हिंदी भारोपीय (इंडो-यूरोपियन) भाषा परिवार की भारतीय आर्य शाखा की एक आधुनिक भाषा है। इसका विकास संस्कृत से पालि, प्राकृत और अपभ्रंश की लंबी यात्रा के बाद लगभग 1000 ईसवी के आसपास हुआ। आज हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और भारत संघ की राजभाषा है। इस अध्याय में हिंदी के उद्भव, विकास के चरण, उपभाषाओं और बोलियों का परिचय है।
मुख्य बिंदु
हिंदी भारोपीय परिवार की भारतीय आर्य भाषा है।
भारतीय आर्य भाषाओं के विकास को तीन कालों में बाँटा जाता है: प्राचीन (वैदिक और लौकिक संस्कृत), मध्यकालीन (पालि, प्राकृत, अपभ्रंश) और आधुनिक (हिंदी, मराठी, बांग्ला, गुजराती आदि)।
आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का काल सामान्यतः 1000 ईसवी के बाद से माना जाता है।
हिंदी का सीधा संबंध अपभ्रंश से है। पश्चिमी हिंदी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से और पूर्वी हिंदी का अर्धमागधी अपभ्रंश से माना जाता है।
अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के बीच की कड़ी को अवहट्ट कहा जाता है। विद्यापति की कीर्तिलता अवहट्ट की प्रसिद्ध रचना है।
'हिंदी' शब्द फ़ारसी से आया है। फ़ारसी में 'स' का उच्चारण 'ह' होता है, इसलिए 'सिंधु' से 'हिंदु' और फिर 'हिंद' तथा 'हिंदी' बना।
हिंदी की पाँच उपभाषाएँ और लगभग 17-18 प्रमुख बोलियाँ मानी जाती हैं।
आज की मानक हिंदी का आधार खड़ी बोली है।
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी कारण 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी बताई गई है।
महत्वपूर्ण शब्द
भाषा परिवार – एक ही मूल से निकली भाषाओं का समूह।
अपभ्रंश – प्राकृत के बाद की लोकभाषा, जिससे आधुनिक आर्य भाषाएँ निकलीं।
अवहट्ट – अपभ्रंश का परवर्ती रूप; अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के बीच की भाषा।
उपभाषा – कई बोलियों का बड़ा समूह, जैसे पश्चिमी हिंदी।
बोली – सीमित क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा का रूप, जैसे ब्रज, अवधी।
खड़ी बोली – दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की बोली, जो आज मानक हिंदी का आधार है।
अनुच्छेद 343: संघ की राजभाषा हिंदी, लिपि देवनागरी।
हिंदी दिवस 14 सितंबर को।
संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी शामिल।
सरकारी कार्यालयों, बैंकों और संसद में प्रयोग।
राजभाषा के रूप में हिंदी की चुनौतियाँ और महत्व।
परीक्षा टिप
विकास क्रम (संस्कृत → पालि → प्राकृत → अपभ्रंश → हिंदी) और उपभाषाओं की तालिका उत्तर में ज़रूर लिखें। इससे उत्तर व्यवस्थित दिखता है और पूरे अंक मिलते हैं।
हिंदी एक विशाल भाषा-क्षेत्र की भाषा है। इस क्षेत्र में बोली जाने वाली अनेक बोलियों को भाषा-वैज्ञानिकों ने पाँच उपभाषाओं में बाँटा है: पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, राजस्थानी, बिहारी और पहाड़ी। इनके अंतर्गत लगभग 17–18 बोलियाँ आती हैं। इन्हीं बोलियों में से ब्रजभाषा और अवधी मध्यकाल की साहित्यिक भाषाएँ बनीं और खड़ी बोली आज की मानक हिंदी का आधार बनी।
मुख्य बिंदु
भाषा, उपभाषा और बोली में अंतर क्षेत्र और प्रयोग के आधार पर होता है। बोली छोटे क्षेत्र में घरेलू व्यवहार की भाषा है; कई बोलियों का समूह उपभाषा कहलाता है।
हिंदी की बोलियों का पहला व्यवस्थित सर्वेक्षण जॉर्ज ग्रियर्सन ने 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में किया। बाद में डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने भी हिंदी बोलियों का वर्गीकरण किया।
पश्चिमी हिंदी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजी। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश से माना जाता है।
पूर्वी हिंदी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी। इसका संबंध अर्धमागधी अपभ्रंश से है।
हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इस लिपि का विकास प्राचीन ब्राह्मी लिपि से हुआ है। देवनागरी बाएँ से दाएँ लिखी जाती है, इसमें शिरोरेखा होती है और यह काफी हद तक ध्वन्यात्मक है, यानी जैसा बोला जाता है वैसा लिखा जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी है। एकरूपता के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने लिपि और वर्तनी का मानक रूप तय किया है।
मुख्य बिंदु
विकास-क्रम: ब्राह्मी → गुप्त लिपि → कुटिल लिपि → नागरी → देवनागरी।
देवनागरी में संस्कृत, हिंदी, मराठी, नेपाली, कोंकणी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं। मराठी विद्यार्थियों के लिए यह परिचित लिपि है।
वैज्ञानिक वर्ण-क्रम: स्वर पहले, फिर व्यंजन; व्यंजन उच्चारण-स्थान के अनुसार वर्गों में (कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग)।
हर वर्ण का एक निश्चित उच्चारण; सामान्यतः एक ध्वनि के लिए एक चिह्न।
स्वरों के लिए स्वतंत्र रूप और व्यंजन के साथ मात्रा के रूप।
अनुस्वार (ं), अनुनासिक/चंद्रबिंदु (ँ), विसर्ग (ः), हलंत (्) जैसे चिह्न।
कमियाँ भी हैं: 'र' के कई रूप (प्र, र्प, ट्र), कुछ संयुक्ताक्षर कठिन, 'ख' और 'रव' में भ्रम, शिरोरेखा से लिखने में समय।
मानकीकरण का उद्देश्य: छपाई, टाइपिंग, शिक्षा और कंप्यूटर में एकरूपता।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय (1960 में स्थापित) ने 'देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण' नियम प्रकाशित किए।
मानक नियम के उदाहरण: पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार (गंगा, हिंदी, संबंध); जहाँ अर्थ बदले वहाँ चंद्रबिंदु (हंस/हँस)।
आज यूनिकोड के कारण देवनागरी मोबाइल और कंप्यूटर पर आसानी से लिखी जाती है।
महत्वपूर्ण शब्द
लिपि – भाषा की ध्वनियों को लिखने के चिह्नों की व्यवस्था।
शिरोरेखा – शब्द के ऊपर खींची जाने वाली आड़ी रेखा।
मात्रा – व्यंजन के साथ जुड़ने वाला स्वर का चिह्न।
संयुक्ताक्षर – दो या अधिक व्यंजनों का मिला रूप (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र)।
हलंत – स्वर-रहित व्यंजन दिखाने वाला चिह्न (्)।
ध्वन्यात्मक लिपि – उच्चारण और लेखन में निकट संबंध वाली लिपि।
मानकीकरण – सबके लिए एक जैसा, नियमबद्ध रूप तय करना।
भाषा अध्ययन
स्वर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
अयोगवाह: अं (अनुस्वार), अः (विसर्ग)।
स्पर्श व्यंजन: क से म तक 25 (पाँच वर्ग)।
अंतःस्थ: य, र, ल, व; ऊष्म: श, ष, स, ह।
संयुक्त व्यंजन: क्ष (क्+ष), त्र (त्+र), ज्ञ (ज्+ञ), श्र (श्+र)।
अनुस्वार और चंद्रबिंदु का अंतर: हंस (पक्षी) – हँस (हँसना)।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. देवनागरी लिपि का विकास किस लिपि से हुआ है?
देवनागरी का विकास प्राचीन ब्राह्मी लिपि से हुआ है (ब्राह्मी → गुप्त → कुटिल → नागरी → देवनागरी)।
Q2. संविधान के किस अनुच्छेद में देवनागरी का उल्लेख है?
अनुच्छेद 343 में; इसके अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।
Q3. देवनागरी लिपि की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
ध्वन्यात्मकता; जैसा बोलें वैसा लिखें।
वैज्ञानिक वर्ण-क्रम (उच्चारण-स्थान के अनुसार)।
स्वर और मात्रा की स्पष्ट व्यवस्था।
अनेक भारतीय भाषाओं के लिए उपयोगी; राष्ट्रीय एकता में सहायक।
सुंदर और सुपाठ्य रूप; शिरोरेखा।
Q4. देवनागरी लिपि के दोष और उनके सुधार के उपायों पर प्रकाश डालिए।
दोष: 'र' के अनेक रूप, कठिन संयुक्ताक्षर, 'ख/रव' भ्रम, इ की मात्रा का पहले लगना।
सुधार: मानक वर्णमाला, संयुक्ताक्षर को हलंत से लिखना, मानक टाइप-फॉन्ट।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय और यूनिकोड की भूमिका।
Q5. देवनागरी लिपि के मानकीकरण की आवश्यकता और प्रमुख नियम स्पष्ट कीजिए।
आवश्यकता: शिक्षा, प्रशासन, मुद्रण और तकनीक में एकरूपता।
नियम: पंचमाक्षर की जगह अनुस्वार; अर्थभेद के लिए चंद्रबिंदु; मानक संयुक्ताक्षर।
संस्थाएँ: केंद्रीय हिंदी निदेशालय।
निष्कर्ष: मानकीकरण से हिंदी की सर्वदेशीय पहचान मजबूत हुई।
परीक्षा टिप
विशेषताएँ लिखते समय हर बिंदु के साथ छोटा उदाहरण दें (जैसे हंस/हँस)। अनुच्छेद 343 का उल्लेख उत्तर को अधिक प्रामाणिक बनाता है।
लगभग एक हजार वर्षों के हिंदी साहित्य को समझने के लिए विद्वानों ने उसे अलग-अलग कालों में बाँटा और हर काल को उसकी प्रमुख प्रवृत्ति के आधार पर नाम दिया। सबसे अधिक मान्य काल-विभाजन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है, जो उनके ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929) में मिलता है। शुक्लजी ने चार काल माने: आदिकाल (वीरगाथा काल), पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल), उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) और आधुनिक काल (गद्यकाल)।
मुख्य बिंदु
हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने का पहला प्रयास फ्रांसीसी विद्वान गार्सा द तासी ने किया; उन्होंने फ्रेंच भाषा में कवियों का परिचय दिया।
शिवसिंह सेंगर ने 'शिवसिंह सरोज' में हिंदी कवियों का परिचय दिया।
जॉर्ज ग्रियर्सन ने 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' में पहली बार काल-विभाजन का प्रयास किया।
मिश्रबंधुओं ने 'मिश्रबंधु विनोद' में बड़ी संख्या में कवियों का विवरण दिया।
रामचंद्र शुक्ल ने हर काल में जिस प्रवृत्ति की रचनाएँ अधिक मिलीं, उसी के आधार पर नाम रखा; यह 'प्रवृत्ति-प्रधानता' का सिद्धांत है।
शुक्लजी का विभाजन (विक्रम संवत में): आदिकाल 1050–1375, भक्तिकाल 1375–1700, रीतिकाल 1700–1900, आधुनिक काल 1900 से आगे।
प्रथम काल के नाम पर सबसे अधिक मतभेद है: शुक्लजी – वीरगाथा काल; हजारीप्रसाद द्विवेदी – आदिकाल; रामकुमार वर्मा – चारण काल; राहुल सांकृत्यायन – सिद्ध-सामंत काल; महावीरप्रसाद द्विवेदी – बीजवपन काल।
'वीरगाथा काल' नाम पर आपत्ति इसलिए हुई कि जिन रासो ग्रंथों के आधार पर यह नाम रखा गया, उनमें से कई की प्रामाणिकता संदिग्ध है।
आज 'आदिकाल' नाम सबसे अधिक स्वीकार्य माना जाता है, क्योंकि यह किसी एक प्रवृत्ति तक सीमित नहीं।
रीतिकाल को विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने 'शृंगार काल' कहा।
काल-विभाजन के आधार: समय, प्रवृत्ति, प्रमुख कवि, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थिति, भाषा।
महत्वपूर्ण शब्द
काल-विभाजन – साहित्य के लंबे इतिहास को समय-खंडों में बाँटना।
नामकरण – किसी काल को उसकी पहचान के अनुसार नाम देना।
प्रवृत्ति – किसी काल की रचनाओं में बार-बार दिखने वाली मुख्य विशेषता।
रासो – आदिकाल के वीर-प्रशंसा वाले काव्य ग्रंथ।
संवत – विक्रम संवत; ईसवी सन से लगभग 57 वर्ष आगे।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
गार्सा द तासी – हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन के आरंभकर्ता।
शिवसिंह सेंगर – 'शिवसिंह सरोज'।
जॉर्ज ग्रियर्सन – 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान'।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल – 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929)।
हजारीप्रसाद द्विवेदी – 'आदिकाल' नाम के प्रमुख समर्थक।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य को कितने कालों में बाँटा है?
चार कालों में: आदिकाल (वीरगाथा काल), पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल), उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) और आधुनिक काल (गद्यकाल)।
Q2. आदिकाल के कोई दो अन्य नाम और उनके देने वाले विद्वान लिखिए।
वीरगाथा काल (रामचंद्र शुक्ल) और चारण काल (रामकुमार वर्मा)। सिद्ध-सामंत काल नाम राहुल सांकृत्यायन ने दिया।
Q3. हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की परंपरा का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
गार्सा द तासी – आरंभिक प्रयास।
शिवसिंह सेंगर – 'शिवसिंह सरोज'।
ग्रियर्सन – काल-विभाजन का पहला प्रयास।
मिश्रबंधु – विस्तृत कवि-परिचय।
रामचंद्र शुक्ल – वैज्ञानिक और प्रवृत्ति-आधारित इतिहास।
बाद में हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामकुमार वर्मा आदि का योगदान।
Q4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के काल-विभाजन की समीक्षा कीजिए।
चार काल और उनकी अवधि।
आधार: प्रवृत्ति-प्रधानता और ग्रंथों की प्रसिद्धि।
गुण: सरल, स्पष्ट, आज तक सर्वमान्य ढाँचा।
सीमाएँ: वीरगाथा काल के आधार-ग्रंथों की अप्रामाणिकता; हर काल में अन्य प्रवृत्तियाँ भी थीं।
निष्कर्ष: कुछ संशोधनों के साथ यही विभाजन आज भी पढ़ाया जाता है।
Q5. हिंदी साहित्य के प्रथम काल के नामकरण की समस्या पर विचार कीजिए।
विभिन्न नाम और उनके विद्वान।
'वीरगाथा काल' पर आपत्तियाँ: रासो ग्रंथों की प्रामाणिकता, सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य की उपेक्षा।
'आदिकाल' नाम की उपयुक्तता: व्यापक, तटस्थ और आरंभ का सूचक।
निष्कर्ष।
परीक्षा टिप
काल, अवधि और नाम देने वाले विद्वान की एक छोटी तालिका बनाकर उत्तर में लिखें। परीक्षक को एक नज़र में पूरी जानकारी मिल जाती है।
हिंदी साहित्य के इतिहास का पहला काल आदिकाल कहलाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा और इसकी सीमा संवत 1050 से 1375 तक मानी। इस काल में सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य, रासो काव्य तथा अमीर खुसरो और विद्यापति का लौकिक साहित्य मिलता है। यह हिंदी भाषा और साहित्य की नींव का काल है।
मुख्य बिंदु
शुक्लजी का काल-विभाजन: आदिकाल (वीरगाथा काल) सं. 1050–1375, पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) सं. 1375–1700, उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) सं. 1700–1900, आधुनिक काल (गद्यकाल) सं. 1900 से आगे।
इस काल के नामकरण पर विद्वानों में मतभेद है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'आदिकाल' नाम दिया, जो आज सबसे अधिक मान्य है।
अन्य नाम: ग्रियर्सन – चारण काल, मिश्रबंधु – आरंभिक काल, राहुल सांकृत्यायन – सिद्ध-सामंत युग, डॉ. रामकुमार वर्मा – संधि काल और चारण काल।
सिद्ध साहित्य: बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के 84 सिद्ध। सरहपा प्रमुख सिद्ध हैं; राहुल सांकृत्यायन उन्हें हिंदी का पहला कवि मानते हैं।
नाथ साहित्य: गोरखनाथ प्रमुख; हठयोग, गुरु महिमा, इंद्रिय-निग्रह और बाह्याडंबर का विरोध। इसका प्रभाव आगे के संत काव्य पर पड़ा।
जैन साहित्य: धार्मिक उपदेश और रास ग्रंथ; शालिभद्र सूरि का 'भरतेश्वर बाहुबली रास' प्रसिद्ध है।
रासो साहित्य: राजाओं की वीरता और प्रेम का वर्णन। चंदबरदाई का पृथ्वीराज रासो सबसे प्रसिद्ध है; इसकी प्रामाणिकता पर विवाद है।
अन्य रासो: नरपति नाल्ह – बीसलदेव रासो, जगनिक – परमाल रासो (इसका लोक रूप 'आल्हखंड'), दलपति विजय – खुमाण रासो।
अमीर खुसरो ने खड़ी बोली में पहेलियाँ और मुकरियाँ लिखीं।
विद्यापति ने मैथिली में राधा-कृष्ण के पद (पदावली) और अवहट्ट में कीर्तिलता, कीर्तिपताका लिखीं। उन्हें 'मैथिल कोकिल' कहा जाता है।
महत्वपूर्ण शब्द
रासो – वीरता और श्रृंगार से भरा चरित काव्य।
चारण/भाट – राजदरबार के कवि जो आश्रयदाता की प्रशंसा करते थे।
सिद्ध – वज्रयानी बौद्ध साधक।
नाथ पंथ – गोरखनाथ से जुड़ा योग-मार्ग।
मुकरी – ऐसी पहेली जिसमें बात कहकर मुकर जाया जाता है।
डिंगल – राजस्थानी की साहित्यिक भाषा, जिसमें वीर काव्य लिखा गया।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
चंदबरदाई – पृथ्वीराज रासो; पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि माने जाते हैं।
नरपति नाल्ह – बीसलदेव रासो।
जगनिक – परमाल रासो (आल्हा-ऊदल की कथा)।
सरहपा – सिद्ध कवि, दोहाकोश।
गोरखनाथ – नाथ पंथ के प्रवर्तक कवि।
अमीर खुसरो – पहेलियाँ, मुकरियाँ; खड़ी बोली के आरंभिक कवि।
विद्यापति – पदावली, कीर्तिलता, कीर्तिपताका।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल – 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (1929) में काल-विभाजन।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. आदिकाल के नामकरण पर टिप्पणी लिखिए।
शुक्लजी ने इसे वीरगाथा काल कहा, ग्रियर्सन ने चारण काल, मिश्रबंधुओं ने आरंभिक काल और राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध-सामंत युग। हजारी प्रसाद द्विवेदी का दिया 'आदिकाल' नाम सबसे उचित माना जाता है क्योंकि इसमें सभी प्रवृत्तियाँ समा जाती हैं।
Q2. पृथ्वीराज रासो का परिचय दीजिए।
पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई की रचना है। इसमें पृथ्वीराज चौहान की वीरता, युद्ध और प्रेम का वर्णन है। इसे हिंदी का पहला महाकाव्य कहा जाता है, पर इसकी प्रामाणिकता पर विद्वानों में विवाद है।
Q3. आदिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।
वीर रस की प्रधानता और युद्धों का वर्णन।
आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा।
श्रृंगार रस का भी चित्रण (विवाह, प्रेम)।
इतिहास के साथ कल्पना का मेल; प्रामाणिकता की कमी।
धार्मिक साहित्य: सिद्ध, नाथ, जैन।
डिंगल-पिंगल और अपभ्रंश मिश्रित भाषा; छप्पय, दोहा आदि छंद।
लौकिक साहित्य: खुसरो और विद्यापति।
Q4. सिद्ध और नाथ साहित्य का परिचय दीजिए।
सिद्ध: वज्रयानी बौद्ध, संख्या 84, सरहपा प्रमुख।
सिद्धों की वाणी में बाह्याडंबर और जाति-भेद का विरोध।
'संधा भाषा' जैसी प्रतीकात्मक शैली।
नाथ पंथ: गोरखनाथ प्रमुख, हठयोग और गुरु का महत्व।
इंद्रिय-संयम और चरित्र की शुद्धता पर बल।
संत काव्य (कबीर आदि) पर इनका सीधा प्रभाव।
Q5. आदिकाल में रासो साहित्य का महत्व स्पष्ट कीजिए।
भक्तिकाल (संवत 1375–1700) को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसकी दो धाराएँ हैं: निर्गुण और सगुण। निर्गुण धारा की एक शाखा संत काव्यधारा या ज्ञानाश्रयी शाखा है, जिसके प्रमुख कवि कबीर हैं। संत कवियों ने निराकार ईश्वर की भक्ति, गुरु की महिमा और सामाजिक समानता का संदेश दिया।
मुख्य बिंदु
भक्तिकाल की धाराएँ: निर्गुण (ज्ञानाश्रयी संत काव्य + प्रेमाश्रयी सूफी काव्य) और सगुण (राम काव्य + कृष्ण काव्य)।
संत काव्य में ईश्वर निर्गुण, निराकार है और वह हर प्राणी के भीतर है।
कबीर इस धारा के सबसे बड़े कवि हैं। उनके गुरु रामानंद माने जाते हैं।
कबीर की वाणी का संकलन बीजक है, जिसके तीन भाग हैं: साखी, सबद, रमैनी।
अन्य संत कवि: रैदास (रविदास), गुरु नानक देव, दादू दयाल, सुंदरदास, मलूकदास।
महाराष्ट्र के संत नामदेव ने भी हिंदी में पद लिखे; उनके पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं।
संतों ने मूर्तिपूजा, तीर्थ, व्रत, जाति-पाँति और कर्मकांड का विरोध किया।
गुरु को ईश्वर से भी बड़ा बताया गया।
भाषा मिली-जुली है, जिसे सधुक्कड़ी कहा जाता है; शुक्लजी ने इसे 'पंचमेल खिचड़ी' कहा।
संत काव्य में रहस्यवाद और उलटबाँसी शैली मिलती है।
अधिकतर संत कवि साधारण परिवारों से थे और अपने हाथ के काम से जीविका चलाते थे।
महत्वपूर्ण शब्द
निर्गुण – जिस ईश्वर का कोई रूप या आकार न हो।
साखी – दोहों में कही गई उपदेश की बातें (साक्षी)।
सबद – गेय पद।
रमैनी – चौपाई-दोहा में रचित रचनाएँ।
सधुक्कड़ी – कई बोलियों के शब्दों से बनी संतों की भाषा।
उलटबाँसी – उलटी लगने वाली बात में गहरा आध्यात्मिक अर्थ।
रहस्यवाद – आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति का वर्णन।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
कबीर – बीजक (साखी, सबद, रमैनी); समाज-सुधारक कवि।
रैदास – भक्ति पद; 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' की उक्ति उनसे जुड़ी है।
गुरु नानक देव – सिख धर्म के संस्थापक; उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में।
दादू दयाल – दादू पंथ के प्रवर्तक।
सुंदरदास – दादू के शिष्य, शास्त्रज्ञ संत कवि।
नामदेव – महाराष्ट्र के संत, हिंदी और मराठी दोनों में रचना।
शुक्लजी ने इस धारा को ज्ञानाश्रयी शाखा नाम दिया।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. बीजक के तीन भाग कौन-से हैं?
कबीर की वाणी के संग्रह 'बीजक' के तीन भाग हैं: साखी (दोहे), सबद (गेय पद) और रमैनी (चौपाई-दोहा में रचना)।
Q2. सधुक्कड़ी भाषा किसे कहते हैं?
संत कवियों की वह भाषा जिसमें खड़ी बोली, ब्रज, अवधी, राजस्थानी, पंजाबी आदि के शब्द मिले हों, सधुक्कड़ी कहलाती है। साधुओं की भाषा होने से यह नाम पड़ा।
Q3. संत काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
निर्गुण, निराकार ब्रह्म की उपासना।
गुरु की महिमा का गान।
जाति-पाँति, ऊँच-नीच का विरोध।
मूर्तिपूजा, तीर्थ, व्रत और बाह्याडंबर का खंडन।
नाम-स्मरण और सच्चे आचरण पर बल।
रहस्यवाद और उलटबाँसी।
सधुक्कड़ी भाषा; साखी और पद शैली।
Q4. कबीर एक समाज-सुधारक कवि थे। स्पष्ट कीजिए।
हिंदू-मुस्लिम दोनों के आडंबरों पर प्रहार।
जाति-भेद और छुआछूत का विरोध।
मानव-मानव में समानता का संदेश।
सत्य, अहिंसा और सादे जीवन पर बल।
सरल, सीधी और चोट करने वाली भाषा।
व्यंग्य का सशक्त प्रयोग।
आज भी उनकी साखियाँ लोकजीवन में प्रचलित।
Q5. भक्तिकाल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है?
कबीर, जायसी, सूर, तुलसी जैसे महान कवि।
भक्ति, नीति और समाज-सुधार का उच्च संदेश।
ब्रज और अवधी भाषा का साहित्यिक उत्कर्ष।
रामचरितमानस, सूरसागर, पद्मावत जैसे अमर ग्रंथ।
जनता के बीच लोकप्रियता और लोकमंगल की भावना।
भाव और कला दोनों का संतुलन।
परीक्षा टिप
संत काव्य के उत्तर में कबीर की कोई एक प्रसिद्ध साखी उदाहरण के रूप में लिखें, जैसे 'गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय...'। उदाहरण से उत्तर प्रभावी बनता है।
कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण संत काव्यधारा के सबसे बड़े कवि और निर्भीक समाज-सुधारक थे। परंपरा के अनुसार उनका जन्म काशी में हुआ, उनका पालन-पोषण जुलाहा दंपति नीरू और नीमा ने किया और उनके गुरु रामानंद माने जाते हैं। कबीर ने निराकार ईश्वर की भक्ति, गुरु की महिमा और प्रेम का संदेश दिया तथा जाति-पाँति, मूर्तिपूजा और पाखंड का खुलकर विरोध किया। उनकी वाणी 'बीजक' में संकलित है।
मुख्य बिंदु
जन्म और मृत्यु की तिथियों पर मतभेद है; परंपरा उनका निधन मगहर में मानती है।
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे; उनकी वाणी शिष्यों ने लिखी।
'बीजक' के तीन भाग: साखी, सबद, रमैनी। उनकी वाणी का कुछ अंश गुरु ग्रंथ साहिब में भी मिलता है।
ईश्वर हर प्राणी के भीतर है; उसे मंदिर-मस्जिद में ढूँढ़ना व्यर्थ है।
गुरु को ईश्वर तक पहुँचाने वाला बताया; गुरु का स्थान बहुत ऊँचा।
हिंदू और मुसलमान दोनों के बाहरी आडंबरों की आलोचना की।
सच्चा ज्ञान पोथी से नहीं, प्रेम से आता है: "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।"
रहस्यवाद: आत्मा को प्रिया और परमात्मा को प्रियतम मानकर विरह और मिलन का वर्णन।
उलटबाँसी: उलटी लगने वाली बातों में गहरे आध्यात्मिक संकेत।
भाषा सधुक्कड़ी – कई बोलियों का मिश्रण; शैली सीधी, चुभने वाली और व्यंग्यपूर्ण।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को 'वाणी का डिक्टेटर' कहा और उन पर 'कबीर' नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
साखी में दोहा छंद और सबद में गेय पदों का प्रयोग।
महत्वपूर्ण शब्द
साखी – दोहों में कही गई अनुभव की बात (साक्षी से)।
सबद – गाए जाने वाले पद।
रमैनी – चौपाई और दोहे में लिखी रचनाएँ।
रहस्यवाद – आत्मा-परमात्मा के संबंध की अनुभूति।
उलटबाँसी – विरोधाभासी कथन वाली शैली।
सधुक्कड़ी – संतों की मिली-जुली भाषा।
पाखंड – दिखावे का धर्म।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
गुरु: स्वामी रामानंद (परंपरा के अनुसार)।
पालक माता-पिता: नीरू और नीमा।
रचना-संग्रह: बीजक (साखी, सबद, रमैनी)।
निधन-स्थान: मगहर (परंपरा के अनुसार)।
आलोचक: हजारीप्रसाद द्विवेदी – 'कबीर'; रामचंद्र शुक्ल – भाषा को 'पंचमेल खिचड़ी' कहा।
५ महत्वपूर्ण प्रश्न
Q1. कबीर की वाणी किस ग्रंथ में संकलित है?
'बीजक' में, जिसके तीन भाग साखी, सबद और रमैनी हैं।
Q2. कबीर को 'वाणी का डिक्टेटर' किसने कहा?
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने, क्योंकि कबीर भाषा से जो चाहते थे, वही कहलवा लेते थे।
Q3. कबीर के काव्य में गुरु-महिमा पर प्रकाश डालिए।
गुरु अंधकार दूर करने वाला और ईश्वर का मार्ग दिखाने वाला।
गुरु और गोविंद में गुरु को पहले प्रणाम का भाव।
सच्चे गुरु की पहचान और झूठे गुरु से सावधानी।
निष्कर्ष: गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं।
Q4. कबीर एक समाज-सुधारक कवि थे – इस कथन की विवेचना कीजिए।
जाति-पाँति और ऊँच-नीच का विरोध।
हिंदू-मुसलमान दोनों के कर्मकांड और पाखंड पर व्यंग्य।
मानव-समानता और प्रेम का संदेश।
सरल जीवन, सच्चाई और श्रम का आदर।
आज के समाज में प्रासंगिकता।
Q5. कबीर के काव्य की भाव-पक्ष और कला-पक्ष की विशेषताएँ लिखिए।
भाव-पक्ष: निर्गुण भक्ति, रहस्यवाद, गुरु-महिमा, समाज-सुधार, माया से सावधानी।
कला-पक्ष: सधुक्कड़ी भाषा, दोहा और पद, उलटबाँसी, प्रतीक और रूपक, व्यंग्य।
निष्कर्ष: सीधी भाषा में गहरी बात कहने की कला।
परीक्षा टिप
उत्तर में एक-दो दोहों की केवल एक पंक्ति उदाहरण के रूप में लिखें और उसका भाव अपने शब्दों में समझाएँ। पूरी साखी याद न हो तो भाव लिखना ही बेहतर है।
भक्तिकाल की निर्गुण धारा की दूसरी शाखा सूफी प्रेमाख्यान काव्य है, जिसे शुक्लजी ने प्रेमाश्रयी शाखा कहा। सूफी कवियों ने लोक में प्रचलित प्रेम-कथाओं के माध्यम से ईश्वर के प्रति प्रेम का संदेश दिया। इस धारा के सबसे बड़े कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं और उनकी पद्मावत इसकी श्रेष्ठ रचना है।
मुख्य बिंदु
सूफी मत इस्लाम की एक उदार, प्रेम-प्रधान साधना पद्धति है। इसमें ईश्वर को प्रियतम (माशूक) माना जाता है।
सूफी कवियों ने प्रायः हिंदू घरों में प्रचलित लोककथाओं को अपनी कथा का आधार बनाया।
कथा के बहाने लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम (इश्क़-ए-मजाज़ी से इश्क़-ए-हक़ीक़ी) की ओर जाने का संदेश दिया गया।
काव्य-रूप फ़ारसी की मसनवी शैली पर आधारित है: पहले ईश्वर-स्तुति, पैगंबर-स्तुति, गुरु (पीर) और तत्कालीन बादशाह की प्रशंसा, फिर कथा।
पद्मावत में चित्तौड़ के राजा रतनसेन और सिंहल की राजकुमारी पद्मावती की कथा है। इसमें हीरामन तोता, नागमती, राघव चेतन और अलाउद्दीन के प्रसंग आते हैं।
पद्मावत के अंत में जायसी स्वयं कथा का प्रतीक-अर्थ बताते हैं: शरीर चित्तौड़ है, मन राजा, हृदय सिंहल, पद्मावती बुद्धि, तोता गुरु, नागमती संसार का धंधा, राघव चेतन शैतान और अलाउद्दीन माया।
नागमती का विरह वर्णन (बारहमासा) हिंदी साहित्य में विरह का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।
जायसी की अन्य रचनाएँ: अखरावट और आखिरी कलाम।
महत्वपूर्ण शब्द
सूफी – प्रेम द्वारा ईश्वर की साधना करने वाले मुस्लिम संत।
प्रेमाख्यान – प्रेम पर आधारित कथा-काव्य।
मसनवी – फ़ारसी का कथा-काव्य रूप।
इश्क़-ए-मजाज़ी – सांसारिक (लौकिक) प्रेम।
इश्क़-ए-हक़ीक़ी – ईश्वरीय (अलौकिक) प्रेम।
बारहमासा – बारह महीनों के क्रम में विरह का वर्णन।
समासोक्ति/अन्योक्ति – एक कथा के पीछे दूसरा (आध्यात्मिक) अर्थ।
महत्वपूर्ण तिथियाँ और व्यक्ति
मुल्ला दाऊद – चंदायन (हिंदी का पहला सूफी प्रेमाख्यान माना जाता है)।
भक्तिकाल की निर्गुण धारा की वह शाखा जिसमें सूफी कवियों ने प्रेम-कथाओं के माध्यम से ईश्वर-प्रेम का संदेश दिया, प्रेमाश्रयी शाखा कहलाती है। जायसी इसके प्रमुख कवि हैं।
Q2. पद्मावत की भाषा और छंद बताइए।
पद्मावत ठेठ अवधी भाषा में लिखा गया है। इसमें दोहा-चौपाई छंदों का प्रयोग है, आम तौर पर कुछ चौपाइयों के बाद एक दोहा आता है।
Q3. सूफी प्रेमाख्यान काव्य की विशेषताएँ लिखिए।
लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से अलौकिक प्रेम।
हिंदू लोककथाओं का आधार; हिंदू-मुस्लिम एकता का भाव।
मसनवी शैली: स्तुति के बाद कथा।
विरह वर्णन की प्रधानता।
प्रतीकात्मकता और रहस्यवाद।
अवधी भाषा, दोहा-चौपाई छंद।
गुरु (पीर) का महत्व।
Q4. पद्मावत की कथा और उसके प्रतीक-अर्थ पर प्रकाश डालिए।
रतनसेन, हीरामन तोते से पद्मावती के रूप का वर्णन सुनता है।
योगी बनकर सिंहल जाता है और पद्मावती से विवाह करता है।
नागमती का विरह और रतनसेन की वापसी।
राघव चेतन द्वारा अलाउद्दीन को पद्मावती के बारे में बताना।
चित्तौड़ पर आक्रमण, रतनसेन की मृत्यु, रानियों का सती होना।