पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- जन्म और प्रारंभिक जीवन
- शिक्षा और गुरु
- पारिवारिक जीवन
- भक्ति आंदोलन में तुलसीदास का स्थान
- भाषा और शैली
- साहित्यिक योगदान
1. जन्म और प्रारंभिक जीवन
गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति शाखा के सबसे महान कवि हैं। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी कम है। अधिकांश बातें अंतःसाक्ष्य (उनकी अपनी रचनाओं में मिले संकेत) और बहिःसाक्ष्य (दूसरे लेखकों के ग्रंथ और जनश्रुतियाँ) पर आधारित हैं।
- जन्म-वर्ष: इस पर विद्वानों में मतभेद है। अधिकतर विद्वान 16वीं शताब्दी (लगभग 1532 ई.) को मानते हैं। कुछ परंपराएँ इससे पहले का समय बताती हैं।
- जन्म-स्थान: यह भी विवादित है। मुख्य रूप से दो मत हैं: राजापुर (उत्तर प्रदेश, चित्रकूट क्षेत्र) और सोरों (उत्तर प्रदेश)। राजापुर वाला मत अधिक प्रचलित है।
- माता-पिता: जनश्रुति के अनुसार पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था।
- बचपन का नाम: परंपरा के अनुसार 'रामबोला' था।
- कठिन बचपन: कहा जाता है कि अशुभ नक्षत्र में जन्म के कारण उन्हें बचपन में ही त्याग दिया गया। उनका बचपन अभाव और कष्ट में बीता। उनकी रचनाओं (जैसे कवितावली, विनयपत्रिका) में भिक्षा माँगकर जीवन बिताने के संकेत मिलते हैं।
- देहावसान: सामान्य रूप से माना जाता है कि संवत 1680 (1623 ई.) में काशी के असी घाट पर उनका निधन हुआ।
2. शिक्षा और गुरु
- गुरु: तुलसीदास के गुरु नरहरिदास (नरहर्यानंद) माने जाते हैं। उन्हें रामानंद की परंपरा से जोड़ा जाता है। गुरु ने ही बालक को राम-कथा सुनाई और रामभक्ति की ओर मोड़ा।
- मानस में संकेत: तुलसी ने रामचरितमानस के आरंभ में गुरु-वंदना की है। वे बताते हैं कि राम-कथा उन्होंने बचपन में गुरु से सुनी थी।
- काशी में अध्ययन: परंपरा के अनुसार उन्होंने काशी में रहकर वेद, पुराण, दर्शन, संस्कृत व्याकरण और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।
- शिक्षा का प्रभाव: उनकी रचनाओं में वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, पुराणों और उपनिषदों का गहरा ज्ञान दिखाई देता है। स्वयं उन्होंने मानस को 'नाना पुराण निगमागम' से सम्मत बताया है।
3. पारिवारिक जीवन
- विवाह: जनश्रुति के अनुसार उनका विवाह रत्नावली से हुआ।
- पत्नी के प्रति आसक्ति: प्रसिद्ध कथा है कि तुलसी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे। एक बार वे पत्नी के मायके चले गए। तब रत्नावली ने उन्हें धिक्कारा कि हाड़-मांस के शरीर से जितना प्रेम है, उतना राम से होता तो जीवन सफल हो जाता।
- वैराग्य: इस फटकार से उनके मन में वैराग्य जागा। उन्होंने गृहस्थी छोड़ दी और रामभक्ति में लीन हो गए।
- तीर्थ-भ्रमण: इसके बाद उन्होंने अयोध्या, काशी, चित्रकूट आदि स्थानों पर निवास और भ्रमण किया।
ध्यान दें: रत्नावली वाली घटना जनश्रुति पर आधारित है। इसे ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं माना जाता।
4. भक्ति आंदोलन में तुलसीदास का स्थान
भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement) मध्यकाल का व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन था। इसमें निर्गुण (कबीर आदि) और सगुण (सूर, तुलसी आदि) दोनों धाराएँ थीं। इस आंदोलन में तुलसी का स्थान बहुत ऊँचा है।
- रामभक्ति शाखा के शिरोमणि: वे सगुण रामभक्ति काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।
- दास्य भाव की भक्ति: वे राम को स्वामी और स्वयं को सेवक मानते हैं। इसे 'सेवक-सेव्य भाव' कहा जाता है।
- समन्वयवादी दृष्टि: उन्होंने कई धाराओं में मेल कराया:
- सगुण और निर्गुण
- शैव और वैष्णव
- ज्ञान, भक्ति और कर्म
- लोक और शास्त्र
- लोकनायक: उन्होंने आदर्श परिवार, आदर्श राजा (रामराज्य) और मर्यादा का चित्र प्रस्तुत किया। इसलिए उन्हें 'लोकनायक' कहा जाता है।
- लोकमंगल: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी भक्ति को लोकमंगल से जुड़ा माना है।
- जन-जागरण: निराशा के युग में उन्होंने जनता को आस्था, धैर्य और नैतिक बल दिया।
5. भाषा और शैली
तुलसी अवधी और ब्रज, दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे।
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| अवधी | रामचरितमानस, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, बरवै रामायण |
| ब्रजभाषा | विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, कृष्णगीतावली |
| छंद | दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया, बरवै, छप्पय, पद (गेय) |
| शैलियाँ | प्रबंध शैली (मानस), गीति/पद शैली (विनयपत्रिका, गीतावली), कवित्त-सवैया शैली (कवितावली), दोहा शैली (दोहावली), मंगल-गीत शैली (रामलला नहछू) |
| अलंकार | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास का स्वाभाविक प्रयोग; 'सांग रूपक' विशेष प्रसिद्ध |
| रस | भक्ति और शांत प्रमुख; करुण, वीर, शृंगार (मर्यादित) आदि भी |
- भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली और लोक-प्रचलित शब्द, दोनों का संतुलन है।
- मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग सहज है।
- भाषा भाव के अनुसार बदलती है। विनय में दीनता है और युद्ध-वर्णन में ओज है।
6. साहित्यिक योगदान
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी के 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने हैं:
- रामचरितमानस
- विनयपत्रिका
- कवितावली
- गीतावली
- दोहावली
- कृष्णगीतावली
- बरवै रामायण
- पार्वती मंगल
- जानकी मंगल
- रामलला नहछू
- वैराग्य संदीपनी
- रामाज्ञा प्रश्न
- रामचरितमानस: यह अवधी में रचित सात काण्डों का महाकाव्य है। परंपरा के अनुसार इसकी रचना संवत 1631 (1574 ई.) में अयोध्या में आरंभ हुई। इसे उत्तर भारत का लोकप्रिय धर्मग्रंथ माना जाता है।
- विनयपत्रिका: इसमें राम के दरबार में भक्त की 'अर्जी' (पत्रिका) के रूप में विनय के पद हैं। यह आत्मनिवेदन और दैन्य भाव की श्रेष्ठ कृति है।
- कवितावली: यह कवित्त-सवैया में राम-कथा है। इसमें तत्कालीन समाज की दरिद्रता, अकाल आदि का यथार्थ चित्रण भी मिलता है।
- योगदान का सार:
- प्रबंध और मुक्तक, दोनों में श्रेष्ठता
- अवधी को साहित्यिक ऊँचाई
- आदर्श चरित्रों की स्थापना
- भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों का संरक्षण
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) गोस्वामी तुलसीदास के जीवन परिचय पर प्रकाश डालते हुए उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भक्ति आंदोलन में तुलसीदास के स्थान और उनकी समन्वय-भावना का विवेचन कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास की भाषा और शैली पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास की प्रमुख रचनाओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास के पारिवारिक जीवन और रत्नावली प्रसंग पर टिप्पणी लिखिए।