मध्यकाल तक हिंदी साहित्य मुख्यतः पद्य में था। खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवीं सदी में हुआ। फोर्ट विलियम कॉलेज, ईसाई मिशनरियों, समाज-सुधार आंदोलनों, पत्र-पत्रिकाओं और छापेखाने ने गद्य को आगे बढ़ाया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने गद्य को साहित्यिक रूप दिया और महावीरप्रसाद द्विवेदी ने उसे व्याकरण-सम्मत और मानक बनाया। इसलिए आधुनिक काल को 'गद्यकाल' भी कहा जाता है।
मुख्य बिंदु
आरंभिक गद्य के नमूने ब्रज और राजस्थानी में मिलते हैं, पर वे बिखरे हुए हैं।
आचार्य शुक्ल ने रामप्रसाद निरंजनी के 'भाषा योगवासिष्ठ' को खड़ी बोली गद्य का प्रौढ़ आरंभिक ग्रंथ माना।
फोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता, 1800) में अंग्रेज़ अधिकारियों को भारतीय भाषाएँ सिखाने के लिए पुस्तकें लिखवाई गईं।
खड़ी बोली गद्य के चार आरंभिक लेखक: मुंशी सदासुखलाल ('सुखसागर'), इंशा अल्ला खाँ ('रानी केतकी की कहानी'), लल्लूलाल ('प्रेमसागर'), सदल मिश्र ('नासिकेतोपाख्यान')। इनमें लल्लूलाल और सदल मिश्र फोर्ट विलियम कॉलेज से जुड़े थे।
इंशा अल्ला खाँ ने ठेठ हिंदी में, बिना अरबी-फारसी या संस्कृत के भारी शब्दों के, कहानी लिखने का प्रयोग किया।
पहला हिंदी समाचार पत्र 'उदंत मार्तंड' (1826, कलकत्ता) पं. जुगलकिशोर शुक्ल ने निकाला।
भाषा-विवाद: राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' उर्दू-मिश्रित सरल भाषा के पक्ष में, राजा लक्ष्मणसिंह संस्कृतनिष्ठ हिंदी के पक्ष में।
स्वामी दयानंद ने 'सत्यार्थ प्रकाश' हिंदी में लिखकर धार्मिक-सामाजिक विचारों के लिए हिंदी गद्य का प्रयोग किया।
भारतेंदु ने दोनों अतियों के बीच का संतुलित मार्ग अपनाया; नाटक, निबंध, पत्रकारिता से गद्य को समृद्ध किया।
महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से वर्तनी, व्याकरण और विराम-चिह्नों में सुधार किया।
बीसवीं सदी में कहानी, उपन्यास, निबंध, आलोचना, आत्मकथा जैसी अनेक गद्य विधाएँ विकसित हुईं।
महत्वपूर्ण शब्द
गद्य – छंद और लय के बंधन से मुक्त सामान्य भाषा में लेखन।
खड़ी बोली – दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की बोली, जो मानक हिंदी का आधार बनी।
गद्यकाल – आधुनिक काल का दूसरा नाम (शुक्लजी द्वारा)।
संस्कृतनिष्ठ – संस्कृत शब्दों की अधिकता वाली भाषा।
आधुनिक हिंदी साहित्य का पहला चरण भारतेंदु युग कहलाता है, जो लगभग 1850 से 1900 ईसवी तक माना जाता है। इसका नाम भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर पड़ा, जिन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है। इस युग में हिंदी गद्य की अनेक विधाओं (नाटक, निबंध, उपन्यास, पत्रकारिता) का आरंभ हुआ और साहित्य में राष्ट्रीयता तथा समाज-सुधार का स्वर आया।
मुख्य बिंदु
इस युग में गद्य के लिए खड़ी बोली और कविता के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग प्रमुख रहा।
भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) ने छोटी आयु में ही नाटक, कविता, निबंध और पत्रकारिता में बड़ा योगदान दिया।
1880 में विद्वानों और जनता ने उन्हें 'भारतेंदु' की उपाधि दी।
भारतेंदु की पत्रिकाएँ: कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन (बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका) और स्त्रियों के लिए बाला बोधिनी।
भारतेंदु के प्रसिद्ध नाटक: अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, चंद्रावली।
भारतेंदु के आसपास लेखकों का समूह भारतेंदु मंडल कहलाया।
बालकृष्ण भट्ट ने 'हिंदी प्रदीप', प्रतापनारायण मिश्र ने 'ब्राह्मण' और बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने 'आनंद कादंबिनी' पत्रिका निकाली।
इसी युग में लाला श्रीनिवासदास का परीक्षा गुरु लिखा गया, जिसे शुक्लजी ने अंग्रेज़ी ढंग का पहला मौलिक हिंदी उपन्यास माना।
साहित्य में देशभक्ति, अंग्रेज़ी शासन की आर्थिक लूट की आलोचना, स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह और अंधविश्वास के विरोध के स्वर मिलते हैं।
भारतेंदु की पंक्ति 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' मातृभाषा के महत्व को बताती है।
महत्वपूर्ण शब्द
भारतेंदु मंडल – भारतेंदु के साथी लेखकों का समूह।
नवजागरण – 19वीं सदी की सामाजिक-सांस्कृतिक जागृति।
प्रहसन – हास्य-व्यंग्य से भरा छोटा नाटक (जैसे अंधेर नगरी)।
पत्रकारिता – पत्र-पत्रिकाओं द्वारा विचारों का प्रचार।
गद्यकाल – शुक्लजी द्वारा आधुनिक काल को दिया गया नाम।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) – नाटककार, कवि, पत्रकार; आधुनिक हिंदी के जनक।
ठाकुर जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यास, राधाचरण गोस्वामी – मंडल के अन्य लेखक।
1880 – हरिश्चंद्र को 'भारतेंदु' उपाधि।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. भारतेंदु को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक क्यों कहा जाता है?
उन्होंने हिंदी में नाटक, निबंध, पत्रकारिता जैसी आधुनिक विधाओं की नींव रखी, खड़ी बोली गद्य को आगे बढ़ाया और साहित्य को देशभक्ति व समाज-सुधार से जोड़ा। इसलिए उन्हें आधुनिक हिंदी का जनक कहा जाता है।
Q2. अंधेर नगरी नाटक का मूल संदेश क्या है?
अंधेर नगरी एक प्रहसन है जिसमें मूर्ख और अन्यायी राजा के राज्य की अव्यवस्था दिखाई गई है। इसके माध्यम से भारतेंदु ने अन्यायपूर्ण शासन और लालच पर व्यंग्य किया है।
Q3. भारतेंदु युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।
राष्ट्रीयता और देशभक्ति।
अंग्रेज़ी शासन की आर्थिक नीति की आलोचना।
समाज-सुधार: स्त्री-शिक्षा, अंधविश्वास और बाल-विवाह का विरोध।
गद्य की विविध विधाओं का आरंभ।
पत्रकारिता का विकास।
कविता में ब्रज, गद्य में खड़ी बोली।
हास्य-व्यंग्य की प्रवृत्ति।
Q4. भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाट्य साहित्य का परिचय दीजिए।
मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के नाटक।
सत्य हरिश्चंद्र: सत्य और त्याग का आदर्श।
भारत दुर्दशा: देश की दयनीय स्थिति का चित्र।
अंधेर नगरी: शासन-व्यवस्था पर व्यंग्य।
नीलदेवी: स्त्री के साहस का चित्र।
रंगमंच की दृष्टि से सरल, लोकप्रिय भाषा।
Q5. भारतेंदु युग में पत्रकारिता के योगदान पर प्रकाश डालिए।
कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका, बाला बोधिनी।
हिंदी प्रदीप, ब्राह्मण, आनंद कादंबिनी।
जनजागरण और राष्ट्रीय चेतना का प्रसार।
निबंध विधा का विकास पत्रिकाओं के माध्यम से।
हिंदी गद्य का मानकीकरण आरंभ।
परीक्षा टिप
भारतेंदु के नाटक और भारतेंदु मंडल के लेखकों की पत्रिकाओं की जोड़ियाँ याद रखें; वस्तुनिष्ठ और लघु प्रश्न इन्हीं से बनते हैं।
भारतेंदु युग के बाद लगभग 1900 से 1920 ईसवी तक का समय द्विवेदी युग कहलाता है। इसका नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर है, जिन्होंने 1903 से 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन करके हिंदी भाषा को शुद्ध, व्याकरणसम्मत और मानक बनाया। इस युग में खड़ी बोली कविता की भाषा के रूप में पूरी तरह स्थापित हुई।
मुख्य बिंदु
'सरस्वती' पत्रिका 1900 में आरंभ हुई; द्विवेदीजी 1903 से इसके संपादक बने।
द्विवेदीजी ने लेखकों की भाषा सुधारी, व्याकरण की शुद्धता और विराम-चिह्नों पर ज़ोर दिया।
उन्होंने कवियों को खड़ी बोली में लिखने के लिए प्रेरित किया और नए विषय सुझाए।
प्रमुख कवि: मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा 'शंकर', गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि कहा जाता है। उनकी रचनाएँ: भारत-भारती, साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध, पंचवटी।
'साकेत' में उर्मिला और 'यशोधरा' में यशोधरा जैसी उपेक्षित नारियों को केंद्र में रखा गया।
हरिऔध का प्रियप्रवास खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना जाता है।
रामनरेश त्रिपाठी के खंडकाव्य: पथिक, मिलन, स्वप्न।
कविता इतिवृत्तात्मक (वर्णन-प्रधान), आदर्शवादी और नैतिक रही।
विषय: राष्ट्रप्रेम, भारत का गौरवशाली अतीत, समाज-सुधार, पौराणिक-ऐतिहासिक कथाएँ।
गद्य में निबंध, आलोचना, कहानी का विकास हुआ; सरदार पूर्णसिंह के निबंध और गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' इसी समय के हैं।
महत्वपूर्ण शब्द
इतिवृत्तात्मकता – घटनाओं का सीधा वर्णन, कल्पना कम।
खड़ी बोली आंदोलन – कविता में ब्रज के स्थान पर खड़ी बोली लाने का प्रयास।
उपेक्षित पात्र – जिन पात्रों पर पहले कम ध्यान दिया गया, जैसे उर्मिला।
खंडकाव्य – जीवन के किसी एक प्रसंग पर आधारित काव्य।
महाकाव्य – विस्तृत कथा, अनेक सर्ग, महान नायक वाला काव्य।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
महावीर प्रसाद द्विवेदी – 'सरस्वती' के संपादक (1903 से)।
मैथिलीशरण गुप्त – भारत-भारती, साकेत, यशोधरा; राष्ट्रकवि।
Q1. 'सरस्वती' पत्रिका का हिंदी साहित्य में क्या महत्व है?
'सरस्वती' के माध्यम से द्विवेदीजी ने हिंदी भाषा को शुद्ध और मानक बनाया, नए लेखक तैयार किए और खड़ी बोली कविता को स्थापित किया। इसलिए यह पत्रिका एक पूरे युग की निर्माता मानी जाती है।
Q2. मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि क्यों कहा जाता है?
उनकी कविता में देशप्रेम, भारतीय संस्कृति का गौरव और जनता को जगाने का संदेश है। 'भारत-भारती' ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय लोगों में राष्ट्रीय भावना भरी। इसलिए वे राष्ट्रकवि कहलाए।
Q3. द्विवेदी युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।
खड़ी बोली का काव्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होना।
राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक गौरव।
आदर्शवाद और नैतिकता।
इतिवृत्तात्मकता (वर्णन-प्रधानता)।
समाज-सुधार की भावना।
पौराणिक-ऐतिहासिक विषय; उपेक्षित पात्रों का चित्रण।
भाषा की शुद्धता, व्याकरण का पालन।
Q4. हिंदी साहित्य में महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान स्पष्ट कीजिए।
'सरस्वती' का कुशल संपादन।
भाषा-संस्कार और व्याकरण की शुद्धता।
खड़ी बोली कविता को प्रोत्साहन।
गुप्तजी जैसे लेखकों का मार्गदर्शन।
निबंध, आलोचना और अनुवाद।
विविध विषयों (विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र) पर लेखन को बढ़ावा।
Q5. 'साकेत' के आधार पर गुप्तजी के नारी चित्रण पर प्रकाश डालिए।
उर्मिला को केंद्र में रखकर रामकथा का नया रूप।
उर्मिला का त्याग और विरह।
नारी के प्रति सम्मान और संवेदना।
यशोधरा में भी उपेक्षित नारी का स्वर।
आदर्श और मानवीय भावनाओं का मेल।
परीक्षा टिप
प्रवृत्तियों वाले उत्तर में हर प्रवृत्ति के साथ एक कवि या रचना का नाम जोड़ें, जैसे 'राष्ट्रीयता – भारत-भारती'। इससे उत्तर प्रमाणित लगता है।
मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी युग के सबसे प्रतिनिधि कवि हैं। उनका जन्म झाँसी के पास चिरगाँव में 1886 में हुआ। महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से उन्होंने खड़ी बोली में कविता लिखी और उसे सरल, सुगम और लोकप्रिय बनाया। 'भारत-भारती' ने देश में राष्ट्रीय चेतना जगाई। गांधीजी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' कहा। उनके काव्य में राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति, नारी के प्रति सम्मान और उपेक्षित पात्रों के प्रति सहानुभूति है।
मुख्य बिंदु
जीवनकाल: 1886–1964; जन्म चिरगाँव (झाँसी)।
उनकी आरंभिक कविताएँ 'सरस्वती' पत्रिका में छपीं; द्विवेदीजी उनके काव्य-गुरु माने जाते हैं।
भारत-भारती (1912): तीन खंड – अतीत, वर्तमान, भविष्यत्; भारत के गौरवशाली अतीत, दुखद वर्तमान और आशामय भविष्य का चित्र।
साकेत: रामकथा पर आधारित महाकाव्य, जिसकी नायिका लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला है। इसमें उपेक्षित उर्मिला के विरह को केंद्र में रखा गया है।
यशोधरा: गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा की पीड़ा और स्वाभिमान का काव्य; प्रसिद्ध पंक्ति: "अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी"।
अन्य रचनाएँ: जयद्रथ वध, पंचवटी, द्वापर, विष्णुप्रिया, किसान।
उपेक्षित नारी पात्रों (उर्मिला, यशोधरा, विष्णुप्रिया) को सम्मान देना उनकी विशेष पहचान है।
भारतीय संस्कृति, रामभक्ति और वैष्णव भावना के साथ आधुनिक मानवतावादी दृष्टि।
उन्हें पद्मभूषण मिला और वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
भाषा: शुद्ध, सरल खड़ी बोली; प्रबंध काव्य में विशेष सफलता; इतिवृत्तात्मकता (कथा-वर्णन की प्रधानता) अधिक।
महत्वपूर्ण शब्द
राष्ट्रकवि – राष्ट्रीय भावना जगाने वाला कवि; गुप्तजी को यह उपाधि मिली।
प्रबंध काव्य / महाकाव्य – कथा पर आधारित लंबा काव्य (साकेत)।
खंडकाव्य – जीवन के एक प्रसंग पर आधारित काव्य (जयद्रथ वध, पंचवटी)।
उपेक्षित पात्र – जिन्हें परंपरागत कथाओं में कम महत्त्व मिला।
इतिवृत्तात्मकता – घटनाओं के सीधे वर्णन की शैली।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
1886 – जन्म, चिरगाँव (झाँसी); 1964 – निधन।
1912 – भारत-भारती।
काव्य-गुरु: महावीरप्रसाद द्विवेदी।
राष्ट्रकवि – गांधीजी द्वारा दी गई उपाधि।
प्रमुख कृतियाँ: साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध, पंचवटी, द्वापर।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. 'साकेत' की नायिका कौन है?
लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला; साकेत में उनके चौदह वर्ष के विरह और त्याग का मार्मिक चित्रण है।
Q2. मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' क्यों कहा जाता है?
उनकी 'भारत-भारती' जैसी रचनाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय देश में राष्ट्रीय चेतना जगाई; गांधीजी ने उन्हें राष्ट्रकवि कहा।
Q3. 'भारत-भारती' का महत्त्व स्पष्ट कीजिए।
तीन खंड: अतीत, वर्तमान, भविष्यत्।
गौरवशाली अतीत की याद और वर्तमान दुर्दशा पर दुख।
सुधार और जागरण का आह्वान।
स्वतंत्रता आंदोलन में लोकप्रियता।
Q4. मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में नारी-चित्रण पर प्रकाश डालिए।
उपेक्षित नारियों को केंद्र में लाना: उर्मिला, यशोधरा, विष्णुप्रिया।
त्याग, धैर्य और स्वाभिमान के गुण।
नारी की पीड़ा के प्रति सहानुभूति।
द्विवेदी युग की सुधारवादी दृष्टि का प्रभाव।
Q5. मैथिलीशरण गुप्त की काव्यगत विशेषताएँ लिखिए।
भाव-पक्ष: राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति, रामभक्ति, मानवतावाद, नारी-सम्मान।
कला-पक्ष: सरल खड़ी बोली, प्रबंध-कौशल, विविध छंद, इतिवृत्तात्मक शैली।
द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि के रूप में मूल्यांकन।
परीक्षा टिप
गुप्तजी पर प्रश्न में 'उपेक्षित नारी पात्र' वाला बिंदु ज़रूर लिखें; यह उनकी सबसे मौलिक देन मानी जाती है।
द्विवेदी युग के बाद लगभग 1918 से 1936 ईसवी तक हिंदी कविता में जो नई काव्यधारा आई, उसे छायावाद कहते हैं। इसमें कवि ने अपने मन की अनुभूतियों, प्रकृति के सौंदर्य, प्रेम, वेदना और रहस्य को कल्पना और प्रतीकों के साथ व्यक्त किया। छायावाद के चार स्तंभ हैं: जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। इसे खड़ी बोली कविता का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।
मुख्य बिंदु
छायावाद द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता और उपदेशात्मकता की प्रतिक्रिया में आया।
डॉ. नगेंद्र ने इसे 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह' कहा।
'छायावाद' शब्द का पहला प्रयोग मुकुटधर पांडेय द्वारा माना जाता है।
जयशंकर प्रसाद: कामायनी (महाकाव्य), आँसू, लहर, झरना। कामायनी में मनु, श्रद्धा और इड़ा के माध्यम से मानव मन की कथा है।
निराला: परिमल, अनामिका, गीतिका; प्रसिद्ध कविताएँ राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, जूही की कली, वह तोड़ती पत्थर। निराला ने हिंदी में मुक्त छंद को स्थापित किया।
सुमित्रानंदन पंत: वीणा, पल्लव, गुंजन, ग्राम्या; उन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है। 'चिदंबरा' पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
महादेवी वर्मा: नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा; संकलन यामा। वेदना और रहस्य के कारण उन्हें आधुनिक मीरा कहा जाता है।
छायावाद में प्रकृति का मानवीकरण प्रमुख है; प्रकृति कवि की सखी और भावों का आधार बनती है।
भाषा संस्कृतनिष्ठ, कोमल खड़ी बोली है; लाक्षणिकता, चित्रात्मकता और नए प्रतीक इसकी पहचान हैं।
1936 में 'कामायनी' का प्रकाशन छायावाद का शिखर माना जाता है; इसके बाद प्रगतिवाद का दौर शुरू हुआ।
महत्वपूर्ण शब्द
छायावाद – अनुभूति, कल्पना और प्रतीकों से भरी स्वच्छंद काव्यधारा।
मानवीकरण – प्रकृति या निर्जीव वस्तु को मनुष्य की तरह भाव और क्रिया देना।
रहस्यवाद – अज्ञात सत्ता के प्रति जिज्ञासा और प्रेम।
मुक्त छंद – मात्रा और तुक के बंधन से मुक्त कविता।
लाक्षणिकता – शब्द के सामान्य अर्थ के स्थान पर लक्ष्य अर्थ का प्रयोग।
वैयक्तिकता – कवि के अपने 'मैं' की अभिव्यक्ति।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
जयशंकर प्रसाद – कामायनी (1936), आँसू, लहर।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' – राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, परिमल।
मुकुटधर पांडेय – 'छायावाद' शब्द के पहले प्रयोक्ता माने जाते हैं।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. छायावाद के चार स्तंभ कौन हैं?
जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा छायावाद के चार स्तंभ माने जाते हैं।
Q2. 'कामायनी' का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
कामायनी जयशंकर प्रसाद का महाकाव्य है। इसमें मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा द्वारा मानव मन के विकास, भावना और बुद्धि के संतुलन तथा आनंद की खोज को दिखाया गया है। यह छायावाद की श्रेष्ठ रचना है।
Q3. छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।
वैयक्तिकता और आत्माभिव्यक्ति।
प्रकृति-चित्रण और मानवीकरण।
सौंदर्य और प्रेम की सूक्ष्म अनुभूति।
वेदना और निराशा का स्वर।
रहस्यवाद।
नारी के प्रति सम्मान।
कल्पना की प्रधानता; लाक्षणिक, प्रतीकात्मक भाषा; मुक्त छंद।
Q4. निराला के काव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
छायावादी कोमलता और ओज दोनों।
मुक्त छंद के प्रवर्तक।
'राम की शक्तिपूजा' में संघर्ष और आत्मविश्वास।
'सरोज स्मृति' में पुत्री-शोक की करुणा।
'तोड़ती पत्थर' जैसी कविताओं में शोषितों के प्रति संवेदना।
भाषा में विविधता: संस्कृतनिष्ठ से बोलचाल तक।
Q5. महादेवी वर्मा को 'आधुनिक मीरा' क्यों कहा जाता है?
काव्य में वेदना और विरह की प्रधानता।
अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रेम (रहस्यवाद)।
मीरा की तरह आत्मसमर्पण का भाव।
गीति शैली और संगीतात्मकता।
दीपक, बादल जैसे प्रतीक।
नारी चेतना और गद्य लेखन (स्मृति की रेखाएँ, अतीत के चलचित्र) में भी योगदान।
परीक्षा टिप
चार स्तंभों के साथ उनकी दो-दो रचनाएँ और एक-एक उपाधि (प्रकृति का सुकुमार कवि, आधुनिक मीरा) लिखें। इससे छोटे प्रश्नों में भी पूरे अंक मिलते हैं।
जयशंकर प्रसाद (1889–1937) छायावाद के चार स्तंभों में से एक और हिंदी के बहुमुखी साहित्यकार हैं। वे कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार और निबंधकार – सभी रूपों में सफल रहे। उनका महाकाव्य 'कामायनी' छायावाद की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि माना जाता है। उनके ऐतिहासिक नाटक 'स्कंदगुप्त', 'चंद्रगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' भारतीय इतिहास के गौरव और राष्ट्रीय भावना को सामने लाते हैं।
मुख्य बिंदु
जन्म वाराणसी में एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में; स्कूली शिक्षा कम, पर घर पर संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फारसी और इतिहास-दर्शन का गहरा अध्ययन।
आरंभिक कविताएँ ब्रजभाषा में (चित्राधार), बाद में खड़ी बोली में।
'कामायनी': मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा; 15 सर्ग (चिंता से आनंद तक)। मनु मन के, श्रद्धा हृदय/विश्वास के और इड़ा बुद्धि के प्रतीक हैं। संदेश: बुद्धि और हृदय के संतुलन से ही आनंद मिलता है। इसका पहला चरण है: "हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर"।
प्रसाद की विचारधारा पर शैव दर्शन के आनंदवाद/समरसता का प्रभाव है।
नाटक: राज्यश्री, अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी। अधिकांश प्राचीन भारत के इतिहास पर आधारित।
'ध्रुवस्वामिनी' में नारी की स्वतंत्रता और विवाह-मोक्ष जैसा प्रगतिशील प्रश्न उठाया गया।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और महादेवी वर्मा छायावाद के चार प्रमुख कवियों में हैं। निराला ने हिंदी कविता को मुक्त छंद दिया और उनकी कविता में ओज, विद्रोह, करुणा और शोषितों के प्रति सहानुभूति है। महादेवी वर्मा की कविता में वेदना, करुणा और रहस्यवाद प्रधान है; इसी कारण उन्हें 'आधुनिक मीरा' कहा जाता है। दोनों ने गद्य में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
मुख्य बिंदु
निराला का जन्म बंगाल के महिषादल में हुआ; जीवन भर आर्थिक संघर्ष और निजी दुख (पत्नी और पुत्री सरोज की मृत्यु) झेले।
निराला की काव्य-कृतियाँ: परिमल, अनामिका, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते।
प्रसिद्ध कविताएँ: राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, जूही की कली, बादल राग, भिक्षुक, वह तोड़ती पत्थर।
'राम की शक्तिपूजा' में निराश राम का आत्मविश्वास लौटना और शक्ति की आराधना – ओज और नाटकीयता का उत्कृष्ट उदाहरण।
'सरोज स्मृति' पुत्री की मृत्यु पर लिखा शोकगीत है।
'वह तोड़ती पत्थर' और 'भिक्षुक' में श्रमिक और गरीब के प्रति गहरी सहानुभूति; बाद की कविता प्रगतिवाद की ओर।
'कुकुरमुत्ता' में व्यंग्य; पूँजीपति (गुलाब) और सर्वहारा (कुकुरमुत्ता) का प्रतीक।
निराला के उपन्यास (अप्सरा, अलका, निरुपमा) और रेखाचित्र (कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा) भी प्रसिद्ध हैं।
महादेवी वर्मा (1907–1987) का जन्म फर्रुखाबाद में; जीवन का बड़ा भाग प्रयागराज (इलाहाबाद) में; प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या रहीं।
महादेवी की काव्य-कृतियाँ: नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा; इनमें से चार का संकलन 'यामा' है, जिस पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार (1982) मिला।
महादेवी के काव्य में दीपक प्रमुख प्रतीक है – स्वयं जलकर प्रकाश देने का भाव।
महादेवी का गद्य: अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ (रेखाचित्र/संस्मरण), पथ के साथी, शृंखला की कड़ियाँ (नारी-समस्याओं पर निबंध)।
महत्वपूर्ण शब्द
मुक्त छंद – मात्रा और तुक के बंधन से मुक्त, पर लय से युक्त छंद।
शोकगीत – किसी प्रिय की मृत्यु पर लिखा गया करुण काव्य।
रहस्यवाद – अज्ञात, असीम प्रियतम के प्रति आत्मा का प्रेम और विरह।
वेदना – गहरी पीड़ा; महादेवी के काव्य का केंद्रीय भाव।
ओज गुण – उत्साह और शक्ति जगाने वाला काव्य-गुण।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
निराला – जन्म महिषादल (बंगाल); निधन 1961, इलाहाबाद।
महादेवी वर्मा – 1907–1987; 'यामा' पर ज्ञानपीठ पुरस्कार 1982।
छायावाद के चार स्तंभ – प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. हिंदी में मुक्त छंद का प्रवर्तक किसे माना जाता है?
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को; उनकी 'जूही की कली' मुक्त छंद की आरंभिक प्रसिद्ध कविता है।
Q2. महादेवी वर्मा को 'आधुनिक मीरा' क्यों कहा जाता है?
मीरा की तरह उनकी कविता में अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रेम, विरह और वेदना का गहरा भाव है।
Q3. 'राम की शक्तिपूजा' का कथ्य संक्षेप में लिखिए।
रावण से युद्ध में राम की निराशा।
जांबवान की सलाह से शक्ति की आराधना।
अंतिम कमल गायब होने पर राम का अपना नेत्र अर्पित करने का निश्चय।
देवी का प्रकट होकर विजय का वरदान।
संदेश: संकट में आत्मविश्वास और संकल्प।
Q4. निराला के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
विषय-विविधता: प्रेम, प्रकृति, राष्ट्र, दर्शन, शोषितों का दुख।
विद्रोह और प्रगतिशीलता।
मुक्त छंद और नए शिल्प-प्रयोग।
ओज और करुणा दोनों।
भाषा: तत्सम से लेकर बोलचाल तक।
Q5. महादेवी वर्मा के काव्य में वेदना और रहस्यवाद पर प्रकाश डालिए।
वेदना को साधना मानना; दुख में आनंद।
अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रेम और विरह।
दीपक, बादल, रात जैसे प्रतीक।
गीतात्मकता और चित्रात्मक भाषा।
गद्य में करुणा और नारी-चेतना।
परीक्षा टिप
इस टॉपिक पर तुलनात्मक प्रश्न भी आता है। निराला = विद्रोह, ओज, मुक्त छंद; महादेवी = वेदना, रहस्य, गीत — यह जोड़ी याद रखें और उदाहरण दें।
छायावाद के बाद हिंदी कविता दो नई दिशाओं में चली: प्रगतिवाद और प्रयोगवाद। प्रगतिवाद (लगभग 1936 से) ने मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित होकर किसान, मज़दूर और शोषित वर्ग की कविता लिखी। प्रयोगवाद (1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' से) ने कविता में नए विषय, नए प्रतीक और नए शिल्प के प्रयोग किए।
मुख्य बिंदु
1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की। यहीं से प्रगतिवाद को गति मिली।
प्रगतिवाद पर कार्ल मार्क्स के विचारों का प्रभाव है: वर्ग-संघर्ष, शोषण का विरोध, पूँजीवाद की आलोचना।
प्रगतिवादी कवि: नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, शिवमंगल सिंह 'सुमन', रांगेय राघव, रामविलास शर्मा। पंत की 'ग्राम्या' और निराला की 'कुकुरमुत्ता' में भी प्रगतिशील स्वर है।
प्रगतिवाद की भाषा सरल, बोलचाल की और व्यंग्यपूर्ण है।
प्रयोगवाद की शुरुआत 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' से मानी जाती है।
तार सप्तक के सात कवि: अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा।
इसके बाद दूसरा सप्तक (1951) और तीसरा सप्तक (1959) आए।
प्रयोगवादी कवि स्वयं को 'राहों के अन्वेषी' कहते थे; वे किसी एक वाद से बँधे नहीं थे।
प्रयोगवाद में बौद्धिकता, व्यक्तिवाद, नए उपमान और प्रतीक, तथा शिल्प के प्रयोग प्रमुख हैं।
आगे चलकर प्रयोगवाद ही नई कविता में विकसित हुआ।
महत्वपूर्ण शब्द
प्रगतिवाद – शोषितों के पक्ष में, सामाजिक परिवर्तन की कविता।
वर्ग-संघर्ष – शोषक और शोषित वर्ग का संघर्ष।
प्रयोगवाद – विषय और शिल्प में नए प्रयोग करने वाली काव्यधारा।
सप्तक – सात कवियों की कविताओं का संकलन।
नए उपमान – पुराने (चाँद, कमल) की जगह नए जीवन से लिए गए उपमान।
बौद्धिकता – भावना के साथ तर्क और चिंतन की प्रधानता।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
1936 – प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन (अध्यक्ष: प्रेमचंद)।
1943 – तार सप्तक (संपादक: अज्ञेय)।
1951 – दूसरा सप्तक; 1959 – तीसरा सप्तक।
नागार्जुन – जनकवि; 'अकाल और उसके बाद', 'बादल को घिरते देखा है' जैसी कविताएँ।
केदारनाथ अग्रवाल – किसान जीवन और बुंदेलखंड की प्रकृति के कवि।
अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) – प्रयोगवाद के प्रवर्तक; 'हरी घास पर क्षण भर', 'बावरा अहेरी'।
गजानन माधव मुक्तिबोध – तार सप्तक के कवि; बाद में नई कविता के प्रमुख कवि।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. प्रगतिवाद किसे कहते हैं?
छायावाद के बाद मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित वह काव्यधारा जिसने किसान, मज़दूर और शोषित वर्ग की पीड़ा, शोषण का विरोध और समाज बदलने का संदेश दिया, प्रगतिवाद कहलाती है।
Q2. तार सप्तक के कवियों के नाम लिखिए।
अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर और रामविलास शर्मा। इसका प्रकाशन 1943 में अज्ञेय के संपादन में हुआ।