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तुलसीदास (Tulsidas) BAHLT Major T-11-106

RTMNU BA Semester 6 · Hindi Literature (हिन्दी साहित्य) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Literature (हिन्दी साहित्य)
SemesterSemester VI
Paper codeBAHLT-MAJOR-T11-106
Paper titleतुलसीदास (Tulsidas)
CategoryMajor Mandatory T-11
Credits04
MarksTheory 80 + CIE 20 = 100 (Passing 40)
पाठ्यपुस्तकसंदर्भ पुस्तक: रामचरित मानस – तुलसीदास, गीता प्रेस; विनय पत्रिका – तुलसीदास, गीता प्रेस; भारतीय भक्ति साहित्य – राजमल बोरा – वाणी प्रकाशन; भक्ति काव्य और मानव मूल्य – वीरेंद्र मोहन
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2026-27 (Semester V–VI)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं; नोट्स और प्रश्न PadhaiNotes द्वारा सरल हिन्दी में लिखे गए हैं। RTMNU BA Hindi – All papers

Units

  1. 1इकाई I: जीवन परिचय और व्यक्तित्वNotes
  2. 2इकाई II: कृतियाँ और साहित्यिक योगदानNotes
  3. 3इकाई III: विनय के पदNotes
  4. 4इकाई IV: तुलसीदास का महत्व और मूल्यांकनNotes

RTMNU BA Sem 6 · BAHLT Major T-11-106 · इकाई I

इकाई I: जीवन परिचय और व्यक्तित्व

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • जन्म और प्रारंभिक जीवन
  • शिक्षा और गुरु
  • पारिवारिक जीवन
  • भक्ति आंदोलन में तुलसीदास का स्थान
  • भाषा और शैली
  • साहित्यिक योगदान

1. जन्म और प्रारंभिक जीवन

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण रामभक्ति शाखा के सबसे महान कवि हैं। उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी कम है। अधिकांश बातें अंतःसाक्ष्य (उनकी अपनी रचनाओं में मिले संकेत) और बहिःसाक्ष्य (दूसरे लेखकों के ग्रंथ और जनश्रुतियाँ) पर आधारित हैं।

  • जन्म-वर्ष: इस पर विद्वानों में मतभेद है। अधिकतर विद्वान 16वीं शताब्दी (लगभग 1532 ई.) को मानते हैं। कुछ परंपराएँ इससे पहले का समय बताती हैं।
  • जन्म-स्थान: यह भी विवादित है। मुख्य रूप से दो मत हैं: राजापुर (उत्तर प्रदेश, चित्रकूट क्षेत्र) और सोरों (उत्तर प्रदेश)। राजापुर वाला मत अधिक प्रचलित है।
  • माता-पिता: जनश्रुति के अनुसार पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था।
  • बचपन का नाम: परंपरा के अनुसार 'रामबोला' था।
  • कठिन बचपन: कहा जाता है कि अशुभ नक्षत्र में जन्म के कारण उन्हें बचपन में ही त्याग दिया गया। उनका बचपन अभाव और कष्ट में बीता। उनकी रचनाओं (जैसे कवितावली, विनयपत्रिका) में भिक्षा माँगकर जीवन बिताने के संकेत मिलते हैं।
  • देहावसान: सामान्य रूप से माना जाता है कि संवत 1680 (1623 ई.) में काशी के असी घाट पर उनका निधन हुआ।
परीक्षा-टिप: जन्म-तिथि और जन्म-स्थान पर उत्तर लिखते समय 'विद्वानों में मतभेद है' अवश्य लिखें। दोनों प्रमुख मत (राजापुर और सोरों) बताएँ।

2. शिक्षा और गुरु

  • गुरु: तुलसीदास के गुरु नरहरिदास (नरहर्यानंद) माने जाते हैं। उन्हें रामानंद की परंपरा से जोड़ा जाता है। गुरु ने ही बालक को राम-कथा सुनाई और रामभक्ति की ओर मोड़ा।
  • मानस में संकेत: तुलसी ने रामचरितमानस के आरंभ में गुरु-वंदना की है। वे बताते हैं कि राम-कथा उन्होंने बचपन में गुरु से सुनी थी।
  • काशी में अध्ययन: परंपरा के अनुसार उन्होंने काशी में रहकर वेद, पुराण, दर्शन, संस्कृत व्याकरण और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।
  • शिक्षा का प्रभाव: उनकी रचनाओं में वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, पुराणों और उपनिषदों का गहरा ज्ञान दिखाई देता है। स्वयं उन्होंने मानस को 'नाना पुराण निगमागम' से सम्मत बताया है।

3. पारिवारिक जीवन

  • विवाह: जनश्रुति के अनुसार उनका विवाह रत्नावली से हुआ।
  • पत्नी के प्रति आसक्ति: प्रसिद्ध कथा है कि तुलसी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे। एक बार वे पत्नी के मायके चले गए। तब रत्नावली ने उन्हें धिक्कारा कि हाड़-मांस के शरीर से जितना प्रेम है, उतना राम से होता तो जीवन सफल हो जाता।
  • वैराग्य: इस फटकार से उनके मन में वैराग्य जागा। उन्होंने गृहस्थी छोड़ दी और रामभक्ति में लीन हो गए।
  • तीर्थ-भ्रमण: इसके बाद उन्होंने अयोध्या, काशी, चित्रकूट आदि स्थानों पर निवास और भ्रमण किया।

ध्यान दें: रत्नावली वाली घटना जनश्रुति पर आधारित है। इसे ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं माना जाता।

4. भक्ति आंदोलन में तुलसीदास का स्थान

भक्ति आंदोलन (Bhakti Movement) मध्यकाल का व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलन था। इसमें निर्गुण (कबीर आदि) और सगुण (सूर, तुलसी आदि) दोनों धाराएँ थीं। इस आंदोलन में तुलसी का स्थान बहुत ऊँचा है।

  • रामभक्ति शाखा के शिरोमणि: वे सगुण रामभक्ति काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।
  • दास्य भाव की भक्ति: वे राम को स्वामी और स्वयं को सेवक मानते हैं। इसे 'सेवक-सेव्य भाव' कहा जाता है।
  • समन्वयवादी दृष्टि: उन्होंने कई धाराओं में मेल कराया:
    • सगुण और निर्गुण
    • शैव और वैष्णव
    • ज्ञान, भक्ति और कर्म
    • लोक और शास्त्र
    आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनके काव्य को समन्वय की विराट चेष्टा कहा है।
  • लोकनायक: उन्होंने आदर्श परिवार, आदर्श राजा (रामराज्य) और मर्यादा का चित्र प्रस्तुत किया। इसलिए उन्हें 'लोकनायक' कहा जाता है।
  • लोकमंगल: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी भक्ति को लोकमंगल से जुड़ा माना है।
  • जन-जागरण: निराशा के युग में उन्होंने जनता को आस्था, धैर्य और नैतिक बल दिया।

5. भाषा और शैली

तुलसी अवधी और ब्रज, दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे।

पक्षविवरण
अवधीरामचरितमानस, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, बरवै रामायण
ब्रजभाषाविनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, कृष्णगीतावली
छंददोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया, बरवै, छप्पय, पद (गेय)
शैलियाँप्रबंध शैली (मानस), गीति/पद शैली (विनयपत्रिका, गीतावली), कवित्त-सवैया शैली (कवितावली), दोहा शैली (दोहावली), मंगल-गीत शैली (रामलला नहछू)
अलंकारउपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास का स्वाभाविक प्रयोग; 'सांग रूपक' विशेष प्रसिद्ध
रसभक्ति और शांत प्रमुख; करुण, वीर, शृंगार (मर्यादित) आदि भी
  • भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली और लोक-प्रचलित शब्द, दोनों का संतुलन है।
  • मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग सहज है।
  • भाषा भाव के अनुसार बदलती है। विनय में दीनता है और युद्ध-वर्णन में ओज है।

6. साहित्यिक योगदान

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी के 12 ग्रंथ प्रामाणिक माने हैं:

  1. रामचरितमानस
  2. विनयपत्रिका
  3. कवितावली
  4. गीतावली
  5. दोहावली
  6. कृष्णगीतावली
  7. बरवै रामायण
  8. पार्वती मंगल
  9. जानकी मंगल
  10. रामलला नहछू
  11. वैराग्य संदीपनी
  12. रामाज्ञा प्रश्न
  • रामचरितमानस: यह अवधी में रचित सात काण्डों का महाकाव्य है। परंपरा के अनुसार इसकी रचना संवत 1631 (1574 ई.) में अयोध्या में आरंभ हुई। इसे उत्तर भारत का लोकप्रिय धर्मग्रंथ माना जाता है।
  • विनयपत्रिका: इसमें राम के दरबार में भक्त की 'अर्जी' (पत्रिका) के रूप में विनय के पद हैं। यह आत्मनिवेदन और दैन्य भाव की श्रेष्ठ कृति है।
  • कवितावली: यह कवित्त-सवैया में राम-कथा है। इसमें तत्कालीन समाज की दरिद्रता, अकाल आदि का यथार्थ चित्रण भी मिलता है।
  • योगदान का सार:
    • प्रबंध और मुक्तक, दोनों में श्रेष्ठता
    • अवधी को साहित्यिक ऊँचाई
    • आदर्श चरित्रों की स्थापना
    • भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों का संरक्षण
याद रखें: तुलसी = सगुण रामभक्ति, दास्य भाव, समन्वय, लोकमंगल, अवधी + ब्रज, प्रबंध + मुक्तक, 12 प्रामाणिक ग्रंथ (शुक्ल जी के अनुसार)।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) गोस्वामी तुलसीदास के जीवन परिचय पर प्रकाश डालते हुए उनके व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भक्ति आंदोलन में तुलसीदास के स्थान और उनकी समन्वय-भावना का विवेचन कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास की भाषा और शैली पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास की प्रमुख रचनाओं का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास के पारिवारिक जीवन और रत्नावली प्रसंग पर टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHLT Major T-11-106 · इकाई II

इकाई II: कृतियाँ और साहित्यिक योगदान

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • उत्तरकाण्ड – रामचरितमानस

उत्तरकाण्ड – रामचरित मानस

1. तुलसीदास की प्रमुख कृतियाँ (संक्षेप में)

तुलसीदास (Tulsidas) रामभक्ति शाखा के सबसे बड़े कवि हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ ये मानी जाती हैं: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्ण गीतावली, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न। इनमें रामचरितमानस उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है।

2. रामचरितमानस : सामान्य परिचय

  • भाषा: अवधी (Awadhi)।
  • विधा: प्रबंध काव्य / महाकाव्य (Epic)।
  • छंद: मुख्य रूप से दोहा-चौपाई, साथ में सोरठा और अन्य छंद।
  • रचना-आरंभ: परंपरा के अनुसार संवत 1631 (लगभग 1574 ई.) में अयोध्या में।
  • सात काण्ड: बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किंधाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड, उत्तरकाण्ड।
  • संवाद-शैली: कथा चार वक्ता-श्रोता जोड़ियों के माध्यम से चलती है: शिव-पार्वती, काकभुशुण्डि-गरुड़, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज तथा तुलसी और संत समाज।

3. उत्तरकाण्ड का स्थान

उत्तरकाण्ड मानस का सातवाँ और अंतिम काण्ड है। इसे मानस का दार्शनिक और भक्ति-सिद्धांत वाला भाग कहा जाता है। पहले छह काण्डों में मुख्य रूप से कथा है, जबकि उत्तरकाण्ड में कथा के साथ ज्ञान, भक्ति, नीति और समाज-दर्शन का निचोड़ मिलता है।

4. उत्तरकाण्ड की कथावस्तु (अपने शब्दों में)

  1. भरत की प्रतीक्षा: राम के लौटने की अवधि पूरी होने को है। भरत व्याकुल हैं। तभी हनुमान ब्राह्मण-वेश में आकर राम के आगमन का समाचार देते हैं।
  2. राम का अयोध्या आगमन: पुष्पक विमान से राम, सीता और लक्ष्मण लौटते हैं। भरत-मिलाप, माताओं और गुरु वशिष्ठ से मिलन होता है। पूरी अयोध्या में उत्सव मनाया जाता है।
  3. राज्याभिषेक: राम का राजतिलक होता है। देवता और वेद स्तुति करते हैं। बाद में वानर-मित्रों (सुग्रीव, विभीषण, अंगद आदि) को सम्मान के साथ विदा किया जाता है। हनुमान राम की सेवा में रहते हैं।
  4. रामराज्य का वर्णन: प्रजा सुखी, धर्मपरायण और रोगमुक्त है। किसी को दैहिक, दैविक, भौतिक ताप नहीं सताते। यह तुलसी का आदर्श राज्य है।
  5. सीता के दो पुत्र: सीता से लव और कुश का जन्म बताया गया है। तुलसी ने सीता-त्याग का प्रसंग नहीं लिया है, जो उनकी मर्यादा-दृष्टि को दिखाता है।
  6. राम का प्रजा को उपदेश: राम नागरिकों को समझाते हैं कि मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिलता है। इसका उपयोग भक्ति और सद्कर्म के लिए करना चाहिए।
  7. काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद: मेघनाद के नागपाश प्रसंग के बाद गरुड़ को राम की ईश्वरता पर मोह (संशय) होता है। शिव के कहने पर वे नील पर्वत पर काकभुशुण्डि के पास जाते हैं। भुशुण्डि अपने पूर्वजन्मों की कथा सुनाते हैं, जैसे गुरु का अपमान और लोमश ऋषि के शाप से कौआ बनना। साथ ही वे राम-भक्ति की महिमा समझाते हैं।
  8. दार्शनिक प्रसंग: ज्ञान-भक्ति निरूपण (ज्ञान-दीपक और भक्ति-चिंतामणि का रूपक), कलियुग वर्णन, मानस रोग (काम, क्रोध, लोभ को रोग मानना) और गरुड़ के सात प्रश्नों के उत्तर इसी भाग में हैं।
  9. समापन: रामकथा की महिमा और फलश्रुति के साथ मानस पूर्ण होता है।

5. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

  • राम: मर्यादा पुरुषोत्तम, आदर्श राजा, प्रजावत्सल और भक्तवत्सल। वे ईश्वर भी हैं और मनुष्य भी।
  • भरत: त्याग, भ्रातृ-प्रेम और निःस्वार्थ भक्ति के प्रतीक।
  • हनुमान: आदर्श सेवक और संदेशवाहक।
  • काकभुशुण्डि: परम ज्ञानी रामभक्त। वे सिद्ध करते हैं कि भक्ति के लिए जाति या योनि बाधा नहीं है।
  • गरुड़: संशय से ग्रस्त जिज्ञासु। उनके माध्यम से तुलसी पाठक के संदेहों का समाधान करते हैं।

6. ज्ञान और भक्ति : तुलनात्मक तालिका (उत्तरकाण्ड के अनुसार)

आधारज्ञान मार्गभक्ति मार्ग
रूपकदीपकचिंतामणि
साधनाकठिन, दीर्घसरल, सुलभ
बाधामाया के झोंकों से बुझ सकता हैमाया का प्रभाव नहीं पड़ता
अधिकारीविशेष योग्य जनसभी जन

7. उत्तरकाण्ड की विशेषताएँ / साहित्यिक महत्व

  • दार्शनिक निचोड़: मानस का भक्ति-दर्शन यहीं स्पष्ट होता है।
  • रामराज्य की कल्पना: लोकमंगल और आदर्श शासन का चित्र मिलता है।
  • समन्वय भावना: ज्ञान-भक्ति, शैव-वैष्णव और सगुण-निर्गुण का समन्वय दिखता है।
  • सामाजिक चेतना: कलियुग वर्णन में तत्कालीन समाज की बुराइयों पर टिप्पणी है।
  • रूपक-प्रधान शैली: मानस रोग और ज्ञान-दीपक जैसे सांगरूपक (Sustained Metaphor) मिलते हैं।
  • रस: भक्ति रस और शांत रस प्रधान हैं। मिलन-प्रसंगों में करुण और वात्सल्य के भाव भी हैं।
  • भाषा: सरल, प्रवाहपूर्ण अवधी। बीच-बीच में संस्कृत स्तुतियाँ भी हैं।
परीक्षा टिप: उत्तर में तीन बिंदु अवश्य लिखें: (1) रामराज्य वर्णन, (2) काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद, (3) ज्ञान-भक्ति निरूपण। मानस की 2–3 प्रसिद्ध अर्धालियों के कुछ शब्द उद्धृत करने से अंक बढ़ते हैं। अध्ययन के लिए गीता प्रेस का संस्करण देखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड की कथावस्तु का परिचय देते हुए उसके साहित्यिक और दार्शनिक महत्व पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) उत्तरकाण्ड के आधार पर तुलसीदास की रामराज्य की परिकल्पना तथा ज्ञान-भक्ति निरूपण की विवेचना कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) काकभुशुण्डि-गरुड़ संवाद पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) उत्तरकाण्ड में वर्णित कलियुग वर्णन अथवा मानस रोग पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) उत्तरकाण्ड के आधार पर भरत अथवा राम का चरित्र-चित्रण कीजिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHLT Major T-11-106 · इकाई III

इकाई III: विनय के पद

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • गाइये गणपति जगबंदन
  • ऐसो को उदार जग माहीं
  • जाके प्रिय न राम वैदेही
  • दानी कहुँ संकर सम नाहीं
  • देव बड़े दाता बड़े संकर बड़े भोरे
  • जाके गति है हनुमान की
  • मंगल-मूरति मारुत-नंदन सकल-अमंगल-मूल-निकंदन
  • श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन
  • राम जपु राम जपु राम जपु बावरे
  • जाऊँ कहाँ तजि चरण तुम्हारे

भूमिका : विनय पत्रिका और 'विनय के पद'

विनय पत्रिका गोस्वामी तुलसीदास की प्रौढ़ रचना है। यह ब्रजभाषा में रचित गेय पदों (Lyrics) का संग्रह है। प्रचलित (गीता प्रेस) संस्करण में लगभग 279 पद माने जाते हैं। 'पत्रिका' का अर्थ है अर्जी या प्रार्थना-पत्र। कवि कलियुग के कष्टों से पीड़ित होकर प्रभु श्रीराम के दरबार में अपनी विनय-पत्रिका प्रस्तुत करता है। पहले वह गणेश, शिव, हनुमान आदि देवताओं की स्तुति करता है, फिर राम के सामने अपनी दीनता प्रकट करता है।

  • भक्ति-भाव : दास्य भाव (सेवक-सेव्य भाव) की भक्ति।
  • शैली : गीति शैली, राग-रागिनियों पर आधारित पद।
  • मुख्य भाव : दैन्य (दीनता), आत्मनिवेदन, शरणागति, नाम-महिमा।
  • रस : मुख्यतः शांत रस और भक्ति रस।
याद रखें : रामचरितमानस अवधी में है, जबकि विनय पत्रिका ब्रजभाषा में है। विनय पत्रिका को तुलसी का 'आत्मनिवेदन काव्य' कहा जाता है।

1. गाइये गणपति जगबंदन

संदर्भ : यह विनय पत्रिका का मंगलाचरण (प्रारंभिक पद) है। भारतीय परंपरा में किसी शुभ कार्य का आरंभ गणेश-वंदना से होता है।

  • भाव : कवि मन से कहता है कि संसार द्वारा वंदित गणेशजी का गुणगान करो।
  • गणेश का स्वरूप : शिव-पार्वती के पुत्र, गजमुख, सिद्धियों के भंडार, विद्या के सागर, बुद्धि देने वाले और मोदकप्रिय।
  • याचना : तुलसी गणेश से धन या सिद्धि नहीं माँगते। वे हाथ जोड़कर यही वर माँगते हैं कि उनके हृदय में राम और सीता निवास करें।
  • विशेषता : देवता की स्तुति भी अंततः राम-भक्ति के लिए की गई है। यही तुलसी का समन्वयवाद है।

2. ऐसो को उदार जग माही

केंद्रीय भाव : संसार में राम जैसा उदार कोई नहीं है, जो बिना सेवा के ही दीनों पर कृपा कर दे।

  • जो गति (मोक्ष) बड़े-बड़े मुनि और ज्ञानी योग, वैराग्य और साधना से भी नहीं पाते, वही गति राम ने गिद्ध जटायु और शबरी को सहज ही दे दी।
  • रावण ने अपने सिर चढ़ाकर शिव से जो वैभव पाया था, वही वैभव राम ने विभीषण को संकोच के साथ दे दिया, मानो कुछ दिया ही न हो।
  • निष्कर्ष : यदि सब सुख चाहिए तो राम का भजन करो।
  • काव्य-सौंदर्य : दृष्टांत शैली, पौराणिक प्रसंगों का प्रयोग और राम की दीनबंधुता का चित्रण।

3. जाके प्रिय न राम वैदेही

केंद्रीय भाव : जिसे राम और सीता प्रिय नहीं हैं, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए, चाहे वह कितना ही प्रिय क्यों न हो।

  • उदाहरण (त्याग के आदर्श) :
    • प्रह्लाद ने पिता हिरण्यकशिपु को छोड़ा।
    • विभीषण ने भाई रावण को छोड़ा।
    • भरत ने माता कैकेयी को छोड़ा।
    • राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य की बात नहीं मानी।
    • ब्रज की गोपियों ने पतियों को छोड़कर कृष्ण-भक्ति अपनाई।
  • इन सबका त्याग कल्याणकारी सिद्ध हुआ। सच्चा संबंध वही है जो प्रभु-भक्ति में सहायक हो।
  • जनश्रुति के अनुसार यह पद मीराबाई के पत्र के उत्तर में लिखा गया था। यह केवल परंपरा है, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है।
  • विशेषता : दृढ़ भक्ति-निष्ठा, उपदेशात्मक स्वर और दृष्टांत अलंकार।

4. दानी कहुं संकर सम नाही

केंद्रीय भाव : शिव के समान दानी कहीं नहीं है। वे दीनदयालु हैं और उन्हें देना ही अच्छा लगता है। याचक उन्हें सदा प्रिय लगते हैं।

  • शिव माँगने वाले को उसकी पात्रता से अधिक दे देते हैं।
  • उन्होंने कामदेव को भस्म किया, फिर भी संसार में उसकी प्रतिष्ठा बनी रहने दी।
  • भाग्य में जो न लिखा हो, वह भी शिव की कृपा से मिल जाता है।
  • तुलसी शिव से भी अंततः राम-भक्ति ही माँगते हैं।
  • महत्त्व : शैव और वैष्णव मत का समन्वय दिखता है।

5. देव बड़े दाता बड़े संकर बड़े भोरे

केंद्रीय भाव : शिव बड़े देवता हैं, बड़े दाता हैं और अत्यंत भोले हैं। जिसने भी उनके सामने हाथ जोड़े, उसके दुख उन्होंने दूर कर दिए।

  • 'भोलेनाथ' रूप : थोड़ी-सी भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं (आशुतोष)।
  • शिव लोक-कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं, जैसे विषपान।
  • कवि अपनी दीनता बताकर शिव से कृपा और राम के चरणों में प्रीति की याचना करता है।
  • शैली : सरल, भावपूर्ण और अनुप्रास युक्त। 'बड़े' शब्द की आवृत्ति से भाव में बल आता है।

6. जाके गति है हनुमान की

केंद्रीय भाव : जिसका सहारा हनुमान हैं, उसकी प्रतिज्ञा (पैज) अवश्य पूरी होती है। यह बात पत्थर पर खिंची वज्र की रेखा के समान अटल है।

  • हनुमान के पराक्रम का स्मरण : समुद्र लाँघना, लंका-दहन, संजीवनी लाकर लक्ष्मण की रक्षा, सीता की खोज।
  • हनुमान भक्तों के रक्षक और संकटमोचन हैं।
  • हनुमान राम तक पहुँचाने वाले मध्यस्थ हैं। विनय पत्रिका की 'अर्जी' में उनकी विशेष भूमिका है।
  • अलंकार : 'कुलिस पषान की रेखा' में उपमा या दृष्टांत।

7. मंगल-मूरति मारुत-नंदन सकल-अमंगल-मूल-निकंदन

केंद्रीय भाव : पवनपुत्र हनुमान मंगल के साकार रूप हैं। वे सभी अमंगलों को जड़ से नष्ट करने वाले हैं।

  • हनुमान के गुण : पवनसुत, संतों के हितकारी, राम के प्रिय, बल-बुद्धि-विद्या के निधान और दुष्टों का नाश करने वाले।
  • कवि उन्हें अपने हृदय में बसने की प्रार्थना करता है।
  • भाषा : संस्कृतनिष्ठ, समास-बहुल ब्रजभाषा। पदों में संगीतात्मकता और अनुप्रास है।

8. श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन

परिचय : यह विनय पत्रिका का अत्यंत प्रसिद्ध स्तुति-पद है, जो आज भी आरती और भजन के रूप में गाया जाता है।

  • भाव : हे मन! कृपालु श्रीराम का भजन करो, जो संसार के भयंकर भय को हरने वाले हैं।
  • राम का रूप-सौंदर्य : नए कमल जैसे नेत्र, नए नीले मेघ जैसा श्याम शरीर, पीतांबर, अनगिनत कामदेवों से अधिक सुंदरता और आभूषणों से सजे अंग।
  • गुण : दीनबंधु, रघुकुल-नंदन, दैत्य-वंश का नाश करने वाले, मुनियों के मन को आनंद देने वाले।
  • याचना : कवि राम से अपने हृदय-कमल में निवास करने की प्रार्थना करता है।
  • विशेषता : तत्सम-प्रधान, लगभग संस्कृत जैसी भाषा। इसमें रूपक और उपमा अलंकार तथा गेयता है।

9. राम जपु राम जपु राम जपु बावरे

केंद्रीय भाव : नाम-महिमा। कवि अपने मन को 'बावरा' (पागल) कहकर बार-बार राम-नाम जपने का उपदेश देता है।

  • संसार एक भयंकर सागर है और राम-नाम उसे पार कराने वाली नाव है।
  • कलियुग में योग, यज्ञ और तप कठिन हैं। नाम-जप ही सरल साधन है।
  • पतित और पापी भी नाम के प्रभाव से तर गए। इसके लिए पौराणिक उदाहरण दिए गए हैं।
  • शिल्प : 'राम जपु' की आवृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार बनता है। स्वर उपदेशात्मक और लय तीव्र है।

10. जाऊँ कहाँ तजि चरण तुम्हारे

केंद्रीय भाव : पूर्ण शरणागति (प्रपत्ति)। कवि राम से पूछता है कि आपके चरण छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?

  • संसार में 'पतितपावन' नाम केवल राम का है। उन्हें ही दीन अत्यंत प्रिय हैं।
  • अन्य देवता स्वयं माया के वश में हैं, इसलिए वे दूसरों का उद्धार कैसे करेंगे?
  • कवि अपने दोष स्वीकार करता है और प्रभु से अपनाने की विनती करता है।
  • महत्त्व : दैन्य भाव और अनन्य भक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण। इसमें प्रश्न-शैली और आत्मनिवेदन है।

तुलनात्मक सारणी

पदआराध्यमुख्य भाव
गाइये गणपति जगबंदनगणेशमंगलाचरण, राम-सीता का हृदय में वास
ऐसो को उदार जग माहीरामराम की उदारता
जाके प्रिय न राम वैदेहीराम-सीताभक्ति-विरोधी का त्याग
दानी कहुं संकर सम नाहीशिवशिव की दानशीलता
देव बड़े दाता बड़े...शिवशिव का भोलापन
जाके गति है हनुमान कीहनुमानहनुमान का सहारा, अटल रक्षा
मंगल-मूरति मारुत-नंदनहनुमानअमंगल-नाश
श्री रामचन्द्र कृपालु...रामरूप-सौंदर्य, स्तुति
राम जपु...बावरेराम-नामनाम-महिमा
जाऊँ कहाँ तजि चरण...रामशरणागति, दैन्य

विनय के पदों की सामान्य विशेषताएँ

  1. दैन्य और आत्मनिवेदन : कवि अपने को दीन और पतित बताकर प्रभु की कृपा माँगता है।
  2. समन्वय भावना : गणेश, शिव और हनुमान की स्तुति है, पर लक्ष्य राम-भक्ति ही है।
  3. नाम-महिमा : कलियुग में नाम-जप को सबसे सरल साधन बताया गया है।
  4. संगीतात्मकता : पद रागों पर आधारित हैं और इनमें टेक (स्थायी पंक्ति) है।
  5. भाषा : ब्रजभाषा, जिसमें संस्कृत तत्सम शब्दों की अधिकता है।
  6. अलंकार : अनुप्रास, रूपक, उपमा, दृष्टांत और पुनरुक्ति प्रकाश।
  7. पौराणिक दृष्टांत : प्रह्लाद, विभीषण, शबरी, जटायु आदि के उदाहरण।
परीक्षा सुझाव : पद की व्याख्या लिखते समय यह क्रम अपनाएँ : संदर्भ → प्रसंग → व्याख्या → विशेष (भाषा, अलंकार, रस, भाव)। संदर्भ में 'विनय पत्रिका – तुलसीदास' अवश्य लिखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) विनय पत्रिका के आधार पर तुलसीदास की दास्य भक्ति, दैन्य भाव और शरणागति की विवेचना कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) पाठ्यक्रम में निर्धारित विनय के पदों में चित्रित शिव और हनुमान के स्वरूप का वर्णन करते हुए तुलसी की समन्वय भावना स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) 'जाके प्रिय न राम वैदेही' पद का भाव स्पष्ट कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) 'श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन' पद में वर्णित राम के रूप-सौंदर्य पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) विनय पत्रिका की भाषा और काव्य-शिल्प पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHLT Major T-11-106 · इकाई IV

इकाई IV: तुलसीदास का महत्व और मूल्यांकन

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • महान कवि और संत
  • भक्ति काव्य के महत्वपूर्ण स्तम्भ
  • धार्मिक जागरण
  • आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता

1. महान कवि और संत

परिचय: गोस्वामी तुलसीदास (16वीं-17वीं शताब्दी) हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा की रामभक्ति शाखा (रामाश्रयी शाखा) के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनकी जन्म-तिथि पर विद्वानों में मतभेद है। निधन सामान्यतः संवत 1680 (सन् 1623) में काशी में माना जाता है। उनके गुरु नरहरिदास माने जाते हैं।

(क) महान कवि के रूप में

  • प्रबंध और मुक्तक दोनों में सिद्धहस्त: 'रामचरितमानस' श्रेष्ठ प्रबंध काव्य (महाकाव्य) है और 'विनयपत्रिका' श्रेष्ठ मुक्तक गीति-काव्य है।
  • दोनों काव्य-भाषाओं पर अधिकार: अवधी (मानस) और ब्रजभाषा (विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली)।
  • विविध छंद और शैलियाँ: दोहा-चौपाई, कवित्त-सवैया, पद, बरवै, सोरठा आदि। उस समय की लगभग सभी प्रचलित काव्य-शैलियों में उन्होंने रचना की।
  • रस और अलंकार: भक्ति रस (शांत रस) प्रमुख है। साथ में करुण, वीर, श्रृंगार (मर्यादित), हास्य आदि सभी रसों का सफल निर्वाह मिलता है। रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा उनके प्रिय अलंकार हैं।
  • चरित्र-चित्रण: राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, हनुमान आदि आदर्श चरित्र भारतीय जनमानस में बस गए।
  • प्रमुख कृतियाँ: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्ण गीतावली, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न। इन्हें सामान्यतः प्रामाणिक माना जाता है।

(ख) संत के रूप में

  • दैन्य और विनय: विनयपत्रिका में आत्मनिवेदन, शरणागति और दास्य भाव मिलता है।
  • लोकमंगल की भावना: उनकी भक्ति केवल निजी मोक्ष के लिए नहीं है, वह समाज के कल्याण से जुड़ी है।
  • नैतिक आदर्श: सत्य, परोपकार, संयम और मर्यादा पर बल।
  • नाम-महिमा: राम-नाम को कलियुग में मुक्ति का सरल साधन बताया।
विद्वानों के मत (परीक्षा हेतु): जॉर्ज ग्रियर्सन ने तुलसी को बुद्ध के बाद भारत का सबसे बड़ा लोकनायक कहा। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें लोकमंगल का कवि माना। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनके काव्य को समन्वय की विराट चेष्टा कहा।

2. भक्ति काव्य के महत्वपूर्ण स्तम्भ

भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तम्भों में कबीर, जायसी, सूरदास और तुलसीदास गिने जाते हैं। इनमें तुलसी सगुण रामभक्ति के मुख्य आधार हैं।

तुलसी की भक्ति की विशेषताएँ

  1. सगुण-निर्गुण समन्वय: तुलसी ब्रह्म को निर्गुण भी मानते हैं, पर भक्त के लिए वही सगुण रूप में अवतार लेता है।
  2. दास्य भाव: वे राम को स्वामी और स्वयं को सेवक मानते हैं।
  3. मर्यादा-भक्ति: राम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, इसलिए उनकी भक्ति में आचरण की शुद्धता आवश्यक है।
  4. ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय: भक्ति को सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग माना, पर ज्ञान का निषेध नहीं किया।
  5. शैव-वैष्णव समन्वय: मानस और विनयपत्रिका में शिव और राम दोनों की वंदना मिलती है। उदाहरण के लिए विनय का पद 'दानी कहुं संकर सम नाही'।
आधारकबीरसूरदासतुलसीदास
धारानिर्गुण (ज्ञानाश्रयी)सगुण (कृष्णभक्ति)सगुण (रामभक्ति)
भक्ति-भावप्रेम-ज्ञानमूलकसख्य, वात्सल्य, माधुर्यदास्य भाव
भाषासधुक्कड़ीब्रजभाषाअवधी और ब्रज
मुख्य रचनाबीजकसूरसागररामचरितमानस
दृष्टिखंडन-मंडनलीला-गानसमन्वय और लोकमंगल

3. धार्मिक जागरण

पृष्ठभूमि: तुलसी के युग में समाज अनेक संप्रदायों, आडंबरों, आपसी मतभेदों और निराशा से ग्रस्त था। तुलसी ने रामकथा के माध्यम से धार्मिक चेतना जगाई।

  • लोकभाषा में धर्म: संस्कृत में सीमित रामकथा को अवधी में लाकर सामान्य जनता तक पहुँचाया।
  • संप्रदायों का समन्वय: शैव, वैष्णव, शाक्त और गणपति-उपासकों में सामंजस्य स्थापित किया। विनय के पद 'गाइये गणपति जगबंदन' से इसका संकेत मिलता है।
  • आशा और आत्मविश्वास: राम को दुष्टों का नाश करने वाले रक्षक के रूप में प्रस्तुत करके जनता में आस्था और साहस भरा।
  • कलियुग-वर्णन: उत्तरकाण्ड में कलियुग के दोषों का वर्णन करके नैतिक सुधार का संदेश दिया।
  • रामलीला परंपरा: परंपरा के अनुसार मानस पर आधारित रामलीला ने उत्तर भारत में धार्मिक-सांस्कृतिक जागरण को बल दिया।
  • घर-घर का ग्रंथ: मानस का पाठ, कथा और गायन आज भी जन-जीवन का अंग है।

4. आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता

  • रामराज्य की कल्पना: उत्तरकाण्ड में ऐसे राज्य का चित्र है जहाँ 'दैहिक दैविक भौतिक' ताप नहीं हैं। महात्मा गांधी ने आदर्श शासन के लिए 'रामराज्य' शब्द का प्रयोग किया।
  • पारिवारिक मूल्य: भाई-प्रेम (भरत), पितृ-भक्ति, पति-पत्नी का समर्पण और मित्रता (सुग्रीव, विभीषण) आज के टूटते परिवारों के लिए प्रेरक हैं।
  • समन्वय और सहिष्णुता: विविधता वाले भारतीय समाज में उनका समन्वयवादी दृष्टिकोण आज भी उपयोगी है।
  • मानवीय मूल्य: 'परहित' को सबसे बड़ा धर्म और पर-पीड़ा को सबसे बड़ा पाप मानना आधुनिक मानवतावाद के निकट है।
  • नेतृत्व और शासन: राजा का प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व लोकतांत्रिक मूल्यों से मेल खाता है।
  • भाषा और संस्कृति: मानस की चौपाइयाँ आज भी लोकोक्तियों की तरह बोली जाती हैं।

आलोचनात्मक दृष्टि

कुछ आधुनिक आलोचकों ने वर्ण-व्यवस्था और नारी संबंधी कुछ पंक्तियों (जैसे 'ढोल गँवार...' वाली चौपाई) पर आपत्ति की है। समर्थक इन्हें प्रसंग, पात्र-कथन और युगीन संदर्भ में देखने की बात करते हैं। परीक्षा में दोनों पक्ष संतुलित रूप से लिखें।

निष्कर्ष: तुलसीदास महान कवि, सच्चे संत, लोकनायक और समन्वयकारी विचारक थे। उनकी रचनाएँ धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि से भी आज प्रासंगिक हैं।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) तुलसीदास एक महान कवि और संत थे — इस कथन की सोदाहरण विवेचना कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) आधुनिक संदर्भ में तुलसीदास की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) तुलसीदास की समन्वय भावना पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) धार्मिक जागरण में तुलसीदास के योगदान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) भक्ति काव्य के स्तम्भ के रूप में तुलसीदास का महत्व स्पष्ट कीजिए।