"वाचन मेला" एक चित्र-पाठ है। इसमें एक पुस्तक प्रदर्शनी (वाचन मेले) का दृश्य दिखाया गया है, जहाँ विज्ञान कथा, बाल साहित्य, किशोर साहित्य, ऑडियो बुक्स और ई-बुक्स के अलग-अलग स्टॉल हैं। पाठ का उद्देश्य है कि बच्चे चित्र को ध्यान से देखें, उस पर बोलें और पढ़ने की आदत डालें।
मुख्य बिंदु
विधा: चित्रवाचन (देखो, समझो और बताओ)।
मेले में किताबों के कई विभाग हैं: विज्ञान कथा, बाल साहित्य, किशोर साहित्य।
नई तकनीक के रूप भी हैं: ऑडियो बुक्स (सुनने वाली किताबें) और ई-बुक्स (मोबाइल/कंप्यूटर पर पढ़ने वाली किताबें)।
मेले में ग्रंथदिंडी (किताबों की शोभायात्रा) भी निकलती है।
घोषवाक्य: "पुस्तकें हैं हम सबकी साथी, प्रज्वलित करें ज्ञान की बाती।"
दूसरा घोषवाक्य: पुस्तकों से ज्ञान पाएँ, भाषाएँ और विज्ञान जानें।
प्रदर्शनी में उद्घोषणाएँ (अनाउंसमेंट) होती हैं, जिन्हें ध्यान से सुनना है।
किताबें हमारी सच्ची मित्र हैं – वे ज्ञान, मनोरंजन और अच्छे संस्कार देती हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
वाचन – पढ़ना।
प्रदर्शनी – चीजें दिखाने का आयोजन।
घोषवाक्य – छोटा, याद रहने वाला नारा।
ग्रंथदिंडी – पुस्तकों की शोभायात्रा।
ई-बुक – डिजिटल रूप में किताब।
ऑडियो बुक – आवाज में रिकॉर्ड की गई किताब।
भाषा अध्ययन
"पढ़ेगा भारत, बढ़ेगा भारत।"
"रोज पढ़ो एक किताब, ज्ञान मिलेगा बेहिसाब।"
घोषवाक्य बनाना – छोटा, तुकांत और संदेश वाला हो:
संज्ञा पहचानो: पुस्तक, मेला, विज्ञान, भाषा (जातिवाचक/भाववाचक)।
समानार्थी: पुस्तक – किताब, ग्रंथ; ज्ञान – विद्या; साथी – मित्र, दोस्त।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. वाचन मेले में कौन-कौन से स्टॉल थे?
विज्ञान कथा, बाल साहित्य, किशोर साहित्य, ऑडियो बुक्स और ई-बुक्स।
Q2. ई-बुक और ऑडियो बुक में क्या अंतर है?
ई-बुक को मोबाइल या कंप्यूटर की स्क्रीन पर पढ़ते हैं; ऑडियो बुक को सुनते हैं।
Q3. पुस्तकें पढ़ने के चार लाभ लिखो।
ज्ञान बढ़ता है।
भाषा और शब्द भंडार सुधरता है।
अच्छा मनोरंजन होता है।
सोचने और कल्पना करने की शक्ति बढ़ती है।
Q4. अपने विद्यालय में होने वाले पुस्तक मेले की उद्घोषणा लिखो।
"सभी विद्यार्थियों के लिए सूचना!"
"कल सुबह 10 बजे विद्यालय के सभागृह में पुस्तक मेला शुरू होगा।"
"यहाँ कहानी, विज्ञान और सामान्य ज्ञान की किताबें मिलेंगी।"
"सभी अवश्य पधारें।"
Q5. पुस्तक पर दो घोषवाक्य बनाओ।
"पुस्तकें हैं हम सबकी साथी, प्रज्वलित करें ज्ञान की बाती।"
"किताबों से करो दोस्ती, कभी न होगी ज्ञान की कमी।"
परीक्षा टिप
चित्र-पाठ में चित्र की हर चीज का नाम लेकर पूरे वाक्य में बोलने का अभ्यास करो; घोषवाक्य छोटा और तुकांत रखो।
"फूल और काँटे" कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता है। फूल और काँटा एक ही पौधे पर, एक ही जगह जन्म लेते हैं, उन पर एक-सी चाँदनी, बारिश और हवा पड़ती है – फिर भी उनके स्वभाव अलग होते हैं। कवि बताते हैं कि मनुष्य ऊँचे कुल में जन्म लेने से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से बड़ा बनता है।
मुख्य बिंदु
कवि: अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (जन्म: 1865, आजमगढ़, उ.प्र.; मृत्यु: 1947)। खड़ी बोली हिंदी के प्रारंभिक कवियों में मूर्धन्य; हिंदी के एक आधार स्तंभ।
"दादी माँ का परिवार" रमाकांत 'कांत' की लयात्मक कहानी है। दादी माँ के परिवार में नीलू चिड़िया, उसके बच्चे टीनू-मीनू और चिंकी चुहिया व उसके बेटे चुसकू-मुसकू रहते हैं। एक दिन चिड़ियाँ बहेलिए के जाल में फँस जाती हैं, पर एक साथ उड़कर जाल समेत दादी माँ के घर पहुँचती हैं और चिंकी चुहिया जाल काटकर उन्हें आजाद करती है। कहानी सिखाती है कि संकट में शांति, धैर्य और एकता से काम लेना चाहिए।
मुख्य बिंदु
लेखक: रमाकांत 'कांत' (जन्म: 25 अक्तूबर 1949)। रचनाएँ: "एक तेरे बिना", "सुनो कहानी", "सरस बाल कथाएँ", "जंगल की कहानियाँ", "परिश्रम का वरदान", "सूझ-बूझ की कथाएँ" आदि।
दादी माँ अकेली रहती थीं, फिर भी घर आबाद था। आँगन के बरगद पर नीलू चिड़िया का घोंसला था, पेड़ के नीचे बिल में चिंकी चुहिया रहती थी।
नीलू के दो बच्चे हुए – टीनू-मीनू; चिंकी के दो बेटे – चुसकू-मुसकू। दादी माँ सबको एकता का पाठ पढ़ाती थीं।
एक दिन नीलू बच्चों और दूसरी चिड़ियों के साथ खलिहान में दाना चुगने गई; सब बहेलिए के जाल में फँस गए।
सब रोने लगे, पर टीनू-मीनू शांत रहे और दादी माँ की सीख याद दिलाई।
टीनू ने युक्ति बताई: मीनू "एक, दो, तीन, चार" कहेगी और सब एक साथ, एक ही दिशा में उड़ेंगे।
सब जाल सहित उड़ गए; बहेलिया ठगा-सा रह गया – "एकता के आगे था हारा।"
पक्षी दादी माँ के आँगन में उतरे। दादी माँ ने कहा, "एक और एक ग्यारह होते हैं", और चिंकी से मदद माँगने को कहा।
चिंकी ने अपने पैने दाँतों से जाल काट दिया; सब आजाद हुए। "अंत भला तो सब भला।"
महत्वपूर्ण शब्द
बहेलिया – पक्षी पकड़ने वाला शिकारी।
युक्ति – उपाय।
क्लांत – थका हुआ, उदास।
हमजोली – साथी, दोस्त।
खलिहान – जहाँ फसल रखी और साफ की जाती है।
भाषा अध्ययन
पंखा → पंखे; थैली → थैलियाँ; दीवार → दीवारें; राजा → राजा
"देहात और शहर" अभिषेक पांडेय के लिखे दो पत्र हैं। पहले पत्र में "देहात" अपने मित्र "शहर" को अपनी खुशियाँ (डिजिटल क्रांति, स्वच्छता) और दुख (पानी, अस्पताल, बेरोजगारी, पलायन) बताता है। दूसरे पत्र में "शहर" जवाब देता है कि शहर में भी भीड़ और परेशानियाँ हैं, और गाँव के विकास के उपाय सुझाता है। पत्रों में बढ़ती जनसंख्या को सबसे बड़ी समस्या बताया गया है।
मुख्य बिंदु
लेखक: अभिषेक पांडेय (जन्म: 29 जनवरी 1992, मुंबई) – सम-सामयिक विषयों पर लेखन।
विधा: पत्र (अनौपचारिक)। पहला पत्र 1 अगस्त 2017, दूसरा 15 अगस्त 2017 का।
देहात की खुशियाँ: मोबाइल से नई सूचनाएँ, "स्वच्छ ग्राम-स्वस्थ ग्राम" परियोजना, "घर-घर में शौचालय" के प्रति जागरूकता, आधुनिक खेती की जानकारी।
देहात के दुख: पीने का पानी दूर से लाना, विद्यालयों में सुविधाओं की कमी, महाविद्यालय दूर, अच्छे अस्पताल नहीं, बेरोजगारी, आपसी झगड़े, गुटबाजी।
लोग रोजगार और चमक-दमक के लिए शहर जा रहे हैं; गाँव में मजदूर नहीं मिलते। परिवार कल्याण के प्रति कुछ लोग अब भी उदासीन हैं।
शहर का जवाब: परिवर्तन सृष्टि का नियम है; धीरे-धीरे विकास होगा ("धीरे-धीरे रे मना...")।
शहर में भी "चिराग तले अँधेरा" है – बढ़ती भीड़, बुरी बस्तियाँ; गाँव से आए कई लोग बाद में पछताते हैं।
सुझाव: "छोटा परिवार-सुखी परिवार", व्यावसायिक कौशल और कंप्यूटर शिक्षा, ग्रामीण खिलाड़ियों को प्रोत्साहन, सहकारिता पर आधारित लघु उद्योग, फलोत्पादन, औषधीय वनस्पतियों की खेती, पशुपालन।
शहर गाँव को भाग्यशाली मानता है – प्रदूषणमुक्त वातावरण, हरे पेड़, तारों भरा आसमान।
दोनों की समस्याओं का मूल कारण: बढ़ती आबादी, अशिक्षा और गरीबी।
महत्वपूर्ण शब्द
देहात – गाँव, ग्रामीण क्षेत्र।
दूरध्वनि – टेलीफोन।
पलायन – रोजगार के लिए गाँव छोड़कर जाना।
सहकारिता – मिल-जुलकर, साझेदारी से काम करना।
अनौपचारिक पत्र – मित्र या परिवार को लिखा गया निजी पत्र।
"बंदर का धंधा" नरेंद्र गोयल की एक हास्य बाल कविता है। एक बंदर को टूटा-फूटा आला (स्टेथोस्कोप) मिलता है, तो वह पेड़ के नीचे कुरसी-मेज लगाकर जानवरों का "डॉक्टर" बन जाता है। वह भालू, बिल्ली और लोमड़ी को जड़ी-बूटियों से इलाज बताता है और उसका धंधा चल निकलता है। कविता हँसी-हँसी में वनौषधियों (जड़ी-बूटियों) के पारंपरिक उपचार बताती है।
मुख्य बिंदु
कवि: नरेंद्र गोयल (जन्म: 21 अक्तूबर 1963, पिलखुवा, गाजियाबाद, उ.प्र.) – बाल मनोविज्ञान के ज्ञाता; बालोपयोगी अनेक रचनाएँ।
"'पृथ्वी' से 'अग्नि' तक" डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की आत्मकथा का अंश है। इसमें भारत की स्वदेशी मिसाइलों "पृथ्वी" और "अग्नि" के प्रक्षेपण की कहानी है। "अग्नि" का प्रक्षेपण कई बार तकनीकी "होल्ड" और खराब मौसम के कारण टला, पर वैज्ञानिकों ने हिम्मत नहीं हारी और अंत में सफलता पाई। पाठ धैर्य, टीम भावना और देशप्रेम सिखाता है।
मुख्य बिंदु
लेखक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (जन्म: 15 अक्तूबर 1931, रामेश्वरम, तमिलनाडु; मृत्यु: 27 जुलाई 2015) – भारत के राष्ट्रपति रहे; "भारतरत्न" से सम्मानित। रचनाएँ: "अग्नि की उड़ान", "छुआ आसमान" आदि।
विधा: आत्मकथा अंश।
"पृथ्वी" के प्रक्षेपण के लिए श्रीहरिकोटा केंद्र में लॉन्च-पैड, ब्लॉक-हाउस, नियंत्रण उपकरण और चलित दूर-मिति केंद्र बनाए गए।
"पृथ्वी" 25 फरवरी 1988 को सुबह 11:23 बजे छोड़ा गया – भारत के रॉकेट विज्ञान के इतिहास में युगांतरकारी घटना। इससे भारत निर्देशित मिसाइलों में आत्मनिर्भर देशों के समूह में पहुँचा।
"अग्नि" को टेक्नोलॉजी प्रदर्शन परियोजना के रूप में बनाया गया; टीम में 500 से अधिक वैज्ञानिक थे।
20 अप्रैल 1989 को प्रक्षेपण तय था, पर टी-14 सेकंड पर एक उपकरण की गड़बड़ी और "होल्ड" से उसे टालना पड़ा। टीम सदमे में थी।
कलाम जी ने अपने एस.एल.वी.-3 के अनुभव से टीम का हौसला बढ़ाया – "आपकी मिसाइल अभी आपके सामने है, कुछ भी ऐसा नहीं खोया जो सुधारा न जा सके।"
दस दिनों में काम पूरा हुआ, पर टी-10 सेकंड पर फिर "होल्ड" आया; फिर चक्रवात का खतरा आया।
अंत में प्रक्षेपण 22 मई 1989 को तय हुआ। रक्षामंत्री ने उपहार पूछा, तो कलाम जी ने आर.सी.आई. में लगाने के लिए एक लाख पौधे माँगे।
सुबह 7:10 बजे "अग्नि" ने उड़ान भरी – परिपूर्ण प्रक्षेपण; 600 सेकंड की भव्य उड़ान ने पाँच साल की थकान धो डाली।
"जहाँ चाह, वहाँ राह" अनुराधा मोहिनी की कहानी है (हिंदी अनुवाद: संजय भारद्वाज)। येसंबा गाँव के बीच से एक नाला बहता था; बरसात में उसमें पानी भर जाने से बच्चे पाठशाला नहीं जा पाते थे। बच्चों ने मिलकर नाले पर पुल बनाने का विचार किया और गाँव वालों के सामूहिक श्रमदान से केवल पंद्रह दिनों में पुल बन गया। कहानी सिखाती है कि पक्का संकल्प और एकता हो तो असंभव भी संभव हो जाता है।
मुख्य बिंदु
लेखिका: अनुराधा मोहिनी (जन्म: 21 सितंबर 1961, नागपुर, महाराष्ट्र) – अनुवाद के क्षेत्र में अमूल्य योगदान; पारिभाषिक कोशों की निर्मिति में सहभाग।
विधा: कहानी (अनुवादित)।
येसंबा गाँव की बस्ती नाले के एक तरफ थी, पाठशाला और खेत दूसरी तरफ। बरसात में नाले में चार-पाँच फीट पानी भर जाता था।
गाँव में गीत चल पड़ा था – "वही नाला, बरसात... पाठशाला से छुट्टी, येसंबा की यही कहानी।"
अनुपस्थिति से अच्छे विद्यार्थी भी परीक्षा में पीछे रह जाते। उज्ज्वला की चौदह अनुपस्थितियाँ हो चुकी थीं।
बरगद के नीचे तुषार ने भूत की बात की, तो जुई ने कहा – भूत-वूत सब कोरी कल्पना है (वैज्ञानिक दृष्टिकोण)।
तुषार बोला, "हम बच्चे कर भी क्या सकते हैं?" पर दामिनी ने कहा, "हर समस्या का निदान संभव है; कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"
आशीष ने हल सुझाया – नाले पर लगभग दस फीट का पुल बनाएँगे; विज्ञान की पुस्तक और अंतरजाल से जानकारी लेंगे।
बच्चों ने समूह बनाए, सामग्री की सूची बनाई, बीस-बीस रुपये जमा किए; शिक्षक और गाँव वाले भी जुड़े। छगनबाबा ने रेत दी।
पंद्रह दिनों में श्रमदान से पुल तैयार हुआ। जुई ने उद्घाटन का वृत्तांत बनाकर संगणक की मदद से शिक्षा निरीक्षक को दिखाया।
महत्वपूर्ण शब्द
लाँघना – पार करना।
निदान / हल – समाधान।
भाँपना – अंदाज लगाना।
हौसला – हिम्मत।
प्रचुर – बहुत अधिक।
श्रमदान – बिना पैसे लिए सबके भले के लिए मेहनत करना।
भाषा अध्ययन
कहावत: जहाँ चाह, वहाँ राह = इच्छा पक्की हो तो रास्ता मिल ही जाता है।
मुहावरे: हाथ पर हाथ धरे बैठना = कुछ न करना; जंगल की आग की तरह फैलना = बात बहुत जल्दी फैलना।
उद्देश्य और विधेय – वाक्य में जिसके बारे में कहा जाए वह उद्देश्य, जो कहा जाए वह विधेय:
वाक्य
उद्देश्य
विधेय
हिमालय भारत का गौरव है।
हिमालय
भारत का गौरव है
परिश्रम सफलता की कुंजी है।
परिश्रम
सफलता की कुंजी है
बच्चों ने पुल बनाया।
बच्चों ने
पुल बनाया
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. येसंबा गाँव के बच्चे बरसात में पाठशाला क्यों नहीं जा पाते थे?
गाँव के बीच बहने वाले नाले में बरसात में चार-पाँच फीट पानी भर जाता था; बस्ती एक तरफ और पाठशाला दूसरी तरफ थी।
Q2. पुल बनाने का विचार किसने दिया?
आशीष ने।
Q3. पुल बनाने के लिए क्या-क्या प्रयास किए गए?
बच्चों ने छोटे समूह बनाकर योजना बनाई, सामग्री की सूची बनाई।
बीस-बीस रुपये जमा किए; शिक्षक और ग्रामवासी भी जुड़े।
सीमेंट के पाइप, पत्थर, ईंटें, मिट्टी जुटाई; छगनबाबा ने रेत दी।
पूरे गाँव ने श्रमदान से पंद्रह दिनों में पुल बना दिया।
Q4. पात्रों के स्वभाव लिखो: जुई, दामिनी, आशीष, तुषार।
जुई – अंधविश्वास न मानने वाली, वैज्ञानिक सोच।
दामिनी – आत्मविश्वासी, हिम्मत बढ़ाने वाली।
आशीष – गंभीर, उपाय खोजने वाला।
तुषार – पहले निराश और अंधविश्वासी, बाद में साथ देने वाला।
Q5. "एकता और श्रमदान से गाँव का विकास" – अपने विचार लिखो।
सरकार की राह देखने के बजाय गाँव खुद पहल कर सकता है।
बुजुर्गों का अनुभव, युवाओं की शक्ति, बच्चों का उत्साह मिलकर बड़ा काम करते हैं।
सड़क, तालाब, स्वच्छता जैसे काम श्रमदान से हो सकते हैं।
इससे आपसी प्रेम और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
परीक्षा टिप
कहानी का शीर्षक ही उसकी सीख है – उत्तर के अंत में "जहाँ चाह, वहाँ राह" का अर्थ जरूर लिखो।
"जीवन नहीं मरा करता है" गोपालदास सक्सेना 'नीरज' का प्रसिद्ध गीत है। कवि कहते हैं कि कुछ सपने टूटने, कुछ दीप बुझने या कुछ खिलौने खोने से जीवन खत्म नहीं हो जाता। जीवन निरंतर चलता रहता है, इसलिए छोटी-छोटी असफलताओं पर आँसू बहाने के बजाय आगे बढ़ना चाहिए।
मुख्य बिंदु
कवि: गोपालदास सक्सेना 'नीरज' (जन्म: 4 जनवरी 1924, पुरावली, इटावा, उ.प्र.) – पद्मभूषण से सम्मानित; कवि सम्मेलनों के प्रसिद्ध काव्य वाचक और विख्यात गीतकार।
रचनाएँ: "बादर बरस गयो", "नीरज रचनावली", "नीरज की गीतिकाएँ", "दर्द दिया है"।
विधा: गीत। हर पद के अंत में "...नहीं मरा करता है" की टेक है।
छिप-छिपकर आँसू बहाने वालों से कवि कहते हैं – कुछ सपनों के मरने से जीवन नहीं मरता।
माला बिखर गई तो समस्या ही हल हो गई; कुछ दीप बुझने से आँगन नहीं मरता।
यहाँ कुछ भी खोता नहीं, केवल पोथी की जिल्द बदलती है – जैसे रात चाँदनी उतारकर सुबह धूप की धोती पहन लेती है।
कुछ खिलौने खोने से बचपन नहीं मरता।
कितनी बार गगरियाँ फूटीं, पर पनघट पर शिकन नहीं आई; कितनी बार नावें डूबीं, पर किनारे पर चहल-पहल वही है।
पतझड़ लाख कोशिश करे, उपवन नहीं मरता।
माली ने उपवन लूटा, पर फूल की गंध नहीं लुटी; कुछ चेहरों की नाराजगी से दर्पण नहीं मरता।
संदेश: जीवन शाश्वत है; "कालचक्र निरंतर गतिमान है।"
महत्वपूर्ण शब्द
नीलाम होना – बिक जाना।
जिल्द – पुस्तक का बाहरी आवरण।
तम – अंधकार।
शिकन – सिलवट, चिंता।
पनघट – जहाँ लोग पानी भरते हैं।
किश्ती – नाव; मुखड़ा – चेहरा।
पतझर – पत्ते झरने की ऋतु।
भाषा अध्ययन
मुहावरा: गले लगाना = प्यार से मिलना। वाक्य: मेले में बिछुड़े भाई को उसने गले लगा लिया।
छोटा कोष्ठक ( ) – अर्थ या स्पष्टीकरण के लिए: पनघट (पानी भरने की जगह)।
बड़ा/वर्गाकार कोष्ठक [ ] – कोष्ठक के अंदर दूसरा कोष्ठक घेरने के लिए।
मँझला/सर्पाकार कोष्ठक { } – गणित आदि में समूह बनाने के लिए।
हंसपद ^ – लिखते समय छूटा हुआ शब्द जोड़ने के लिए।
कोष्ठक के प्रकार:
"दीप" से नए शब्द: दीपक, दीपावली, दीपशिखा, दीपमाला, दीपस्तंभ।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. "लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है" – अर्थ लिखो।
पतझड़ में पेड़ों के पत्ते गिर जाते हैं, पर बगीचा खत्म नहीं होता; वसंत आते ही वह फिर हरा-भरा हो जाता है। वैसे ही दुख के बाद सुख आता है।
Q2. "कितनी बार गगरियाँ फूटीं, शिकन न पर आई पनघट पर" – अर्थ लिखो।
पानी भरते समय कई बार घड़े फूटते हैं, फिर भी पनघट उदास नहीं होता, वहाँ रौनक बनी रहती है। कुछ नुकसान से जीवन नहीं रुकता।
Q3. जीवन की शाश्वतता बताने वाले कविता के उदाहरण लिखो।
दीप बुझने पर भी आँगन रहता है।
खिलौने खोने पर भी बचपन रहता है।
नावें डूबने पर भी किनारे पर चहल-पहल रहती है।
पतझड़ के बाद भी उपवन रहता है।
Q4. कविता का मुख्य आशय लिखो।
छोटी असफलताओं और नुकसान पर निराश नहीं होना चाहिए।
जीवन में बदलाव आते हैं, पर जीवन नष्ट नहीं होता।
जैसे रात के बाद सुबह आती है, वैसे दुख के बाद सुख।
हमें आशा रखकर आगे बढ़ना चाहिए।
Q5. "सौर ऊर्जा" पर टिप्पणी लिखो।
सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा सौर ऊर्जा है।
सोलर पैनल से बिजली, सोलर कुकर, सोलर वाटर हीटर में उपयोग।
यह कभी खत्म न होने वाली और प्रदूषणरहित ऊर्जा है।
इससे कोयला-पेट्रोल की बचत होती है।
परीक्षा टिप
इस गीत में हर उदाहरण "छोटा नुकसान – बड़ा जीवन" की जोड़ी है (दीप–आँगन, खिलौने–बचपन, पतझर–उपवन); यही जोड़ियाँ कृति में पूछी जाती हैं।
"अस्पताल" दूसरी इकाई का चित्र-पाठ है। इसमें एक अस्पताल का दृश्य है – आई.सी.यू., वार्ड, दवा का काउंटर, व्हीलचेयर पर मरीज, डॉक्टर, नर्स और प्रतीक्षा करते लोग। दीवारों पर लगी सूचनाएँ ("शांति बनाए रखें", "रोगी से अधिक बातें न करें") हमें अस्पताल में सही व्यवहार करना सिखाती हैं।
मुख्य बिंदु
विधा: चित्रवाचन (पहचानो, समझो और बताओ)।
चित्र में विभाग: आई.सी.यू. (गहन चिकित्सा कक्ष), वार्ड, दवाइयों का काउंटर, प्रतीक्षा कक्ष।
लोग: डॉक्टर (हाथ में फाइल), नर्स, व्हीलचेयर पर पैर में प्लास्टर वाला मरीज, बच्चे को गोद में लिए माँ, कुर्सियों पर बैठे परिजन।
सूचना फलक: "शांति बनाए रखें", "रोगी से अधिक बातें न करें", रोगी से मिलने का समय – सुबह 8 से 12 और शाम 4 से 7 बजे तक।
जनजागृति के पोस्टर: नेत्रदान, रक्तदान महादान, "छोटा परिवार – सुखी परिवार"।
सफाई के लिए कूड़ादान रखा गया है।
अस्पताल में शांति, स्वच्छता और नियमों का पालन जरूरी है, ताकि मरीज जल्दी ठीक हों।
महत्वपूर्ण शब्द
आई.सी.यू. – गंभीर मरीजों के लिए विशेष कक्ष।
वार्ड – जहाँ मरीज भर्ती रहते हैं।
रक्तदान – जरूरतमंद के लिए अपना खून देना।
नेत्रदान – मृत्यु के बाद आँखें दान करना, जिससे अंधे व्यक्ति को रोशनी मिले।
व्हीलचेयर – पहियों वाली कुर्सी।
भाषा अध्ययन
सूचना वाक्य – आदेश या निवेदन के रूप में: "शांति बनाए रखें।" "कृपया कूड़ा कूड़ादान में डालें।"
संज्ञा पहचानो: डॉक्टर, नर्स, मरीज, दवा, अस्पताल (जातिवाचक); शांति, स्वच्छता (भाववाचक)।
"बेटी युग" आनंद विश्वास की कविता है। कवि कहते हैं कि अब बेटी युग का नया दौर है, जिसमें बेटा-बेटी दोनों पढ़ेंगे और आगे बढ़ेंगे। केवल बेटा पढ़े तो आधी शिक्षा है, दोनों पढ़ें तो पूरी शिक्षा। कविता बेटियों की शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है।
मुख्य बिंदु
कवि: आनंद विश्वास (जन्म: जुलाई 1949, शिकोहाबाद, उ.प्र.) – अंधविश्वास और कठिनाइयों के विरुद्ध विद्रोही स्वर रखने वाले कवि।
रचनाएँ: "मिटने वाली रात नहीं", "पर कटी पाँखी", "देवम", "गरमागरम थपेड़े लू के", "बहादुर बेटी"।
विधा: गीत/कविता। टेक: "नानी वाली कथा-कहानी, अब भी जग में लगे सुहानी।"
बेटी युग के नए दौर की नई कहानी लिखनी है।
बेटा-बेटी सभी पढ़ेंगे, सभी बढ़ेंगे; फौलादी नेक इरादों से अपना इतिहास खुद गढ़ेंगे।
देश पढ़ेगा तो देश बढ़ेगा।
"बेटा शिक्षित आधी शिक्षा, दोनों शिक्षित पूरी शिक्षा।"
सारे जग को शिक्षामय करने का संकल्प; अब कोई अनपढ़ नहीं होगा, सबके हाथों में पुस्तक होगी।
ज्ञानगंगा की पावन धारा हर आँगन तक पहुँचेगी; पुस्तक और कलम की शक्ति सब जानते हैं।
बेटी युग सम्मान पर्व, पुण्य पर्व और ज्ञान पर्व है; सब सबका सम्मान करें तो यह जन-जन का उत्थान पर्व है।
महत्वपूर्ण शब्द
दौर – काल, समय।
नेक – भला, अच्छा; इरादा – संकल्प।
फौलादी – लोहे जैसा मजबूत।
उत्थान – प्रगति।
पर्व – त्योहार।
सयानी – समझदार; सुहानी – सुंदर।
भाषा अध्ययन
मुहावरा: ठान लेना = निश्चय करना। वाक्य: उसने रोज पढ़ने की ठान ली।
"दो लघुकथाएँ" में अकबर-बीरबल की दो कहानियाँ हैं – "हरा घोड़ा" और "सेठ का चित्र"। दोनों में बीरबल अपनी बुद्धिमानी और चतुराई से मुश्किल समस्याओं का हल निकालते हैं। पहली कहानी में वे बादशाह को निरुत्तर करते हैं और दूसरी में एक कंजूस, धूर्त सेठ से गरीब चित्रकार को न्याय दिलाते हैं।
मुख्य बिंदु
अकबर महान शासक थे; बीरबल उनके नवरत्नों में से एक थे।
(अ) हरा घोड़ा: बगीचे की हरियाली देखकर अकबर ने बीरबल से एक सप्ताह में हरे रंग का घोड़ा लाने को कहा; वे बीरबल की बुद्धि परखना चाहते थे।
दोनों जानते थे कि हरा घोड़ा होता ही नहीं; फिर भी बीरबल ने आदेश सिर-आँखों पर रखा।
आठवें दिन बीरबल बोले – घोड़ा मिल गया, पर मालिक की दो शर्तें हैं।
शर्त 1: बादशाह को घोड़ा लेने स्वयं जाना होगा। शर्त 2: घोड़ा अलग रंग का है, इसलिए सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी और दिन देखना होगा।
बादशाह निरुत्तर हो गए और मन-ही-मन बीरबल की चतुराई पर खुश हुए।
(ब) सेठ का चित्र: एक कंजूस सेठ हर बार "चित्र ठीक नहीं है" कहकर चित्रकार को पैसे नहीं देता था।
चित्रकार की बुद्धिमान पत्नी ने उसे अकबर के दरबार में न्याय माँगने भेजा। सेठ बोला – एक भी चित्र हू-ब-हू मेरे चेहरे जैसा नहीं।
बीरबल समझ गए कि सेठ चेहरा बदलने का नाटक करता है। उन्होंने चित्रकार से तीन दिन बाद एक बड़ा दर्पण लाने को कहा।
दर्पण में सेठ ने अपना ही प्रतिबिंब देखा और मान लिया कि यह उसका रूप है; चालाकी पकड़ी गई, वह लज्जित हुआ और चित्रकार को मेहनताना दिया। बीरबल ने "दूध का दूध, पानी का पानी" कर दिया।
महत्वपूर्ण शब्द
नवरत्न – अकबर के दरबार के नौ गुणी व्यक्ति।
निरुत्तर – जिसके पास कोई उत्तर न हो।
हू-ब-हू – बिल्कुल वैसा ही।
तकादा – बार-बार माँग करना।
मेहनताना – काम की मजदूरी।
प्रतिबिंब – दर्पण में दिखने वाली छवि।
भाषा अध्ययन
रीतिवाचक: चुपचाप, धीरे-धीरे – गाड़ी धीरे-धीरे चल रही थी।
कालवाचक: आज, अभी – माँ आज अस्पताल जाएगी।
स्थानवाचक: यहाँ, वहाँ – मेरा गाँव यहाँ बसा है।
परिमाणवाचक: बहुत, थोड़ा – वह बहुत बोलता है।
क्रियाविशेषण अव्यय – क्रिया की विशेषता बताने वाले शब्द:
मुहावरे: सिर-आँखों पर रखना = आदर से मानना; दूध का दूध, पानी का पानी करना = सही न्याय करना; मात देना = हराना; मुँह लटकाना = उदास होना।
सुवचन: "सत्यमेव जयते" – सत्य की ही जीत होती है।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. बीरबल ने हरे घोड़े के मालिक की कौन-सी दो शर्तें बताईं?
(1) बादशाह को घोड़ा लेने स्वयं जाना होगा। (2) घोड़ा सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी और दिन ही देखा जा सकता है।
Q2. सेठ चित्रकार को पैसे क्यों नहीं देता था?
वह बहुत कंजूस और धूर्त था; हर बार कह देता कि चित्र ठीक नहीं बना, ताकि पैसे न देने पड़ें।
Q3. बीरबल ने सेठ को कैसे सबक सिखाया?
सेठ की चालाकी समझ गए कि वह चेहरा बदलने का नाटक करता है।
चित्रकार से तीन दिन बाद बड़ा दर्पण लाने को कहा।
दर्पण में सेठ ने अपना रूप देखा और मान लिया कि वही उसका रूप है।
सेठ लज्जित हुआ और चित्रकार को उसका मेहनताना दिया।
Q4. दोनों कहानियों से बीरबल के कौन-से गुण दिखते हैं?
तीव्र बुद्धि और हाजिरजवाबी।
असंभव लगने वाली समस्या का शांत, चतुर हल।
गरीब और कलाकार के प्रति न्याय की भावना।
बादशाह के आदेश का सम्मान।
Q5. "कला और कलाकार का सम्मान क्यों जरूरी है?" – अपने विचार लिखो।
कलाकार की मेहनत और प्रतिभा का उचित मूल्य मिलना चाहिए।
सम्मान से कला और संस्कृति की रक्षा व संवर्धन होता है।
जहाँ कलाकारों की इज्जत होती है, वह देश विश्व में प्रसिद्ध होता है।
वारली, मधुबनी जैसी लोक-कलाएँ इसी सम्मान से जीवित हैं।
परीक्षा टिप
दोनों कहानियों की "समस्या – बीरबल का उपाय – परिणाम" तीन पंक्तियों में लिखने का अभ्यास करो।
"शब्द संपदा" डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे का निबंध है। लेखक बताते हैं कि मनुष्य की प्रगति का मूल भाषा है और शब्दों में बड़ी शक्ति होती है – शब्द जोड़ते भी हैं और तोड़ते भी हैं। मनुष्यों की तरह शब्दों के भी स्वभाव होते हैं। दूसरी भाषाओं के शब्दों से हिंदी समृद्ध हुई है, पर जिन शब्दों के लिए अपनी भाषा में सुंदर शब्द हैं, उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए।
मुख्य बिंदु
लेखक: डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे (जन्म: 7 अगस्त 1942, गुलबर्गा, कर्नाटक) – मराठी भाषी हिंदी लेखक, प्राध्यापक, अनुवादक, समीक्षक; लगभग 65 पुस्तकें, जैसे "अनुवाद का समाज शास्त्र", "हिंदी कथा साहित्य और देश विभाजन"।
विधा: निबंध।
मनुष्य की प्रगति इसलिए हुई क्योंकि उसके मस्तिष्क ने भाषा की खोज की; भाषा ही सभी ज्ञानशाखाओं के विकास की जड़ है।
भाषा = सार्थक शब्दों का व्यवस्थित, क्रमबद्ध संयोजन।
अक्षर ध्वनि के निर्जीव चिह्न हैं; मनुष्य उन्हें अर्थ देकर जीवंत बनाता है।
शब्दों के भी स्वभाव होते हैं – कुछ हँसाते हैं, कुछ दुख देते हैं, कुछ प्रिय, कुछ धोखा देने वाले, कुछ सभ्य और सुसंस्कृत, कुछ निष्क्रिय बनाने वाले ("जो भाग्य में है वही मिलेगा")। निष्क्रिय बनाने वाले शब्दों को जीवन से निकाल देना चाहिए।
अंग्रेजी के कई शब्द दूसरी भाषाओं में घुल-मिल गए: बस, रेल, कार, रेडियो, स्टेशन, ब्रश, पेंसिल, स्कूटर।
तमिळ के शब्द अधिकतर अपने द्रविड़ परिवार तक सीमित रहते हैं; हिंदी के शब्द मिलनसार हैं।
दो भाषाओं के मेल से बने शब्द: वर्षगाँठ, माँगपत्र (हिंदी-संस्कृत), थानेदार, किताबघर (हिंदी-अरबी/फारसी), रेलयात्री, रेडियो तरंग (अंग्रेजी-संस्कृत)।
माई, अम्मा, बाबा, बापू जैसे सुंदर शब्द छोड़कर "मम्मी-डैडी" कहना अपनी भाषा का अपमान है।
हमारे शब्द हमारे चरित्र और संस्कार दिखाते हैं; एक गलत शब्द से वर्षों की दोस्ती में दरार पड़ सकती है।
महत्वपूर्ण शब्द
संपदा – धन, संपत्ति।
भाषा – सार्थक शब्दों का व्यवस्थित संयोजन।
निष्क्रिय – काम न करने वाला।
समृद्ध – संपन्न, भरपूर।
प्रतिशब्द – दूसरी भाषा के शब्द के बदले अपना शब्द।
भाषा अध्ययन
समोच्चारित (एक जैसे सुनाई देने वाले) भिन्नार्थक शब्द:
मील (दूरी) – मिल (कारखाना/मिलना): लक्ष्मी मिल यहाँ से दस मील दूर है।
दिन – दीन (गरीब): दिन-रात दीन-दुखियों की सेवा करो।
प्रण (प्रतिज्ञा) – प्राण (जान): प्राण छोड़ दूँगा पर प्रण नहीं छोड़ूँगा।
कुल (वंश/सारा) – कूल (किनारा): नदी के कूल का कुल जल समेटा नहीं जा सकता।
"बसंत गीत" चंद्रप्रकाश 'चंद्र' का लोकगीत शैली का गीत है। इसमें बसंत ऋतु के आने पर प्रकृति में होने वाले बदलाव और सभी प्राणियों में फैले उल्लास का सुंदर वर्णन है – फूल मुसकाते हैं, भौंरे गुनगुनाते हैं, मोर नाचता है, कोयल गाती है और खेतों में सरसों फूलती है।
मुख्य बिंदु
कवि: चंद्रप्रकाश 'चंद्र' (जन्म: 3 अक्टूबर 1957, बुलंदशहर, उ.प्र.) – कवि, लेखक, निर्देशक, अभिनेता; बहुप्रतिभा के धनी।
रचनाएँ: "खयाल ऊपर और ऊपर" (लघुकथा), टेलीफिल्म, गीत, बालगीत आदि।
विधा: गीत (लोकभाषा/ब्रज की मिठास वाला)। टेक: "सजि आयो रे, ऋतु बसंत सजि आयो।"
बसंत ऋतु सज-धजकर आई है; कवि सबको गाने के लिए बुलाते हैं।
कली-कली के फूल आनंद से मंद-मंद मुसकाने लगे।
भौंरों के झुंड गुन-गुन करते हुए फूलों का मधु और मकरंद चुराते हैं।
वन-वन, बाग-बगीचों में सुहानी सुगंध फैल गई।
मोर ठुमक-ठुमककर नाच रहा है और कोयल गीत गा रही है।
पीली-पीली सरसों फूली है, आम के पेड़ों पर बौर (मंजरी) छा गया है।
हरी-हरी मटर के बिछौने पर मानो अनगिनत रंग बरस रहे हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
ऋतु बसंत – फरवरी-मार्च की सुहानी ऋतु, "ऋतुराज"।
कलोल – आनंद, खेलकूद।
कुसुम – फूल।
मधुप – भौंरा; गन – झुंड, समूह।
मकरंद – फूलों का रस/पराग।
बौर – आम की मंजरी; अमवा – आम।
अमित – अनगिनत।
भाषा अध्ययन
ध्वन्यात्मक और पुनरुक्त शब्द: गुन-गुन, मंद-मंद, ठुमकि-ठुमकि, बन-बन, बाग-बाग, पीली-पीली, हरी-हरी, कलि-कलि। इनसे गीत में लय और संगीत आता है।
लोकभाषा के शब्द और खड़ी बोली रूप: सजि आयो – सज आया; मुस्कायो – मुसकाया; कोयलिया – कोयल; मयूरा – मोर; अरु – और।
"चंदा मामा की जय" मंगल सक्सेना की बाल एकांकी है। आधी रात को बादलों के देश में रातरानी की अदालत लगती है, जहाँ नींदपरी शरारती बच्चों – सुनील, अनिल और अन्य – की शिकायतें करती है। रातरानी सजा देने वाली होती है, तभी चंदा मामा आकर बच्चों के गुण बताते हैं। बच्चे बुरी आदतें छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं और सबको क्षमा मिल जाती है।
मुख्य बिंदु
लेखक: मंगल सक्सेना (जन्म: 1936, बीकानेर, राजस्थान; मृत्यु: जुलाई 2016) – कवि, नाट्य निर्देशक, राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव। रचना: "मैं तुम्हारा स्वर" आदि।
विधा: एकांकी। समय: अर्धरात्रि; स्थान: बादलों का देश।
पात्र: सुनील (8 वर्ष), अनिल (5 वर्ष), चार छोटे बच्चे, रातरानी (13), नींदपरी (11), चंदा मामा (14), दो तारे, तीन पहरेदार।
रातरानी काली पोशाक में, सामने हथौड़ी रखकर न्यायाधीश की तरह बैठी है।
नींदपरी की शिकायतें: अनिल बहुत रोता है; सुनील ने चाय की कप-प्लेटें तोड़ीं, माँ से पिटकर सोया, माँ का कहना नहीं मानता, कोई काम समय पर नहीं करता, बड़ों को "तू" कहता है।
सुनील ने "कहती है" कहा, तो रातरानी बोलीं – बड़ों के लिए "कहती हैं" कहना चाहिए।
अनिल ने कहा – रोने से लड्डू मिलते हैं; सुनील – रोने से बताशे मिलते हैं। सब हँस पड़े।
चंदा मामा आए ("जयहिंद") और कहा – किसी की बुराई के साथ उसकी अच्छाई भी ढूँढ़नी चाहिए।
बच्चों के गुण: सुनील छोटे बच्चों को कभी नहीं पीटता, प्यार करता है; बच्चे बड़ों का आदर करते हैं, आपस में नहीं झगड़ते।
बच्चों ने सब बुरी आदतें छोड़ने की प्रतिज्ञा की; रातरानी बोलीं – "सबको क्षमा किया जाता है।" बच्चों ने "चंदा मामा की जय" कहा।
महत्वपूर्ण शब्द
एकांकी – एक अंक का नाटक।
सेविका – सेवा करने वाली।
कड़ी – कठोर।
मजाक – हँसी-ठट्ठा।
शैतानी – शरारत।
प्रतिज्ञा – पक्का वादा।
भाषा अध्ययन
मुहावरा: गला फाड़कर रोना = जोर-जोर से रोना। वाक्य: खिलौना टूटा तो बच्चा गला फाड़कर रोने लगा।
और: सर्वेश ने परिश्रम किया और सफल हुआ।
परंतु: मैं कर्ज में डूबा था परंतु असंतोष न था।
अथवा: माता जी अथवा पिता जी के हस्ताक्षर लाओ।
तो: मैं लगातार चलता तो मंजिल पा लेता।
क्योंकि: मुझे सौ-सौ के नोट देने पड़े क्योंकि दुकानदार के पास छुट्टे नहीं थे।
समुच्चयबोधक अव्यय – दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने वाले शब्द:
आदरसूचक प्रयोग: बड़ों के लिए बहुवचन क्रिया – "दादी जी कहती हैं", "पिता जी आए हैं"।
रातरानी ने सुनील से कहा, क्योंकि वह बड़ों का मजाक उड़ा रहा था।
Q2. किसने कहा: "सबको क्षमा किया जाता है।" और क्यों?
रातरानी ने कहा, क्योंकि बच्चों ने सब बुरी आदतें छोड़ने की प्रतिज्ञा की और चंदा मामा ने उनके गुण बताए।
Q3. नींदपरी ने सुनील की कौन-सी शिकायतें कीं?
चाय की कप-प्लेटें तोड़ीं।
माँ का कहना नहीं मानता।
खाना, खेलना, पढ़ना – कोई काम समय पर नहीं करता।
बड़ों को "तू" कहता है और दूसरों को पीटता है।
Q4. चंदा मामा ने रातरानी को क्या सीख दी?
एक व्यक्ति में गुण अधिक और बुराइयाँ कम हों तो उसे क्षमा करना चाहिए।
बुराई के साथ अच्छाई भी ढूँढ़नी चाहिए।
सुनील छोटों से प्यार करता है, बच्चे बड़ों का आदर करते हैं।
इसलिए उन्हें सजा देना अन्याय होगा।
Q5. एकांकी से मिलने वाले नैतिक मूल्यों की सूची बनाओ।
बड़ों का आदर और छोटों से प्यार।
माँ-बाप का कहना मानना, समय पर काम करना।
बात-बात पर न रोना, जिद न करना।
दूसरों के गुण देखना, क्षमा करना; निवेदन विनम्र शब्दों में करना।
परीक्षा टिप
"किसने, किससे, कब कहा" वाले प्रश्नों के लिए पात्रों के संवाद पहचानना सीखो – रातरानी (न्यायाधीश), नींदपरी (शिकायत करने वाली), चंदा मामा (न्याय दिलाने वाले)।
"रहस्य" डॉ. हरिकृष्ण देवसरे की कहानी है। आर्यन गरमी की छुट्टियों में मामा जी के गाँव आता है, जहाँ सामने की पुरानी हवेली को "भूतों का डेरा" कहा जाता है। आर्यन और उसकी ममेरी बहन कनिष्का हिम्मत करके हवेली में जाते हैं और कैमरे से फोटो खींचते हैं – वहाँ भूत नहीं, डाकुओं का गिरोह था। उनकी बहादुरी से डाकू पकड़े जाते हैं। कहानी अंधविश्वास छोड़कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।
मुख्य बिंदु
लेखक: डॉ. हरिकृष्ण देवसरे (जन्म: 1940, नागोद, म.प्र.; मृत्यु: 14 नवंबर 2013) – बालसाहित्य रचना और समीक्षा में प्रशंसनीय योगदान। रचना: "संपूर्ण बाल विज्ञान कथाएँ" आदि।
विधा: कहानी (रहस्य-साहस कथा)।
हवेली में 10-15 सालों से कोई नहीं रहता था; मामा जी कहते थे वहाँ भूतों का डेरा है – घीसू उधर गया तो तीन महीने खाट पकड़े रहा।
आर्यन जानता था कि भूत-वूत कपोल कल्पना है; विज्ञान के शिक्षक ने उसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण समझाया था।
आधी रात को हवेली में रोशनी दिखती थी। आर्यन ने कनिष्का से सलाह-मशविरा किया।
मामा जी के पास विदेशी डिजिटल कैमरा था, जो कम रोशनी में बिना फ्लैशगन के भी फोटो खींच लेता था।
रात में दोनों दबे पाँव हवेली में गए। अंदर पगड़ी बाँधे, बड़ी मूँछों वाले, लाल आँखों वाले लोग थे; गले में कारतूसों की पेटी, बंदूकें और तलवारें।
कनिष्का ने गैस बत्तियों की तेज रोशनी में कई फोटो खींचे; आर्यन ने नारायणपुर जाकर फोटो तैयार कराए।
फोटो में लोगों के पैर सीधे थे, छाया थी – "इनसान ही भूत हैं"; अपना रहस्य छिपाने के लिए उन्होंने भूतों की अफवाह फैलाई थी।
थानेदार ने पहचाना – यह कई वर्षों से उत्पात मचाने वाला डाकुओं का गिरोह था। पुलिस के छापे में डाकू पकड़े गए। कलेक्टर ने दोनों के नाम वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रपति कार्यालय भेजे।
महत्वपूर्ण शब्द
रहस्य – छिपी हुई बात।
हवेली – पुराना बड़ा मकान।
कपोल कल्पना – मन से गढ़ी झूठी बात।
अफवाह – बिना आधार की फैलाई गई बात।
अंधश्रद्धा / अंधविश्वास – बिना सोचे-समझे गलत बातों पर विश्वास।
राहजनी – रास्ते में लूटपाट।
भाषा अध्ययन
मुहावरे: कमर कसना = तैयार होना; खाट पकड़ना = बीमार होना; तारीफ के पुल बाँधना = बहुत प्रशंसा करना; आँखें खुली की खुली रह जाना = हैरान होना; खून-पसीना एक करना = बहुत मेहनत करना।
"हम चलते सीना तान के" डॉ. हरिवंशराय बच्चन का प्रयाण गीत (अभियान गीत) है। सैनिक कहते हैं कि हमारे धर्म, जाति, भाषा और प्रदेश अलग हो सकते हैं, पर फौजी वर्दी में हम सबसे पहले हिंदुस्तान के हैं। भारतमाता के बेटे गर्व से सीना तानकर चलते हैं और देश के लिए बलिदान देने में सबसे आगे रहते हैं। कविता समता, बंधुता, श्रम और देशप्रेम का संदेश देती है।
मुख्य बिंदु
कवि: डॉ. हरिवंशराय बच्चन (जन्म: 27 नवंबर 1907, इलाहाबाद, उ.प्र.; मृत्यु: 18 जनवरी 2003) – हिंदी कविता में उत्तर छायावाद के प्रमुख कवि।
रचनाएँ: "मधुशाला", "मधुकलश", "निशा निमंत्रण", "क्या भूलूँ क्या याद करूँ", "नीड़ का निर्माण फिर", "दस द्वार से सोपान तक" आदि।
विधा: प्रयाण गीत। टेक: "भारतमाता के बेटे हम चलते सीना तान के।"
धर्म, जाति, वर्ण, भाषा अलग हों; पर्वत, समुद्र तट, वन, मरुस्थल, मैदान – कहीं से भी आएँ, फौजी वर्दी में हम सबसे पहले हिंदुस्तान के हैं।
जिस मिट्टी में हम खेले-खाए, उसके रजकणों ने हमें ममता और समता से अपनाया; उनके एहसान का कर्ज चुकाना है।
सदियों से इस देश की पूजा में श्रम के फूल चढ़ाए गए; रक्षा में पुरखों ने अनगिनत शीश कटाए।
हम देश के गौरव और मान के रखवाले हैं।
हम गिर जाएँ पर देश का निशान (झंडा) नहीं गिरने देंगे; हम मिट जाएँ पर हिंदुस्तान को नहीं मिटने देंगे।
बलिदान के अवसर पर हम सबसे आगे रहते हैं।
युद्ध में दिखाए वीरत्व और विवेक की गाथाएँ गाँव, नगर और घर-घर में गाई जाएँगी।
महत्वपूर्ण शब्द
प्रयाण गीत – आगे बढ़ते हुए (मार्च करते हुए) गाया जाने वाला जोशीला गीत।