पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- भारतेन्दु का जीवन परिचय
- 19वीं शताब्दी का सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य
- हिन्दी नवजागरण की अवधारणा
- भारतेन्दु युग की प्रमुख विशेषताएँ
1. भारतेन्दु का जीवन परिचय
भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक (Father of Modern Hindi Literature) कहा जाता है। उन्होंने हिंदी गद्य, नाटक, पत्रकारिता और कविता को नई दिशा दी।
- जन्म: 9 सितंबर 1850, काशी (वाराणसी) के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में।
- पिता: गोपालचंद्र, जो 'गिरिधरदास' नाम से ब्रजभाषा में कविता करते थे। इस प्रकार काव्य-संस्कार उन्हें घर से ही मिले।
- बचपन: बचपन में ही माता और फिर पिता का देहांत हो गया। औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं हुई, पर स्वाध्याय से उन्होंने हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, उर्दू और अंग्रेज़ी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।
- यात्राएँ: किशोरावस्था में परिवार के साथ जगन्नाथपुरी की यात्रा की। इस दौरान बंगाल के नवजागरण और बांग्ला नाटकों का उन पर प्रभाव पड़ा।
- 'भारतेन्दु' उपाधि: उनकी साहित्य-सेवा और उदारता से प्रभावित होकर सन् 1880 में काशी के विद्वानों और जनता ने उन्हें 'भारतेन्दु' (भारत का चंद्रमा) की उपाधि दी।
- मृत्यु: 6 जनवरी 1885 को लगभग 34 वर्ष की अल्पायु में। अपनी उदारता और दानशीलता के कारण उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति का बड़ा भाग खर्च कर दिया था।
प्रमुख पत्रिकाएँ
- कविवचन सुधा (1868)
- हरिश्चंद्र मैगज़ीन (1873), जो बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका नाम से निकली।
- बालाबोधिनी (1874) – स्त्रियों के लिए।
प्रमुख रचनाएँ
- मौलिक नाटक: वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, सत्य हरिश्चंद्र, चंद्रावली, भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, नीलदेवी, विषस्य विषमौषधम्।
- अनूदित नाटक: मुद्राराक्षस, विद्यासुंदर आदि।
- निबंध/व्याख्यान: 'भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?', 'स्वर्ग में विचार सभा का आयोजन', 'दिल्ली दरबार दर्पण'।
- काव्य: प्रेममालिका, प्रेम सरोवर आदि भक्ति-शृंगार प्रधान रचनाएँ; साथ ही देशभक्ति की कविताएँ।
2. 19 वीं शताब्दी का सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य
राजनीतिक परिदृश्य
- 1857 का विद्रोह: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और 1858 में शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथ में आ गया।
- महारानी विक्टोरिया का घोषणापत्र (1858): भारतीयों में राजभक्ति और आशा का भाव जगा, पर शोषण जारी रहा।
- दिल्ली दरबार (1877): विक्टोरिया को 'भारत की साम्राज्ञी' घोषित किया गया।
- वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878): भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर नियंत्रण।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885): संगठित राष्ट्रीय चेतना का आरंभ।
आर्थिक परिदृश्य
- देश का धन इंग्लैंड जाना – धन-निष्कासन (Drain of Wealth), जिसका विवेचन दादाभाई नौरोजी ने किया।
- कुटीर उद्योगों का नाश, भारी कर, बार-बार अकाल और गरीबी।
सामाजिक-धार्मिक परिदृश्य
- अंधविश्वास, जाति-भेद, बाल-विवाह, स्त्री-अशिक्षा, विधवाओं की दुर्दशा।
- सुधार आंदोलन: ब्रह्म समाज (राजा राममोहन राय), प्रार्थना समाज, आर्य समाज (स्वामी दयानंद सरस्वती, 1875)।
- सती प्रथा पर रोक (1829), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856)।
- अंग्रेज़ी शिक्षा, छापाखाना (Printing Press), रेल और डाक से नए विचारों का प्रसार।
- हिंदी-उर्दू विवाद: अदालतों और शिक्षा में हिंदी (नागरी लिपि) को स्थान दिलाने का संघर्ष।
3. हिन्दी नवजागरण की अवधारणा
अर्थ: नवजागरण (Renaissance) का अर्थ है – नई चेतना का जागना। 19वीं शताब्दी में हिंदी प्रदेश में भाषा, साहित्य, समाज, धर्म और राजनीति के क्षेत्र में जो आधुनिक, तार्किक और राष्ट्रीय चेतना जागी, उसे हिंदी नवजागरण कहते हैं। आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने इस अवधारणा का विस्तार से विवेचन किया है।
नवजागरण के कारण
- 1857 के संघर्ष से उपजी राष्ट्रीय भावना।
- अंग्रेज़ी शिक्षा और पश्चिमी विचारों का संपर्क।
- बंगाल नवजागरण और सुधार आंदोलनों का प्रभाव।
- मुद्रण और पत्रकारिता का विकास।
- आर्थिक शोषण के प्रति बढ़ती जागरूकता।
प्रमुख विशेषताएँ
- राष्ट्रीय चेतना: देश की दुर्दशा पर चिंता और 'स्वदेशी' का आग्रह।
- भाषा-चेतना: हिंदी और नागरी लिपि का समर्थन।
- समाज-सुधार: स्त्री-शिक्षा, कुरीतियों का विरोध।
- तर्क और विवेक: अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार।
- अतीत-गौरव: प्राचीन भारतीय संस्कृति पर गर्व के साथ वर्तमान का सुधार।
4. भारतेन्दु युग की प्रमुख विशेषताएँ
भारतेन्दु और उनके सहयोगी लेखकों के रचनाकाल (लगभग 1850 से 1900 ई. के बीच का समय) को भारतेन्दु युग कहा जाता है। यह रीतिकाल और आधुनिक काल के बीच संक्रमण (Transition) का युग है।
भारतेन्दु मंडल के प्रमुख लेखक
प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', राधाचरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यास, लाला श्रीनिवासदास आदि।
मुख्य विशेषताएँ
- राष्ट्रप्रेम और राजभक्ति का मिश्रण: अंग्रेज़ी शासन की कुछ बातों की प्रशंसा, पर आर्थिक शोषण की तीखी आलोचना।
- समाज-सुधार: बाल-विवाह, छुआछूत, स्त्री-अशिक्षा का विरोध।
- गद्य का विकास: खड़ी बोली गद्य स्थिर हुआ; आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेन्दु को आधुनिक हिंदी गद्य का प्रवर्तक माना।
- नई विधाएँ: नाटक, निबंध, उपन्यास, आलोचना, पत्रकारिता का आरंभ।
- भाषा: गद्य में खड़ी बोली, पर कविता में अधिकतर ब्रजभाषा।
- हास्य-व्यंग्य: सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य की प्रधानता।
- लोक-शैलियाँ: कजरी, लावनी, होली जैसे लोकगीतों का प्रयोग।
- परंपरा और नवीनता: भक्ति-शृंगार की पुरानी धारा के साथ नई विषयवस्तु।
| आधार | रीतिकाल | भारतेन्दु युग |
|---|---|---|
| विषय | शृंगार, नायिका-भेद | देश, समाज, सुधार |
| आश्रय | राज-दरबार | जनता और पत्रिकाएँ |
| भाषा | ब्रजभाषा | गद्य में खड़ी बोली, काव्य में ब्रज |
| विधा | मुख्यतः कविता | नाटक, निबंध, उपन्यास, पत्रकारिता |
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भारतेन्दु हरिश्चंद्र के जीवन एवं साहित्यिक योगदान का विस्तार से परिचय दीजिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिंदी नवजागरण की अवधारणा स्पष्ट करते हुए उसमें भारतेन्दु की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) भारतेन्दु युग की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) 19वीं शताब्दी के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) भारतेन्दु मंडल पर टिप्पणी लिखिए।