१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 1
नवनिर्माण
संक्षिप्त सार
नवनिर्माण में कवि त्रिलोचन की चतुष्पदियाँ हैं (‘चुनी हुईं कविताएँ’ संग्रह से)। इनमें कवि का आशावाद दिखता है – वे मनुष्य को अँधेरे से लड़ने, बल का उपयोग पीड़ितों को बचाने और न्याय दिलाने में करने तथा नर-नारी मिलकर नए समाज की रचना करने की प्रेरणा देते हैं। समानता, स्वतंत्रता और मानवता की स्थापना ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: त्रिलोचन (वास्तविक नाम वासुदेव सिंह; जन्म २० अगस्त १९१७, कटघरा चिरानी पट्टी, सुल्तानपुर, उ.प्र.; निधन २००७) – हिंदी के साथ अरबी-फारसी के ज्ञाता; पत्रकारिता में सक्रिय; दबे-कुचले ग्राम समाज के कवि; भाषा लोकभाषा से अनुप्राणित, मुहावरेदार।
कृतियाँ: ‘धरती’, ‘दिगंत’, ‘गुलाब और बुलबुल’, ‘उस जनपद का कवि हूँ’, ‘सबका अपना आकाश’ (कविता संग्रह), ‘देशकाल’ (कहानी संग्रह), ‘दैनंदिनी’ (डायरी)।
विधा – चतुष्पदी: चार चरणों वाला छंद, चौपाई जैसा; पहले, दूसरे और चौथे चरण में तुक; हर चतुष्पदी अपने-आप में पूर्ण।
तुमने विश्वास और आकाश (ऊँचे सपने) दिए हैं, मैं उन्हें धरती पर (यथार्थ में) सँभालूँगा।
हम कहीं भी उड़ जाएँ, भूमि को छोड़ नहीं सकते – अपनी जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है।
राह में अँधेरा और बाधाएँ हैं, फिर भी आगे बढ़ते चलो।
बल सताने के लिए नहीं, पीड़ित को बचाने और न्याय दिलाने के लिए होता है।
जिसे मंजिल का पता होता है, वही पथ के संकट सहता है और सिद्धि के शिखर पर बैठकर अपना इतिहास कहता है।
प्रीति, नीति और गीति की राह पर चलने का आह्वान।
नर-नारी संगी और सहचर हैं – दोनों मिलकर काँटों का ताज लेंगे और नया समाज रचेंगे।
वर्तमान कहता है – अतीत अच्छा था, पर मेरा गीत भविष्य गाएगा।
महत्वपूर्ण शब्द
व्योम – आकाश
उच्छ्वास – मन की उमंग, ऊपर की ओर ली गई साँस
सिद्धि – सफलता
सहचर – साथ चलने वाला, मित्र
मीत – मित्र
काँटों का ताज (मुहावरा) – कठिन जिम्मेदारी
भाषा अध्ययन
उपसर्गयुक्त शब्द: नीति → अनीति, कुनीति, सुनीति; बल → निर्बल, सबल, प्रबल।
प्रतीक: आकाश – ऊँचे आदर्श/सपने; भूमि – यथार्थ; अँधेरा – बाधाएँ, अन्याय; काँटों का ताज – संघर्ष।
वाक्य शुद्धि (पाठ के अभ्यास से):
अतिथि आए है, घर में सामान नही है। → अतिथि आए हैं, घर में सामान नहीं है।
परंतु अग्यान भी अपराध है। → परंतु अज्ञान भी अपराध है।
उसके सत्य का पराजय हो जाता है। → उसके सत्य की पराजय हो जाती है।
दिलीप अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थी। → दिलीप अपने माँ-बाप की इकलौती संतान था।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कृति पूर्ण कीजिए : बल इसके लिए होता है – (१) … (२) …
(१) पीड़ित को बचाने के लिए। (२) न्याय दिलाने के लिए।
Q2. जिसे मंजिल का पता रहता है, वह – (१) … (२) …
(१) पथ के संकट सहता है। (२) एक दिन सिद्धि के शिखर पर बैठकर अपना इतिहास कहता है।
Q3. चतुष्पदी के लक्षण लिखिए।
चार चरणों वाला छंद, चौपाई की तरह।
पहले, दूसरे और चौथे चरण में तुकबंदी।
भाव और विचार की दृष्टि से हर चतुष्पदी अपने-आप में पूर्ण।
Q4. रसास्वादन कीजिए (रचनाकार, पसंद की पंक्तियाँ, कारण, केंद्रीय भाव)।
रचनाकार – त्रिलोचन।
पसंद की पंक्तियाँ – ‘बल नहीं होता सताने के लिए, वह है पीड़ित को बचाने के लिए।’
कारण – शक्ति के सही उपयोग की सीख; सरल, मुहावरेदार भाषा और तुकबंदी से गेयता।
केंद्रीय भाव – आशावाद, संघर्ष की प्रेरणा, न्याय, समानता और नर-नारी के सहयोग से नवनिर्माण।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘समाज का नवनिर्माण और विकास नर-नारी के सहयोग से ही संभव है।’
समाज रूपी रथ के नर और नारी दो पहिये हैं।
शिक्षा, विज्ञान, खेल, राजनीति – हर क्षेत्र में स्त्रियाँ समान योगदान दे रही हैं।
घर और बाहर की जिम्मेदारियाँ मिलकर निभाने से परिवार और देश मजबूत होता है।
समान अवसर और सम्मान से ही सच्चा विकास होगा।
परीक्षा टिप
बोर्ड में ‘रसास्वादन’ के चार मुद्दे (रचनाकार, पसंद की पंक्तियाँ, कारण, केंद्रीय भाव) पूरे लिखें। ‘चतुष्पदी के लक्षण’ साहित्य संबंधी सामान्य ज्ञान में पूछे जाते हैं।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 2
निराला भाई
संक्षिप्त सार
निराला भाई महादेवी वर्मा का संस्मरण है, जिसमें वे छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के फक्कड़, उदार, अतिथिप्रिय, संवेदनशील और क्रांतिकारी व्यक्तित्व का चित्र खींचती हैं। राखी के प्रसंग से शुरू होकर लेखिका उनकी दानशीलता, आतिथ्य, मित्रों के प्रति चिंता और संन्यासी वृत्ति के मार्मिक प्रसंग बताती हैं।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: महादेवी वर्मा (जन्म २६ मार्च १९०७, फर्रुखाबाद, उ.प्र.; निधन १९८७) – छायावाद की प्रमुख स्तंभ, सफल कवयित्री और गद्यकार। निराला ने उन्हें ‘हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती’ कहा; आलोचकों ने ‘आधुनिक मीरा’ कहा।
कृतियाँ: ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘दीपशिखा’, ‘सांध्यगीत’, ‘यामा’ (कविता), ‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘मेरा परिवार’ (रेखाचित्र), ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ (निबंध)।
विधा – संस्मरण: स्मृति के आधार पर किसी व्यक्ति के गुणों और उसके साथ घटित प्रसंगों का लेखन।
सावनी पूर्णिमा पर लेखिका ने पूछा – ‘आपको किसी ने राखी नहीं बाँधी?’ निराला बोले – ‘कौन बहिन हम जैसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी !’ तब लेखिका ने उन्हें राखी बाँधी।
निराला ने तीन सौ रुपये लेखिका के पास जमा करके बजट बनवाया, पर तीन दिन में सब दान में चला गया – किसी विद्यार्थी का परीक्षा शुल्क (५०), साहित्यिक मित्र (६०), ताँगेवाले की माँ को मनीऑर्डर (४०), दिवंगत मित्र की भतीजी के विवाह को (१००)।
रजाई, कोट जैसी चीजें भी दूसरे दिन किसी और के कष्ट दूर करने में चली जातीं – लेखिका ने उन्हें ‘औढरदानी’ माना।
आतिथ्य: मैथिलीशरण गुप्त के आने पर नया घड़ा लाकर गंगाजल भरा, घर में जो था सब तख्त पर बिछा दिया; भोजन बनाने से जूठे बर्तन माँजने तक स्वयं करते – ग्रामीण किसान जैसा पुरातन संस्कार।
मित्र-प्रेम: सुमित्रानंदन पंत के स्वर्गवास की झूठी खबर सुनकर वे पत्थर-से हो गए, आँसू बहे; रात भर पार्क में ओस से भीगी दूब पर बैठकर तार के उत्तर की प्रतीक्षा की।
पुरस्कार में मिले धन को ‘संकल्पित अर्थ’ मानकर अपने लिए उपयोग नहीं करते थे।
उन्होंने गेरुए वस्त्र पहनकर संन्यास लिया – ‘मधुकरी (भिक्षा) तो अब भी खाते हैं।’
निराला विचार से क्रांतदर्शी और आचरण से क्रांतिकारी थे – झंझा की तरह, मंद समीर की तरह नहीं; उन्हें समझने के लिए बौद्धिकता के साथ हृदय की संवेदनशीलता चाहिए।
महत्वपूर्ण शब्द
फक्कड़ – मस्तमौला, बेफिक्र
औढरदानी – बिना सोचे-समझे सब कुछ दान देने वाला
अपरिग्रही – संग्रह न करने वाला
मधुकरी – भिक्षा (घर-घर से माँगा भोजन)
गैरिक – गेरुआ
क्रांतदर्शी – दूरदर्शी, युग से आगे देखने वाला
अक्षुण्ण – अखंड, बिना टूटे
भाषा अध्ययन
विधा: संस्मरण; शैली – काव्यात्मक, चित्रात्मक गद्य।
मुहावरे: चादर लंबी करना – आय बढ़ाना; पैर सिकोड़ना – खर्च कम करना; दम लेना – आराम करना; अवाक रह जाना – चकित होना।
उपमा/उत्प्रेक्षा गद्य में: ‘आँसू की बूँदें… मानो प्रतिमा से झड़े जूही के फूल हों’; ‘मानो सुनहली धूप में धुला गेरू के पर्वत का कोई शिखर हो’।
विलोम: मर्यादावादी ↔ विद्रोही; संचय ↔ दान।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कृति पूर्ण कीजिए : निराला जी द्वारा तीन दिन में खर्च किए गए रुपये।
विद्यार्थी का परीक्षा शुल्क – ५०; साहित्यिक मित्र – ६०; ताँगेवाले की माँ को मनीऑर्डर – ४०; दिवंगत मित्र की भतीजी का विवाह – १००।
Q2. ‘कौन बहिन हम जैसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी !’ – इस वाक्य से निराला जी की कौन-सी मनःस्थिति प्रकट होती है?
उनके एकाकी जीवन की व्यथा और अपनी निर्धनता का स्वाभिमान भरा स्वीकार; साथ ही एक अव्यक्त चुनौती।
Q3. निराला जी के आतिथ्य का वर्णन कीजिए।
अतिथि को देवता मानते थे।
गुप्त जी के लिए नया घड़ा, गंगाजल, घर की हर धोती-चादर तख्त पर बिछाई।
घर में सामान न होने पर लेखिका से लकड़ी-घी माँग लाते, पर अतिथि को दूसरे घर भोजन पर नहीं भेजते।
भोजन बनाना, बर्तन माँजना तक स्वयं करते।
Q4. ‘निराला जी के व्यक्तित्व की विशेषताएँ’ पाठ के आधार पर लिखिए।
फक्कड़ और अपरिग्रही; दानशील (औढरदानी)।
अतिथिप्रिय और आत्मीय।
मित्रों के प्रति गहरी संवेदना (पंत प्रसंग)।
स्वाभिमानी; पुरस्कार धन को संकल्पित अर्थ मानना।
विचार से क्रांतदर्शी, आचरण से क्रांतिकारी।
Q5. संस्मरण विधा की विशेषताएँ लिखिए।
स्मृति पर आधारित, वास्तविक व्यक्ति और घटनाएँ।
लेखक स्वयं प्रसंगों का साक्षी होता है।
आत्मीय, भावपूर्ण शैली।
व्यक्ति के गुणों का प्रभावी चित्रण।
परीक्षा टिप
प्रसंगों (राखी, बजट, गुप्त जी का आतिथ्य, पंत की झूठी खबर, संन्यास) को क्रम से याद रखें; ‘व्यक्तित्व की विशेषताएँ’ प्रश्न में हर गुण के साथ एक प्रसंग जोड़ें।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 3
सच हम नहीं; सच तुम नहीं
संक्षिप्त सार
सच हम नहीं; सच तुम नहीं डॉ. जगदीश गुप्त की नयी कविता है (‘नाव के पाँव’ संग्रह से)। कवि कहते हैं कि न हम सच हैं, न तुम – सच केवल सतत संघर्ष है। जो कठिनाइयों से झुकता नहीं, रुकता नहीं, अपनी क्षमता स्वयं पहचानता है और अपने आँसू स्वयं पोंछता है, वही सच्चा जीवन जीता है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: डॉ. जगदीश गुप्त (जन्म १९२४, शाहाबाद, उ.प्र.; निधन २००१) – ‘नयी कविता’ के प्रमुख प्रवर्तक; पौराणिक प्रसंगों को नये संदर्भ दिए; ‘नयी कविता’ पत्रिका निकाली।
कृतियाँ: ‘नाव के पाँव’, ‘शब्द दंश’, ‘हिम विद्ध’, ‘गोपा-गौतम’ (काव्य संग्रह), ‘शंबूक’ (खंडकाव्य), ‘भारतीय कला के पद चिह्न’, ‘नयी कविता : स्वरूप और समस्याएँ’, ‘केशवदास’ (आलोचना)।
विधा – नयी कविता: प्रयोगवाद के बाद की धारा; नये भावबोध, नये मूल्य और नया शिल्प। आरंभ जगदीश गुप्त, रामस्वरूप चतुर्वेदी और विजयदेव साही के संपादन में निकली ‘नयी कविता’ पत्रिका से माना जाता है।
संघर्ष से हटकर जीना, जीना नहीं है; जो झुक गया वह डंठल से झरे फूल की तरह मृत हो गया।
सच्चा जीवन: जो राह भूलकर भी रुका नहीं, हार देखकर झुका नहीं और जिसने मृत्यु को भी जीत लिया।
प्राणों में जड़ता न आए; हर व्यक्ति चुपचाप अपने-आप से लड़ता रहे।
काँटे चुभें या कलियाँ खिलें, इनसान टूटे नहीं – यही यौवन का संदेश है।
सच्चा मिलन वही जो मँझधार को मोड़ दे; जो केवल ढलान पाकर ढले, पानी-सी बहने वाली जिंदगी सच्ची नहीं।
अपने हृदय का सत्य स्वयं खोजना और अपनी आँखों के आँसू स्वयं पोंछने हैं; आकाश सुख नहीं देगा, धरती पसीजती नहीं।
हर राही को भटककर ही दिशा मिली है।
मुस्कान से मन की खिन्नता ढकना बेकार है; तन और मन की भिन्नता आदर्श नहीं हो सकती (भीतर-बाहर एक-सा रहो)।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 4
आदर्श बदला
संक्षिप्त सार
आदर्श बदला सुदर्शन की कहानी है (‘सुदर्शन की श्रेष्ठ कहानियाँ’ से)। अकबर के दरबारी गायक तानसेन ने कानून बनवाया था कि आगरा की सीमा में जो उसकी बराबरी का न हो, वह गाए तो उसे मृत्युदंड मिले। भजन गाते बैजू के पिता इसी नियम से मारे गए। बैजू ने स्वामी हरिदास से बारह वर्ष संगीत सीखा और गानयुद्ध में तानसेन को हराया, पर बदले में उसके प्राण नहीं लिए – केवल उस निष्ठुर नियम को रद्द करवाया। यही ‘आदर्श बदला’ है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: सुदर्शन (वास्तविक नाम बदरीनाथ; जन्म २९ मई १८९५, सियालकोट) – प्रेमचंद की परंपरा के कथाकार; सुधारवादी दृष्टि, आदर्शोन्मुख यथार्थवाद; फिल्मों की पटकथाएँ और गीत भी लिखे। पहली कहानी ‘हार की जीत’।
विधा: कहानी (घटनाप्रधान, सरल-पात्रानुकूल भाषा)।
अकबर के समय तानसेन ने कानून बनवाया – जो रागविद्या में उसकी बराबरी न कर सके, वह आगरा की सीमा में गाए तो मार दिया जाए।
साधुओं की मंडली भजन गाती आगरा आई; बालक बैजू के पिता भी मारे गए। बैजू अनाथ हो गया।
बैजू स्वामी हरिदास के पास गया; उन्होंने बदला लेने का ‘हथियार’ (संगीत) देने का वचन दिया, पर पहले प्रतिज्ञा करवाई कि इस रागविद्या से किसी को हानि नहीं पहुँचाएगा।
बारह वर्ष की तपस्या से बैजू ‘बैजू बावरा’ बना – उसके गाने से पत्थर पिघलते और पशु-पक्षी मुग्ध हो जाते।
प्रतिज्ञा याद आने पर बदले की भावना कुंद हो गई, फिर भी वह आगरा गया और गाने लगा; पकड़ा गया तो तानसेन से मुकाबला माँगा।
शर्त: बैजू हारे तो तानसेन को उसकी जान लेने का अधिकार, जीते तो तानसेन का जीवन बैजू के हाथ में।
जंगल में गानयुद्ध हुआ; बैजू के राग से हरिण खिंचे चले आए, उसने उन्हें फूलमालाएँ पहनाईं; तानसेन उन्हें वापस नहीं बुला सका।
अकबर ने निर्णय दिया – ‘बैजू बावरा जीत गया, तानसेन हार गया।’ तानसेन प्राणों की भीख माँगने लगा।
बैजू बोला – मुझे तुम्हारे प्राण नहीं चाहिए; यह निष्ठुर नियम उड़वा दो कि जो तुम्हारी बराबरी का न हो उसे मार दिया जाए।
संदेश: कलाकार को कला पर अहंकार नहीं करना चाहिए; क्षमा ही सच्चा और आदर्श बदला है।
महत्वपूर्ण शब्द
रागविद्या – संगीत विद्या
प्रतिहिंसा – बदले की हिंसा
कुंद करना – धार मिटा देना, निष्प्रभावी करना
निष्ठुर – कठोर, निर्दयी
तासीर – प्रभाव, असर
तूती बोलना (मुहावरा) – प्रभाव या धाक होना
पानी फिर जाना (मुहावरा) – मेहनत बेकार हो जाना
रक्त का घूँट पीना – गुस्सा दबाना
भाषा अध्ययन
मुहावरों का प्रयोग: अकबर की तूती बोलती थी; बारह वर्ष की तपस्या पर एक क्षण में पानी फिर गया; बैजू रक्त का घूँट पीकर रह गया।
शब्द-युग्म और पुनरुक्ति: ‘सुनते रहे, सुनते रहे’; ‘दिन-ब-दिन’; ‘पसीना-पसीना’।
तानसेन के बनवाए कानून के अनुसार आगरा की सीमा में बिना बराबरी के गाने वाले को मृत्युदंड था; बैजू के पिता साधु मंडली के साथ भजन गाते आगरा आए, इसलिए मारे गए।
Q2. हरिदास ने बैजू से कौन-सी प्रतिज्ञा करवाई?
कि वह इस रागविद्या से किसी को हानि नहीं पहुँचाएगा।
Q3. गानयुद्ध का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
अकबर, तानसेन और दर्शक जंगल में एकत्र हुए।
बैजू के गाने से हरिण आए और मस्त होकर सुनते रहे; बैजू ने उन्हें मालाएँ पहनाईं।
तानसेन ने गाया पर हरिण वापस न आए; वह लज्जित हुआ।
अकबर ने बैजू को विजयी घोषित किया।
Q4. ‘आदर्श बदला’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
बैजू के पास तानसेन के प्राण लेने का अधिकार था।
पर गुरु की प्रतिज्ञा और कलाकार की उदारता के कारण उसने उसे जीवनदान दिया।
केवल निष्ठुर कानून रद्द करवाया, जिससे भविष्य में कोई निर्दोष न मरे।
बदला हिंसा से नहीं, क्षमा और सुधार से लिया – इसलिए शीर्षक सार्थक है।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘कलाकार को अपनी कला पर अहंकार नहीं करना चाहिए।’
अहंकार कला की साधना को रोक देता है।
तानसेन का अहंकार निर्दोषों की मृत्यु और अंत में उसकी हार का कारण बना।
कला का उद्देश्य आनंद और कल्याण है, दूसरों को दबाना नहीं।
विनम्र कलाकार ही सच्चा सम्मान पाता है।
परीक्षा टिप
कहानी का घटनाक्रम (कानून → पिता की मृत्यु → हरिदास → १२ वर्ष → गानयुद्ध → निर्णय → जीवनदान) याद रखें; ‘शीर्षक की सार्थकता’ प्रश्न अक्सर आता है।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 5
गुरुबानी
संक्षिप्त सार
गुरुबानी में गुरु नानक के दोहे और पद (‘गुरु ग्रंथ साहिब’ से) हैं। इनमें गुरु की महिमा, नामस्मरण, अहंकार-त्याग, ईश्वर की सर्वव्यापकता और बाह्य आडंबर के विरोध का संदेश है। अंतिम पद में प्रकृति द्वारा हो रही ईश्वर की विराट आरती का अद्भुत वर्णन है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: गुरु नानक (जन्म १५ अप्रैल १४६९, तलवंडी, रावी नदी के किनारे; निधन १५३९) – दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म व समाज सुधारक और कवि; सर्वेश्वरवादी, विश्वबंधुत्व के समर्थक।
भाषा: फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली और अरबी शब्दों का मेल; सहज-सरल।
रचना: ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित वाणी।
विधा – पद: गेय काव्य शैली; मूल स्रोत लोकगीत। हिंदी पद शैली की दो परंपराएँ – संतों की ‘सबद’ और कृष्णभक्तों की।
दोहा १: जो गुरु की उपेक्षा कर स्वयं को ज्ञानी मानते हैं, वे खेत में बेकार उगी तिल की झाड़ियों जैसे हैं – बाहर से फले-फूले, भीतर राख (मैल)।
दोहा २: मोह को जलाकर स्याही, बुद्धि को कागज, प्रेम को कलम और चित्त को लेखक बनाकर गुरु से पूछकर प्रभु के नाम की स्तुति लिखो; उसका अंत और सीमा नहीं।
पद ३: हे मन, दिन-रात हरि के गुण गा; जो क्षण भर भी नाम नहीं भूलते, ऐसे लोग विरले हैं। अहंकार (हउमै) और हिंसा जाने पर ही संशय-शोक मिटता है।
पद ४: प्रभु की गति केवल वही जानता है; वह गुप्त भी है, प्रकट भी। साधक, सिद्ध, गुरु-चेले उसे खोजते हैं; नामस्मरण करने वालों को दर्शन मिलते हैं।
पद ५ (आरती): आकाश थाल है, सूर्य-चंद्र दीपक, तारे मोती, मलय पवन धूप, हवा चँवर डुलाती है, वनस्पति फूल चढ़ाती है और अनहद नाद का ढोल बजता है – यही प्रभु की सच्ची आरती है।
संदेश: गुरुनिष्ठा, नामस्मरण, सच्चे कर्म; कर्मकांड और आडंबर व्यर्थ।
महत्वपूर्ण शब्द
बूआड़ – बुआई; सुंञे – सूने
सउ – ईश्वर (स्वामी)
मसु – स्याही; चितु – चित्त
अहिनिसि – दिन-रात
गुपता – अप्रकट, गुप्त
सगल – संपूर्ण; भेरी – बड़ा ढोल
अनहद नाद – भीतर सुनाई देने वाला दिव्य स्वर
भाषा अध्ययन
रूपक अलंकार: ‘मति कागदु… भाउ कलम… चितु लेखारी’; ‘गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने’ – प्रकृति पर आरती की सामग्री का आरोप।
उपमा: ‘छुटे तिल बूआड़ जिउ’ (जिउ = जैसे)।
प्रत्यययुक्त शब्द: दान – दानी, दानव/दानशील; दया – दयालु; गुण – गुणवान/गुणी; अंतर – आंतरिक।
वचन परिवर्तन (भाषा अध्ययन): मार्ग – मार्ग (सत्य के मार्ग सरल हैं); हथकड़ियाँ – हथकड़ी; झाड़ियाँ – झाड़ी; प्याला – प्याले।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. संजाल पूर्ण कीजिए : नाम स्तुति के लिए ये आवश्यक हैं।
मोह को जलाकर बनी स्याही, बुद्धि रूपी कागज, प्रेम रूपी कलम, चित्त रूपी लेखक और गुरु का मार्गदर्शन।
Q2. कृति पूर्ण कीजिए : आकाश के दीप – … ; आरती के मोती – …
आकाश के दीप – सूर्य और चंद्रमा; आरती के मोती – तारामंडल।
Q3. गुरु नानक जी की भाषाशैली की विशेषताएँ लिखिए।
सहज-सरल, लोक की भाषा।
फारसी, पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी शब्दों का मेल।
गेय पद और दोहे; प्रकृति से प्रेरित प्रभावी रूपक।
उपदेशात्मक पर भावपूर्ण।
Q4. ‘गुरुनिष्ठा और भक्तिभाव से ही मानव श्रेष्ठ बनता है’ – रसास्वादन कीजिए।
भाव पक्ष: गुरु के बिना ज्ञान नहीं; अहंकार त्यागकर नामस्मरण से ही प्रभु मिलते हैं; बाहरी दिखावा व्यर्थ।
आरती वाले पद में प्रकृति ही ईश्वर की पूजा करती दिखाई गई है – विराट और सुंदर कल्पना।
कला पक्ष: पंजाबी मिश्रित लोकभाषा, रूपक और उपमा, गेयता।
रस: शांत और भक्ति रस।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘गुरु बिन ज्ञान न होई’।
गुरु अज्ञान का अंधकार दूर कर सही मार्ग दिखाता है।
पुस्तकें जानकारी देती हैं, पर समझ और संस्कार गुरु देता है।
गुरु शिष्य की कमियाँ पहचानकर उसे सुधारता है।
इसलिए जीवन में गुरु का स्थान सर्वोच्च है।
परीक्षा टिप
आरती वाले पद के रूपक (थाल, दीपक, मोती, धूप, चँवर, फूल, भेरी) तालिका बनाकर याद करें – कृति प्रश्न इन्हीं से बनते हैं।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 6
वृंद के दोहे
संक्षिप्त सार
वृंद के दोहे रीतिकालीन कवि वृंद के नीतिपरक दोहे हैं (‘वृंद सतसई’ से)। हर दोहे में एक व्यावहारिक सीख के साथ उसे समझाने वाला दृष्टांत (उदाहरण) है – विद्या बाँटने से बढ़ती है, जितनी चादर उतने पाँव, कपट एक ही बार चलता है, गुण के बिना बड़प्पन नहीं, दुष्ट से न उलझें, आदि।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: वृंद (पूरा नाम वृंदावनदास; माना जाता है जन्म १६४३, मथुरा; निधन १७२३) – रीतिकाल के आदरणीय कवि; नीतिपरक दोहे जनसाधारण में प्रसिद्ध; भाषा में ब्रज और अवधी शब्दों की बहुलता; दृष्टांत शैली प्रभावी।
कृतियाँ: ‘वृंद सतसई’, ‘समेत शिखर छंद’, ‘भाव पंचाशिका’, ‘पवन पचीसी’, ‘हितोपदेश संधि’, ‘यमक सतसई’, ‘वचनिका’, ‘सत्यस्वरूप’; ‘बारहमासा’ में बारह महीनों का चित्रण।
दोहा छंद: अर्द्धसम मात्रिक छंद; चार चरण; पहले-तीसरे में १३-१३ और दूसरे-चौथे में ११-११ मात्राएँ; हर चरण के अंत में लघु वर्ण।
सरस्वती (विद्या) का भंडार अपूर्व है – खर्च करने पर बढ़ता है, न खर्च करने पर घटता है।
आँखें मन का हित-अहित बता देती हैं, जैसे साफ आईना भला-बुरा दिखा देता है।
अपनी पहुँच देखकर काम करो – जितनी लंबी चादर, उतने पाँव फैलाओ।
कपट से व्यापार दोबारा नहीं चलता, जैसे काठ की हाँडी दूसरी बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती।
ऊँचे बैठने से गुण के बिना बड़प्पन नहीं मिलता – मंदिर के शिखर पर बैठा कौआ गरुड़ नहीं बनता।
दूसरों की आशा में उद्यम न छोड़ो – घिरे बादल देखकर अपनी गगरी नहीं फोड़नी चाहिए।
नीच को छेड़ो मत – कीचड़ में पत्थर डालो तो उछलकर अपना ही अंग गंदा होता है।
ऊँचे पद का पतन भी निश्चित है – दोपहर तक तपकर सूर्य अस्त होता है।
गुण के अनुसार आदर मिलता है – कोयल आम लेती है, कौआ निबौरी।
कुबुद्धि के साथ काम करना अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारना है; होनहार बिरवान के होत चीकने पात।
महत्वपूर्ण शब्द
सरसुति – सरस्वती, विद्या की देवी
करतब – कार्य
सौर – चादर
काठ – लकड़ी
वायस – कौआ
उद्यम – प्रयत्न; पयोद – बादल
अंबहि – आम; निबौरी – नीम का फल
भाषा अध्ययन
दृष्टांत अलंकार: हर दोहे में बात और उसका उदाहरण – ‘ऊँचे बैठे ना लहैं… बैठो देवल सिखर पर, वायस गरुड़ न होइ।’
उदाहरण अलंकार: ‘ज्यौं’, ‘जैसे’ वाचक शब्द – ‘जैसे निरमल आरसी…’।
मुहावरे/कहावतें दोहों में: तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर; अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारना; काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती; होनहार बिरवान के होत चीकने पात।
Q1. कारण लिखिए : (१) सरस्वती के भंडार को अपूर्व कहा गया है (२) व्यापार में दूसरी बार छल-कपट करना असंभव होता है
(१) यह भंडार खर्च करने पर बढ़ता है और न खर्च करने पर घटता है। (२) कपट एक बार पकड़ में आने पर ग्राहक भरोसा नहीं करता, जैसे काठ की हाँडी दूसरी बार नहीं चढ़ती।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 7
पाप के चार हथियार
संक्षिप्त सार
पाप के चार हथियार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का वैचारिक निबंध है। लेखक प्रश्न उठाते हैं कि इतने संत, सुधारक, अवतार और पैगंबर आए, फिर भी संसार में पाप और अन्याय क्यों बना हुआ है। उनका उत्तर है – पाप के पास चार शस्त्र हैं: उपेक्षा, निंदा, हत्या और श्रद्धा, जिनसे वह सुधारक के सत्य को असफल करता है। श्रद्धा पाप का ब्रह्मास्त्र है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (जन्म २६ सितंबर १९०६, देवबंद, उ.प्र.; निधन १९९५) – कथाकार, निबंधकार, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी; ‘पद्मश्री’ से सम्मानित; भाषा सहज, मुहावरेदार।
कृतियाँ: ‘धरती के फूल’ (कहानी संग्रह), ‘जिंदगी मुस्कुराई’, ‘बाजे पायलिया के घुँघरू’, ‘जिंदगी लहलहाई’, ‘महके आँगन-चहके द्वार’ (निबंध संग्रह), ‘दीप जले, शंख बजे’, ‘माटी हो गई सोना’ (संस्मरण-रेखाचित्र)।
विधा – निबंध: विचारों को भाषा में व्यवस्थित रूप से बाँधना; निबंध को ‘गद्य की कसौटी’ माना गया है।
जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का कथन: लोग मेरी बातों को दिल्लगी समझकर उड़ा देते हैं, इसलिए मैं कोड़े खाने से बच जाता हूँ। लेखक इसे सच पर ‘एकांगी’ मानते हैं।
पहला शस्त्र – उपेक्षा: समाज सुधारक की बात पर ध्यान नहीं देता, पागल का प्रलाप समझकर हँस देता है – ‘अरे, छोड़ो इसे’।
दूसरा – निंदा: सत्य का स्वर तेज होने पर गालियों की दीवार खड़ी की जाती है; सुधारक का जो जितना समीप, वह उतना बड़ा निंदक।
तीसरा – हत्या: सुकरात को जहर का प्याला, ईसा को सूली, दयानंद को पिसा काँच। पर शहादत सत्य को और प्रचंड बना देती है।
चौथा – श्रद्धा (ब्रह्मास्त्र): पाप सुधारक की जय-जयकार करता है, उसे लोकोत्तर, भगवान, अवतार कहकर पूजता है – ‘हम साधारण मनुष्य वैसा नहीं बन सकते’।
अब लोगों का ध्यान सुधारक के सत्य पर नहीं, उसकी मूर्ति, स्मारक और उत्सवों पर रहता है; अनुयायी विचारों को आचरण में नहीं उतारते।
संदेश: महापुरुषों की जयंती मनाना पर्याप्त नहीं; उनके विचारों को जीवन में अपनाना ही सच्ची श्रद्धा है।
महत्वपूर्ण शब्द
विडंबना – उपहास, कड़वी असंगति
प्रलाप – निरर्थक बड़बड़ाहट
लोकोत्तर – अलौकिक, संसार से परे
प्रखर – तीक्ष्ण, तेज
ब्रह्मास्त्र – अचूक अस्त्र
शहादत – बलिदान
कान पर उँगली रखना (मुहावरा) – अनसुनी करना
भाषा अध्ययन
विधा: वैचारिक निबंध; शैली – विश्लेषणात्मक, उदाहरण सहित (शॉ, सुकरात, ईसा, दयानंद)।
हर शस्त्र के साथ पाप का ‘नारा’: उपेक्षा – ‘अरे, छोड़ो इसे’; निंदा – ‘बेवकूफ है’; हत्या – ‘तुम साँप निकले’; श्रद्धा – ‘महाप्रभु सुधारक वंदनीय है’।
मुहावरे: झंडा बुलंद करना – आवाज उठाना; गले के नीचे उतरना – बात समझ में आना/स्वीकार होना; बौखला उठना – घबराकर क्रोधित होना।
शब्द रचना: लोक + उत्तर = लोकोत्तर; वंद + नीय = वंदनीय; स्मर + णीय = स्मरणीय।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. पाप के चार हथियार लिखिए।
उपेक्षा, निंदा, हत्या और श्रद्धा।
Q2. ‘हत्या’ शस्त्र के उदाहरण पाठ के आधार पर लिखिए।
सुकरात के लिए जहर का प्याला, ईसा के लिए सूली और दयानंद के लिए पिसा काँच।
Q3. ‘श्रद्धा’ को पाप का ब्रह्मास्त्र क्यों कहा गया है?
श्रद्धा के नाम पर सुधारक को भगवान/लोकोत्तर बना दिया जाता है।
लोग मान लेते हैं कि साधारण मनुष्य उसके जैसा नहीं बन सकता।
ध्यान सत्य से हटकर मूर्ति, स्मारक, उत्सवों पर चला जाता है।
इस तरह सत्य जीवन में नहीं उतरता और पाप जीवित रहता है।
Q4. सुधारक के सत्य का विकास (प्रवाह तालिका) स्पष्ट कीजिए।
उपेक्षा की रगड़ से सत्य तेज होता है, स्वर पैने और ऊँचे होते हैं।
निंदा की रगड़ से और प्रखर होकर काटने लगता है।
हत्या (शहादत) से प्रचंड बनता है – सूर्य का ताप, बिजली की कड़क पाता है।
अंत में श्रद्धा से शांत और कोमल होकर निष्प्रभावी हो जाता है।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘महापुरुषों के विचारों को आचरण में लाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा है।’
केवल जयंती, फूलमाला और नारे खोखली श्रद्धा है।
गांधीजी के सत्य-अहिंसा या बाबासाहेब के समानता के विचार व्यवहार में उतारें।
विचारों का पालन समाज को बदलता है, मूर्तिपूजा नहीं।
युवा पीढ़ी को आचरण से उदाहरण बनना चाहिए।
परीक्षा टिप
चारों शस्त्र क्रम से (उपेक्षा → निंदा → हत्या → श्रद्धा) और हर एक का परिणाम लिखें; ‘ब्रह्मास्त्र’ वाला प्रश्न सबसे महत्त्वपूर्ण है।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 8
पेड़ होने का अर्थ
संक्षिप्त सार
पेड़ होने का अर्थ डॉ. मुकेश गौतम की नयी कविता है (‘प्रेम समर्थक हैं पेड़’ संग्रह से)। कवि खिड़की से एक पेड़ को देखकर सोचते हैं कि आदमी कितना भी बड़ा हो जाए, पेड़ जितना बड़ा नहीं हो सकता। कविता के दो भाग हैं – ‘हौसला है पेड़’ और ‘दाता है पेड़’। पेड़ हर हाल में डटा रहता है और अपना सब कुछ दूसरों को देकर संत और दधीचि जैसा बन जाता है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: डॉ. मुकेश गौतम (जन्म १ जुलाई १९७०, सहारनपुर, उ.प्र.) – आधुनिक कवि; हास्य-व्यंग्य के लोकप्रिय मंचीय कवि, पर काव्य का मुख्य स्वर सामाजिक सरोकार; भाषा सरल, लोकव्यवहार के बिंब-प्रतीक।
कृतियाँ: ‘अपनों के बीच’, ‘सतह और शिखर’, ‘सच्चाइयों के रू-ब-रू’, ‘वृक्षों के हक में’, ‘लगातार कविता’, ‘प्रेम समर्थक हैं पेड़’, ‘इसकी क्या जरूरत थी’।
विधा: नयी कविता – नये प्रतीक, उपमान और आज के मनुष्य का दर्पण।
आदमी पेड़ नहीं हो सकता: आदमी सिर्फ आदमी है; पेड़ की उदारता और धैर्य तक नहीं पहुँच सकता।
हौसला है पेड़: अंकुर से ठूँठ होने तक आँधी-तूफान या प्रतापी राजा – किसी के पाँव नहीं पड़ता; एक जगह खड़े रहकर हालात से लड़ता है।
भेड़िया, बाघ, शेर – किसी से नहीं डरता; हत्या या आत्महत्या नहीं करता।
थके राहगीर को छाँव और ठंडी हवा देता है, फूल गिराकर आगे बढ़ने का इशारा करता है; सबका स्वागत और विदाई करता है।
तूफान से लड़कर टेढ़ा पड़ा घायल पेड़ भी मुस्कुराता है – उस पर चिड़िया के बच्चों का घोंसला अब भी सुरक्षित है।
दाता है पेड़: जड़, तना, शाखा, पत्ती, फूल, फल, बीज – सब हमारे लिए; पूजने वाले और कुल्हाड़ी चलाने वाले, दोनों के लिए समान।
शुद्ध हवा, दवा, शवयात्रा-शगुन-बारात के लिए फूल; कवि को कागज-कलम, वैद्य को दवा, शासन को कुर्सी-मेज – पेड़ की हर चीज उपयोगी।
निष्कर्ष: पेड़ संत है, दधीचि है (दधीचि ऋषि ने वृत्रासुर-वध के लिए इंद्र को अपनी हड्डियाँ दी थीं)।
महत्वपूर्ण शब्द
ठूँठ – फूल-पत्ते विहीन सूखा पेड़
सौगात – भेंट, उपहार
हौसला – साहस
दधीचि – त्याग के प्रतीक ऋषि
प्रतापी – पराक्रमी
दाता – देने वाला
भाषा अध्ययन
भिन्नार्थक (समोच्चारित) शब्द: साँस (श्वास) – सास (पति/पत्नी की माँ); ग्रह (आकाशीय पिंड) – गृह (घर); आँचल (साड़ी का पल्लू) – अंचल (क्षेत्र); कुल (वंश) – कूल (किनारा)।
मानवीकरण अलंकार: पेड़ मुस्कुराता है, स्वागत और विदाई करता है, इशारा करता है।
रूपक: ‘पेड़ बहुत बड़ा हौसला है’, ‘पेड़ संत है, दधीचि है’।
प्रतीक: घोंसला – सुरक्षा और जीवन; ठूँठ – अंत; तूफान – संकट।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. पेड़ का बुलंद हौसला सूचित करने वाली दो पंक्तियाँ लिखिए।
पेड़ किसी के पाँव नहीं पड़ता है।
एक जगह पर खड़े रहकर हालात से लड़ता है। (या: पेड़ किसी से नहीं डरता है।)
Q2. कृति पूर्ण कीजिए : पेड़ इन रूपों में दाता है।
शुद्ध हवा देने वाला, दवा देने वाला, फल-फूल देने वाला, कागज और कुर्सी-मेज के लिए लकड़ी देने वाला।
Q3. ‘आदमी पेड़ नहीं हो सकता’ – कवि के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
पेड़ निःस्वार्थ भाव से सबको देता है, आदमी स्वार्थी है।
पेड़ कष्ट में भी दूसरों की रक्षा करता है, शिकायत नहीं करता।
पेड़ भेदभाव नहीं करता – पूजने वाले और काटने वाले दोनों को देता है।
इसलिए आदमी उसकी ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता।
Q4. ‘पेड़ हौसला भी है और दाता भी’ – रसास्वादन कीजिए।
भाव पक्ष: पेड़ संकटों में अडिग रहने का साहस और पूर्ण त्याग का आदर्श है।
घायल पेड़ पर सुरक्षित घोंसले का बिंब मार्मिक है; अंत में पेड़ को संत और दधीचि कहा गया है।
कला पक्ष: मुक्त छंद, सरल बोलचाल की भाषा, मानवीकरण और रूपक।
प्रेरणा: पर्यावरण संरक्षण और परोपकार।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘भारतीय संस्कृति में पेड़ का महत्त्व’।
पीपल, वट, तुलसी, नीम की पूजा की परंपरा।
वट सावित्री जैसे त्योहार और वृक्षारोपण को पुण्य मानना।
आयुर्वेद में पेड़-पौधों से औषधियाँ।
पेड़ पर्यावरण का संतुलन रखते हैं; इसलिए उनकी रक्षा हमारा कर्तव्य है।
परीक्षा टिप
कविता के दो भागों (हौसला और दाता) के बिंदु अलग-अलग याद करें; ‘दधीचि’ की टिप्पणी अवश्य लिखें।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 9
सुनो किशोरी
संक्षिप्त सार
सुनो किशोरी आशारानी व्होरा का पत्र है, जो एक माँ अपनी बेटी सुगंधा को लिखती है। माँ एक सहेली और मार्गदर्शिका की तरह किशोरियों के प्रश्नों और शंकाओं का समाधान करती है – ‘उड़ो बेटी, पर धरती पर निगाह रखकर।’ पत्र में रूढ़ि और परंपरा का अंतर, पश्चिमी मूल्यों के अंधानुकरण से बचने, नये मूल्यों को सोच-समझकर अपनाने और भावुकता में जल्दबाजी के निर्णयों से सावधान रहने की सीख दी गई है।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: आशारानी व्होरा (जन्म ७ अप्रैल १९२१, ग्राम दुलहा, तहसील तकवाल, जिला झेलम, अविभाजित भारत; निधन २००९) – नारी विषयक लेखन में विशिष्ट स्थान; अग्रणी महिलाओं के जीवन-संघर्ष का चित्रण; नारी विमर्श लेखन को समृद्ध किया।
कृतियाँ: ‘भारत की प्रथम महिलाएँ’, ‘स्वतंत्रता सेनानी लेखिकाएँ’, ‘क्रांतिकारी किशोरी’, ‘स्वाधीनता सेनानी’, ‘लेखक-पत्रकार’।
विधा: पत्र – साहित्यकारों और नेताओं के पत्र तत्कालीन परिस्थितियों का लेखा-जोखा देते हैं।
बेटी ने ‘दोतरफा अधिकार’ की बात उठाई, माँ को यह पसंद आया – असहमति हो तो अपनी बात समझाने का पूरा अधिकार है।
माँ बेटी के ऊँचे सपनों के डैने काटना नहीं चाहती, केवल धरती से जुड़ी डोर मजबूत करना चाहती है।
धरती का आधार: परिवेश, संस्कार, सांस्कृतिक परंपरा और अपनी सामर्थ्य।
रूढ़ि और परंपरा: रूढ़ि स्थिर है – समय के साथ अर्थ खो चुकी रीति-नीति; परंपरा गतिशील, निरंतर बहता निर्मल प्रवाह जो अनुपयोगी को छोड़ता और उपयोगी को अपनाता है।
पुरानी जर्जर रूढ़ियाँ तोड़नी हैं, अच्छी परंपराएँ नहीं; पश्चिमी दुनिया का हर मूल्य हमारे लिए नये मूल्य का पर्याय नहीं।
नये मूल्यों को ‘पहचान’कर अपनाना है; नया ज्ञान-विज्ञान अपनी धरती पर टिकाना होगा।
सहेली रचना का उदाहरण: भावुक उम्र में किसी की मीठी बातों के बहकावे में जल्दबाजी का निर्णय पछतावा देता है।
मित्रता में एक-दूसरे की राह का रोड़ा नहीं, प्रेरणा और ताकत बनकर परस्पर विकास में सहभागी बनें; सोच-समझकर निर्णय लें।
महत्वपूर्ण शब्द
डैने – पंख
क्षत-विक्षत – घायल
रूढ़ि – समय के साथ अनुपयोगी हो चुकी स्थिर प्रथा
परंपरा – पीढ़ियों से चली आ रही गतिशील रीति
अवांछित – न चाहा हुआ
अंधानुकरण – बिना सोचे नकल
कन्नी काटना (मुहावरा) – बचकर निकलना; पानी सिर से गुजरना – स्थिति हाथ से निकल जाना
भाषा अध्ययन
विधा की विशेषताएँ: संबोधन (सुनो सुगंधा !), आत्मीय शैली, उपदेश प्रत्यक्ष न होकर सलाह के रूप में।
Q1. कृति पूर्ण कीजिए : लेखिका के अनुसार धरती (आधार) में ये जुड़े होने चाहिए।
परिवेश, संस्कार, सांस्कृतिक परंपरा और अपनी सामर्थ्य।
Q2. रूढ़ि और परंपरा में अंतर लिखिए।
रूढ़ि स्थिर है, समय के साथ अर्थ खो चुकी है और समाज को पीछे ले जाती है। परंपरा गतिशील है, अनुपयोगी को छोड़कर उपयोगी मूल्यों को अपनाती हुई निरंतर बहती है।
Q3. ‘उड़ो बेटी, पर धरती पर निगाह रखकर’ – इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
माँ बेटी के ऊँचे सपनों का समर्थन करती है।
पर चाहती है कि वह अपने संस्कार, परिवार और यथार्थ से जुड़ी रहे।
डोर कटी तो डैने क्षत-विक्षत हो सकते हैं – यानी बिना आधार की उड़ान खतरनाक है।
स्वतंत्रता के साथ सावधानी और विवेक जरूरी है।
Q4. नयी पीढ़ी के संघर्ष के बारे में लेखिका के विचार लिखिए।
नयी पीढ़ी पुराने मूल्यों को काट फेंकना चाहती है।
नये मूल्यों के नाम पर केवल पश्चिमी मूल्य अपनाती है – उधार के मूल्यों से काम चलाती है।
नये मूल्यों के निर्माण का सामर्थ्य अभी नहीं आया है।
नये ज्ञान को अपनी धरती पर टिकाकर ही नये मूल्य बनेंगे।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘आधुनिकता और भारतीय संस्कृति का समन्वय’।
विज्ञान, तकनीक और खुली सोच को अपनाना जरूरी है।
साथ ही परिवार, बड़ों का आदर, सहिष्णुता जैसे भारतीय मूल्य बनाए रखें।
अंधानुकरण के बजाय विवेक से चुनें।
दोनों का संतुलन ही प्रगतिशील और संस्कारी समाज बनाता है।
परीक्षा टिप
‘रूढ़ि बनाम परंपरा’ का अंतर और ‘उड़ो बेटी…’ वाला कथन बोर्ड में सबसे अधिक पूछे जाते हैं; पत्र विधा की विशेषताएँ भी याद रखें।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 10
चुनिंदा शेर
संक्षिप्त सार
चुनिंदा शेर नागपुर के गजलकार कैलाश सेंगर के शेर हैं (‘सूरज तुम्हारा है’ गजल संग्रह से)। इनमें सामाजिक अव्यवस्था, विडंबना और आम आदमी की अनसुनी पीड़ा व्यक्त हुई है – गरीबी, मजदूर का शोषण, प्रदूषित नदी, दिखावा और व्यवस्था की कमियाँ। साथ ही कठिनाई में भी खुशहाली रचने का हौसला और बदलाव की आग भी इन शेरों में है।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: कैलाश सेंगर (जन्म १६ फरवरी १९५४, नागपुर, महाराष्ट्र) – सहज हिंदुस्तानी भाषा के लोकप्रिय गजलकार; गीत, कविता, कहानी, नाटक भी लिखे; पत्रकारिता में योगदान; हिंदी के साथ मराठी पर भी प्रभुत्व।
कृतियाँ: ‘सूरज तुम्हारा है’ (गजल संग्रह), ‘यहाँ आदमी नहीं, जूते भी चलते हैं’, ‘सुबह होने का इंतजार’ (कहानी संग्रह), ‘अभी रात बाकी है’ (अनूदित साहित्य)।
विधा – शेर/गजल: उर्दू की लोकप्रिय विधा; हिंदी में आकर गजल रूमानी भाव से हटकर यथार्थ पर खड़ी हुई।
हमें गजलों से खुशबू बिखराना और चट्टानों पर फूल खिलाना (कड़ी मेहनत से खुशहाली लाना) आता है।
परिंदों (आम जनता) की शिकायत – मालिक, तेरे दानों में भी घुन लगा है (व्यवस्था में भ्रष्टाचार)।
सपने देखने वाला नहीं जानता था कि वह इन्कलाब (क्रांति) लिख रहा है।
हँसी से आँसू छिपाना – चेहरे पर नया मुखौटा (दिखावटी जीवन पर व्यंग्य)।
नदी को माँ कहकर पूजने वाले उसे साफ नहीं रखते – उसमें लाशें तक मिलती हैं।
जब पानी सिर से गुजर जाएगा (सहनशीलता की सीमा टूटेगी), तब सीने में नई आग (विद्रोह) लगेगी।
‘आँखों में बहुत बाढ़ है, शेष सब कुशल’ – दुख को छिपाकर ‘सब ठीक है’ कहने की विवशता।
गरीब की साँस भी साहूकार के घर गिरवी कंगन-सी पराई लगती है (कर्ज का बोझ)।
किसी का सिर खुला, किसी के पाँव बाहर – मालिक, अपनी चादरें ढंग से बुन (संसाधनों का असमान बँटवारा)।
मरा हुआ मजदूर निरक्षर था, पर अपने भीतर रोज एक किताब लिखता था (उसके अनुभव का मूल्य)।
महत्वपूर्ण शब्द
शेर – गजल की दो पंक्तियों की स्वतंत्र इकाई
घुन – अनाज को खोखला करने वाला कीड़ा
ख्वाब – सपना; इन्कलाब – क्रांति
मुखौटा – नकली चेहरा
खँगालना – अच्छी तरह साफ करना/जाँचना
चट्टानों पर फूल खिलाना (मुहावरा) – कड़ी मेहनत से खुशहाली पाना
सिर से पानी गुजरना (मुहावरा) – सहने की सीमा समाप्त होना
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 11
ओजोन विघटन का संकट
संक्षिप्त सार
ओजोन विघटन का संकट डॉ. कृष्ण कुमार मिश्र का विज्ञान निबंध है। इसमें बताया गया है कि वायुमंडल की ओजोन परत ‘ओजोन छतरी’ बनकर सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों से धरती के जीवन की रक्षा करती है। फ्रिज, एयरकंडिशनर आदि में प्रयुक्त सी.एफ.सी. (क्लोरो फ्लोरो कार्बन) इस परत को नष्ट कर रहे हैं। लेखक विएना और मांट्रियल जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों की जानकारी देकर पर्यावरण बचाने का संदेश देते हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. कृष्ण कुमार मिश्र (जन्म १५ मार्च १९६६, जौनपुर, उ.प्र.) – हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए प्रसिद्ध; बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से १९९२ में रसायन शास्त्र में पीएच.डी.; लोकविज्ञान पर व्यापक लेखन।
विधा: विज्ञान निबंध (वैज्ञानिक लेख)।
ओजोन: ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनी, नीले रंग की, तीक्ष्ण और विषैली गैस; साँस में जाने पर हानिकारक, पर वायुमंडल में हमारी रक्षक।
ओजोन धरती से लगभग १५ से २० किमी की ऊँचाई पर स्ट्रेटोस्फियर में पाई जाती है; सबसे अधिक सांद्रता लगभग २५ किमी पर।
पराबैंगनी किरणें: अल्प तरंगदैर्ध्य, अधिक ऊर्जा; धरती तक आएँ तो त्वचा कैंसर और अनेक रोग।
१९३० से पहले प्रशीतन में अमोनिया और सल्फर डाइऑक्साइड; तीस के दशक में थॉमस मिडले ने सी.एफ.सी. खोजा – रंगहीन, गंधहीन, अक्रियाशील, अज्वलनशील, इसलिए ‘आदर्श प्रशीतक’।
सी.एफ.सी. फ्रिज, एयरकंडिशनर, कीटनाशक, प्रसाधन, दवाएँ, रंग-रोगन में; ये नष्ट नहीं होते, पानी में नहीं घुलते, हवा से हल्के होकर ऊपर पहुँचते हैं।
ऊपर पराबैंगनी किरणों से प्रकाश अपघटन (फोटोलिसिस) होकर क्लोरीन मुक्त मूलक बनते हैं, जो ओजोन को ऑक्सीजन में बदल देते हैं।
अमेरिकी वैज्ञानिक एफ.एस. रोलैंड का शोधपत्र १९७४ में ‘नेचर’ में छपा; पहले उपहास हुआ, पर १९८५ में ब्रिटिश सर्वे टीम ने दक्षिणी ध्रुव पर ओजोन छिद्र की पुष्टि की; अमेरिकी उपग्रह निंबस के चित्रों से भी पुष्टि।
अंतरराष्ट्रीय प्रयास: पहली बैठक १९८५ विएना; सितंबर १९८७ मांट्रियल (४८ देश) – मांट्रियल प्रोटोकॉल: १९९५ तक सी.एफ.सी. खपत में ५०% और १९९७ तक ८५% कटौती।
१९९० के आँकड़ों के अनुसार विश्व की सी.एफ.सी. खपत १२ लाख टन; अमेरिका की हिस्सेदारी ३०%, भारत की केवल ०.६%। विकासशील देशों ने चाहा कि खर्च धनी देश उठाएँ; लंदन बैठक में नई तकनीक के लिए कोष की माँग।
महत्वपूर्ण शब्द
विघटन – टूटना, नष्ट होना
स्ट्रेटोस्फियर – समताप मंडल
पराबैंगनी किरणें – अल्ट्रावायलेट किरणें
प्रशीतक – ठंडा करने वाला पदार्थ
फोटोलिसिस – प्रकाश अपघटन
मसौदा – प्रारूप, ड्राफ्ट
छीजना – धीरे-धीरे कम होना
भाषा अध्ययन
विधा की विशेषताएँ: तथ्यात्मक भाषा, आँकड़े, वैज्ञानिक शब्दावली, कारण-परिणाम की शैली।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 12
कोखजाया
संक्षिप्त सार
कोखजाया मैथिली कथाकार श्याम दरिहरे की कहानी है, जिसका हिंदी अनुवाद बैद्यनाथ झा ने किया है (‘रक्त संबंध’ कहानी संग्रह से)। भारत सरकार के पूर्व वित्त सचिव की विधवा गंगा मिश्रा (कथावाचक रघुनाथ की मौसी) को उनका इकलौता बेटा दिलीप घर बेचकर हवाई अड्डे पर अकेला छोड़कर लंदन भाग जाता है। मौसी वृद्धाश्रम में सात वर्ष बिताती हैं और अंत में भतीजे रघुनाथ को अपने दाह संस्कार का अधिकार देकर संसार से जाती हैं। कहानी धन के आगे टूटते रिश्तों और वृद्धों की दुर्दशा पर प्रहार करती है।
मुख्य बिंदु
मूल लेखक: श्याम दरिहरे (जन्म १९ फरवरी १९५४, मधुबनी, बिहार) – मैथिली के चर्चित रचनाकार; ‘कनुप्रिया’ का मैथिली अनुवाद किया। कृतियाँ: ‘घुरि आउ मान्या’, ‘जगत सब सपना’, ‘न जायते म्रियते वा’ (उपन्यास), ‘सरिसो में भूत’, ‘रक्त संबंध’ (कथा संग्रह)।
अनुवादक: बैद्यनाथ झा। विधा: अनूदित कहानी।
कथावाचक रघुनाथ चौधरी को वृद्धाश्रम प्रबंधक का फोन मिलता है कि मौसी नहीं रहीं; वह ‘मातेश्वरी महिला वृद्धाश्रम’ पहुँचता है और पुरानी बातें याद करता है।
मौसी के पति (मौसा) प्रतिभाशाली आई.ए.एस. अधिकारी थे और भारत सरकार के वित्त सचिव पद से रिटायर हुए; मौसी को कभी पद-पावर का घमंड नहीं था, वे सबके काम आती थीं।
मौसा की मृत्यु के बाद दिलीप ने पेंशन ट्रांसफर और वीजा के बहाने कई कागजों पर हस्ताक्षर करवाए और घर बेच दिया।
लंदन ले जाने के नाम पर वह मौसी को हवाई अड्डे पर छोड़कर चला गया; अधिकारियों ने यह दुखद समाचार दिया और मौसी को इसी वृद्धाश्रम में रखवाया।
आई.ए.एस. एसोसिएशन और मीडिया ने भारत से इंग्लैंड तक हंगामा किया; दिलीप घर लौटाने को तैयार हुआ, पर मौसी ने उसका मुँह देखने से भी इनकार कर दिया – ‘टस-से-मस नहीं हुईं’।
वृद्धाश्रम का कर्मचारी कहता है – आजकल बड़े लोग ही माँ-बाप को वृद्धाश्रम भेजते हैं; गरीब बूढ़े अपमान सहकर भी बच्चों के साथ रहने को अभिशप्त हैं।
रघुनाथ और उसकी पत्नी हर रविवार मिलने आते; मौसी सोहर (जन्मोत्सव का लोकगीत) गाते-गाते रो पड़तीं।
लगभग सात वर्ष बाद मौसी का निधन; पत्र में लिखा – कोख का जाया मुझे जिंदा मारकर भाग गया, पर तुम्हें देखकर विश्वास बचा रहा कि सभी संतानें एक जैसी नहीं होतीं; ‘तुम्हारे जैसा पुत्र भगवान सबको दें।’ श्राद्ध खर्च के लिए रघुनाथ के नाम चेक भी छोड़ा।
महत्वपूर्ण शब्द
कोखजाया – अपनी कोख से जन्मा, सगा बेटा
अवाक् – चुप, कुछ न बोल पाना
अभिशप्त – शापित
नैहर – मायका
औने-पौने दामों में – बहुत कम दाम में
सोहर – पुत्र जन्म पर गाया जाने वाला लोकगीत
टस-से-मस न होना (मुहावरा) – अपनी बात पर अडिग रहना
भाषा अध्ययन
अनूदित साहित्य: एक भाषा की रचना दूसरी भाषा में; भारतीय भाषाओं के बीच सेतु।
शीर्षक का व्यंग्य: ‘कोखजाया’ (सगा बेटा) ने ही माँ को छोड़ा, जबकि भतीजे ने बेटे का धर्म निभाया।
मुहावरे: मुँह न देखना – संबंध तोड़ लेना; लोकलज्जा से ढकना – समाज के डर से शर्मिंदा होना; बुलंदी पर होना – उन्नति के शिखर पर होना।
वाक्य शुद्धि: ‘आप इस शेष लिफाफे को खोलकर पढ़ लीजिए।’ → ‘शेष आप इस लिफाफे को खोलकर पढ़ लीजिए।’
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कारण लिखिए : मौसी ने दिलीप से मिलने से इनकार कर दिया।
दिलीप ने धोखे से घर बेचकर सारा पैसा अपने नाम किया और माँ को हवाई अड्डे पर बेसहारा छोड़कर लंदन भाग गया; इस विश्वासघात से उनका मन टूट गया था।
Q2. मौसी के पत्र से प्राप्त संदेश लिखिए।
सभी संतानें एक जैसी नहीं होतीं; जब तक एक भी सपूत संसार में है, माँएँ कष्ट सहकर भी संतान को जन्म देती रहेंगी और संसार चलता रहेगा।
Q3. मौसी के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
उच्च पद की पत्नी होकर भी निरभिमानी।
दूसरों के काम आने वाली, उदार (नाना का श्राद्ध खर्च स्वयं उठाया)।
स्वाभिमानी और दृढ़ – विश्वासघाती बेटे से अंत तक नहीं मिलीं।
स्नेहिल – रघुनाथ और उसकी पत्नी से माँ जैसा प्रेम।
Q4. ‘कोखजाया’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
कहानी सगे बेटे (कोखजाया) के विश्वासघात पर केंद्रित है।
जिस बेटे को माँ ने जन्म दिया, उसी ने उसे वृद्धाश्रम का जीवन दिया।
भतीजे ने बेटे जैसा कर्तव्य निभाया, जिससे विरोधाभास और गहरा होता है।
मौसी का पत्र भी ‘अपनी कोख का जाया बेटा…’ से शुरू होता है – इसलिए शीर्षक सार्थक है।
Q5. अभिव्यक्ति : ‘वृद्धाश्रम : आज की आवश्यकता या विवशता’।
बदलती जीवनशैली, नौकरी के लिए विदेश जाना और स्वार्थ से बुजुर्ग अकेले पड़ रहे हैं।
वृद्धाश्रम कई बुजुर्गों को सुरक्षा और साथ देते हैं, पर परिवार का स्नेह नहीं।
माता-पिता की सेवा हमारा नैतिक और कानूनी कर्तव्य है।
परिवार में सम्मान और समय देना ही सही रास्ता है।
परीक्षा टिप
पात्रों के संबंध (रघुनाथ – मौसी गंगा मिश्रा – मौसेरा भाई दिलीप) और कहानी का अंत (पत्र, चेक, दाह संस्कार का अधिकार) अवश्य याद रखें।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 13
सुनु रे सखिया, कजरी
संक्षिप्त सार
इस पाठ में दो लोकगीत हैं – ‘सुनु रे सखिया’ और ‘कजरी’। पहले गीत में एक युवती सखियों को वसंत ऋतु के आने पर प्रकृति और मन में आए उल्लास के बारे में बताती है; अंत में प्रिय के वियोग की पीड़ा है। दूसरे गीत ‘कजरी’ में सावन-भादों के मनभावन दृश्य – बादल, बिजली, रिमझिम वर्षा, मोर-पपीहा, झूले और उमड़ती नदियाँ – का सरस वर्णन है।
मुख्य बिंदु
विधा – लोकगीत: पद, दोहा, चौपाई छंदों में; गेयता प्रमुख; जनसाधारण के त्योहारों से जुड़े; परंपरा से अगली पीढ़ी तक पहुँचते हैं और लोकसंस्कृति को अक्षुण्ण रखते हैं।
लोकगीतों के प्रकार: कजरी, सोहर, बन्ना-बन्नी (आदि)।
भाषा में ग्रामीण बोली (भोजपुरी/अवधी) का स्पर्श; सरल शब्द, ग्रामीण प्रतीक, बिंब और लोककथा का आधार।
सुनु रे सखिया: वसंत आया – सरसों फूलों से लद गई, अलसी अलसाई, धरती हर्षित हुई, कली-कली मुस्काई।
खेत, वन, तन-मन सब रंग गए – मन इंद्रधनुष जैसा हो गया; आँखों में काजल, कंठ में राग।
मस्त हवा बही, बगिया मुस्काई, कलियाँ चटकीं, भौंरों के दल दौड़ आए।
वियोग: प्रिय पास नहीं है, इसलिए काजल आँख में चुभता है, सेज काँटे जैसी लगती है, आँसू आँचल भिगोते हैं – ‘पिया बो गये बबूल के फूल’।
कजरी: मनभावन सावन आया, बादल घिर-घिरकर आते हैं, बादल गरजते, बिजली चमकती, पुरवैया हवा चलती है।
रिमझिम मेघ धरती को नहलाते हैं; दादुर, मोर, पपीहा बोलते हैं, जुगनू जगमगाते हैं।
लता-बेलें फूलतीं, डाली-डाली महकती है; नदी-तालाब उमड़ते हैं और मन आनंद से भर जाता है।
अंत में ‘संकर कहैं’ – सखी, जल्दी चलो, श्याम बाँसुरी बजा रहे हैं।
अनेक शब्दों के लिए एक शब्द (भाषा अध्ययन): मन का गर्व – अहंकार; जिसका मूल्य न आँका जा सके – अमूल्य; कम व्यय करने वाला – मितव्ययी; आकाश को चूमने वाला – गगनचुंबी; जो दिखाई न दे – अदृश्य; जो खाने योग्य न हो – अखाद्य; कानून के विरुद्ध – अवैध; मन को हरने वाला – मनोहर।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. उत्तर लिखिए : (१) मन को प्रसन्न करने वाले (२) धरती को नहलाने वाले
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 14
कनुप्रिया
संक्षिप्त सार
कनुप्रिया (विशेष अध्ययन) डॉ. धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध काव्य कृति के अंश हैं। इनमें राधा (कनुप्रिया) महाभारत युद्ध के समय कृष्ण (कनु) से प्रश्न करती है। पाठ में तीन मुख्य अंश हैं – सेतु : मैं, अमंगल छाया और एक प्रश्न (शब्द : अर्थहीन)। राधा के लिए प्रेम और तन्मयता के क्षण ही सत्य हैं, जबकि युद्ध, इतिहास और कर्म-धर्म के बड़े शब्द उसे अर्थहीन लगते हैं।
मुख्य बिंदु
कवि परिचय: डॉ. धर्मवीर भारती (जन्म २५ दिसंबर १९२६, इलाहाबाद; निधन १९९७) – आचार्य धीरेंद्र वर्मा के निर्देशन में ‘सिद्ध साहित्य’ पर शोध; १९५९ तक अध्यापन; मुंबई से ‘धर्मयुग’ के वर्षों तक संपादक; ‘पद्मश्री’ से सम्मानित।
कृतियाँ: ‘गुनाहों का देवता’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ (उपन्यास), ‘सात गीत वर्ष’, ‘ठंडा लोहा’, ‘कनुप्रिया’ (कविता), ‘अंधा युग’ (गीतिनाट्य), ‘मुर्दों का गाँव’ (कहानी संग्रह)।
विधा: ‘कनुप्रिया’ को महाकाव्य, खंडकाव्य, गीतिकाव्य या गीतिनाट्य – किसी एक वर्ग में रखना कठिन; इसमें सर्ग के रूप में गीत हैं, अलग-अलग पढ़ें तो हर गीत स्वतंत्र है।
सेतु : मैं – राधा कहती है कि कृष्ण उसी पर पग रखकर नीचे की घाटी (लीलाभूमि) से ऊपर के शिखरों (युद्धक्षेत्र, इतिहास) पर चले गए; क्या मैं सिर्फ एक सेतु थी?
अमंगल छाया – घाट से लौटती राधा कदंब के नीचे खड़े ध्यानमग्न कृष्ण को याद करती है; अब उसी राह से द्वारिका की युद्धोन्मत्त सेनाएँ गुजर रही हैं।
सखियाँ/अंतर्मन कहता है – मान लिया कनु तेरा सबसे अपना है, पर ये अगणित सैनिक तुझे नहीं जानते; पथ से हट जा बावरी, आम की वह डाल भी कटकर तोपों के लिए रास्ता बनेगी।
व्यंग्य: गर्व कर बावरी! किसके महान प्रिय के पास अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ हैं?
एक प्रश्न – मान लो मेरे तन्मयता के क्षण सिर्फ भावावेश, कोमल कल्पनाएँ और रँगे हुए अर्थहीन आकर्षक शब्द थे – तो क्या युद्ध की अमानुषिक घटनाएँ, गिद्धों का उड़ना सार्थक है?
राधा चाहती है कि अर्जुन की तरह कृष्ण उसे भी समझाएँ – उसे समझाया जाना अच्छा लगता है; सेनाएँ स्तब्ध हैं और इतिहास स्थगित है।
कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व – ये शब्द गली-गली सुनाई देते हैं, पर राधा के लिए ये अर्थहीन हैं; उसके लिए कनु का प्रेम ही सार्थक है।
मूल भाव: प्रेम बनाम युद्ध; व्यक्ति के कोमल भाव बनाम इतिहास की कठोरता।
महत्वपूर्ण शब्द
कनु – कन्हैया, कृष्ण; कनुप्रिया – राधा
सेतु – पुल
अलंघ्य – जिसे लाँघा न जा सके
अक्षौहिणी – प्राचीन सेना का एक बड़ा विभाग
तन्मयता – पूरी तरह लीन होना
भावावेश – भावनाओं का उफान
गृद्ध – गिद्ध
भाषा अध्ययन
प्रतीक: घाटी – लीलाभूमि/प्रेम; शिखर – इतिहास/युद्ध; सेतु – राधा; आम्रवृक्ष की डाल – प्रेम की स्मृतियाँ।
उपमा: ‘(जैसे बुलाते थे भटकी हुई गायों को)’ – गिद्धों को बुलाना।
पुनरुक्ति और व्यंग्य: ‘शब्द, शब्द, शब्द…’; ‘गर्व कर बावरी !’।
शैली: मुक्त छंद, आत्मालाप (स्वगत कथन), प्रश्नात्मक शैली, नाटकीयता।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कृति पूर्ण कीजिए : (१) कनुप्रिया की तन्मयता के गहरे क्षण सिर्फ – (२) कनुप्रिया के लिए अर्थहीन शब्द –
(१) भावावेश, सुकोमल कल्पनाएँ, रँगे हुए अर्थहीन आकर्षक शब्द थे। (२) कर्म, स्वधर्म, निर्णय, दायित्व।
Q2. ‘सेतु’ के रूप में राधा की व्यथा स्पष्ट कीजिए।
कृष्ण राधा के प्रेम को सीढ़ी बनाकर लीलाभूमि से इतिहास और युद्धक्षेत्र की ऊँचाइयों पर चले गए; राधा पीछे छूट गई, उसे लगता है कि वह केवल एक पुल थी।
Q3. ‘अमंगल छाया’ में राधा के मन की दशा का वर्णन कीजिए।
जिस राह पर कृष्ण उसकी प्रतीक्षा करते थे, वहाँ से अब सेनाएँ गुजर रही हैं।
सैनिक राधा को नहीं जानते – उसे पथ से हटने को कहा जाता है।
प्रिय आम की डाल भी युद्ध के लिए काटी जाएगी।
राधा में पीड़ा, अकेलापन और व्यंग्य का भाव है।
Q4. ‘एक प्रश्न’ अंश में राधा कृष्ण से क्या पूछती है?
यदि मेरे प्रेम के क्षण अर्थहीन थे, तो क्या युद्ध की अमानुषिक घटनाएँ सार्थक हैं?
क्या तुम गिद्धों को वैसे ही बुलाते हो जैसे भटकी गायों को बुलाते थे?
अर्जुन की तरह मुझे भी समझाओ।
उसके लिए कर्म, स्वधर्म जैसे शब्द खोखले हैं; प्रेम ही सत्य है।
Q5. ‘कनुप्रिया’ की काव्य-विधा के बारे में लिखिए।
इसे महाकाव्य, खंडकाव्य, गीतिकाव्य या गीतिनाट्य में बाँधना कठिन है।
सर्ग के रूप में गीत हैं; हर गीत स्वतंत्र भी है।
मुक्त छंद और आत्मकथनात्मक नाटकीय शैली।
राधा के माध्यम से आधुनिक मनुष्य के युद्ध-विरोधी प्रश्न।
परीक्षा टिप
तीनों अंशों के शीर्षक और उनके मुख्य भाव अलग-अलग याद करें; प्रतीकों (सेतु, घाटी, शिखर) का अर्थ लिखने से उत्तर प्रभावी बनता है।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 15
पल्लवन
संक्षिप्त सार
पल्लवन डॉ. दयानंद तिवारी का पाठ है, जो अध्यापक और विद्यार्थियों (रोशन, तन्वी, गीत, मितवा) के संवाद के रूप में लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि किसी सूक्ति, लोकोक्ति, कहावत या काव्य-पंक्ति के गूढ़ अर्थ को विस्तार से, सरल और क्रमबद्ध रूप में स्पष्ट करना पल्लवन है। पाठ में पल्लवन का महत्त्व, विशेषताएँ, शैलियाँ, प्रक्रिया और उदाहरण दिए गए हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. दयानंद तिवारी (जन्म १ अक्तूबर १९६२, खोपोली, जिला रायगड, महाराष्ट्र) – अध्यापक, समाजशास्त्री और साहित्यकार; आकाशवाणी-दूरदर्शन की परिचर्चाओं में सहभागी।
विधा: संवादात्मक शैली में लिखा गया उपयोजित लेखन पाठ।
पल्लवन का अर्थ: जैसे बीज से पेड़, पेड़ से पल्लव और डालियाँ विकसित होती हैं, वैसे ही किसी संक्षिप्त कथन के भाव का विस्तार करना।
महत्त्व: साहित्यकारों के मौलिक विचार समझने में सहायता; व्यक्तित्व निर्माण; वक्ता, पत्रकार, नेता, प्रोफेसर, वकील बनने में उपयोगी; कहानी, संवाद, विज्ञापन, समाचार लेखन में भी उपयोग।
शैली १: विषय प्रवर्तन पहले वाक्य से ही; लंबी भूमिका नहीं।
शैली २: आरंभ के दो-तीन वाक्यों में भूमिका, बीच के दस-बारह वाक्यों में विषय प्रतिपादन, अंतिम दो-तीन वाक्यों में उपसंहार।
प्रक्रिया: (१) विषय को भली-भाँति पढ़ना, समझना, अर्थ पर फिर सोचना; (२) संक्षिप्त रूपरेखा बनाना, पक्ष-विपक्ष सोचकर असंगत विचार हटाना; (३) शब्दसीमा के अनुसार लिखना और अंत में दोबारा पढ़ना।
नियम: पल्लवन अन्य पुरुष में, परोक्ष कथन और भूतकालिक क्रिया से लिखें; उत्तम पुरुष (मैं/हम) और मध्यम पुरुष (तुम/आप) का प्रयोग नहीं।
पाठ के उदाहरण: ‘नर हो, न निराश करो मन को’; ‘अविवेक आपदाओं का घर है’; ‘सेवा तीर्थयात्रा से बढ़कर है’; कबीर – ‘जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोइ तू फूल’।
महत्वपूर्ण शब्द
पल्लवन – भाव विस्तार
सूक्ति – सुंदर, सारगर्भित कथन
विषय प्रवर्तन – विषय की शुरुआत
उपसंहार – समापन
अन्य पुरुष – वह/वे वाला पुरुष (तृतीय पुरुष)
परोक्ष कथन – अप्रत्यक्ष रूप से कही गई बात
भाषा अध्ययन
पल्लवन का नमूना (संक्षेप): ‘नर हो, न निराश करो मन को’ – मनुष्य सबसे बुद्धिमान और सक्षम प्राणी है। जीवन में सुख-दुख, सफलता-असफलता आते रहते हैं। मन हार जाए तो कोई बड़ा कार्य संभव नहीं। मनोबल ही उसे निरंतर कर्म की प्रेरणा देता है, इसलिए मनुष्य को कभी निराश नहीं होना चाहिए।
ध्यान रखें: मूल भाव से न भटकें, उदाहरण/दृष्टांत दें, एक ही बात न दोहराएँ, भाषा सरल रखें।
पुरुष के भेद: उत्तम (मैं, हम), मध्यम (तू, तुम, आप), अन्य (वह, वे, यह, ये)।
अन्य पुरुष में, परोक्ष कथन और भूतकालिक क्रिया के माध्यम से; उत्तम और मध्यम पुरुष का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
Q3. पल्लवन की प्रक्रिया स्पष्ट कीजिए।
विषय को ध्यान से पढ़कर उसका अर्थ समझना।
संक्षिप्त रूपरेखा बनाना, पक्ष-विपक्ष के तर्क सोचना।
असंगत विचार हटाकर संगत विचारों को क्रम से जोड़ना।
शब्दसीमा में अनुच्छेद लिखकर अंत में दोबारा पढ़ना।
Q4. पल्लवन का जीवन में क्या महत्त्व है?
गूढ़ विचारों को समझने की क्षमता बढ़ती है।
अभिव्यक्ति कौशल और व्यक्तित्व का विकास होता है।
वक्ता, पत्रकार, वकील, अध्यापक जैसे व्यवसायों में उपयोगी।
कहानी, संवाद, विज्ञापन और समाचार लेखन में भी सहायक।
Q5. पल्लवन कीजिए : ‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।’
सफलता किसी भाग्य से नहीं, निरंतर परिश्रम से मिलती है। किसान वर्ष भर मेहनत करके ही अन्न उगाता है। विद्यार्थी नियमित अध्ययन से ही परीक्षा में सफल होता है। महान वैज्ञानिकों और खिलाड़ियों की उपलब्धियों के पीछे वर्षों का श्रम छिपा रहता है। परिश्रमी व्यक्ति असफलता से भी सीखकर आगे बढ़ता है। इसलिए परिश्रम को ही सफलता का वास्तविक साधन माना गया है।
परीक्षा टिप
बोर्ड में पल्लवन लगभग ८०-१०० शब्दों में आता है – पहला वाक्य सीधे विषय पर, बीच में तर्क और उदाहरण, अंत में निष्कर्ष; ‘मैं/आप’ न लिखें।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 16
फीचर लेखन
संक्षिप्त सार
फीचर लेखन डॉ. बीना शर्मा का पाठ है, जिसमें फीचर लेखन की जानकारी कहानी के माध्यम से दी गई है। फीचर लेखिका स्नेहा को ‘सर्वश्रेष्ठ फीचर लेखन’ का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है और परिवार की पार्टी में वह अपनी यात्रा याद करती है – पत्रकारिता की कक्षा, फीचर की परिभाषाएँ और दस वर्ष पहले फीचर लेखन पर दिया गया व्याख्यान। अंत में पता चलता है कि उसी व्याख्यान में प्रश्न पूछने वाला विद्यार्थी आज विख्यात फीचर लेखक बन चुका है।
मुख्य बिंदु
लेखिका परिचय: डॉ. बीना शर्मा (जन्म २० अक्तूबर १९५९, आगरा, उ.प्र.) – लेखिका और कवयित्री; हिंदीतर और विदेशी विद्यार्थियों के हिंदी शिक्षण में उल्लेखनीय कार्य; केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में आचार्य एवं कुलसचिव। कृतियाँ: ‘हिंदी शिक्षण-अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य’, ‘भारतीय सांस्कृतिक प्रतीक’।
विधा – कहानी: कम पात्रों में जीवन का बड़ा चित्र; ‘गागर में सागर’।
बी.ए. के बाद स्नेहा ने पत्रकारिता का कोर्स चुना; माँ ने समर्थन किया।
परिभाषाएँ: जेम्स डेविस – फीचर समाचारों को नया आयाम देता है, उनका परीक्षण-विश्लेषण कर नया प्रकाश डालता है। पी.डी. टंडन – फीचर गद्य गीत की तरह होता है, जो बहुत लंबा, नीरस और गंभीर नहीं होना चाहिए।
फीचर समाचारपत्र का प्राणतत्त्व है – घटना की मनोरंजक अभिव्यक्ति की कला।
विशेषताएँ: नवीनतम जानकारी, सत्यता/तथ्यता, समसामयिक विषय, भावप्रधानता, तार्किकता (विश्वसनीयता के लिए), नवीनता, पाठक की योग्यता का ध्यान, कथन-उद्धरण-मुहावरों का प्रयोग, निष्पक्षता, सहज भाषा, चित्र-कार्टून-फोटो।
फीचर के प्रकार: व्यक्तिपरक, सूचनात्मक, विवरणात्मक, विश्लेषणात्मक, साक्षात्कार, विज्ञापन फीचर।
प्रक्रिया के तीन अंग: (१) विषय का चयन – रोचक, ज्ञानवर्धक, समसामयिक, जिज्ञासा जगाने वाला; (२) सामग्री का संकलन – पुस्तकें, पत्रिकाएँ, लोगों से मिलकर, स्थानों पर जाकर; (३) फीचर योजना – योजनाबद्ध ढाँचा।
चार सोपान: (१) प्रस्तावना – आकर्षक संक्षिप्त परिचय; (२) विवरण/मुख्य कलेवर – अनुभव और जानकारी क्रमबद्ध, रोचक रूप में; (३) उपसंहार – सार/निचोड़, निष्कर्ष या अनुत्तरित प्रश्न; (४) शीर्षक – फीचर की आत्मा; संक्षिप्त, रोचक, जिज्ञासावर्धक।
सावधानियाँ: मिथ्या आरोप-प्रत्यारोप नहीं; अति क्लिष्ट और आलंकारिक भाषा नहीं; झूठे आँकड़े नहीं; अति नाटकीयता और हवाई कल्पनाएँ नहीं।
महत्वपूर्ण शब्द
फीचर – किसी विषय का सजीव, मनोरंजक और विश्लेषणात्मक आलेख
कलेवर – ढाँचा, मुख्य भाग
सोपान – चरण, सीढ़ी
संप्रेषणीयता – बात पहुँचाने की क्षमता
समसामयिक – वर्तमान समय से संबंधित
चार चाँद लगाना (मुहावरा) – शोभा बढ़ाना
भाषा अध्ययन
अच्छे फीचर के गुण (पाठ के अंत की सूची): मनोरंजकता, ज्ञानवर्धकता, मानवीय रुचि पर आधारित, कल्पनाशीलता, भावात्मकता, तर्कसंगतता, गतिशीलता, रोचकता, चित्रात्मकता, भाषाशैली।
समाचार और फीचर में अंतर: समाचार तथ्य की तुरंत सूचना देता है; फीचर उसी विषय का विस्तृत, रोचक और विश्लेषणात्मक प्रस्तुतीकरण है।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 17
मैं उद्घोषक
संक्षिप्त सार
मैं उद्घोषक आनंद सिंह का पाठ है, जिसमें सूत्र संचालन (मंच संचालन) की जानकारी आत्मकथा के रूप में दी गई है। आकाशवाणी मुंबई के उद्घोषक रहे लेखक बताते हैं कि नौवीं कक्षा में गांधी जयंती पर पहली बार मंच पर उनके हाथ-पैर काँपे, पर हिम्मत से बोलकर उन्होंने सफलता पाई। पाठ में सूत्र संचालक के गुण, संचालन के प्रकार, चरण, तैयारी और इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर बताए गए हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: आनंद प्रकाश सिंह (जन्म २१ जुलाई १९५८, धुबरी, असम; शिक्षा प्रतापगढ़ और इलाहाबाद) – कविता, लेख, फिल्म-नाट्य-कला समीक्षा; श्रेष्ठ उद्घोषक और मंच संचालक; आकाशवाणी मुंबई में २९ वर्ष उद्घोषक रहकर सेवानिवृत्त।
विधा – आत्मकथा: ‘मैं’ (उत्तम पुरुष) में लिखी जाती है; निष्ठा, तटस्थता और निरपेक्षता उसे विश्वसनीय बनाती हैं।
उद्घोषक = मंच संचालक = एंकर; वह श्रोता और वक्ता को जोड़ने वाली कड़ी (सेतु) है।
भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी जैसी हस्तियों ने कहा – ‘मैं तो तुम्हारा फैन हो गया’।
शुरुआत में माइक साँप के फन जैसा लगता था; नेताओं के हकलाने-काँपने और बाद में कुशल वक्ता बनने के प्रसंग याद कर लेखक ने हिम्मत जुटाई।
सूत्र संचालन के प्रकार: शासकीय कार्यक्रम, दूरदर्शन, रेडियो, और राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सूत्र संचालन।
शासकीय/राजनीतिक समारोह में प्रोटोकॉल का ध्यान – पदानुसार नामों की सूची, सत्कार की योजना; अति आलंकारिक भाषा से बचना।
दूरदर्शन/रेडियो में कार्यक्रम की पूरी जानकारी और लिखित संहिता (स्क्रिप्ट); अचानक बदलाव पर संहिता बदलकर संचालन।
गुण: हँसमुख, हाजिरजवाबी, मिलनसार, विविध विषयों का ज्ञान, भाषा पर प्रभुत्व, समयसूचकता; परिधान सहज और गरिमामय; सतर्कता, सहजता, उत्साहवर्धन।
चरण: श्रोता वंदन, स्वयं का परिचय, स्वागत; मंच पर उपस्थित महानुभावों का सम्मान; सकारात्मक अभिप्राय; सहज-उत्स्फूर्त संचालन; आवाज में उतार-चढ़ाव; श्रोताओं से संवाद; गलती पर तुरंत माफी; कार्यक्रम के अनुसार भाषा-शैली।
गीत/मुशायरे में भावपूर्ण सरल भाषा, व्याख्यान में संदर्भ सहित सटीक शब्द; बीच-बीच में दृष्टांत, शेर-ओ-शायरी और कविता।
बचपन में ‘चंपक’, ‘नंदन’, ‘चंदामामा’, फिर ‘धर्मयुग’, ‘कादंबिनी’, ‘नवनीत’ आदि पढ़ना और रेडियो सुनना संचालन का आधार बना। पुरस्कार: किंग ऑफ वॉईस, संस्कृति शिरोमणि, अखिल आकाशवाणी।
रोजगार: रेडियो, दूरदर्शन, निजी चैनल, कार्यक्रम आयोजन, विज्ञापन आदि में उद्घोषक/एंकर के अवसर।
महत्वपूर्ण शब्द
उद्घोषक – घोषणा करने वाला, एंकर
सूत्र संचालन – कार्यक्रम को क्रम से चलाना
संहिता – स्क्रिप्ट, लिखित आलेख
प्रोटोकॉल – पद-प्रतिष्ठा के अनुसार शिष्टाचार का क्रम
हाजिरजवाबी – तुरंत उचित उत्तर देने की क्षमता
समयसूचकता – मौके के अनुसार सूझ-बूझ
पापड़ बेलना (मुहावरा) – बहुत परिश्रम करना
भाषा अध्ययन
आत्मकथात्मक शैली: ‘मैं उद्घोषक हूँ…’ की आवृत्ति; व्यक्तिगत प्रसंग।
उपमा: ‘माइक मुझे साँप के फन की तरह नजर आता था’।
मुहावरे: भूरि-भूरि प्रशंसा करना – बहुत प्रशंसा करना; चार चाँद लगाना – शोभा बढ़ाना; होश खो बैठना – घबरा जाना।
पर्यायवाची: उद्घोषक – मंच संचालक, एंकर, सूत्रधार।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. सूत्र संचालन के प्रकार लिखिए।
शासकीय कार्यक्रम, दूरदर्शन हेतु, रेडियो हेतु, और राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सूत्र संचालन।
Q2. सूत्र संचालक के चार गुण लिखिए।
हँसमुख, हाजिरजवाबी, भाषा पर प्रभुत्व, विविध विषयों का ज्ञान (मिलनसार होना, समयसूचकता भी)।
Q3. शासकीय एवं राजनीतिक समारोह के संचालन में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
प्रोटोकॉल का पालन – पदों के अनुसार नामों की सूची।
किसका सत्कार किसके हाथों होगा, इसकी योजना।
अति आलंकारिक भाषा से बचना।
ऐन वक्त पर होने वाले बदलाव के लिए तैयार रहना।
Q4. सूत्र संचालन के चरण स्पष्ट कीजिए।
श्रोता वंदन, स्वयं का परिचय और स्वागत।
मंच पर उपस्थित महानुभावों का आदरपूर्वक सम्मान।
सहज, उत्स्फूर्त संचालन, आवाज में उतार-चढ़ाव, श्रोताओं से संवाद।
समयसूचकता, गलती पर तुरंत माफी और कार्यक्रम के अनुसार भाषा-शैली।
Q5. सूत्र संचालन : विद्यालय के वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह की प्रारंभिक संहिता लिखिए।
‘आदरणीय मुख्य अतिथि, प्रधानाचार्य जी, शिक्षकगण, अभिभावक और मेरे प्यारे साथियो! मैं, (नाम), आज के इस गौरवशाली वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में आप सबका हार्दिक स्वागत करता/करती हूँ। मेहनत का फल जब सम्मान बनकर सामने आता है, तो खुशी दुगुनी हो जाती है। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से करने के लिए मैं मुख्य अतिथि महोदय से मंच पर पधारने का विनम्र अनुरोध करता/करती हूँ…’
परीक्षा टिप
सूत्र संचालन के प्रश्न में श्रोता वंदन, स्वागत, प्रोटोकॉल के अनुसार नाम और एक काव्य-पंक्ति जोड़ें – उत्तर तुरंत प्रभावी लगता है।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 18
ब्लॉग लेखन
संक्षिप्त सार
ब्लॉग लेखन मराठी पत्रकार प्रवीण बर्दापूरकर का आलेख है। इसमें बताया गया है कि ब्लॉग अपने विचार और मत व्यक्त करने का एक डिजिटल माध्यम है, जिसके लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं और शब्दसंख्या का बंधन नहीं। लेखक ब्लॉग का इतिहास, शुरू करने की प्रक्रिया, लेखक के आवश्यक गुण, सावधानियाँ, प्रचार-प्रसार और आर्थिक लाभ समझाते हैं। अंत में ‘महात्मा गांधी – जीने की प्रेरणा देने वाला महामानव’ ब्लॉग का नमूना दिया गया है।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: प्रवीण बर्दापूरकर (जन्म ३ सितंबर १९५५, गुलबर्गा) – मराठी पत्रकारिता में सम्मानित, निर्भीक पत्रकार; ब्लॉग लेखन को लोकप्रिय बनाया; धर्मनिरपेक्ष दृष्टि। कृतियाँ: ‘डायरी’, ‘नोंदी डायरीनंतरच्या’, ‘दिवस असे की’, ‘आई’, ‘ग्रेस नावाचं गारूड’।
विधा – आलेख: विज्ञान, राजनीति, समसामयिक विषयों की विस्तृत और ज्ञानवर्धक जानकारी।
डिजिटल माध्यम: ब्लॉग, वेबसाइट, पोर्टल; कंप्यूटर, टैब या सेलफोन के परदे पर पढ़ना। नये वाचकों (विशेषकर युवा) की संख्या मुद्रित माध्यम के पाठकों से अधिक; लेखक-पत्रकार ग्लोबल हो गए।
इतिहास: जॉन बर्गर ने ‘वेब्लॉग’ (Weblog) शब्द का प्रयोग किया; जस्टीन हॉल ने सन १९९४ में सबसे पहले इस शब्द का प्रयोग किया; १९९९ में पीटर मेरहोल्स ने ‘ब्लॉग’ शब्द प्रस्थापित किया; भारत में २००२ के बाद ब्लॉग लेखन आरंभ हुआ।
शुरू करने की प्रक्रिया: तकनीकी प्रक्रिया – डोमेन (ब्लॉग का शीर्षक) रजिस्टर्ड कराना, किसी सर्वर से जोड़ना, फिर सामग्री डालना।
ब्लॉग लेखक के गुण: संवाद के लिए बहुत-से विषय, विपुल पठन, चिंतन, भाषा का समुचित ज्ञान; सहज, प्रवाहमयी भाषा; विषय से जुड़े संदर्भ, घटनाएँ और यादें।
शैली एक दिन में नहीं बनती – जैसे गायक रोज रियाज करता है, वैसे ही निरंतर लेखन से शैली विकसित होती है।
सावधानियाँ: मानक भाषा, व्याकरणिक शुद्धता; लेखन की स्वतंत्रता का अर्थ कुछ भी लिखने का अनुमतिपत्र नहीं; गाली-गलौज, अश्लीलता, निंदा, गलत टिप्पणी, सामाजिक तनाव से दूर रहें; बिना सबूत आरोप गंभीर अपराध है।
प्रचार-प्रसार: विज्ञापन, फेसबुक, वॉट्सऐप, एसएमएस; आकर्षक चित्रों के साथ रोचक सामग्री; पाठक ही प्रचारक बन जाते हैं।
आर्थिक लाभ: हिंदी और अंग्रेजी ब्लॉग का बड़ा पाठक वर्ग; राजनीति, जीवनशैली, शिक्षा, यात्रा वर्णन, आत्मकथात्मक विषय खूब पढ़े जाते हैं; विद्यार्थी अपने अनुभव साझा कर सकते हैं।
नमूना ब्लॉग: गांधीजी को हर कोई अलग रूप में देखता है – ‘हाथी और सात अंधों’ की कहानी की तरह; उनका एकमात्र धर्म ‘मानवता’; वे धर्मनिरपेक्ष, अहिंसा के पुजारी और विश्व के लिए वंदनीय थे।
महत्वपूर्ण शब्द
ब्लॉग – विचार व्यक्त करने का डिजिटल माध्यम (वेब्लॉग)
डोमेन – ब्लॉग/वेबसाइट का पंजीकृत नाम
सर्वर – सामग्री को इंटरनेट पर उपलब्ध कराने वाला कंप्यूटर
संप्रेषणीय – बात पहुँचाने में समर्थ
सौष्ठव – सुंदरता, सुगठन
बाँकपन – भाषा की विशिष्ट अदा
भाषा अध्ययन
अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग: डोमेन, सर्वर, पोर्टल, ग्लोबल – तकनीकी विषय में सहज मिश्रण।
दृष्टांत: ‘गायक रोज रियाज करता है’; ‘हाथी और सात अंधे’।
पारिभाषिक शब्द: Digital – अंकीय/डिजिटल; Website – जालस्थल; Internet – अंतरजाल; Post – प्रविष्टि।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. ब्लॉग लेखन की प्रक्रिया लिखिए।
डोमेन (ब्लॉग का शीर्षक) रजिस्टर्ड कराना, उसे किसी सर्वर से जोड़ना और फिर उसमें विषय सामग्री समाविष्ट करके ब्लॉग का उपयोग करना।
Q2. ब्लॉग शब्द से संबंधित इतिहास के महत्त्वपूर्ण तथ्य लिखिए।
जॉन बर्गर ने ‘वेब्लॉग’ शब्द का प्रयोग किया; जस्टीन हॉल ने १९९४ में इसका सबसे पहले प्रयोग किया; १९९९ में पीटर मेरहोल्स ने ‘ब्लॉग’ शब्द प्रस्थापित किया; भारत में २००२ के बाद ब्लॉग लेखन आरंभ हुआ।
Q3. ब्लॉग लेखन में कौन-सी सावधानियाँ आवश्यक हैं?
मानक भाषा और व्याकरणिक शुद्धता।
गाली-गलौज और अश्लील शब्दों से बचना।
किसी की निंदा, गलत टिप्पणी या समाज में तनाव फैलाने से दूर रहना।
बिना सबूत किसी पर आरोप न लगाना।
Q4. ब्लॉग लेखन से होने वाले लाभ स्पष्ट कीजिए।
अनुमति और शब्दसीमा के बंधन के बिना विचारों की अभिव्यक्ति।
विश्व भर के पाठकों तक तुरंत पहुँच।
विज्ञापनों और बड़े पाठक वर्ग के कारण आर्थिक लाभ।
सामाजिक जागरण और विद्यार्थियों द्वारा अनुभव साझा करने का माध्यम।
Q5. ब्लॉग लेखन : ‘मेरा प्रिय त्योहार’ (रूपरेखा)।
आकर्षक शीर्षक और एक चित्र।
त्योहार से जुड़ी व्यक्तिगत स्मृति से शुरुआत।
परंपरा, तैयारियाँ, पारिवारिक मेल-जोल का सहज भाषा में वर्णन।
पर्यावरण-अनुकूल उत्सव का संदेश और पाठकों से प्रश्न – ‘आप कैसे मनाते हैं?’
परीक्षा टिप
ब्लॉग का इतिहास (१९९४, १९९९, २००२ और नाम) और सावधानियाँ सबसे ज्यादा पूछी जाती हैं; ब्लॉग लिखते समय आत्मीय ‘मैं’ शैली और सरल भाषा रखें।
१२ वी (विज्ञान, वाणिज्य, कला) · हिंदी (युवकभारती) · पाठ 19
प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव
संक्षिप्त सार
प्रकाश उत्पन्न करने वाले जीव डॉ. परशुराम शुक्ल का शोधपरक लेख है। इसमें बताया गया है कि जुगनू के अलावा कवक, मशरूम, जेलीफिश, स्क्विड, झींगे, एंगलर मछली जैसे असंख्य जीव अपने शरीर से प्रकाश उत्पन्न करते हैं। इस प्रक्रिया को ल्यूमिनिसेंस कहते हैं और इसमें ऊष्मा नहीं निकलती, इसलिए इसे ‘शीतल प्रकाश’ कहा जाता है। लेखक जीवों द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने के तरीके और उद्देश्य समझाते हैं।
मुख्य बिंदु
लेखक परिचय: डॉ. परशुराम शुक्ल (जन्म ६ जून १९४७, कानपुर, उ.प्र.) – बाल साहित्य और पशु जगत के विश्लेषण में सिद्धहस्त; भारतीय वन्य जीवों का अनुसंधानपरक लेखन; कृतियों का अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी में अनुवाद।
कृतियाँ: ‘जासूस परमचंद के कारनामे’ (बाल धारावाहिक), ‘नन्हा जासूस’ (बाल कहानी संग्रह), ‘सुनहरी परी और राजकुमार’ (बाल उपन्यास), ‘नंदनवन’, ‘आओ बच्चो, गाओ बच्चो’, ‘मंगल ग्रह जाएँगे’ (बाल कविता संग्रह)।
विधा – शोधपरक लेख: वस्तुनिष्ठता, ज्ञानपरकता, शोधपरकता; उदाहरणों से रोचकता।
मनुष्य अँधेरे के लिए टॉर्च-बल्ब बनाता है; प्रकृति ने पशु-पक्षियों को अलग सुविधाएँ दीं (उल्लू की बड़ी आँखें, बाघ-सिंह की रात में देखने वाली आँखें)। कुछ जीवों ने प्रकाश उत्पन्न करने वाले अंग विकसित किए – बायोल्यूमिनिसेंट जीव।
बल्ब बनाम जीव: बल्ब का तंतु (फिलामेंट) गर्म होकर प्रकाश के साथ ऊष्मा देता है – ‘गर्म प्रकाश’; जीवों के प्रकाश में ऊष्मा नहीं – ‘शीतल/ठंडा प्रकाश’।
उदाहरण: जुगनू (कीट वर्ग, पूरे वर्ष प्रकाश); कवक की चमकने वाली जातियाँ – उनका प्रकाश ‘फॉक्स फायर’; मशरूम की कुछ जातियाँ; मोती बनाने वाला घोंघा मुक्ताशुक्ति।
ऐसे जीव थल की अपेक्षा सागरों में अधिक – मुख्यतः २२० मीटर से ११०० मीटर गहराई में (जेलीफिश, स्क्विड, क्रिल, झींगे)।
ताजा पानी (नदी, झील, तालाब) में ये प्रायः नहीं मिलते, क्योंकि वहाँ तल तक सूर्य की किरणें पहुँचती हैं; समुद्र की गहराई में अँधेरा रहता है।
दो तरीके: (१) जीवाणुओं द्वारा – शरीर पर रहने वाले प्रकाशदायी जीवाणुओं से सहजीवी संबंध; शरीर का भाग ढककर प्रकाश नियंत्रित करना; (२) रासायनिक क्रिया द्वारा – ल्यूसीफेरिन और ल्यूसीफेरैस नामक रसायनों की क्रिया से; ऑक्सीजन आवश्यक; सागरी जीव पानी के बाहर प्रकाश नहीं दे सकते।
उद्देश्य: साथी की खोज और संकेतों का आदान-प्रदान; शिकार की खोज और उसे आकर्षित करना (जैसे एंगलर मछली); कामाफ्लास (परिवेश में घुल-मिल जाना); आत्मरक्षा।
संदेश: विज्ञान की आँखों से आस-पास की दुनिया को देखें।
महत्वपूर्ण शब्द
ल्यूमिनिसेंस – जीवों द्वारा प्रकाश उत्पन्न करने की प्रक्रिया
बायोल्यूमिनिसेंट – प्रकाश उत्पन्न करने वाले (जीव)
फॉक्स फायर – चमकने वाले कवक का प्रकाश
मुक्ताशुक्ति – मोती बनाने वाला समुद्री घोंघा (पर्ल ऑयस्टर)
सहजीवी संबंध – दो जीवों का परस्पर लाभ वाला संबंध
कामाफ्लास – परिवेश से घुल-मिलकर छिप जाने की स्थिति
तंतु – फिलामेंट
भाषा अध्ययन
विधा की विशेषताएँ: वैज्ञानिक शब्दावली के साथ अंग्रेजी पर्याय कोष्ठक में; तथ्य, आँकड़े और उदाहरण।