्य-काव्य रचना।
रंगमंच – नाटक के प्रदर्शन का स्थान और उसकी पूरी कला।
अभिनेयता – नाटक का मंच पर सफलतापूर्वक खेले जाने का गुण।
समस्या नाटक – किसी सामाजिक या वैयक्तिक समस्या पर केंद्रित नाटक।
प्रहसन – हास्य-व्यंग्य प्रधान छोटा नाटक।
एकांकी – एक अंक का नाटक।
नाटक के तत्व – कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली, उद्देश्य, अभिनेयता।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
गोपालचंद्र 'गिरिधरदास' – नहुष।
भारतेंदु हरिश्चंद्र – अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा।
जयशंकर प्रसाद – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
लक्ष्मीनारायण मिश्र – समस्या नाटकों के प्रवर्तक।
जगदीशचंद्र माथुर – कोणार्क।
मोहन राकेश – आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे।
धर्मवीर भारती – अंधा युग।
हबीब तनवीर – चरणदास चोर।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. प्रसाद के नाटकों की दो विशेषताएँ लिखिए।
प्रसाद के नाटक ऐतिहासिक हैं और उनमें राष्ट्रीयता तथा भारतीय संस्कृति का गौरव है। उनकी भाषा काव्यात्मक और संस्कृतनिष्ठ है, जिसमें गीतों का भी प्रयोग हुआ है।
Q2. 'आषाढ़ का एक दिन' के लेखक कौन हैं? इसका विषय बताइए।
इसके लेखक मोहन राकेश हैं। यह कवि कालिदास और मल्लिका के जीवन पर आधारित है, जिसमें सृजन, प्रेम और सत्ता के बीच के द्वंद्व को दिखाया गया है।
Q3. हिंदी नाटक के विकास पर प्रकाश डालिए।
आरंभ: नहुष और भारतेंदु के नाटक।
भारतेंदु युग: सामाजिक-राष्ट्रीय विषय, प्रहसन।
प्रसाद युग: ऐतिहासिक नाटक।
प्रसादोत्तर: समस्या नाटक (लक्ष्मीनारायण मिश्र)।
स्वातंत्र्योत्तर: मोहन राकेश, अंधा युग।
लोकनाट्य प्रयोग: हबीब तनवीर।
एकांकी का विकास।
Q4. मोहन राकेश के नाट्य साहित्य का मूल्यांकन कीजिए।
तीन प्रमुख नाटक: आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे।
आधुनिक मनुष्य का अकेलापन और द्वंद्व।
स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता।
'आधे-अधूरे' में मध्यवर्गीय परिवार का बिखराव।
सहज, बोलचाल की नाट्य भाषा।
रंगमंच की गहरी समझ; हिंदी रंगमंच को नई दिशा।
Q5. नाटक के तत्वों का परिचय दीजिए।
कथावस्तु: मुख्य और गौण कथाएँ।
पात्र और चरित्र-चित्रण।
संवाद: संक्षिप्त, पात्रानुकूल।
देशकाल और वातावरण।
भाषा-शैली।
उद्देश्य।
अभिनेयता: रंगमंच पर खेले जाने की योग्यता।
परीक्षा टिप
नाटक के उत्तर में 'अभिनेयता' और 'रंगमंच' शब्दों का प्रयोग करें; यही नाटक को अन्य विधाओं से अलग करता है। नाटककार-नाटक की जोड़ियाँ सही लिखें।
एकांकी एक अंक का छोटा नाटक है, जिसमें जीवन की किसी एक घटना, समस्या या मनःस्थिति को कम पात्रों और कम समय में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। भारतेंदु युग के छोटे नाटकों और प्रहसनों में इसके बीज मिलते हैं, पर आधुनिक हिंदी एकांकी का वास्तविक विकास 1930 के आसपास हुआ। जयशंकर प्रसाद, भुवनेश्वर और डॉ. रामकुमार वर्मा इसके आरंभिक प्रमुख लेखक हैं। रेडियो ने एकांकी को और लोकप्रिय बनाया।
मुख्य बिंदु
भारतेंदु युग: 'अंधेर नगरी' जैसे छोटे प्रहसन, जिनमें व्यंग्य प्रधान है; इन्हें एकांकी की पृष्ठभूमि माना जाता है।
प्रसाद की 'एक घूँट' को कई विद्वान आधुनिक ढंग का पहला हिंदी एकांकी मानते हैं, पर इस पर मतभेद है।
भुवनेश्वर के संग्रह 'कारवाँ' ने पश्चिमी शैली के यथार्थवादी एकांकी की शुरुआत की।
डॉ. रामकुमार वर्मा ने ऐतिहासिक और सामाजिक एकांकियों से विधा को प्रतिष्ठा दी; उनके संग्रह 'पृथ्वीराज की आँखें' और 'रेशमी टाई' प्रसिद्ध हैं। उन्हें एकांकी सम्राट भी कहा जाता है।
उपेंद्रनाथ 'अश्क' ('तौलिए') ने मध्यवर्गीय जीवन की समस्याओं पर व्यंग्यपूर्ण एकांकी लिखे।
जगदीशचंद्र माथुर ('भोर का तारा', 'रीढ़ की हड्डी') ने सामाजिक विसंगतियों को सरल और रंगमंचीय ढंग से रखा।
सेठ गोविंददास, उदयशंकर भट्ट, लक्ष्मीनारायण मिश्र, विष्णु प्रभाकर आदि ने एकांकी को विविधता दी।
रेडियो (आकाशवाणी) के लिए ध्वनि-नाटक और रूपक लिखे गए, जिनमें संवाद और ध्वनि-प्रभाव ही सब कुछ हैं।
स्वतंत्रता के बाद नुक्कड़ नाटक और प्रयोगधर्मी एकांकी भी आए।
विषय: सामाजिक कुरीतियाँ, दहेज, नारी-समस्या, मध्यवर्गीय जीवन, इतिहास, राष्ट्रीयता, मनोविज्ञान।
महत्वपूर्ण शब्द
एकांकी – एक अंक में पूरा होने वाला लघु नाटक।
प्रहसन – हास्य-व्यंग्य प्रधान छोटा नाटक।
संकलन-त्रय – स्थान, समय और कार्य की एकता।
अभिनेयता – मंच पर सफलतापूर्वक खेले जाने का गुण।
रंग-संकेत – मंच-सज्जा और अभिनय के निर्देश।
ध्वनि-नाटक – रेडियो के लिए लिखा गया नाटक।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
भारतेंदु हरिश्चंद्र – अंधेर नगरी (प्रहसन)।
जयशंकर प्रसाद – एक घूँट।
भुवनेश्वर – कारवाँ।
डॉ. रामकुमार वर्मा – पृथ्वीराज की आँखें, रेशमी टाई।
उपेंद्रनाथ 'अश्क' – तौलिए; जगदीशचंद्र माथुर – भोर का तारा, रीढ़ की हड्डी।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. एकांकी किसे कहते हैं?
एक अंक में समाप्त होने वाले उस लघु नाटक को एकांकी कहते हैं, जिसमें एक घटना या समस्या को कम पात्रों और सीमित समय में प्रस्तुत किया जाता है।
Q2. डॉ. रामकुमार वर्मा के दो एकांकी-संग्रहों के नाम लिखिए।
'पृथ्वीराज की आँखें' और 'रेशमी टाई'।
Q3. एकांकी के तत्त्व लिखिए।
कथावस्तु: एक केंद्रीय घटना।
पात्र और चरित्र-चित्रण: कम पात्र।
संवाद: छोटे, चुस्त, नाटकीय।
देश-काल-वातावरण और संकलन-त्रय।
अभिनेयता और रंग-संकेत।
उद्देश्य।
Q4. नाटक और एकांकी का अंतर स्पष्ट कीजिए।
अंक: अनेक बनाम एक।
कथा: विस्तृत जीवन बनाम एक घटना।
पात्र: अधिक बनाम कम।
समय: लंबा बनाम संक्षिप्त।
प्रभाव: व्यापक बनाम तीव्र और केंद्रित।
Q5. हिंदी एकांकी के विकास-क्रम पर प्रकाश डालिए।
पृष्ठभूमि: भारतेंदु युग के प्रहसन।
आरंभ: प्रसाद, भुवनेश्वर, रामकुमार वर्मा।
विकास: अश्क, माथुर, सेठ गोविंददास, उदयशंकर भट्ट।
रेडियो एकांकी और स्वातंत्र्योत्तर प्रयोग।
निष्कर्ष: आज भी विद्यालय-महाविद्यालय मंच की लोकप्रिय विधा।
परीक्षा टिप
'पहला एकांकी' जैसे विवादित प्रश्न में एक ही नाम पर अड़ने के बजाय दो-तीन मत लिखें और अपना निष्कर्ष दें; परीक्षक इसे संतुलित उत्तर मानते हैं।
प्रेमचंद (1880–1936) हिंदी और उर्दू के महान कथाकार हैं, जिन्हें 'उपन्यास सम्राट' और 'कलम का सिपाही' कहा जाता है। उन्होंने किसान, मज़दूर, स्त्री, दलित और मध्यवर्ग के जीवन को सच्चाई के साथ अपनी कहानियों और उपन्यासों में उतारा। उनकी रचनाओं ने हिंदी कथा-साहित्य को मनोरंजन से हटाकर जीवन के यथार्थ से जोड़ा।
मुख्य बिंदु
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ। उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।
आरंभ में वे 'नवाब राय' नाम से उर्दू में लिखते थे।
उनका उर्दू कहानी-संग्रह 'सोज़े वतन' (1908) देशभक्ति के स्वर के कारण अंग्रेज़ी सरकार ने ज़ब्त कर लिया। इसके बाद वे 'प्रेमचंद' नाम से लिखने लगे।
प्रमुख उपन्यास: सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला, गबन, गोदान (1936); मंगलसूत्र अधूरा रह गया।
लगभग तीन सौ कहानियाँ 'मानसरोवर' (आठ भाग) में संकलित हैं।
प्रसिद्ध कहानियाँ: कफ़न, पूस की रात, ईदगाह, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, नमक का दारोगा, शतरंज के खिलाड़ी, ठाकुर का कुआँ, सद्गति, दो बैलों की कथा।
उन्होंने 'हंस' और 'जागरण' पत्रिकाओं का संपादन किया।
1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता की।
आरंभिक रचनाओं में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद है; अंतिम रचनाओं (गोदान, कफ़न) में कठोर यथार्थवाद।
गोदान में किसान होरी का जीवन-संघर्ष है; होरी की गाय पालने की इच्छा और कर्ज़ में डूबा जीवन भारतीय किसान की त्रासदी है। इसे 'भारतीय किसान का महाकाव्य' कहा जाता है।
भाषा सरल, मुहावरेदार हिंदुस्तानी है, जो आम पाठक तक सीधे पहुँचती है।
8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ।
महत्वपूर्ण शब्द
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद – यथार्थ दिखाते हुए आदर्श समाधान की ओर संकेत।
यथार्थवाद – जीवन को जैसा है, वैसा दिखाना।
किसान जीवन – कर्ज़, लगान, महाजन और ज़मींदार का शोषण।
हिंदुस्तानी – हिंदी-उर्दू की मिली-जुली बोलचाल की भाषा।
मानसरोवर – प्रेमचंद की कहानियों का संकलन।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
1880 – जन्म, लमही (वाराणसी)।
1908 – सोज़े वतन; सरकार द्वारा ज़ब्त।
1936 – गोदान का प्रकाशन; प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन की अध्यक्षता; 8 अक्टूबर को निधन।
Q1. प्रेमचंद का मूल नाम क्या था? उन्होंने किस नाम से लिखना शुरू किया?
प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्होंने आरंभ में 'नवाब राय' नाम से उर्दू में लिखना शुरू किया।
Q2. 'कफ़न' कहानी का मूल भाव लिखिए।
'कफ़न' में घीसू और माधव, बुधिया के कफ़न के लिए मिले पैसों से शराब पी जाते हैं। कहानी दिखाती है कि गरीबी और शोषण इंसान की संवेदना को भी मार देते हैं। यह प्रेमचंद के कठोर यथार्थवाद का उदाहरण है।
Q3. प्रेमचंद के कथा-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
ग्रामीण और किसान जीवन का यथार्थ चित्रण।
स्त्री समस्याएँ: दहेज, अनमेल विवाह, विधवा जीवन।
दलितों और शोषितों के प्रति सहानुभूति।
राष्ट्रीय चेतना और गांधीवादी प्रभाव।
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से यथार्थवाद की ओर।
सजीव पात्र और स्वाभाविक संवाद।
सरल, मुहावरेदार भाषा।
Q4. 'गोदान' को भारतीय किसान का महाकाव्य क्यों कहा जाता है?
होरी के माध्यम से पूरे किसान वर्ग की कहानी।
कर्ज़, लगान और महाजनी शोषण।
गाय की लालसा: किसान का छोटा सपना और उसकी त्रासदी।
गाँव और शहर दोनों कथाओं का समानांतर चित्र।
धनिया का साहस, गोबर की नई पीढ़ी की सोच।
अंत में होरी की मृत्यु और 'गोदान' की विडंबना।
Q5. प्रेमचंद की कहानी-कला पर प्रकाश डालिए।
जीवन से लिए गए सरल कथानक।
मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता (ईदगाह का हामिद)।
सामाजिक उद्देश्य और सुधार भावना।
संक्षिप्त, पात्रानुकूल संवाद।
प्रभावशाली अंत।
मानसरोवर में लगभग तीन सौ कहानियाँ।
परीक्षा टिप
प्रेमचंद पर लंबे उत्तर में कम से कम तीन उपन्यास और तीन कहानियों के नाम उदाहरण के रूप में दें; 'गोदान' और 'कफ़न' का उल्लेख अवश्य करें।
आलोचना का अर्थ है किसी साहित्यिक कृति को अच्छी तरह देखकर उसके गुण-दोषों, अर्थ और मूल्य का निर्णय करना। हिंदी में आधुनिक आलोचना भारतेंदु युग में पुस्तक-समीक्षा के रूप में शुरू हुई, द्विवेदी युग में परिचयात्मक और तुलनात्मक बनी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हाथों वैज्ञानिक और व्यवस्थित हुई और शुक्लोत्तर युग में स्वच्छंदतावादी, मनोविश्लेषणवादी, मार्क्सवादी आदि अनेक धाराओं में विकसित हुई।
मुख्य बिंदु
संस्कृत काव्यशास्त्र (रस, अलंकार, ध्वनि) और रीतिकालीन लक्षण-ग्रंथ आलोचना की पुरानी परंपरा हैं।
भारतेंदु युग: पत्रिकाओं में पुस्तक-समीक्षा; बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' और बालकृष्ण भट्ट प्रमुख।
द्विवेदी युग: महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भाषा और नैतिकता की कसौटी पर निर्णयात्मक आलोचना की ('रसज्ञ रंजन')।
मिश्रबंधुओं ने 'हिंदी नवरत्न' में नौ कवियों का क्रम तय किया; पद्मसिंह शर्मा ने बिहारी पर तुलनात्मक आलोचना की, जिससे 'देव बड़े या बिहारी' विवाद चला।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: 'हिंदी साहित्य का इतिहास', 'चिंतामणि', 'रस मीमांसा'; तुलसी, सूर और जायसी पर विस्तृत आलोचनाएँ।
शुक्लजी की कसौटी लोकमंगल और रस है; उन्होंने रीतिकाल और रहस्यवाद की आलोचना की और तुलसी को सर्वोच्च माना।
हजारीप्रसाद द्विवेदी: 'हिंदी साहित्य की भूमिका', 'कबीर'; ऐतिहासिक-सांस्कृतिक दृष्टि; कबीर का नया मूल्यांकन।
नंददुलारे वाजपेयी: छायावाद के समर्थक; स्वच्छंदतावादी (सौष्ठववादी) आलोचना।
डॉ. नगेंद्र: रसवादी और मनोविश्लेषणवादी आलोचना।
डॉ. रामविलास शर्मा: मार्क्सवादी आलोचना; 'निराला की साहित्य साधना'।
नामवर सिंह: 'कविता के नए प्रतिमान', 'दूसरी परंपरा की खोज'; नई कविता और समकालीन साहित्य का मूल्यांकन।
मुक्तिबोध ('एक साहित्यिक की डायरी') ने रचना-प्रक्रिया और सामाजिक दायित्व पर गहन चिंतन किया।
आज दलित और स्त्री दृष्टि से भी साहित्य का पुनर्मूल्यांकन हो रहा है।
महत्वपूर्ण शब्द
आलोचना / समालोचना – कृति का सम्यक् मूल्यांकन।
निर्णयात्मक आलोचना – निश्चित मानदंडों पर अच्छा-बुरा तय करना।
तुलनात्मक आलोचना – दो रचनाकारों/कृतियों की तुलना।
मार्क्सवादी आलोचना – सामाजिक-आर्थिक संबंधों के आधार पर मूल्यांकन।
मनोविश्लेषणवादी आलोचना – लेखक और पात्रों के मनोविज्ञान के आधार पर।
लोकमंगल – समाज-कल्याण की कसौटी (शुक्ल)।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
रामचंद्र शुक्ल – हिंदी साहित्य का इतिहास (1929), चिंतामणि, रस मीमांसा।
हजारीप्रसाद द्विवेदी – हिंदी साहित्य की भूमिका, कबीर।
रामविलास शर्मा – निराला की साहित्य साधना।
नामवर सिंह – कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज।
मिश्रबंधु – हिंदी नवरत्न।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. 'कविता के नए प्रतिमान' के लेखक कौन हैं?
डॉ. नामवर सिंह।
Q2. आचार्य शुक्ल की आलोचना की मुख्य कसौटी क्या है?
लोकमंगल और रस; जो साहित्य समाज के कल्याण और हृदय के विस्तार में सहायक हो, वही श्रेष्ठ है।
Q3. द्विवेदी युग की आलोचना की विशेषताएँ लिखिए।
निर्णयात्मक और सुधारवादी दृष्टि।
भाषा-शुद्धि पर बल।
परिचयात्मक आलोचना (मिश्रबंधु)।
तुलनात्मक आलोचना (पद्मसिंह शर्मा)।
नैतिक मानदंड।
Q4. हिंदी आलोचना में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
पहला व्यवस्थित साहित्येतिहास।
सैद्धांतिक (रस मीमांसा) और व्यावहारिक (तुलसी, सूर, जायसी) आलोचना।
लोकमंगल की कसौटी।
सीमाएँ: रीतिकाल, कबीर और छायावाद के प्रति कठोरता।
निष्कर्ष: हिंदी आलोचना के शिखर-पुरुष।
Q5. शुक्लोत्तर हिंदी आलोचना की प्रमुख धाराओं का परिचय दीजिए।
विमर्श का अर्थ है किसी वर्ग के अनुभव, पीड़ा और अधिकारों पर केंद्रित गंभीर चिंतन। दलित विमर्श जाति-व्यवस्था के कारण सदियों से अपमान और शोषण झेलते आए समाज का साहित्य है, जो 'स्वानुभूति' (अपने भोगे हुए अनुभव) पर आधारित है और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से प्रेरित है। स्त्री विमर्श पितृसत्ता के कारण स्त्री के साथ होने वाले भेदभाव को सामने लाकर उसकी अस्मिता, स्वतंत्रता और समानता की बात करता है। हिंदी में दोनों विमर्श 1980 के बाद विशेष रूप से उभरे।
मुख्य बिंदु
हिंदी दलित साहित्य पर मराठी दलित साहित्य का गहरा प्रभाव है; महाराष्ट्र इस आंदोलन की प्रमुख भूमि रहा।
आरंभिक स्वर के रूप में हीरा डोम की कविता 'अछूत की शिकायत' का उल्लेख होता है, जो 'सरस्वती' पत्रिका में छपी थी।
दलित साहित्य की कसौटी: स्वानुभूति बनाम सहानुभूति – दलित लेखक मानते हैं कि भोगा हुआ यथार्थ ही प्रामाणिक है।
प्रमुख दलित आत्मकथाएँ: ओमप्रकाश वाल्मीकि – 'जूठन'; मोहनदास नैमिशराय – 'अपने-अपने पिंजरे'; तुलसीराम – 'मुर्दहिया'; कौशल्या बैसंत्री – 'दोहरा अभिशाप' (दलित स्त्री की आत्मकथा)।
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने 'दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र' में दलित साहित्य की अलग कसौटी पर विचार किया।
दलित साहित्य के मूल्य: समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय; जाति, अंधविश्वास और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का विरोध।
स्त्री विमर्श की पृष्ठभूमि: महादेवी वर्मा के निबंध 'शृंखला की कड़ियाँ'; पश्चिम में सिमोन द बोउवार की 'द सेकंड सेक्स' (हिंदी अनुवाद प्रभा खेतान – 'स्त्री उपेक्षिता')।
Q5. दलित विमर्श और स्त्री विमर्श की समानताओं और अंतरों पर विचार कीजिए।
समानता: हाशिए की आवाज़, अस्मिता, समानता की माँग, आत्मकथा का महत्त्व।
अंतर: जाति बनाम लिंग आधारित शोषण; प्रेरणा-स्रोत।
दलित स्त्री का दोहरा शोषण।
साहित्य और समाज पर प्रभाव।
परीक्षा टिप
विमर्श वाले प्रश्नों में लेखक–रचना के ठोस उदाहरण ही अंक दिलाते हैं। कम से कम चार नाम उनकी रचनाओं के साथ लिखें और महाराष्ट्र के दलित आंदोलन का संदर्भ जोड़ें।
काव्यशास्त्र के आरंभिक प्रश्न तीन हैं: काव्य क्या है (लक्षण), काव्य की रचना कैसे संभव होती है (हेतु) और काव्य क्यों रचा व पढ़ा जाता है (प्रयोजन)। संस्कृत आचार्यों – भामह, दंडी, वामन, मम्मट, विश्वनाथ, जगन्नाथ – ने काव्य की अलग-अलग परिभाषाएँ दीं। मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' में काव्य के तीन हेतु (शक्ति/प्रतिभा, निपुणता/व्युत्पत्ति, अभ्यास) और छह प्रयोजन बताए। पश्चिमी और हिंदी विद्वानों ने भी काव्य को अपने ढंग से परिभाषित किया।
मुख्य बिंदु
भामह: शब्द और अर्थ का साथ-साथ होना काव्य है – "शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्"।
दंडी: इच्छित अर्थ से युक्त पदावली काव्य का शरीर है।
वामन: रीति को काव्य की आत्मा माना।
मम्मट ('काव्यप्रकाश'): दोष-रहित, गुण-सहित शब्द और अर्थ काव्य है; अलंकार कहीं-कहीं स्पष्ट न हों तब भी काव्य हो सकता है।
विश्वनाथ ('साहित्यदर्पण'): रसात्मक वाक्य ही काव्य है – "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्"।
पंडितराज जगन्नाथ ('रसगंगाधर'): रमणीय अर्थ प्रकट करने वाला शब्द काव्य है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल: हृदय की मुक्तावस्था को रस-दशा कहा और उस अवस्था के लिए वाणी जो शब्द-विधान करती है, उसे कविता माना।
पश्चिमी परिभाषाएँ: वर्ड्सवर्थ – प्रबल भावों का स्वतःस्फूर्त प्रवाह; कॉलरिज – सर्वोत्तम शब्द सर्वोत्तम क्रम में; मैथ्यू आर्नल्ड – जीवन की आलोचना।
काव्य-हेतु (मम्मट): शक्ति/प्रतिभा (जन्मजात क्षमता), निपुणता/व्युत्पत्ति (लोक, शास्त्र और काव्य के अध्ययन से प्राप्त ज्ञान), अभ्यास (काव्य-मर्मज्ञ की शिक्षा में लगातार रचना)। अधिकांश आचार्य प्रतिभा को प्रमुख मानते हैं।
काव्य-प्रयोजन (मम्मट): यश, अर्थ (धन), व्यवहार-ज्ञान, अमंगल का नाश, तुरंत परम आनंद, कांता-सम्मित उपदेश।
'कांता-सम्मित उपदेश' का अर्थ है पत्नी की तरह मधुर, प्रिय ढंग से दी गई सीख – वेद (प्रभु-सम्मित) और पुराण (मित्र-सम्मित) से भिन्न।
आधुनिक दृष्टि में आनंद और लोकमंगल दोनों काव्य के प्रमुख प्रयोजन हैं।
रस को काव्य की आत्मा कहा गया है। काव्य पढ़ने, सुनने या नाटक देखने से जो आनंद मिलता है, वही रस है। आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में रस-सूत्र दिया। रस के चार अंग हैं: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव। मुख्य रूप से नौ रस माने जाते हैं, और बाद में वात्सल्य तथा भक्ति को जोड़कर ग्यारह।
मुख्य बिंदु
भरतमुनि का रस-सूत्र: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
भरतमुनि ने नाटक के संदर्भ में आठ रस बताए; शांत रस बाद में जोड़ा गया।
स्थायी भाव: मन में स्थायी रूप से रहने वाले भाव, जो रस में बदलते हैं।
विभाव: भाव जगाने वाले कारण। इसके दो भेद: आलंबन (जिसके कारण भाव जागे) और उद्दीपन (जो भाव को बढ़ाए, जैसे चाँदनी, एकांत)।
अनुभाव: भाव जागने पर शरीर की चेष्टाएँ, जैसे आँसू, रोमांच, काँपना।
संचारी (व्यभिचारी) भाव: थोड़ी देर के लिए आने-जाने वाले भाव; इनकी संख्या 33 मानी जाती है (जैसे चिंता, हर्ष, शंका, लज्जा)।
श्रृंगार को रसराज कहा जाता है; इसके दो भेद हैं: संयोग और वियोग (विप्रलंभ)।
महत्वपूर्ण शब्द
रस – काव्य से मिलने वाला अलौकिक आनंद।
सहृदय – काव्य का रस लेने वाला संवेदनशील पाठक/दर्शक।
आलंबन – भाव का मुख्य आधार (जैसे नायक-नायिका)।
उद्दीपन – भाव को तीव्र करने वाली परिस्थितियाँ।
आश्रय – जिसके मन में भाव जागता है।
साधारणीकरण – पात्र का भाव सहृदय का अपना भाव बन जाना।
भाषा अध्ययन
रस और उनके स्थायी भाव
रस
स्थायी भाव
श्रृंगार
रति
हास्य
हास
करुण
शोक
रौद्र
क्रोध
वीर
उत्साह
भयानक
भय
वीभत्स
जुगुप्सा (घृणा)
अद्भुत
विस्मय
शांत
निर्वेद
वात्सल्य
वत्सलता (संतान के प्रति स्नेह)
भक्ति
भगवद्-विषयक रति (अनुराग)
उदाहरण
संयोग श्रृंगार (बिहारी): "बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करै भौंहनि हँसै, दैन कहै नटि जाय॥" – गोपियों ने कृष्ण से बात करने के लालच में मुरली छिपा दी।
वियोग श्रृंगार (सूरदास): "निसिदिन बरसत नैन हमारे।" – कृष्ण के वियोग में गोपियों की आँखें दिन-रात बरसती हैं।
वीर (सुभद्राकुमारी चौहान): "बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।"
रौद्र (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ वध): "श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।"
करुण (हरिऔध, प्रियप्रवास): "प्रिय पति, वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?" – कृष्ण के मथुरा जाने पर यशोदा का विलाप।
वात्सल्य (सूरदास): "मैया मैं नहिं माखन खायो।"
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. रस की परिभाषा और रस-सूत्र लिखिए।
काव्य पढ़ने-सुनने या नाटक देखने से सहृदय को जो अलौकिक आनंद मिलता है, उसे रस कहते हैं। भरतमुनि का रस-सूत्र है: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"।
Q2. वीर और रौद्र रस के स्थायी भाव बताइए।
वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है और रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है।
Q3. रस के अंगों का सोदाहरण परिचय दीजिए।
स्थायी भाव: रति, शोक, क्रोध आदि।
विभाव: आलंबन (नायिका) और उद्दीपन (चाँदनी, बसंत)।
अनुभाव: आँसू, मुस्कान, रोमांच।
संचारी भाव: लज्जा, चिंता, हर्ष (33)।
आश्रय: जिसके मन में भाव जागे।
उदाहरण: वियोग श्रृंगार में गोपियाँ आश्रय, कृष्ण आलंबन, आँसू अनुभाव, चिंता संचारी।
Q4. श्रृंगार रस को रसराज क्यों कहा जाता है? उसके भेद उदाहरण सहित लिखिए।