पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- जिंदगी और गुलाब के फूल – उषा प्रियंवदा
- बूढ़ी काकी – मुंशी प्रेमचंद
- जिन्दगी और जोंक – अमरकांत
- संघर्ष – सुशीला टाकभौरे
1. जिंदगी और गुलाब के फूल – उषा प्रियंवदा
लेखिका परिचय
उषा प्रियंवदा (जन्म 1930, कानपुर) 'नई कहानी' आंदोलन की प्रमुख कथाकार हैं। उन्होंने लंबे समय तक अमेरिका में अध्यापन किया। उनके प्रमुख उपन्यास हैं 'पचपन खंभे लाल दीवारें' और 'रुकोगी नहीं राधिका'। 'वापसी' उनकी बहुचर्चित कहानी है। उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय परिवार, अकेलापन, अजनबीपन और बदलते पारिवारिक संबंधों का सूक्ष्म चित्रण मिलता है।
कथावस्तु (सार)
कहानी का नायक सुबोध एक स्वाभिमानी युवक है। वह सिद्धांत और आत्मसम्मान के कारण अपनी नौकरी छोड़ देता है और बेरोज़गार हो जाता है। उसकी बहन वृंदा नौकरी करने लगती है और घर की कमाने वाली सदस्य बन जाती है। धीरे-धीरे घर में सुबोध का महत्व घटता जाता है। माँ का स्नेह और ध्यान कमाने वाली बेटी की ओर झुक जाता है। सुबोध अपने ही घर में उपेक्षित, फालतू और अजनबी जैसा अनुभव करने लगता है। कहानी दिखाती है कि आधुनिक मध्यवर्गीय जीवन में संबंधों का आधार भावना कम और आर्थिक उपयोगिता अधिक हो गया है।
मुख्य विषय
- आर्थिक आधार पर संबंध: कमाने वाला ही घर में सम्मान पाता है।
- बेरोज़गारी की पीड़ा: शिक्षित युवक की हताशा और हीनभावना।
- अजनबीपन (Alienation): अपने ही घर में पराया हो जाना।
- बदलती स्त्री-भूमिका: कमाऊ स्त्री का परिवार में बढ़ता स्थान।
- शीर्षक: 'गुलाब के फूल' जीवन की कोमल आशाओं और सपनों के प्रतीक हैं, जो कठोर यथार्थ में मुरझा जाते हैं।
शिल्प
मनोवैज्ञानिक चित्रण, सहज भाषा, छोटे-छोटे घरेलू प्रसंगों द्वारा गहरी बात कहना और प्रतीकात्मकता इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
2. बूढ़ी काकी – मुंशी प्रेमचंद
लेखक परिचय
प्रेमचंद (1880–1936) का वास्तविक नाम धनपत राय था। उनका जन्म वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ। उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है। प्रमुख कृतियाँ: 'गोदान', 'गबन', 'निर्मला', 'रंगभूमि'; कहानियाँ: 'कफ़न', 'ईदगाह', 'पूस की रात', 'नमक का दारोगा'। उनकी कहानियाँ 'मानसरोवर' के खंडों में संकलित हैं।
कथावस्तु (सार)
बूढ़ी काकी एक विधवा वृद्धा हैं, जिनका अपना कोई नहीं है। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति भतीजे बुद्धिराम के नाम कर दी। संपत्ति मिलते ही बुद्धिराम और उसकी पत्नी रूपा उनकी उपेक्षा करने लगे। घर में बेटे के तिलक का उत्सव होता है और तरह-तरह के पकवान बनते हैं। भूख से व्याकुल काकी भोज में पहुँच जाती हैं और अपमानित होकर लौटा दी जाती हैं। केवल छोटी बच्ची लाडली उनसे सच्चा प्रेम करती है। रात को लाडली उन्हें वहाँ ले जाती है जहाँ मेहमानों की जूठी पत्तलें पड़ी हैं, और काकी जूठन खाने लगती हैं। यह दृश्य देखकर रूपा का हृदय काँप उठता है। उसे पश्चाताप होता है और वह काकी को आदरपूर्वक भोजन परोसती है।
मुख्य बिंदु
- वृद्धों की उपेक्षा: संपत्ति के बाद सेवा समाप्त हो जाना।
- प्रसिद्ध कथन का भाव: बुढ़ापा प्रायः बचपन का पुनरागमन होता है, अर्थात् वृद्ध भी बच्चों की तरह स्वाद और स्नेह चाहते हैं।
- बाल-मन की निश्छलता: लाडली मानवता की प्रतीक है।
- हृदय-परिवर्तन: प्रेमचंद का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद।
पात्र
| पात्र | विशेषता |
|---|---|
| बूढ़ी काकी | असहाय, भूखी, उपेक्षित, बाल-स्वभाव वाली वृद्धा |
| बुद्धिराम | स्वार्थी, संपत्ति लेकर कर्तव्य भूलने वाला |
| रूपा | कठोर, पर अंत में पश्चाताप करने वाली |
| लाडली | निश्छल, करुणामयी बालिका |
3. जिन्दगी और जोंक – अमरकांत
लेखक परिचय
अमरकांत (1925–2014) का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ। वे 'नई कहानी' के प्रमुख कथाकार हैं। उपन्यास 'इन्हीं हथियारों से' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और बाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए। प्रसिद्ध कहानियाँ: 'दोपहर का भोजन', 'डिप्टी कलक्टरी', 'जिन्दगी और जोंक'।
कथावस्तु (सार)
कहानी का केंद्रीय पात्र रजुआ एक अत्यंत गरीब, बेसहारा व्यक्ति है जो एक मोहल्ले में आकर रहने लगता है। चोरी के संदेह में उसे पीटा जाता है, फिर भी वह वहीं टिका रहता है। पेट भरने के लिए वह मोहल्ले भर के छोटे-मोटे काम करता है। लोग उसका शोषण करते हैं, उसका मज़ाक उड़ाते हैं, पर वह हर अपमान सहकर भी जीता रहता है। बीमारी और कष्ट में भी वह जीवन से चिपका रहता है। कहानी का वर्णन 'मैं' (कथावाचक) की दृष्टि से हुआ है।
मुख्य विषय
- जिजीविषा (जीने की इच्छा): रजुआ जोंक की तरह जीवन से चिपका है।
- शीर्षक का द्विअर्थ: जीवन रजुआ को जोंक की तरह चूसता है, और रजुआ भी जोंक की तरह जीवन को पकड़े रहता है।
- निम्नवर्ग का शोषण और मध्यवर्ग की संवेदनहीनता।
- यथार्थवादी शैली: व्यंग्य, सहज भाषा, सूक्ष्म निरीक्षण।
4. संघर्ष – सुशीला टाकभौरे
लेखिका परिचय
सुशीला टाकभौरे हिंदी की प्रमुख दलित लेखिका हैं, जिनका कार्यक्षेत्र नागपुर क्षेत्र रहा है। उन्होंने कहानी, कविता, नाटक और आत्मकथा लिखी है। उनकी आत्मकथा 'शिकंजे का दर्द' दलित स्त्री के दोहरे शोषण (जाति और लिंग) का मार्मिक दस्तावेज़ है।
दलित कहानी की विशेषताएँ
- स्वानुभूति (अपना भोगा हुआ यथार्थ) पर आधारित लेखन।
- जातिगत भेदभाव, अपमान और शोषण का विरोध।
- डॉ. आंबेडकर के विचारों से प्रेरित चेतना: शिक्षा, समानता, स्वाभिमान।
- दलित स्त्री का दोहरा संघर्ष।
- सीधी, सरल और प्रश्न उठाने वाली भाषा।
चारों कहानियों की तुलना
| कहानी | लेखक | मुख्य समस्या |
|---|---|---|
| जिंदगी और गुलाब के फूल | उषा प्रियंवदा | बेरोज़गारी, अजनबीपन |
| बूढ़ी काकी | प्रेमचंद | वृद्धों की उपेक्षा |
| जिन्दगी और जोंक | अमरकांत | निम्नवर्ग का शोषण, जिजीविषा |
| संघर्ष | सुशीला टाकभौरे | दलित चेतना, सामाजिक संघर्ष |
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'बूढ़ी काकी' कहानी की कथावस्तु लिखते हुए उसमें चित्रित वृद्धों की समस्या पर प्रकाश डालिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'जिंदगी और गुलाब के फूल' कहानी के आधार पर सुबोध का चरित्र-चित्रण कीजिए तथा कहानी के मूल उद्देश्य को स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) 'जिन्दगी और जोंक' कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: बूढ़ी काकी कहानी की लाडली।
- (लघूत्तरी प्रश्न) सुशीला टाकभौरे का साहित्यिक परिचय दीजिए।