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देवनागरी लिपि: उद्भव तथा विकास (Devanagari Script: Origin and Development) BAHIN Major T-12-106

RTMNU BA Semester 6 · Hindi Language (हिन्दी भाषा) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Language (हिन्दी भाषा)
SemesterSemester VI
Paper codeBAHIN-MAJOR-T12-106
Paper titleदेवनागरी लिपि: उद्भव तथा विकास (Devanagari Script: Origin and Development)
CategoryMajor Mandatory T-12
Credits04
MarksTheory 80 + CIE 20 = 100 (Passing 40)
पाठ्यपुस्तकReference: भाषा विज्ञान - हिन्दी भाषा तथा देवनागरी लिपि - डॉ शिखा रस्तोगी - पुष्पा शर्मा; भाषाविज्ञान - हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि - प्रो हरिमोहन; भारतीय महान लिपि: ब्राह्मी - अब्दुल वाहिद; देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण - केंद्रीय हिन्दी निदेशालय
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2026-27 (Semester V–VI)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं; नोट्स और प्रश्न PadhaiNotes द्वारा सरल हिन्दी में लिखे गए हैं। RTMNU BA Hindi – All papers

Units

  1. 1इकाई I: लिपि का स्वरूप और देवनागरी का परिचयNotes
  2. 2इकाई II: देवनागरी लिपि का उद्भवNotes
  3. 3इकाई III: देवनागरी लिपि का विकासNotes
  4. 4इकाई IV: देवनागरी लिपि के गुण-दोष और सुधारNotes

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-12-106 · इकाई I

इकाई I: लिपि का स्वरूप और देवनागरी का परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • लिपि की परिभाषा
  • लिपि और भाषा का संबंध
  • भारत की प्रमुख लिपियाँ
  • देवनागरी लिपि की विशेषताएँ
  • देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता

1. लिपि की परिभाषा

अर्थ: ‘लिपि’ शब्द संस्कृत की लिप् धातु से बना है। इसका अर्थ है लीपना, पोतना या अंकित करना। अंग्रेज़ी में इसे स्क्रिप्ट (Script) कहते हैं।

परिभाषा: भाषा की मौखिक ध्वनियों को स्थायी रूप देने के लिए जिन लिखित चिह्नों (वर्णों) की व्यवस्थित प्रणाली का प्रयोग किया जाता है, उसे लिपि कहते हैं।

सरल शब्दों में, लिपि भाषा का लिखित रूप है। यह बोली गई बात को आँखों से देखने योग्य बनाती है।

लिपि के विकास की अवस्थाएँ

  1. चित्रलिपि (Pictographic Script): वस्तु का चित्र बनाकर उसका बोध कराना। जैसे सूर्य के लिए गोला बनाना।
  2. भावलिपि (Ideographic Script): चित्र या संकेत से किसी भाव या विचार को प्रकट करना।
  3. ध्वन्यात्मक लिपि (Phonetic Script): चिह्न सीधे ध्वनि को प्रकट करते हैं। इसके दो रूप हैं:
    • अक्षरात्मक (Syllabic): एक चिह्न से पूरा अक्षर प्रकट होता है, जैसे ‘क’ (क् + अ)।
    • वर्णात्मक (Alphabetic): एक चिह्न से एक ही ध्वनि प्रकट होती है, जैसे रोमन लिपि।

लिपि का महत्व

  • ज्ञान और साहित्य का संरक्षण होता है।
  • विचारों को दूर-दूर तक और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जा सकता है।
  • इतिहास जानने के प्रमुख साधन शिलालेख और ताम्रपत्र लिपि पर ही आधारित हैं।
  • शिक्षा, प्रशासन और व्यापार का आधार लिपि ही है।

2. लिपि और भाषा का संबंध

भाषा और लिपि एक-दूसरे के पूरक हैं। भाषा आत्मा है तो लिपि उसका शरीर। फिर भी दोनों अलग-अलग हैं।

  • भाषा पहले, लिपि बाद में: मनुष्य ने पहले बोलना सीखा, लिखना बहुत बाद में। आज भी कई बोलियों की अपनी लिपि नहीं है।
  • एक भाषा, अनेक लिपियाँ: संस्कृत अलग-अलग क्षेत्रों में अनेक लिपियों में लिखी गई। पंजाबी भारत में गुरुमुखी में और पाकिस्तान में शाहमुखी में लिखी जाती है।
  • एक लिपि, अनेक भाषाएँ: देवनागरी में हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी, बोडो, डोगरी, मैथिली आदि लिखी जाती हैं।
  • लिपि भाषा को स्थायित्व देती है: लिखित रूप से भाषा का मानकीकरण होता है और साहित्य सुरक्षित रहता है।
  • भाषा और लिपि में दूरी: उच्चारण बदलता रहता है, पर लिखावट जल्दी नहीं बदलती। इसीलिए अंग्रेज़ी में लेखन और उच्चारण में अंतर दिखता है।
आधारभाषालिपि
स्वरूपमौखिक, ध्वनि-आधारितलिखित, चिह्न-आधारित
माध्यमकान से सुनी जाती हैआँख से पढ़ी जाती है
उत्पत्तिपहलेबाद में
स्थायित्वक्षणिकस्थायी
परिवर्तनतेज़ी से बदलती हैधीरे बदलती है

3. भारत की प्रमुख लिपियाँ

भारत बहुभाषी देश है। यहाँ की अधिकांश लिपियों का स्रोत प्राचीन ब्राह्मी लिपि मानी जाती है। ब्राह्मी से उत्तरी और दक्षिणी, दो शैलियाँ विकसित हुईं।

प्राचीन लिपियाँ

  • ब्राह्मी: बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी। अशोक के अधिकांश अभिलेख इसी लिपि में हैं।
  • खरोष्ठी: दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। इसका प्रयोग मुख्य रूप से पश्चिमोत्तर भारत में हुआ।

आधुनिक प्रमुख लिपियाँ

लिपिप्रमुख भाषा/भाषाएँ
देवनागरीहिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी आदि
बांग्लाबांग्ला, असमिया (कुछ भिन्नताओं के साथ)
गुरुमुखीपंजाबी
गुजरातीगुजराती
ओड़ियाओड़िया
तमिलतमिल
तेलुगुतेलुगु
कन्नड़कन्नड़
मलयालममलयालम
फ़ारसी-अरबी (नस्तालीक शैली)उर्दू, कश्मीरी, सिंधी
ओल चिकीसंथाली
याद रखें: उर्दू को छोड़कर अधिकांश भारतीय लिपियाँ बाएँ से दाएँ लिखी जाती हैं और ब्राह्मी परिवार की हैं। उर्दू लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती है। गुरुमुखी का संबंध परंपरा के अनुसार गुरु अंगद देव से जोड़ा जाता है। ओल चिकी के निर्माता पंडित रघुनाथ मुर्मू माने जाते हैं।

4. देवनागरी लिपि की विशेषताएँ

देवनागरी भारत की सबसे व्यापक लिपि है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी है और उसकी लिपि देवनागरी है।

  1. बाएँ से दाएँ लेखन: इसे ब्राह्मी की परंपरा से लिया गया है।
  2. शिरोरेखा: अधिकांश वर्णों के ऊपर एक पड़ी रेखा होती है, जिससे शब्द एक इकाई के रूप में दिखता है।
  3. स्वर और व्यंजन अलग: पहले स्वर (अ, आ, इ…) आते हैं, फिर व्यंजन (क, ख…)।
  4. मात्रा-व्यवस्था: व्यंजन के साथ स्वर मात्रा के रूप में जुड़ते हैं, जैसे का, कि, की, कु।
  5. अक्षरात्मक स्वरूप: हर व्यंजन में ‘अ’ स्वर अंतर्निहित रहता है। शुद्ध व्यंजन दिखाने के लिए हलंत (्) लगाया जाता है, जैसे क्।
  6. जैसा बोला जाता है, वैसा लिखा जाता है: उच्चारण और लेखन में अधिकतर समानता है।
  7. संयुक्ताक्षर: दो या अधिक व्यंजन मिलकर लिखे जाते हैं, जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, श्र।
  8. छोटे-बड़े अक्षर का भेद नहीं: रोमन की तरह कैपिटल और स्मॉल अक्षर नहीं होते।
  9. विशेष चिह्न: अनुस्वार (ं), अनुनासिक/चंद्रबिंदु (ँ), विसर्ग (ः) और विदेशी ध्वनियों के लिए नुक्ता (़)।
  10. व्यापकता: अनेक भारतीय भाषाएँ और नेपाली भाषा इसी लिपि में लिखी जाती हैं।

5. देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता

देवनागरी को विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में गिना जाता है। इसके प्रमुख आधार नीचे दिए गए हैं।

  • उच्चारण-स्थान पर आधारित क्रम: व्यंजन मुख के भीतर के उच्चारण-स्थान के अनुसार पीछे से आगे की ओर रखे गए हैं।
  • वर्गों की एक जैसी आंतरिक व्यवस्था: हर वर्ग में पहला और दूसरा वर्ण अघोष होता है। तीसरा और चौथा सघोष होता है। पहला और तीसरा अल्पप्राण है, जबकि दूसरा और चौथा महाप्राण है। पाँचवाँ वर्ण नासिक्य है।
  • एक ध्वनि के लिए एक चिह्न: सामान्यतः हर ध्वनि का अलग वर्ण है और हर वर्ण का एक निश्चित उच्चारण है।
  • स्वरों की जोड़ियाँ: ह्रस्व-दीर्घ जोड़े (अ-आ, इ-ई, उ-ऊ) मात्रा-भेद को स्पष्ट करते हैं।
  • अंतस्थ और ऊष्म वर्ण: य, र, ल, व (अंतस्थ) और श, ष, स, ह (ऊष्म) का अलग समूह है।
  • मूक वर्ण नहीं: अंग्रेज़ी के ‘know’ के ‘k’ जैसी न बोली जाने वाली ध्वनियाँ प्रायः नहीं होतीं।
  • तकनीकी अनुकूलता: यूनिकोड (Unicode) में देवनागरी का मानक स्थान है, जिससे कंप्यूटर और मोबाइल पर इसका प्रयोग सरल हुआ है।
वर्गउच्चारण-स्थानवर्ण
क-वर्गकंठ्य (कंठ)क ख ग घ ङ
च-वर्गतालव्य (तालु)च छ ज झ ञ
ट-वर्गमूर्धन्य (मूर्धा)ट ठ ड ढ ण
त-वर्गदंत्य (दाँत)त थ द ध न
प-वर्गओष्ठ्य (ओठ)प फ ब भ म
परीक्षा-टिप: वैज्ञानिकता के उत्तर में वर्ग-तालिका अवश्य बनाएँ। अंत में संक्षेप में यह भी लिखें कि देवनागरी में कुछ कमियाँ भी हैं। जैसे ‘र’ के अनेक रूप, ‘इ’ की मात्रा का वर्ण से पहले लिखा जाना और शिरोरेखा में लगने वाला समय। इनका विस्तृत अध्ययन इकाई 4 में है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) लिपि की परिभाषा देते हुए लिपि और भाषा के पारस्परिक संबंध पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) देवनागरी लिपि की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उसकी वैज्ञानिकता सिद्ध कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) लिपि के विकास की अवस्थाओं (चित्रलिपि, भावलिपि, ध्वन्यात्मक लिपि) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) भारत की प्रमुख लिपियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) देवनागरी वर्णमाला के उच्चारण-स्थान आधारित वर्गीकरण पर टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-12-106 · इकाई II

इकाई II: देवनागरी लिपि का उद्भव

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • प्राचीन भारतीय लिपि [ब्राह्मी लिपि, खरोष्ठी लिपि]
  • ब्राह्मी लिपि का महत्व
  • विकास क्रम
  • नागरी से देवनागरी

1. प्राचीन भारतीय लिपि [ब्राह्मी लिपि, खरोष्ठी लिपि]

परिचय: भारत में लेखन की परंपरा बहुत पुरानी है। सिंधु घाटी सभ्यता की चित्रात्मक लिपि (सिंधु लिपि) अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। पढ़ी जा चुकी सबसे प्राचीन भारतीय लिपियाँ ब्राह्मी और खरोष्ठी हैं। इनके सबसे पुराने स्पष्ट प्रमाण सम्राट अशोक के शिलालेखों (ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी) में मिलते हैं। बौद्ध ग्रंथ 'ललितविस्तर' में 64 लिपियों की सूची है, जिसमें ब्राह्मी और खरोष्ठी के नाम सबसे पहले आते हैं। जैन ग्रंथों की लिपि-सूचियों में भी ब्राह्मी को प्रमुख स्थान दिया गया है।

(क) ब्राह्मी लिपि

  • नामकरण: परंपरा के अनुसार इसे ब्रह्मा द्वारा रची गई लिपि माना गया, इसलिए 'ब्राह्मी' कहा गया। कुछ विद्वान इसका संबंध 'ब्रह्म' (वेद/ज्ञान) या ब्राह्मणों द्वारा प्रयोग से जोड़ते हैं।
  • लेखन दिशा: बाएँ से दाएँ।
  • प्रसार: लगभग पूरे भारत में (उत्तर-पश्चिम के कुछ भागों को छोड़कर)।
  • उद्वाचन (Decipherment): जेम्स प्रिंसेप (James Prinsep) ने उन्नीसवीं शताब्दी (1837 ई. के आसपास) में अशोक के अभिलेखों के आधार पर इसे पढ़ा।
  • विशेषताएँ: ध्वन्यात्मक लिपि; स्वर और व्यंजन अलग-अलग; मात्राओं की व्यवस्था; अक्षरों की आकृति सरल और ज्यामितीय (रेखा, वृत्त, कोण)।

ब्राह्मी की उत्पत्ति संबंधी मत

  1. विदेशी उत्पत्ति का मत: जॉर्ज ब्यूलर (Georg Bühler) आदि विद्वानों के अनुसार ब्राह्मी सेमेटिक (Semitic) लिपि से निकली। कुछ विद्वानों ने यूनानी (ग्रीक) स्रोत की भी कल्पना की।
  2. भारतीय (स्वदेशी) उत्पत्ति का मत: अलेक्जेंडर कनिंघम ने इसे भारतीय चित्रलिपि से विकसित माना। गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे पूर्णतः भारतीय आविष्कार बताया। कुछ विद्वान इसका संबंध सिंधु लिपि से भी जोड़ते हैं।
  3. निष्कर्ष: ब्राह्मी की ध्वनि-व्यवस्था भारतीय भाषाओं के अनुकूल और अत्यंत वैज्ञानिक है, इसलिए अधिकांश भारतीय विद्वान इसे भारतीय उपज मानते हैं।

(ख) खरोष्ठी लिपि

  • नामकरण: एक मत के अनुसार 'खर + ओष्ठ' (गधे का होंठ), यानी अक्षरों की आकृति के आधार पर नाम पड़ा। दूसरे मत के अनुसार इसका संबंध 'खरोष्ठ' नामक आचार्य से है।
  • लेखन दिशा: दाएँ से बाएँ।
  • उत्पत्ति: अधिकांश विद्वान इसे अरामाई (Aramaic) लिपि से विकसित मानते हैं।
  • प्रसार: पश्चिमोत्तर भारत (गांधार क्षेत्र)। अशोक के शाहबाज़गढ़ी और मानसेहरा अभिलेख इसी लिपि में हैं।
  • अंत: ईसा की आरंभिक शताब्दियों के बाद भारत में इसका प्रयोग समाप्त हो गया; इससे आगे कोई भारतीय लिपि विकसित नहीं हुई।
  • दोष: मात्राओं और संयुक्ताक्षरों की अपूर्ण व्यवस्था, ह्रस्व-दीर्घ स्वरों में भेद का अभाव।
आधारब्राह्मीखरोष्ठी
लेखन दिशाबाएँ से दाएँदाएँ से बाएँ
उत्पत्तिअधिकतर भारतीय मानी जाती हैअरामाई लिपि से
क्षेत्रलगभग पूरा भारतपश्चिमोत्तर भारत
वैज्ञानिकताअधिक पूर्ण, स्वर-व्यंजन भेद स्पष्टअपूर्ण, स्वरों का भेद कम
आगे विकासलगभग सभी भारतीय लिपियों की जननीकोई उत्तराधिकारी लिपि नहीं

2. ब्राह्मी लिपि का महत्व

  • भारतीय लिपियों की जननी: देवनागरी, बांग्ला, गुरुमुखी, गुजराती, उड़िया, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि सभी लिपियाँ ब्राह्मी से विकसित हुईं।
  • एशियाई लिपियों पर प्रभाव: तिब्बती, सिंहली, बर्मी, थाई आदि अनेक लिपियाँ भी ब्राह्मी परंपरा से जुड़ी हैं।
  • वैज्ञानिक वर्ण-व्यवस्था: स्वर-व्यंजन का अलग वर्गीकरण, उच्चारण-स्थान के अनुसार क्रम, मात्रा-पद्धति, एक ध्वनि के लिए एक चिह्न।
  • ऐतिहासिक स्रोत: अशोक के अभिलेख, गुफा-लेख, सिक्के और ताम्रपत्र ब्राह्मी में मिलते हैं, जिनसे प्राचीन भारत का इतिहास ज्ञात होता है।
  • सांस्कृतिक एकता: एक ही मूल से निकली लिपियों के कारण भारतीय भाषाओं में समानता और एकता दिखाई देती है।
याद रखें: ब्राह्मी = बाएँ से दाएँ, भारतीय लिपियों की जननी; खरोष्ठी = दाएँ से बाएँ, अरामाई मूल, कोई उत्तराधिकारी नहीं। ब्राह्मी के उद्वाचक: जेम्स प्रिंसेप।

3. विकास क्रम

समय और क्षेत्र के अनुसार ब्राह्मी के अक्षरों की आकृति बदलती गई। ईसा की आरंभिक शताब्दियों के बाद ब्राह्मी दो प्रमुख शैलियों में बँट गई: उत्तरी शैली और दक्षिणी शैली।

(क) उत्तरी शैली

  1. गुप्त लिपि: गुप्त काल (लगभग चौथी से छठी शताब्दी) में प्रचलित।
  2. कुटिल लिपि: गुप्त लिपि से विकसित (लगभग छठी से नौवीं शताब्दी)। अक्षरों और मात्राओं में टेढ़ापन (कुटिलता) होने के कारण यह नाम पड़ा। इसमें शिरोरेखा का आरंभिक रूप दिखाई देता है।
  3. कुटिल लिपि से आगे की शाखाएँ:
    • नागरी → देवनागरी (हिंदी, मराठी, संस्कृत, नेपाली आदि); नागरी परिवार से गुजराती, कैथी, महाजनी आदि का भी संबंध है।
    • शारदा (कश्मीर क्षेत्र) → टाकरी; गुरुमुखी का संबंध भी शारदा और लंडा परंपरा से है।
    • प्राचीन बांग्ला → बांग्ला, असमिया, उड़िया, मैथिली (तिरहुता)।

(ख) दक्षिणी शैली

  • ग्रंथ लिपि → मलयालम, तमिल लिपियों पर प्रभाव
  • तेलुगु-कन्नड़ लिपि → तेलुगु और कन्नड़
  • तमिल लिपि, कलिंग लिपि आदि

संक्षिप्त क्रम: ब्राह्मी → गुप्त लिपि → कुटिल लिपि → प्राचीन नागरी → देवनागरी।

4. नागरी से देवनागरी

नागरी का उदय: कुटिल लिपि से लगभग आठवीं-नौवीं शताब्दी में नागरी का विकास हुआ। दक्षिण के राष्ट्रकूट राजाओं के ताम्रपत्रों (जैसे दंतिदुर्ग का सामनगढ़ ताम्रपत्र, आठवीं शताब्दी) में इसके आरंभिक रूप मिलते हैं। दसवीं शताब्दी के आसपास उत्तर भारत में यह व्यापक रूप से प्रचलित हो गई। दक्षिण में इसका एक रूप 'नंदिनागरी' कहलाया।

'नागरी' नाम के संबंध में मत

  • गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा प्रयोग के कारण 'नागरी'।
  • नगरों में प्रचलित होने के कारण 'नागरी'।
  • तांत्रिक यंत्र 'देवनगर' के चिह्नों से संबंध (एक मत)।

'देवनागरी' नाम के संबंध में मत

  • देवभाषा संस्कृत लिखने में प्रयोग होने से 'देव + नागरी' = देवनागरी।
  • देवनगर (काशी) से संबंध का मत।
  • धार्मिक ग्रंथों के लेखन के कारण इसमें 'देव' शब्द जुड़ा।

नागरी से देवनागरी: प्रमुख परिवर्तन

  • पूरी शिरोरेखा का नियमित प्रयोग।
  • अक्षरों की आकृति गोल, स्पष्ट और स्थिर हुई।
  • मात्राओं और संयुक्ताक्षरों की व्यवस्था पक्की हुई।
  • मध्यकाल में हिंदी, मराठी और संस्कृत ग्रंथों के लेखन से इसका प्रसार बढ़ा। बाद में छपाई (मुद्रण) ने इसके रूप को मानक बनाया।
परीक्षा सूत्र: देवनागरी कोई अचानक बनी लिपि नहीं है। यह ब्राह्मी से लगभग दो हजार वर्षों में क्रमिक रूप से विकसित हुई। आज यह हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी आदि की लिपि है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति संबंधी विभिन्न मतों की समीक्षा कीजिए तथा भारतीय लिपियों के विकास में ब्राह्मी लिपि का महत्व स्पष्ट कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) ब्राह्मी से देवनागरी तक के विकास क्रम का सविस्तार वर्णन कीजिए तथा 'नागरी' और 'देवनागरी' नामकरण संबंधी मतों पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) खरोष्ठी लिपि पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) कुटिल लिपि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-12-106 · इकाई III

इकाई III: देवनागरी लिपि का विकास

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • प्राचीन काल
  • मध्यकाल
  • आधुनिक काल
  • तकनीकी युग में देवनागरी

भूमिका

देवनागरी लिपि अचानक नहीं बनी। यह लगभग दो हज़ार वर्षों के लंबे विकास का परिणाम है। इसकी जड़ ब्राह्मी लिपि में है। ब्राह्मी से गुप्त लिपि, गुप्त लिपि से कुटिल (सिद्धमातृका) लिपि, कुटिल से प्राचीन नागरी और फिर नागरी से आधुनिक देवनागरी का विकास हुआ। अध्ययन की सुविधा के लिए इस विकास को चार चरणों में बाँटा जाता है: प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल और तकनीकी युग।

क्रमलिपि / चरणलगभग समयमुख्य विशेषता
1ब्राह्मी (अशोककालीन)ई.पू. तीसरी शताब्दीसरल, रेखीय अक्षर; शिरोरेखा नहीं
2गुप्त लिपिलगभग चौथी से छठी शताब्दी ई.अक्षरों में गोलाई; ऊपर छोटे शीर्ष-चिह्न
3कुटिल / सिद्धमातृकालगभग छठी से नौवीं शताब्दी ई.अक्षरों में मोड़ और कोण; मात्राएँ टेढ़ी
4प्राचीन नागरीलगभग आठवीं-नौवीं शताब्दी सेशिरोरेखा का विकास आरंभ
5देवनागरी (स्थिर रूप)लगभग ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी सेपूरी शिरोरेखा; आज जैसे अक्षर

1. प्राचीन काल

अर्थ: ब्राह्मी लिपि से लेकर प्राचीन नागरी के उदय तक का समय देवनागरी के विकास का प्राचीन काल माना जाता है।

मुख्य बिंदु

  • ब्राह्मी आधार: सम्राट अशोक के शिलालेख (ई.पू. तीसरी शताब्दी) ब्राह्मी के सबसे प्रसिद्ध प्रमाण हैं। भारत की अधिकांश लिपियाँ इसी से निकलीं।
  • उत्तरी और दक्षिणी शैली: समय के साथ ब्राह्मी दो शैलियों में बँट गई। देवनागरी का संबंध उत्तरी शैली से है।
  • गुप्त लिपि: गुप्त राजाओं के अभिलेखों में प्रयुक्त। इसमें अक्षर गोल और सुंदर हुए तथा ऊपर छोटे शीर्ष-चिह्न लगने लगे, जो आगे चलकर शिरोरेखा बने।
  • कुटिल लिपि: अक्षरों और मात्राओं की बनावट टेढ़ी (कुटिल) होने के कारण यह नाम पड़ा। इसे सिद्धमातृका भी कहते हैं। इसी से नागरी, शारदा आदि लिपियाँ निकलीं।
  • प्राचीन नागरी: आठवीं-नौवीं शताब्दी के आसपास के अनेक अभिलेखों में नागरी के आरंभिक रूप मिलते हैं। राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग के सामंगढ़ ताम्रपत्र को प्रायः नागरी के आरंभिक प्रमाणों में गिना जाता है।
याद रखें: ब्राह्मी → गुप्त → कुटिल → प्राचीन नागरी → देवनागरी। यह क्रम परीक्षा में बार-बार पूछा जाता है।

2. मध्यकाल

अर्थ: लगभग दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक का समय, जब नागरी ने स्थिर रूप पाया और पूरे उत्तर भारत में फैली।

मुख्य बिंदु

  • रूप का स्थिर होना: लगभग ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक अक्षरों पर पूरी शिरोरेखा लगने लगी और अधिकांश वर्ण आज जैसे दिखने लगे।
  • राजकीय प्रयोग: उत्तर और मध्य भारत के अनेक राजवंशों के ताम्रपत्रों और शिलालेखों में नागरी का प्रयोग हुआ।
  • साहित्य और धर्म: संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश के ग्रंथ तथा जैन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ नागरी में लिखी गईं। भक्तिकाल के हिंदी साहित्य की अधिकांश पांडुलिपियाँ भी नागरी में मिलती हैं।
  • मुस्लिम शासन का प्रभाव: राजकाज की भाषा फ़ारसी होने से कचहरियों में फ़ारसी लिपि का प्रयोग बढ़ा। फिर भी जनता, व्यापार, धार्मिक साहित्य और शिक्षा में नागरी बनी रही।
  • शाखा-लिपियाँ: नागरी से या इसके प्रभाव से कैथी, महाजनी, मोड़ी (मराठी के लिए) जैसी व्यावहारिक लिपियाँ विकसित हुईं, जो तेज़ लिखने के लिए उपयोगी थीं।
  • क्षेत्रीय भेद: हाथ से लिखी जाने के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में कुछ अक्षरों (जैसे अ, झ, ण आदि) के रूपों में भिन्नता रही।

3. आधुनिक काल

अर्थ: उन्नीसवीं शताब्दी से स्वतंत्रता के बाद तक का समय, जब छपाई, आंदोलन और संवैधानिक मान्यता से देवनागरी को राष्ट्रीय स्तर मिला।

(क) मुद्रण का प्रभाव

  • उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में श्रीरामपुर (सेरामपुर) मिशन प्रेस जैसे छापेखानों ने देवनागरी में पुस्तकें छापीं।
  • फोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता, 1800) में हिंदी गद्य की पुस्तकें तैयार हुईं।
  • छपाई से अक्षरों के रूप एक जैसे (मानक) होने लगे और क्षेत्रीय भेद घटे।

(ख) नागरी आंदोलन

  • राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि ने हिंदी और नागरी के पक्ष में काम किया।
  • नागरी प्रचारिणी सभा, काशी (1893) की स्थापना नागरी के प्रचार के लिए हुई।
  • पं. मदन मोहन मालवीय के प्रयासों के बाद सन् 1900 में संयुक्त प्रांत की कचहरियों में नागरी के प्रयोग की अनुमति मिली।

(ग) संवैधानिक मान्यता और मानकीकरण

  • 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने निर्णय लिया कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी (अनुच्छेद 343)। अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप स्वीकार किया गया।
  • केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने देवनागरी लिपि और हिंदी वर्तनी के मानकीकरण के नियम जारी किए।
  • देवनागरी आज हिंदी के साथ-साथ संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी, मैथिली, डोगरी, बोडो आदि भाषाओं के लिए भी प्रयुक्त होती है।

4. तकनीकी युग में देवनागरी

अर्थ: टाइपराइटर से लेकर कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल तक देवनागरी का प्रयोग इसका तकनीकी युग है।

विकास के चरण

  1. टाइपराइटर और टेलीप्रिंटर: मात्राओं और संयुक्ताक्षरों के कारण कुंजीपटल बनाना कठिन था, फिर भी हिंदी टाइपराइटर दफ़्तरों में प्रचलित हुए।
  2. इस्की (ISCII): भारतीय लिपियों के लिए एक समान कोड प्रणाली, जिसे भारतीय मानक के रूप में अपनाया गया।
  3. यूनिकोड (Unicode): देवनागरी को अंतरराष्ट्रीय मानक में अलग कोड-क्षेत्र मिला। इससे हिंदी हर कंप्यूटर, वेबसाइट और मोबाइल पर एक जैसी दिखने लगी।
  4. इनस्क्रिप्ट कुंजीपटल (InScript Keyboard): सभी भारतीय लिपियों के लिए एक समान कुंजीपटल।
  5. आधुनिक साधन: ध्वन्यात्मक टाइपिंग, वाक् से पाठ (Speech to Text), ओसीआर (OCR), मशीनी अनुवाद, सोशल मीडिया और देवनागरी में डोमेन नाम।

लाभ

  • हिंदी का वैश्विक प्रसार, ई-शासन और ई-शिक्षा में सरलता।
  • ध्वन्यात्मक लिपि होने के कारण वाक्-तकनीक के लिए उपयुक्त।

चुनौतियाँ

  • पुराने गैर-यूनिकोड फ़ॉन्ट (जैसे कृतिदेव) से फ़ाइलों में असंगति।
  • संयुक्ताक्षर, रेफ और मात्राओं का सही प्रदर्शन।
  • युवाओं में रोमन लिपि में हिंदी लिखने की प्रवृत्ति।
नोट: सरकारी भाषा-तकनीक कार्यक्रम और नए डिजिटल उपकरण लगातार बदलते रहते हैं। विद्यार्थी उत्तर लिखते समय नवीनतम उपलब्ध जानकारी अवश्य देख लें।

निष्कर्ष

ब्राह्मी के सरल रेखीय अक्षरों से चलकर देवनागरी ने शिरोरेखायुक्त, वैज्ञानिक और मानक रूप प्राप्त किया। मुद्रण, नागरी आंदोलन और संविधान ने इसे राष्ट्रीय पहचान दी। यूनिकोड ने इसे डिजिटल युग की सक्षम लिपि बनाया। इसकी विकास-यात्रा निरंतर अनुकूलन की कहानी है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) देवनागरी लिपि के विकास-क्रम का प्राचीन काल से आधुनिक काल तक विस्तार से वर्णन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) तकनीकी युग में देवनागरी लिपि के विकास, उपलब्धियों और चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) मध्यकाल में देवनागरी लिपि की स्थिति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) नागरी प्रचारिणी सभा और नागरी आंदोलन पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) यूनिकोड और देवनागरी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-12-106 · इकाई IV

इकाई IV: देवनागरी लिपि के गुण-दोष और सुधार

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • देवनागरी लिपि के गुण
  • देवनागरी लिपि के दोष
  • सुधार की आवश्यकता
  • सुधार के प्रयास

1. देवनागरी लिपि के गुण

भूमिका: देवनागरी लिपि ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई है। आज इसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी, नेपाली, कोंकणी, बोडो, मैथिली, डोगरी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं। भाषा-वैज्ञानिक इसे संसार की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में गिनते हैं। इसके प्रमुख गुण नीचे दिए गए हैं।

  • ध्वन्यात्मकता (Phonetic nature): जैसा बोला जाता है, लगभग वैसा ही लिखा जाता है और जैसा लिखा जाता है, वैसा ही पढ़ा जाता है। अंग्रेज़ी की तरह एक ही वर्ण के अनेक उच्चारण नहीं होते। उदाहरण: अंग्रेज़ी में 'c' कहीं 'क' (cat) तो कहीं 'स' (city) पढ़ा जाता है।
  • एक ध्वनि के लिए एक चिह्न: सामान्यतः हर ध्वनि के लिए अलग वर्ण है, इसलिए भ्रम कम होता है।
  • वैज्ञानिक वर्णक्रम: पहले स्वर, फिर व्यंजन रखे गए हैं। व्यंजनों को उच्चारण-स्थान के अनुसार कवर्ग (कंठ्य), चवर्ग (तालव्य), टवर्ग (मूर्धन्य), तवर्ग (दंत्य) और पवर्ग (ओष्ठ्य) में बाँटा गया है।
  • अल्पप्राण-महाप्राण और घोष-अघोष का भेद: क-ख, ग-घ जैसे जोड़ों में यह भेद स्पष्ट दिखता है।
  • ह्रस्व-दीर्घ का स्पष्ट भेद: इ-ई, उ-ऊ के लिए अलग-अलग चिह्न हैं।
  • मात्रा-व्यवस्था: स्वरों के लिए मात्राएँ होने से लेखन संक्षिप्त होता है, जैसे 'कि', 'की', 'कु'।
  • आक्षरिक लिपि (Syllabic script): हर व्यंजन में 'अ' निहित होता है, इसलिए एक वर्ण पूरा अक्षर बन जाता है।
  • वर्णों की पर्याप्तता: अनेक भारतीय भाषाओं की ध्वनियाँ लिखने की क्षमता इसमें है। नुक्ता लगाकर विदेशी ध्वनियाँ (ज़, फ़) भी लिखी जा सकती हैं।
  • सुंदरता और स्पष्टता: शिरोरेखा के कारण शब्द सुगठित और सुंदर दिखते हैं।
  • राष्ट्रीय एकता का साधन: यह संविधान द्वारा स्वीकृत राजभाषा हिंदी की लिपि है (अनुच्छेद 343)।

2. देवनागरी लिपि के दोष

गुणों के साथ-साथ देवनागरी में कुछ कमियाँ भी हैं, जो मुद्रण, टंकण और शिक्षण में कठिनाई पैदा करती हैं।

  • ह्रस्व 'इ' की मात्रा: यह व्यंजन से पहले लिखी जाती है, पर उच्चारण बाद में होता है, जैसे 'कि'। इससे लेखन और उच्चारण का क्रम बदल जाता है।
  • 'र' के अनेक रूप: 'र' के कई रूप हैं, जैसे कर्म (रेफ), प्रकाश, ट्रक। ये सीखने वालों को उलझन में डालते हैं।
  • संयुक्ताक्षरों की जटिलता: क्ष, त्र, ज्ञ, द्ध, द्य, ह्म आदि के अलग और कठिन रूप बनते हैं।
  • मिलते-जुलते वर्ण: ख और रव, ध और घ, भ और म, थ और य आसानी से भ्रम पैदा करते हैं।
  • उच्चारण और लेखन में अंतर: 'ऋ' का उच्चारण प्रायः 'रि' होता है। 'ष' का उच्चारण प्रायः 'श' जैसा होता है। 'ज्ञ' के उच्चारण में भी क्षेत्रीय अंतर मिलता है।
  • अनुस्वार और चंद्रबिंदु का भ्रम: हंस और हँस जैसे शब्दों में भूल हो जाती है। पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण) के स्थान पर अनुस्वार लिखने में भी एकरूपता नहीं है।
  • शिरोरेखा: इसे लगाने में समय और स्याही अधिक लगती है, जिससे लेखन की गति धीमी होती है।
  • मात्राएँ चारों ओर: मात्राएँ ऊपर, नीचे, आगे और पीछे लगती हैं। इसलिए पुराने टाइपराइटर और मुद्रण में अधिक खाँचे (टाइप) बनाने पड़ते थे।
  • कुछ वर्णों का कम प्रयोग: ङ, ञ जैसे वर्ण बहुत कम प्रयोग में आते हैं।
  • हलंत की आवश्यकता: व्यंजन में निहित 'अ' हटाने के लिए हलंत (्) लगाना पड़ता है।
गुणदोष
उच्चारण के अनुसार लेखनऋ, ष आदि में उच्चारण-भेद
वैज्ञानिक वर्णक्रममिलते-जुलते वर्णों से भ्रम
मात्राओं से संक्षिप्त लेखनह्रस्व 'इ' की मात्रा का उल्टा क्रम
शिरोरेखा से सुंदरताशिरोरेखा से लेखन की गति धीमी
संयुक्त ध्वनियों को लिखने की क्षमतासंयुक्ताक्षरों और 'र' के रूपों की जटिलता

3. सुधार की आवश्यकता

  • मुद्रण और टंकण की सुविधा: टाइपराइटर और छापेखाने के लिए वर्णों की संख्या और रूपों को सरल बनाना ज़रूरी था।
  • एकरूपता (मानकीकरण): एक ही वर्ण के कई रूप प्रचलित थे, जैसे अ, झ, ण, ल के पुराने और नए रूप। इससे शिक्षा और प्रकाशन में अव्यवस्था थी।
  • शिक्षण में सरलता: बच्चों और अहिंदी-भाषियों के लिए लिपि सीखना सरल होना चाहिए।
  • राजभाषा और राष्ट्रलिपि की भूमिका: पूरे देश में प्रयोग के लिए लिपि का सर्वमान्य और सरल होना आवश्यक था।
  • नई ध्वनियों का समावेश: अंग्रेज़ी, अरबी-फ़ारसी आदि से आए शब्दों की ध्वनियाँ लिखने के लिए नए चिह्न चाहिए थे।
  • तकनीकी युग की माँग: कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट पर प्रयोग के लिए मानक रूप और कोड आवश्यक हो गए।

4. सुधार के प्रयास

(क) व्यक्तिगत एवं संस्थागत प्रयास (स्वतंत्रता से पूर्व)

  • नागरी प्रचारिणी सभा, काशी (स्थापना 1893): सभा ने नागरी के प्रचार और उसके रूपों की एकरूपता के लिए कार्य किया।
  • बाल गंगाधर तिलक: उन्होंने मुद्रण की सुविधा के लिए नागरी टाइपों को कम और सरल करने का प्रयास किया। इसके परिणामस्वरूप 'केसरी' पत्र के लिए विशेष टाइप तैयार हुए।
  • विनायक दामोदर सावरकर: उन्होंने 'अ की बारहखड़ी' का सुझाव दिया, यानी सभी स्वर 'अ' पर मात्रा लगाकर लिखे जाएँ, जैसे अि, अी, अु। इसका उद्देश्य स्वर-चिह्नों की संख्या घटाना था।
  • काका कालेलकर और महात्मा गांधी: दोनों ने 'अ की बारहखड़ी' का समर्थन किया। गांधीजी के पत्रों में इसका प्रयोग भी हुआ। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने भी लिपि-सुधार पर विचार किया।

(ख) स्वतंत्रता के बाद के सरकारी प्रयास

  • आचार्य नरेंद्र देव समिति (उत्तर प्रदेश सरकार, 1947): समिति ने लिपि को सरल और एकरूप बनाने के लिए अनेक सुझाव दिए।
  • लखनऊ सम्मेलन (1953): विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में सुधार संबंधी सुझावों पर विचार किया और कुछ रूपों को स्वीकार किया।
  • केंद्रीय हिंदी निदेशालय (स्थापना 1960): निदेशालय ने 'मानक देवनागरी वर्णमाला' तैयार की और 'देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण' पुस्तिका प्रकाशित की। इसे समय-समय पर संशोधित किया गया है। इसमें ये नियम निर्धारित हैं:
    • अ, झ, ण, ल आदि के मानक रूप
    • पंचमाक्षर के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग, जैसे गंगा, चंचल
    • चंद्रबिंदु और अनुस्वार के प्रयोग के नियम
    • नुक्ता (ज़, फ़) के प्रयोग के नियम
    • संयुक्ताक्षरों के खड़ी पाई वाले रूप, जैसे द्ध, द्य के स्थान पर सरल रूप

(ग) तकनीकी युग के प्रयास

  • इस्की (ISCII) और यूनिकोड (Unicode): इन मानकों से देवनागरी कंप्यूटर और इंटरनेट पर एकरूप ढंग से लिखी-पढ़ी जा सकती है।
  • इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड (InScript): यह भारतीय लिपियों के लिए मानक कीबोर्ड है।
  • अन्य तकनीकें: ओसीआर (OCR), वाक्-से-पाठ (Speech-to-Text) और अनुवाद उपकरण भी देवनागरी के लिए विकसित हुए हैं।
परीक्षा-टिप: उत्तर में पहले गुण-दोष का संतुलित विवेचन करें। फिर सुधार के प्रयासों को कालक्रम से लिखें: व्यक्तिगत प्रयास, उसके बाद सरकारी समितियाँ, फिर केंद्रीय हिंदी निदेशालय और अंत में तकनीकी मानक। मानकीकरण के नियम समय-समय पर संशोधित होते हैं, इसलिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय का नवीनतम संस्करण अवश्य देखें।

निष्कर्ष: देवनागरी के दोष बहुत कम और सुधारने योग्य हैं, जबकि इसके गुण इसे वैज्ञानिक और सक्षम लिपि बनाते हैं। निरंतर मानकीकरण और तकनीकी विकास से यह आधुनिक युग की आवश्यकताओं को पूरा कर रही है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) देवनागरी लिपि के गुणों और दोषों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) देवनागरी लिपि में सुधार की आवश्यकता बताते हुए अब तक हुए सुधार-प्रयासों का वर्णन कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) 'अ की बारहखड़ी' संबंधी सुझाव पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) देवनागरी के मानकीकरण में केंद्रीय हिंदी निदेशालय की भूमिका स्पष्ट कीजिए।