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हिन्दी भाषा की श्रेष्ठ एकांकी (Best One-Act Plays of Hindi) BAHIN Major T-11-106

RTMNU BA Semester 6 · Hindi Language (हिन्दी भाषा) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Language (हिन्दी भाषा)
SemesterSemester VI
Paper codeBAHIN-MAJOR-T11-106
Paper titleहिन्दी भाषा की श्रेष्ठ एकांकी (Best One-Act Plays of Hindi)
CategoryMajor Mandatory T-11
Credits04
MarksTheory 80 + CIE 20 = 100 (Passing 40)
पाठ्यपुस्तकपृथ्वीराज की आँखें - रामकुमार वर्मा; महाभारत की एक साँझ - भारत भूषण अग्रवाल; ऐसे ऐसे - विष्णु प्रभाकर. Reference: हिन्दी एकाँकी: उद्भव और विकास - लक्ष्मी नारायण लाल; हिन्दी एकाँकी का इतिहास - डॉ रामकुमार वर्मा; हिन्दी एकाँकी: शिल्प और सिद्धांत - डॉ रामकुमार वर्मा; हिन्दी एकाँकी - सं. डॉ नगेन्द्र
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2026-27 (Semester V–VI)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं; नोट्स और प्रश्न PadhaiNotes द्वारा सरल हिन्दी में लिखे गए हैं। RTMNU BA Hindi – All papers

Units

  1. 1इकाई I: एकांकी: परिभाषा, तत्व, इतिहास और शिल्पNotes
  2. 2इकाई II: एकांकी: पृथ्वीराज की आँखें (रामकुमार वर्मा)Notes
  3. 3इकाई III: एकांकी: महाभारत की एक साँझ (भारत भूषण अग्रवाल)Notes
  4. 4इकाई IV: एकांकी: ऐसे ऐसे (विष्णु प्रभाकर)Notes

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-11-106 · इकाई I

इकाई I: एकांकी: परिभाषा, तत्व, इतिहास और शिल्प

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • एकांकी की परिभाषा - एकांकी के तत्व - एकांकी की विशेषताएँ
  • हिन्दी एकांकी का इतिहास और विकास
  • एकांकी और नाटक में अंतर
  • एकांकी का भाषा-शिल्प

1. एकाँकी की परिभाषा, तत्व और विशेषताएँ

अर्थ

एकाँकी का अर्थ है एक अंक वाला नाटक। अंग्रेज़ी में इसे वन-ऐक्ट प्ले (One-Act Play) कहते हैं। यह नाटक का लघु रूप है। इसमें जीवन की किसी एक घटना, एक समस्या या एक मनोभाव को एक ही अंक में, कम पात्रों और कम समय में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।

परिभाषा

  • डॉ. रामकुमार वर्मा (भावार्थ): एकाँकी में कोई एक घटना होती है। वह जिज्ञासा और कौतूहल से भरी नाटकीय शैली में आगे बढ़ती है, अपने चरम बिंदु तक पहुँचती है और वहीं समाप्त हो जाती है।
  • सामान्य परिभाषा: एकाँकी वह दृश्य-काव्य है जिसमें एक अंक में एक केंद्रीय घटना या समस्या को एक ही प्रभाव (एकोन्मुखता) के साथ रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है।
याद रखें: एकाँकी का मूल मंत्र है — एक घटना, एक लक्ष्य, एक प्रभाव।

एकाँकी के तत्व

  1. कथावस्तु (Plot): संक्षिप्त और सुगठित होती है। इसमें एक ही मुख्य घटना रहती है। प्रासंगिक कथाएँ नहीं होतीं। आरंभ, संघर्ष, चरम सीमा (Climax) और अंत शीघ्रता से आते हैं।
  2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण: पात्र कम होते हैं। प्रायः किसी एक प्रमुख पात्र के चरित्र का एक पक्ष उभारा जाता है।
  3. संवाद या कथोपकथन (Dialogue): संवाद छोटे, चुस्त, स्वाभाविक और पात्रानुकूल होते हैं। ये कथा को आगे बढ़ाते हैं और चरित्र को भी स्पष्ट करते हैं।
  4. देशकाल एवं वातावरण: घटना जिस समय और स्थान की है, उसका सजीव चित्रण किया जाता है। यह काम प्रायः रंग-निर्देशों के माध्यम से होता है।
  5. संकलन-त्रय (Three Unities): स्थान, समय और कार्य की एकता। एकाँकी में इसका पालन प्रायः अधिक होता है।
  6. भाषा-शैली: सरल, प्रभावपूर्ण और विषय के अनुकूल होती है।
  7. उद्देश्य: किसी समस्या, विचार या भाव को दर्शक तक पहुँचाना। उद्देश्य प्रायः संकेत रूप में व्यक्त होता है, उपदेश के रूप में नहीं।
  8. अभिनेयता (Stageability): एकाँकी रंगमंच पर खेलने योग्य होना चाहिए।

एकाँकी की विशेषताएँ

  • संक्षिप्तता: इसका मंचन प्रायः कम समय में पूरा हो जाता है।
  • एकोन्मुखता: पूरी रचना एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ती है।
  • तीव्र गति: घटनाएँ शीघ्रता से चरम सीमा तक पहुँचती हैं।
  • कौतूहल और जिज्ञासा: दर्शक अंत तक बँधा रहता है।
  • प्रभावान्विति: अंत में एक गहरी और समग्र छाप छोड़ना।
  • कम दृश्य, सरल मंच-सज्जा: इसके कारण विद्यालयों, महाविद्यालयों और रेडियो पर इसका मंचन सरल होता है।

2. हिन्दी एकाँकी का इतिहास और विकास

(क) पूर्व-पीठिका : भारतेंदु युग

भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके समकालीन लेखकों ने छोटे-छोटे प्रहसन और लघु नाटक लिखे। अंधेर नगरी और भारत दुर्दशा जैसी रचनाओं में एकाँकी के बीज दिखाई देते हैं। फिर भी इन्हें आधुनिक अर्थ में पूर्ण एकाँकी नहीं माना जाता।

(ख) द्विवेदी युग

इस युग में कुछ लघु नाटक लिखे गए, पर एकाँकी का स्वतंत्र शिल्प अभी विकसित नहीं हुआ था। अनुवादों के द्वारा पाश्चात्य वन-ऐक्ट प्ले का परिचय मिलने लगा था।

(ग) प्रसाद युग / आधुनिक एकाँकी का उदय

  • जयशंकर प्रसाद की एक घूँट (लगभग 1929-30) को अनेक विद्वान पहला आधुनिक हिन्दी एकाँकी मानते हैं।
  • डॉ. रामकुमार वर्मा की बादल की मृत्यु को भी पहला एकाँकी मानने का मत है। वर्मा जी को प्रायः हिन्दी एकाँकी का जनक कहा जाता है। उनके ऐतिहासिक एकाँकी प्रसिद्ध हैं, जैसे पृथ्वीराज की आँखें और दीपदान।
  • भुवनेश्वर का संग्रह कारवाँ यथार्थवादी और नई शैली के एकाँकियों के लिए प्रसिद्ध है।
पहले एकाँकी के विषय में विद्वानों में मतभेद है। उत्तर में दोनों मतों का उल्लेख करना सुरक्षित रहता है।

(घ) प्रसादोत्तर और स्वातंत्र्योत्तर युग (विकास काल)

  • प्रमुख एकाँकीकार: उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्ट, सेठ गोविन्ददास, लक्ष्मीनारायण मिश्र, जगदीशचंद्र माथुर (भोर का तारा), विष्णु प्रभाकर, भारत भूषण अग्रवाल, धर्मवीर भारती, लक्ष्मीनारायण लाल आदि।
  • रेडियो एकाँकी (Radio Play): आकाशवाणी के प्रसार से ध्वनि-प्रधान एकाँकी बहुत लोकप्रिय हुए।
  • विषयों का विस्तार: ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक, हास्य-व्यंग्य और प्रतीकात्मक विषयों पर एकाँकी लिखे गए।
  • नए प्रयोग: विसंगति, प्रतीक, नुक्कड़ नाटक और मिथकों की नई व्याख्या, जैसे महाभारत की एक साँझ।

विकास के कारण

  • पाश्चात्य वन-ऐक्ट प्ले का प्रभाव
  • व्यस्त आधुनिक जीवन में समय का अभाव
  • रेडियो और रंगमंच का विकास
  • विद्यालयों और महाविद्यालयों में मंचन की सुविधा
  • पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के अवसर

3. एकाँकी और नाटक में अंतर

आधारएकाँकीनाटक
अंककेवल एक अंकअनेक अंक
कथावस्तुएक घटना, कोई प्रासंगिक कथा नहींमुख्य कथा के साथ प्रासंगिक कथाएँ भी
पात्रकम पात्रअधिक पात्र
चरित्र-चित्रणचरित्र का एक पक्षचरित्र का पूर्ण और क्रमिक विकास
समयमंचन में कम समयमंचन में अधिक समय
गतितीव्र, चरम सीमा शीघ्रधीमी, क्रमिक
संकलन-त्रयपालन प्रायः अधिकपालन आवश्यक नहीं
प्रभावएक तीव्र प्रभावव्यापक और बहुआयामी प्रभाव
मंच-सज्जासरलविस्तृत

निष्कर्ष: एकाँकी नाटक का छोटा संस्करण मात्र नहीं है। इसका अपना स्वतंत्र शिल्प है। जैसे कहानी उपन्यास से अलग विधा है, वैसे ही एकाँकी भी नाटक से अलग विधा है।

4. एकाँकी का भाषा-शिल्प

  • पात्रानुकूल भाषा: राजा, किसान, बालक, विद्वान आदि सभी अपनी स्थिति के अनुसार बोलते हैं।
  • संक्षिप्त और सारगर्भित संवाद: लंबे भाषणों के स्थान पर छोटे और चुटीले वाक्य होते हैं।
  • विषयानुकूल भाषा: ऐतिहासिक या पौराणिक एकाँकियों में तत्सम-प्रधान भाषा होती है, सामाजिक एकाँकियों में बोलचाल की हिन्दी, और उर्दू या अंग्रेज़ी शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग भी होता है।
  • रंग-निर्देश (Stage Directions): दृश्य, वेशभूषा, प्रकाश, ध्वनि और पात्रों के हाव-भाव के संकेत दिए जाते हैं। रामकुमार वर्मा के रंग-निर्देश विस्तृत और काव्यात्मक माने जाते हैं।
  • नाटकीयता: प्रश्न, विस्मय, विराम और मौन से तनाव पैदा किया जाता है।
  • व्यंग्य और हास्य: सामाजिक एकाँकियों में व्यंग्य का पैनापन दिखाई देता है।
  • प्रतीक और बिंब: आधुनिक एकाँकियों में अर्थ को गहरा करने के लिए इनका प्रयोग होता है।
  • मुहावरे और लोकोक्तियाँ: इनसे भाषा में सजीवता आती है।
  • ध्वनि-प्रधानता: रेडियो एकाँकी में भाषा और ध्वनि-प्रभाव ही दृश्य का काम करते हैं।
परीक्षा टिप: दीर्घ उत्तर में परिभाषा, तत्व, विशेषताएँ, उदाहरण (एकाँकीकार और रचना) और निष्कर्ष, इस क्रम में लिखें। अंतर वाले प्रश्न में तालिका अवश्य बनाएँ।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) एकाँकी की परिभाषा देते हुए उसके प्रमुख तत्वों और विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी एकाँकी के उद्भव और विकास का परिचय प्रमुख एकाँकीकारों और उनकी रचनाओं के उल्लेख सहित दीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) एकाँकी और नाटक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: एकाँकी का भाषा-शिल्प।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: हिन्दी एकाँकी के विकास में डॉ. रामकुमार वर्मा का योगदान।

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-11-106 · इकाई II

इकाई II: एकांकी: पृथ्वीराज की आँखें (रामकुमार वर्मा)

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • पृथ्वीराज की आँखें - रामकुमार वर्मा

पृथ्वीराज की आँखें - रामकुमार वर्मा

1. लेखक परिचय: डॉ. रामकुमार वर्मा

डॉ. रामकुमार वर्मा (1905–1990) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि, आलोचक, साहित्य-इतिहासकार और एकाँकीकार थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में हुआ। वे लंबे समय तक प्रयाग (इलाहाबाद) विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से जुड़े रहे। आधुनिक हिन्दी एकाँकी को व्यवस्थित रूप देने के कारण उन्हें प्रायः 'हिन्दी एकाँकी का जनक' कहा जाता है।

  • प्रमुख एकाँकी / संग्रह: बादल की मृत्यु, पृथ्वीराज की आँखें, रेशमी टाई, चारुमित्रा, सप्त किरण, दीपदान, कौमुदी महोत्सव आदि।
  • काव्य: चित्ररेखा, अंजलि आदि।
  • आलोचना / इतिहास: हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, हिन्दी एकाँकी: शिल्प और सिद्धांत।
  • सम्मान: पद्म भूषण।
  • विशेषता: ऐतिहासिक और सामाजिक दोनों प्रकार के एकाँकी लिखे। ऐतिहासिक एकाँकियों में भारतीय गौरव, त्याग, वीरता और आदर्श पर विशेष बल दिया।

2. रचना का परिचय और ऐतिहासिक आधार

'पृथ्वीराज की आँखें' एक ऐतिहासिक एकाँकी (Historical One-Act Play) है। इसी नाम से रामकुमार वर्मा का एक एकाँकी-संग्रह भी प्रसिद्ध है। इसका आधार दिल्ली-अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के संघर्ष से जुड़ी इतिहास-प्रसिद्ध कथा है।

पृष्ठभूमि (लोक-प्रचलित कथा): तराइन के युद्ध में पराजय के बाद पृथ्वीराज बंदी बना लिए गए। लोक-परंपरा और 'पृथ्वीराज रासो' से जुड़ी कथा के अनुसार गोरी ने उनकी आँखें छीन लीं। उनके मित्र और राजकवि चंदबरदाई उनके साथ रहे। अंधे होने पर भी पृथ्वीराज ने अपने शब्दभेदी बाण के कौशल से अपने स्वाभिमान की रक्षा की। एकाँकी का शीर्षक इसी 'आँखें छीने जाने' के मार्मिक प्रसंग की ओर संकेत करता है।

ध्यान दें: एकाँकी के दृश्यों, संवादों और पात्रों का विस्तृत क्रम विद्यार्थी अपनी पाठ्य-पुस्तक से अवश्य पढ़ें। उत्तर में कथा अपने शब्दों में लिखें और उसे पाठ्य-पुस्तक से मिलाकर पक्का करें।

3. मूल कथ्य / उद्देश्य

  • राष्ट्रीय स्वाभिमान: पराजय और बंदी होने पर भी आत्मसम्मान न छोड़ने का संदेश।
  • शारीरिक दुर्बलता पर आत्मबल की विजय: आँखें न रहने पर भी साहस और कौशल बना रहता है।
  • मित्रता और निष्ठा: राजा और राजकवि के आत्मीय संबंध का चित्रण।
  • अतीत-गौरव: भारतीय इतिहास के वीर चरित्रों के माध्यम से पाठकों में देशप्रेम जगाना।
  • करुणा और वीर रस का मेल: अंधे राजा की विवशता में करुणा और उसके संकल्प में वीरता।

4. प्रमुख पात्र (ऐतिहासिक आधार पर)

  • पृथ्वीराज चौहान: नायक; वीर, स्वाभिमानी, धनुर्विद्या में निपुण। बंदी और नेत्रहीन होकर भी झुकता नहीं। उसकी पीड़ा दर्शक में करुणा और उसका साहस गर्व जगाता है।
  • चंदबरदाई: राजकवि और सच्चा मित्र; बुद्धिमान, निष्ठावान और राजा का सहारा।
  • मुहम्मद गोरी: विरोधी पक्ष; विजय के अहंकार और क्रूरता का प्रतीक।

5. एकाँकी के तत्वों के आधार पर मूल्यांकन

तत्व'पृथ्वीराज की आँखें' में स्थिति
कथावस्तु (Plot)एक ही मार्मिक ऐतिहासिक प्रसंग पर केंद्रित, संक्षिप्त और कसा हुआ
पात्र / चरित्र-चित्रणकम पात्र; नायक के अंतर्द्वंद्व और स्वाभिमान पर बल
संवाद (Dialogue)भावपूर्ण, ओजस्वी, कहीं-कहीं काव्यात्मक
देश-काल-वातावरणमध्यकालीन युद्ध, बंदी-जीवन और राजदरबार का वातावरण
भाषा-शैलीतत्सम-प्रधान, परिष्कृत खड़ी बोली; वीर और करुण रस
उद्देश्यराष्ट्रीय गौरव, स्वाभिमान और त्याग का संदेश
अभिनेयता (Stage-worthiness)सीमित पात्र और केंद्रित घटना होने से मंचन में सरल

6. भाषा-शैली और शिल्प की विशेषताएँ

  1. संकलन-त्रय (Three Unities) का ध्यान: समय, स्थान और कार्य की एकता बनाए रखने का प्रयास।
  2. संघर्ष (Conflict): बाहरी संघर्ष (पृथ्वीराज–गोरी) और भीतरी संघर्ष (विवशता बनाम स्वाभिमान)।
  3. चरम सीमा (Climax): घटना तेज़ी से एक प्रभावशाली अंत की ओर बढ़ती है, जो एकाँकी की पहचान है।
  4. रंग-संकेत (Stage Directions): वर्मा जी के एकाँकियों में दृश्य, प्रकाश और पात्रों की मुद्राओं के विस्तृत संकेत मिलते हैं।
  5. प्रतीकात्मकता: 'आँखें' केवल शारीरिक अंग नहीं, बल्कि सम्मान, दृष्टि और आत्मबल का प्रतीक हैं।
  6. इतिहास और कल्पना का मेल: ऐतिहासिक तथ्य के साथ लोक-परंपरा और नाटकीय कल्पना का प्रयोग।

7. शीर्षक की सार्थकता

शीर्षक संक्षिप्त, जिज्ञासा जगाने वाला और कथा के केंद्र से सीधा जुड़ा है। पृथ्वीराज की आँखें छीनी जाना ही कथा की सबसे मार्मिक घटना है। साथ ही शीर्षक यह संकेत भी देता है कि बाहरी आँखें चली जाने पर भी नायक की आंतरिक दृष्टि और आत्मबल बना रहता है। इसलिए शीर्षक पूरी तरह सार्थक है।

8. समीक्षात्मक बिंदु (Critical Points)

  • हिन्दी के आरंभिक श्रेष्ठ ऐतिहासिक एकाँकियों में इसकी गणना होती है।
  • राष्ट्रीय चेतना के युग में अतीत-गौरव के माध्यम से जागरण का प्रयास।
  • सीमा: आदर्शवाद और भावुकता की प्रधानता; ऐतिहासिक प्रामाणिकता की जगह लोक-कथा पर निर्भरता।
परीक्षा सुझाव: लंबे उत्तर में क्रम रखें: लेखक परिचय → कथासार (अपने शब्दों में) → उद्देश्य → तत्वों के आधार पर समीक्षा → निष्कर्ष। चरित्र-चित्रण में पात्र के 4–5 गुण शीर्षक बनाकर लिखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) एकाँकी के तत्वों के आधार पर 'पृथ्वीराज की आँखें' एकाँकी की समीक्षा कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'पृथ्वीराज की आँखें' एकाँकी के नायक पृथ्वीराज का चरित्र-चित्रण कीजिए तथा एकाँकी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) डॉ. रामकुमार वर्मा का एकाँकीकार के रूप में परिचय दीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) 'पृथ्वीराज की आँखें' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: 'पृथ्वीराज की आँखें' की भाषा-शैली एवं ऐतिहासिकता।

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-11-106 · इकाई III

इकाई III: एकांकी: महाभारत की एक साँझ (भारत भूषण अग्रवाल)

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • महाभारत की एक साँझ - भारत भूषण अग्रवाल

महाभारत की एक साँझ - भारत भूषण अग्रवाल

1. लेखक परिचय

  • भारत भूषण अग्रवाल (1919–1975) हिन्दी के प्रमुख आधुनिक कवि, आलोचक और एकाँकीकार थे। उनका जन्म मथुरा (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
  • वे अज्ञेय द्वारा संपादित 'तार सप्तक' (1943) के कवि थे। इसलिए उन्हें प्रयोगवाद और नई कविता से जुड़ा रचनाकार माना जाता है।
  • प्रमुख काव्य कृतियाँ: छवि के बंधन, जागते रहो, मुक्तिमार्ग, ओ अप्रस्तुत मन, अनुपस्थित लोग, उतना वह सूरज है।
  • 'उतना वह सूरज है' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार (मरणोपरांत) मिला।
  • उन्होंने आकाशवाणी में काम किया था। इसी कारण उनके एकाँकियों में रेडियो नाटक (Radio Play) की तकनीक दिखाई देती है। इस तकनीक में संवाद, ध्वनि और कथन (narration) प्रमुख होते हैं।

2. एकाँकी का कथ्य (सार)

यह एकाँकी महाभारत की पौराणिक कथा पर आधारित है। इसका समय महाभारत युद्ध के अंतिम चरण की एक साँझ (संध्या) है। यह वह समय है जब युद्ध लगभग समाप्त हो चुका है।

  • भीम के साथ गदा-युद्ध में दुर्योधन की जाँघ टूट चुकी है। वह घायल होकर पड़ा है और उसकी मृत्यु निकट है।
  • इसी अवस्था में दुर्योधन और युधिष्ठिर का आमना-सामना होता है। दोनों के बीच तीखा और विचारोत्तेजक संवाद होता है। यही संवाद एकाँकी का केंद्र है।
  • दुर्योधन अपने पक्ष को सामने रखता है। वह अपने अधिकार, पांडवों के दावे और युद्ध में अपनाए गए छल-कपट पर प्रश्न उठाता है। वह यह भी पूछता है कि केवल विजेता को ही 'धर्म' का पक्षधर क्यों माना जाए।
  • युधिष्ठिर, जिन्हें 'धर्मराज' कहा जाता है, इन प्रश्नों के आगे स्वयं को असहज और निरुत्तर-सा पाते हैं।
  • अंत में पाठक के सामने यह प्रश्न बच जाता है कि इस महायुद्ध में वास्तव में जीता कौन। विनाश के बाद विजय भी खोखली लगती है।
मुख्य बात: लेखक ने परंपरा से 'खलनायक' माने गए दुर्योधन को अपनी बात कहने का अवसर दिया है। इस प्रकार पौराणिक कथा की आधुनिक पुनर्व्याख्या की गई है।

3. प्रमुख विषय-वस्तु (Themes)

  1. युद्ध की निरर्थकता: युद्ध का अंत केवल विनाश, शोक और पछतावे में होता है। विजेता और पराजित दोनों हारते हैं।
  2. सत्य और धर्म की सापेक्षता: हर पक्ष का अपना 'सत्य' होता है। धर्म-अधर्म की परिभाषा प्रायः विजेता तय करता है।
  3. परंपरागत मूल्यों पर प्रश्न: धर्मराज युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की नीति पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
  4. आधुनिक बोध: दो विश्वयुद्धों के बाद की मानसिकता, यानी हिंसा के प्रति संदेह और मनुष्य की नैतिक दुविधा, इस रचना में झलकती है।
  5. मनोवैज्ञानिक द्वंद्व: पात्रों के भीतर चल रहा संघर्ष बाहरी घटनाओं से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

4. चरित्र-चित्रण

दुर्योधन:

  • वह स्वाभिमानी और दृढ़ है। मृत्यु के निकट होने पर भी वह झुकता नहीं।
  • वह तर्कशील और वाक्पटु है। अपने कर्मों का तर्कपूर्ण पक्ष रखता है।
  • उसे अपने साथ हुए अन्याय की पीड़ा है। यहाँ वह केवल खलनायक नहीं, बल्कि एक त्रासद (tragic) पात्र लगता है।

युधिष्ठिर:

  • वे धर्म और सत्य के प्रतीक माने जाते हैं, पर यहाँ आत्म-संशय से घिरे दिखते हैं।
  • वे शांत और संयमी हैं, किंतु विजय के बाद भी अंदर से व्यथित हैं।
  • उनके माध्यम से लेखक दिखाता है कि 'धर्मयुद्ध' भी नैतिक प्रश्नों से मुक्त नहीं होता।

5. परंपरागत और एकाँकी में चित्रण - तुलना

आधारपरंपरागत महाभारत दृष्टि'महाभारत की एक साँझ' की दृष्टि
दुर्योधनअधर्मी, खलनायकतर्कशील, स्वाभिमानी, त्रासद पात्र
युधिष्ठिरनिर्विवाद धर्मराजआत्म-संशय से ग्रस्त मनुष्य
युद्धधर्म की विजयविनाशकारी और निरर्थक
सत्यएक और निश्चितसापेक्ष, दृष्टिकोण पर निर्भर

6. शिल्प और भाषा-शैली

  • संवाद-प्रधानता: पूरा एकाँकी तीखे, तर्कपूर्ण और भावपूर्ण संवादों पर टिका है।
  • काव्यात्मक भाषा: कवि होने के कारण लेखक की भाषा में बिंब, लय और प्रतीकात्मकता है। भाषा तत्सम-प्रधान खड़ी बोली है।
  • संकलन-त्रय: स्थान सीमित है, समय एक साँझ का है और कार्य एक केंद्रीय संवाद-संघर्ष है। यह एकाँकी की मूल विशेषताओं के अनुरूप है।
  • रेडियो शिल्प: ध्वनि, कथन और संवाद के माध्यम से दृश्य उभारे गए हैं।
  • प्रतीकात्मक शीर्षक: 'साँझ' एक युग के अंत, विनाश और ढलते जीवन का प्रतीक है।
  • चरम सीमा (Climax): दुर्योधन के तीखे प्रश्नों पर युधिष्ठिर का निरुत्तर होना।

7. मूल्यांकन

यह एकाँकी पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक मनुष्य के नैतिक संकट को व्यक्त करता है। इसकी विशेषताएँ हैं: विचार की गहराई, पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण, युद्ध-विरोधी स्वर और काव्यात्मक संवाद। इन्हीं कारणों से यह हिन्दी के श्रेष्ठ एकाँकियों में गिना जाता है।

परीक्षा टिप: उत्तर में चार बातें अवश्य लिखें: (1) शीर्षक की सार्थकता, (2) दुर्योधन की नई छवि, (3) युद्ध की निरर्थकता, (4) एकाँकी के तत्वों (कथावस्तु, पात्र, संवाद, देशकाल, उद्देश्य, अभिनेयता) के आधार पर समीक्षा। मूल पाठ को ध्यान से पढ़कर दो-चार छोटे उद्धरण याद रखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'महाभारत की एक साँझ' एकाँकी की कथावस्तु लिखिए और इसके मूल उद्देश्य (युद्ध की निरर्थकता तथा सत्य की सापेक्षता) पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) एकाँकी के तत्वों के आधार पर भारत भूषण अग्रवाल कृत 'महाभारत की एक साँझ' की समीक्षा कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) 'महाभारत की एक साँझ' के आधार पर दुर्योधन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) 'महाभारत की एक साँझ' शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) भारत भूषण अग्रवाल का साहित्यिक परिचय दीजिए।

RTMNU BA Sem 6 · BAHIN Major T-11-106 · इकाई IV

इकाई IV: एकांकी: ऐसे ऐसे (विष्णु प्रभाकर)

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • ऐसे ऐसे - विष्णु प्रभाकर

ऐसे ऐसे - विष्णु प्रभाकर

1. लेखक परिचय: विष्णु प्रभाकर

  • जन्म: सन् 1912, मीरापुर (जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश)। निधन: सन् 2009।
  • वे कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, एकांकीकार और जीवनीकार थे। उन पर गांधीवादी विचारधारा और मानवतावाद का गहरा प्रभाव था।
  • प्रसिद्ध रचना: 'आवारा मसीहा', जो बांग्ला कथाकार शरतचंद्र की जीवनी है। उपन्यास 'अर्धनारीश्वर' और नाटक 'डॉक्टर' भी प्रसिद्ध हैं।
  • सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण आदि।
  • हिन्दी एकांकी के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने रेडियो के लिए भी अनेक एकांकी लिखे। उनके एकांकियों में सामाजिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक विषय मिलते हैं।

2. एकांकी का परिचय एवं कथासार (अपने शब्दों में)

'ऐसे ऐसे' एक हास्य-प्रधान सामाजिक एवं बाल-मनोवैज्ञानिक एकांकी है। इसका नायक मोहन नाम का स्कूली बालक है।

  • छुट्टियाँ खत्म होने वाली हैं और अगले दिन स्कूल खुलना है। मोहन ने छुट्टियों का गृहकार्य (होमवर्क) पूरा नहीं किया है।
  • स्कूल जाने और डाँट से बचने के लिए वह पेट-दर्द का बहाना करता है। पूछने पर वह बस इतना कहता है कि पेट में 'ऐसे-ऐसे' होता है। यही वाक्य एकांकी का शीर्षक है।
  • माता-पिता बहुत घबरा जाते हैं। घर में चिंता का वातावरण बन जाता है।
  • वैद्य जी आते हैं। वे नाड़ी देखकर अपने ढंग से रोग बताते हैं और चूर्ण-पुड़िया देते हैं।
  • फिर डॉक्टर आते हैं। वे भी जाँच करके अपनी तरह का निदान बताते हैं और दवा लिखते हैं। कोई भी असली कारण नहीं समझ पाता।
  • अंत में मोहन के मास्टर जी आते हैं। वे बच्चे के मन को समझते हैं और तुरंत भाँप लेते हैं कि असली 'रोग' अधूरा गृहकार्य है।
  • मास्टर जी काम पूरा करने के लिए कुछ दिन की छूट दे देते हैं। इसके बाद मोहन का 'ऐसे-ऐसे' अपने-आप ठीक हो जाता है। इस तरह एकांकी हास्यपूर्ण ढंग से समाप्त होता है।
मूल संदेश: बच्चों के व्यवहार के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारण को समझना चाहिए। केवल दवा-इलाज से हर समस्या हल नहीं होती।

3. प्रमुख विषय-वस्तु (Themes)

  • बाल मनोविज्ञान (Child Psychology): डर, दंड से बचने की इच्छा और बहानेबाजी का स्वाभाविक चित्रण।
  • शिक्षा व्यवस्था पर संकेत: गृहकार्य का बोझ और शिक्षक का भय।
  • अभिभावकों का अति-स्नेह और चिंता: माता-पिता छोटी बात पर भी घबरा जाते हैं।
  • चिकित्सकों पर व्यंग्य (Satire): वैद्य और डॉक्टर बिना असली कारण जाने अपने-अपने निदान थोपते हैं।
  • शिक्षक की भूमिका: सच्चा शिक्षक बच्चे के मन को सबसे अच्छी तरह पहचानता है।

4. चरित्र-चित्रण

पात्रप्रमुख विशेषताएँ
मोहननायक, चतुर, नटखट, बहानेबाज़। स्वभाव से भोला, पर पढ़ाई से जी चुराने वाला। सामान्य बालक का प्रतिनिधि।
माँममतामयी, भावुक और चिंतित। बेटे की तकलीफ़ से जल्दी घबरा जाती है।
पिताजिम्मेदार और चिंतित। इलाज के लिए तुरंत वैद्य और डॉक्टर बुलाते हैं।
वैद्य जीपरंपरागत आयुर्वेदिक चिकित्सक, नाड़ी-परीक्षक, बातूनी। उनके माध्यम से हास्य और व्यंग्य उत्पन्न होता है।
डॉक्टरआधुनिक चिकित्सक, आत्मविश्वासी। वे भी असली कारण नहीं पकड़ पाते।
मास्टर जीअनुभवी, समझदार, मनोवैज्ञानिक दृष्टि वाले। समस्या का सही समाधान करने वाले।

5. शिल्प एवं भाषा-शैली

  • कथानक: छोटा, सुगठित और एक ही घटना पर केंद्रित। इसमें एकांकी की एकता (स्थान, समय, कार्य) का पालन है।
  • स्थान: मुख्यतः एक ही स्थान, यानी मोहन का घर। इसलिए मंचन सरल है।
  • संवाद: छोटे, सरल, चुटीले और स्वाभाविक। 'ऐसे-ऐसे' की बार-बार आवृत्ति से हास्य बढ़ता है।
  • भाषा: बोलचाल की सरल हिन्दी। आवश्यकतानुसार उर्दू-अंग्रेज़ी शब्द भी हैं। वैद्य और डॉक्टर की भाषा उनके पेशे के अनुरूप है।
  • रस: हास्य रस प्रधान, साथ में हल्का व्यंग्य।
  • चरमोत्कर्ष (Climax): मास्टर जी द्वारा रहस्य खुलना।
  • अभिनेयता: कम पात्र, सरल मंच-सज्जा। विद्यालयों में मंचन के लिए उपयुक्त।

6. शीर्षक की सार्थकता

'ऐसे-ऐसे' मोहन के अस्पष्ट और बनावटी दर्द का प्रतीक है। पूरा कथानक इसी शब्द के इर्द-गिर्द घूमता है। यह शब्द जिज्ञासा और हास्य दोनों पैदा करता है। इसलिए शीर्षक संक्षिप्त, आकर्षक और पूर्णतः सार्थक है।

7. आलोचनात्मक मूल्यांकन

  • गुण: मनोरंजन के साथ शिक्षा, स्वाभाविक बाल-चित्रण, सामाजिक व्यंग्य और सरल मंचीयता।
  • सीमा: विषय छोटा और हल्का है, गंभीर संघर्ष का अभाव है।
  • फिर भी यह विष्णु प्रभाकर के सफल हास्य-एकांकियों में गिना जाता है।
परीक्षा टिप: उत्तर में लेखक परिचय, कथासार, उद्देश्य, पात्र, शिल्प और शीर्षक, इन छह बिंदुओं को क्रम से लिखें। अपने उत्तर को मूल पाठ से अवश्य मिलाएँ।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'ऐसे ऐसे' एकांकी का कथासार लिखते हुए उसके उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) एकांकी के तत्वों के आधार पर विष्णु प्रभाकर के 'ऐसे ऐसे' एकांकी की समीक्षा कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) 'ऐसे ऐसे' एकांकी के प्रमुख पात्र मोहन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) 'ऐसे ऐसे' एकांकी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: 'ऐसे ऐसे' एकांकी में मास्टर जी की भूमिका।