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नाट्य विधा: भाषा और शिल्प (Dramatic Genre: Language and Craft) BAHIN Major T-9-105

RTMNU BA Semester 5 · Hindi Language (हिन्दी भाषा) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Language (हिन्दी भाषा)
SemesterSemester V
Paper codeBAHIN-MAJOR-T9-105
Paper titleनाट्य विधा: भाषा और शिल्प (Dramatic Genre: Language and Craft)
CategoryMajor Mandatory T-9
Credits04
MarksTheory 80 + CIE 20 = 100 (Passing 40)
पाठ्यपुस्तकध्रुवस्वामिनी - जयशंकर प्रसाद; अंधायुग - धर्मवीर भारती; कोर्ट मार्शल - स्वदेश दीपक
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2026-27 (Semester V–VI)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं; नोट्स और प्रश्न PadhaiNotes द्वारा सरल हिन्दी में लिखे गए हैं। RTMNU BA Hindi – All papers

Units

  1. 1इकाई I: नाट्य विधा का परिचयNotes
  2. 2इकाई II: ध्रुवस्वामिनी - नाटक - जयशंकर प्रसादNotes
  3. 3इकाई III: अंधायुग - नाटक - धर्मवीर भारतीNotes
  4. 4इकाई IV: कोर्ट मार्शल - नाटक - स्वदेश दीपकNotes

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN Major T-9-105 · इकाई I

इकाई I: नाट्य विधा का परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • नाट्य विधा का अर्थ, स्वरूप, परिभाषा, तत्व तथा प्रकार

1. नाट्य विधा का अर्थ

नाटक शब्द संस्कृत की ‘नट्’ धातु से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है अभिनय करना या नाचना। ‘नट’ अर्थात अभिनेता जो प्रस्तुत करता है, वही नाटक है। संस्कृत आचार्यों ने काव्य के दो भेद बताए हैं: श्रव्य काव्य, जिसे सुना या पढ़ा जाता है, और दृश्य काव्य, जिसे देखा जाता है। नाटक दृश्य काव्य है।

संस्कृत में नाटक के लिए रूपक शब्द का भी प्रयोग होता है। इसका कारण यह है कि अभिनेता पर किसी दूसरे व्यक्ति, जैसे राम या दुष्यंत, के रूप का आरोप किया जाता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाट्य को ‘पंचम वेद’ कहा गया है, जो सभी वर्णों के लिए सुलभ है। संस्कृत में प्रचलित उक्ति ‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’ नाटक की श्रेष्ठता बताती है।

  • सरल अर्थ: वह साहित्यिक रचना जिसमें कथा को पात्रों के संवाद और अभिनय द्वारा रंगमंच पर दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाए।
  • अंग्रेज़ी में इसे ड्रामा (Drama) कहते हैं। यह यूनानी शब्द से आया है, जिसका अर्थ है ‘करना’ या ‘क्रिया’।

2. नाट्य विधा का स्वरूप

नाटक साहित्य की सबसे सामूहिक और जीवंत विधा है। इसका स्वरूप इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • दृश्य और श्रव्य दोनों: नाटक पढ़ा भी जाता है और मंच पर देखा-सुना भी जाता है।
  • अभिनेयता: नाटक की सबसे बड़ी कसौटी है कि वह मंच पर खेला जा सके।
  • सामूहिक कला: इसमें लेखक, निर्देशक, अभिनेता, संगीत, प्रकाश, वेशभूषा और दर्शक सभी का योगदान होता है।
  • संवाद पर आधारित: नाटक में लेखक स्वयं कुछ नहीं कहता। कथा पात्रों के संवाद से आगे बढ़ती है।
  • अनुकरण: यह मानव-जीवन की अवस्थाओं और कार्यों का अनुकरण है।
  • समय-सीमा: नाटक को सीमित समय और स्थान में प्रस्तुत करना होता है, इसलिए उसमें कसाव आवश्यक है।
  • रस और लोकरंजन: भारतीय दृष्टि से इसका लक्ष्य रस की अनुभूति कराना और साथ ही लोकशिक्षा देना है।

3. नाट्य विधा की परिभाषा

भारतीय आचार्य

  • भरतमुनि (नाट्यशास्त्र): नाट्य लोक-चरित्र, अर्थात संसार के व्यवहार, का अनुकरण है। इसमें अनेक भावों और अवस्थाओं का समावेश होता है।
  • धनंजय (दशरूपक): ‘अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्’, अर्थात किसी अवस्था का अनुकरण ही नाट्य है।

पाश्चात्य विद्वान

  • अरस्तू (Aristotle), ‘काव्यशास्त्र’ (Poetics): त्रासदी किसी गंभीर और पूर्ण कार्य का अनुकरण है, जो कथन से नहीं बल्कि अभिनय से प्रस्तुत होता है।

निष्कर्ष रूप परिभाषा: नाटक वह दृश्य काव्य है जिसमें जीवन की किसी घटना या अवस्था को पात्रों के संवाद और अभिनय के माध्यम से रंगमंच पर इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि दर्शकों को रस और विचार दोनों प्राप्त हों।

4. नाटक के तत्व

(क) भारतीय दृष्टि: तीन तत्व

दशरूपक के अनुसार नाटक के तीन मुख्य तत्व हैं: वस्तु, नेता और रस।

  • वस्तु (कथानक): इसके दो प्रकार हैं, आधिकारिक (मुख्य कथा) और प्रासंगिक (सहायक कथा)। प्रासंगिक कथा के दो भेद हैं: पताका और प्रकरी। स्रोत के आधार पर कथा प्रख्यात, उत्पाद्य या मिश्र होती है।
  • कार्य की पाँच अवस्थाएँ: आरंभ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति, फलागम।
  • पाँच अर्थप्रकृतियाँ: बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी, कार्य।
  • पाँच संधियाँ: मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण।
  • नेता (नायक): नायक के चार भेद हैं: धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशांत, धीरोद्धत।
  • रस: नाटक का अंतिम लक्ष्य रस है। प्रायः शृंगार या वीर रस अंगी (प्रधान) रस होता है।

(ख) पाश्चात्य और आधुनिक दृष्टि

अरस्तू ने त्रासदी के छह तत्व बताए: कथानक, चरित्र, विचार, पद-रचना (भाषा), गीत और दृश्य-विधान। आधुनिक हिंदी आलोचना में नाटक के प्रायः ये तत्व माने जाते हैं:

  1. कथावस्तु: यह सुसंगठित, रोचक और संघर्षपूर्ण हो।
  2. पात्र और चरित्र-चित्रण: पात्र स्वाभाविक हों और उनका विकास क्रमिक हो।
  3. संवाद (कथोपकथन): संवाद संक्षिप्त, पात्रानुकूल और गतिशील हों। स्वगत कथन भी इसी में आता है।
  4. देशकाल और वातावरण: युग, स्थान और परिस्थितियों का सही चित्रण हो।
  5. भाषा-शैली: भाषा सरल हो, पात्र के अनुरूप हो और अभिनय योग्य हो।
  6. उद्देश्य: नाटक के माध्यम से कोई संदेश या जीवन-दृष्टि दी जाए।
  7. अभिनेयता और रंगमंचीयता: मंच-सज्जा, प्रकाश, संगीत और रंग-निर्देश इसमें शामिल हैं।
आधारभारतीय नाट्य दृष्टिपाश्चात्य नाट्य दृष्टि
प्रमुख ग्रंथनाट्यशास्त्र, दशरूपकअरस्तू का काव्यशास्त्र
लक्ष्यरस-निष्पत्तिविरेचन (Catharsis)
अंतप्रायः सुखांतत्रासदी (दुखांत) को महत्त्व
केंद्ररस और नायककार्य और संघर्ष

5. नाटक के प्रकार

(क) संस्कृत परंपरा

  • रूपक के दस भेद: नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अंक, वीथी, प्रहसन।
  • उपरूपक: इसके अठारह भेद बताए गए हैं। नाटिका और सट्टक इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

(ख) आधुनिक वर्गीकरण

  • विषय के आधार पर: ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, राजनीतिक, समस्या-प्रधान, मनोवैज्ञानिक।
  • अंत के आधार पर: सुखांत (कॉमेडी), दुखांत (ट्रेजेडी), प्रसादांत।
  • रूप और शिल्प के आधार पर: पूर्णांकी नाटक, एकांकी, गीतिनाट्य या काव्य नाटक, प्रहसन, रेडियो (ध्वनि) नाटक, नुक्कड़ नाटक।
  • लोक नाट्य: रामलीला, रासलीला, नौटंकी, तमाशा (महाराष्ट्र), यक्षगान आदि।
पाठ्यक्रम से जोड़ें: ध्रुवस्वामिनी (जयशंकर प्रसाद) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित समस्या-प्रधान नाटक है। अंधायुग (धर्मवीर भारती) महाभारत पर आधारित गीतिनाट्य या काव्य नाटक है। कोर्ट मार्शल (स्वदेश दीपक) आधुनिक सामाजिक-यथार्थवादी नाटक है। उत्तर में इन उदाहरणों का प्रयोग करने से अधिक अंक मिलते हैं।

परीक्षा टिप: लंबे उत्तर में ये बातें अवश्य लिखें: अर्थ, भरत और धनंजय की परिभाषा, भारतीय तथा पाश्चात्य तत्व, तुलना-तालिका और निष्कर्ष। आधुनिक हिंदी नाटक की चर्चा में भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी नाटक का प्रवर्तक माना जाता है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाटक का अर्थ और स्वरूप स्पष्ट करते हुए भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर उसकी विशेषताएँ लिखिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाटक के प्रमुख तत्वों का सविस्तार विवेचन कीजिए तथा नाटक के विविध प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: दृश्य काव्य के रूप में नाटक।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) कार्य की पाँच अवस्थाएँ और पाँच संधियाँ संक्षेप में समझाइए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: रूपक के दस भेद।

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN Major T-9-105 · इकाई II

इकाई II: ध्रुवस्वामिनी - नाटक - जयशंकर प्रसाद

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • ध्रुवस्वामिनी - नाटक - जयशंकर प्रसाद

1. लेखक परिचय: जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद (1889–1937) का जन्म वाराणसी (काशी) में हुआ। वे छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। वे कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार और निबंधकार थे।

  • प्रमुख नाटक: अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, राज्यश्री, जनमेजय का नागयज्ञ।
  • काव्य: कामायनी (महाकाव्य), आँसू, लहर, झरना।
  • उपन्यास: कंकाल, तितली।
  • प्रसाद को हिंदी के ऐतिहासिक नाटकों का श्रेष्ठ रचनाकार माना जाता है। उनके नाटकों में भारतीय इतिहास (विशेषकर गुप्त काल), राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गौरव मिलता है।

2. ध्रुवस्वामिनी: सामान्य परिचय

  • रचना काल: लगभग 1933 ई.
  • अंक: तीन अंक – प्रसाद का सबसे छोटा और सबसे अधिक मंचनीय नाटक।
  • ऐतिहासिक आधार: गुप्त काल की कथा; रामगुप्त, ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त (द्वितीय) का प्रसंग। इस कथा का संकेत विशाखदत्त के संस्कृत नाटक देवीचंद्रगुप्तम् के अंशों तथा कुछ अन्य प्राचीन स्रोतों में मिलता है।
  • विधा: ऐतिहासिक होते हुए भी यह समस्या नाटक (Problem Play) है, क्योंकि इसमें स्त्री के अधिकार, विवाह-मोक्ष और पुनर्विवाह की समस्या उठाई गई है।

3. कथानक (कथासार)

प्रथम अंक

गुप्त सम्राट रामगुप्त कायर, विलासी और अयोग्य है। उसने छल से राज्य पाया और ध्रुवस्वामिनी से विवाह किया, जबकि ध्रुवस्वामिनी का मन चंद्रगुप्त की ओर था। शक राजा शकराज गुप्त शिविर को घेर लेता है और संधि की शर्त में ध्रुवस्वामिनी को माँगता है। रामगुप्त अपनी रक्षा के लिए पत्नी को सौंपने को तैयार हो जाता है। ध्रुवस्वामिनी इसका तीव्र विरोध करती है। अंत में चंद्रगुप्त स्वयं स्त्री-वेश में ध्रुवस्वामिनी के साथ शक शिविर जाने का निश्चय करता है।

द्वितीय अंक

शक दुर्ग में शकराज और कोमा का प्रसंग है। कोमा शकराज से प्रेम करती है और उसे अनुचित कार्य से रोकती है; आचार्य मिहिरदेव भी चेतावनी देते हैं। चंद्रगुप्त शकराज का वध कर देता है और शक दुर्ग पर गुप्तों का अधिकार हो जाता है।

तृतीय अंक

कोमा शकराज का शव लेने आती है, पर रामगुप्त की क्रूरता के कारण कोमा और मिहिरदेव मारे जाते हैं। परिषद में पुरोहित शास्त्र के आधार पर निर्णय देता है कि रामगुप्त जैसे क्लीब और कायर पति से ध्रुवस्वामिनी का विवाह-बंधन मान्य नहीं है; उसे मोक्ष (विवाह-विच्छेद) और पुनर्विवाह का अधिकार है। रामगुप्त का अंत होता है और चंद्रगुप्त राजा बनता है।

4. प्रमुख समस्याएँ एवं उद्देश्य

  • नारी-मुक्ति: स्त्री कोई वस्तु नहीं जिसे दान या उपहार में दिया जाए।
  • विवाह-मोक्ष एवं पुनर्विवाह: अनमेल और अन्यायपूर्ण विवाह से मुक्ति का शास्त्रीय समर्थन।
  • योग्य शासक की आवश्यकता: कायर राजा के स्थान पर वीर और योग्य नेतृत्व।
  • राष्ट्रीय गौरव: विदेशी आक्रमणकारी (शक) के सामने आत्मसम्मान की रक्षा।
  • धर्म की नई व्याख्या: पुरोहित के माध्यम से रूढ़ि के स्थान पर विवेकपूर्ण धर्म।

5. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

पात्रप्रमुख विशेषताएँ
ध्रुवस्वामिनीनायिका; स्वाभिमानी, साहसी, विद्रोही, अपने अधिकार के प्रति सजग; आरंभ में असहाय, अंत में दृढ़ नारी।
चंद्रगुप्तनायक; वीर, त्यागी, मर्यादाशील, कर्तव्यनिष्ठ; नारी-सम्मान का रक्षक।
रामगुप्तखलनायक-सा; कायर, विलासी, संशयी, स्वार्थी और अयोग्य शासक।
शकराजशक राजा; अहंकारी, कामुक, बलशाली परंतु अविवेकी।
कोमाकोमल, प्रेममयी, भावुक; त्याग और सच्चे प्रेम का प्रतीक।
शिखरस्वामीरामगुप्त का मंत्री (अमात्य); कूटनीतिज्ञ, अवसरवादी।
मिहिरदेव / पुरोहितविवेक और धर्म के प्रतिनिधि; पुरोहित न्यायपूर्ण निर्णय देता है।

6. भाषा और शिल्प

  • भाषा: तत्सम-प्रधान, संस्कृतनिष्ठ, काव्यात्मक खड़ी बोली; छायावादी कोमलता।
  • संवाद: पिछले नाटकों की तुलना में छोटे, सजीव और प्रभावशाली; कहीं-कहीं दार्शनिक और भावुक।
  • गीत-योजना: बीच-बीच में गीत, जो वातावरण और भाव को गहरा करते हैं।
  • संकलन-त्रय: स्थान, समय और कार्य की एकता का अपेक्षाकृत अच्छा निर्वाह।
  • मंचीयता (रंगमंचीयता): तीन अंक, सीमित दृश्य और पात्र – इसलिए प्रसाद के नाटकों में यह सबसे सफल मंचीय नाटक माना जाता है।
  • शैली: भारतीय और पाश्चात्य नाट्य-परंपरा का समन्वय; संघर्ष और द्वंद्व का सुंदर चित्रण।
परीक्षा-स्मरण: ध्रुवस्वामिनी = ऐतिहासिक कथानक + आधुनिक समस्या (नारी-अधिकार, विवाह-मोक्ष)। तीन अंक, गुप्त काल, नायिका ध्रुवस्वामिनी, नायक चंद्रगुप्त।

7. आलोचनात्मक मूल्यांकन

  • गुण: सशक्त नारी-पात्र, स्पष्ट उद्देश्य, कसा हुआ कथानक, अभिनेयता।
  • सीमाएँ: भाषा कहीं-कहीं कठिन, संस्कृतनिष्ठ; कुछ संवाद लंबे और दार्शनिक।
  • महत्त्व: 1930 के दशक में स्त्री के विवाह-विच्छेद का प्रश्न उठाना साहसिक और प्रगतिशील कदम था।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) ध्रुवस्वामिनी नाटक की कथावस्तु का सार लिखते हुए इसे समस्या नाटक के रूप में सिद्ध कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) ध्रुवस्वामिनी नाटक की भाषा, संवाद-योजना और रंगमंचीयता (मंचीयता) पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) ध्रुवस्वामिनी का चरित्र-चित्रण कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) रामगुप्त के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: ध्रुवस्वामिनी में नारी-मुक्ति का प्रश्न।

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN Major T-9-105 · इकाई III

इकाई III: अंधायुग - नाटक - धर्मवीर भारती

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • अंधायुग - नाटक - धर्मवीर भारती
नोट: इस इकाई के उप-विषय पाठ्यक्रम में अलग से छपे नहीं हैं। इसलिए यहाँ परीक्षा की दृष्टि से नाटक के सभी मुख्य पक्ष क्रम से दिए गए हैं: लेखक परिचय, रचना की पृष्ठभूमि, कथासार, उद्देश्य, पात्र, शिल्प और भाषा।

1. धर्मवीर भारती : लेखक परिचय

  • जन्म-मृत्यु: 1926 ई. में इलाहाबाद (प्रयागराज) में जन्म और 1997 ई. में निधन।
  • कार्यक्षेत्र: कवि, उपन्यासकार, नाटककार और पत्रकार। वे लंबे समय तक प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के संपादक रहे।
  • प्रमुख रचनाएँ: गुनाहों का देवता और सूरज का सातवाँ घोड़ा (उपन्यास); ठंडा लोहा, सात गीत वर्ष और कनुप्रिया (काव्य); अंधायुग (गीतिनाट्य)।
  • सम्मान: भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
  • साहित्यिक पहचान: वे ‘नई कविता’ आंदोलन के प्रमुख रचनाकार माने जाते हैं। उनके लेखन में मानवीय मूल्य, प्रेम, आस्था और आधुनिक मनुष्य का संकट प्रमुख विषय हैं।

2. अंधायुग : रचना की पृष्ठभूमि और विधा

  • रचना-काल: 1950 के दशक के मध्य में यह नाटक लिखा और प्रकाशित हुआ। पहले इसे रेडियो पर प्रस्तुत किया गया। बाद में यह अनेक बार मंच पर खेला गया।
  • विधा: यह गीतिनाट्य / काव्य-नाटक (Poetic Drama) है। पूरा नाटक मुक्त छंद में लिखा गया है।
  • आधार: इसकी कथा महाभारत से ली गई है। इसमें युद्ध के अठारहवें दिन की संध्या से लेकर कृष्ण की मृत्यु तक की घटनाएँ हैं।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: यह नाटक द्वितीय विश्वयुद्ध, हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम और भारत-विभाजन की हिंसा की पृष्ठभूमि में लिखा गया। महाभारत के बहाने लेखक ने आधुनिक युद्ध और मूल्यहीनता पर प्रश्न उठाए हैं।

3. संरचना (Structure)

भागशीर्षक / मुख्य विषय
स्थापनायुद्ध के बाद ‘अंधे युग’ के आगमन की सूचना
पहला अंककौरव नगरी
दूसरा अंकपशु का उदय
तीसरा अंकअश्वत्थामा का अर्धसत्य
अंतरालपंख, पहिये और पट्टियाँ
चौथा अंकगांधारी का शाप
पाँचवाँ अंकविजय : एक क्रमिक आत्महत्या
समापनप्रभु की मृत्यु

4. कथासार (अपने शब्दों में)

  1. युद्ध लगभग समाप्त है। कौरव पक्ष हार चुका है। अंधे धृतराष्ट्र और गांधारी संजय के माध्यम से विनाश के समाचार सुनते हैं। दो प्रहरी उजड़ी नगरी का पहरा दे रहे हैं।
  2. दुर्योधन के पराजित होने पर अश्वत्थामा प्रतिशोध की आग में जलकर ‘पशु’ बन जाता है। वह एक वृद्ध याचक की हत्या करता है। फिर कृपाचार्य और कृतवर्मा के साथ रात में सोते हुए पांडव-पक्ष के योद्धाओं का संहार करता है।
  3. अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र चलाता है और उसे उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ देता है। कृष्ण उसे युगों तक घावों के साथ भटकने का शाप देते हैं।
  4. पुत्रों के शोक में डूबी गांधारी कृष्ण को शाप देती हैं। कृष्ण उस शाप को शांत भाव से स्वीकार कर लेते हैं।
  5. पांडवों की विजय खोखली सिद्ध होती है। युधिष्ठिर को राज्य मिलकर भी शांति नहीं मिलती। अपनों से अपमानित युयुत्सु आत्महत्या कर लेता है। धृतराष्ट्र और गांधारी वन की आग में जलकर मर जाते हैं।
  6. अंत में एक व्याध (जरा) के बाण से कृष्ण की मृत्यु होती है। समापन यह संकेत देता है कि मानव-भविष्य की जिम्मेदारी अब मनुष्य को स्वयं उठानी होगी।

5. प्रमुख उद्देश्य और विचार (Themes)

  • युद्ध-विरोध: युद्ध में कोई सच्चा विजेता नहीं होता। ‘ब्रह्मास्त्र’ परमाणु अस्त्र का प्रतीक है।
  • मूल्यों का विघटन: दोनों पक्षों ने मर्यादा तोड़ी। यही नैतिक अंधापन ‘अंधा युग’ है।
  • आस्था बनाम अनास्था: एक ओर अश्वत्थामा और युयुत्सु की निराशा है, दूसरी ओर कृष्ण का दायित्व-बोध।
  • अस्तित्ववादी चिंतन (Existentialism): इसमें मनुष्य की स्वतंत्रता, चुनाव का अधिकार और उत्तरदायित्व का प्रश्न उठाया गया है।
  • सत्ता और साधारण जन: प्रहरियों के माध्यम से दिखाया गया है कि आम आदमी का जीवन व्यर्थ में बीत जाता है।

6. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

  • अश्वत्थामा: नाटक का सबसे सशक्त पात्र। वह घृणा, प्रतिशोध और कुंठा से भरा है। वह आधुनिक हिंसक, विवेकहीन मनुष्य का प्रतीक है।
  • गांधारी: आँखों पर पट्टी बाँधे एक कटु और शोकाकुल माँ। वह मर्यादा और ईश्वर पर अविश्वास व्यक्त करती है।
  • धृतराष्ट्र: शारीरिक और मानसिक, दोनों रूपों में अंधे। पुत्र-मोह ही उनके विनाश का कारण बनता है।
  • कृष्ण: वे प्रत्यक्ष कम आते हैं, पर पूरे नाटक में व्याप्त हैं। वे करुणा और उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं। गांधारी का शाप स्वीकार करना उनका बड़प्पन है।
  • युयुत्सु: सत्य का पक्ष लेने वाला कौरव, जिसे दोनों पक्ष ठुकरा देते हैं। उसके माध्यम से ईमानदार व्यक्ति की त्रासदी दिखाई गई है।
  • विदुर और संजय: विवेक और तटस्थ दृष्टि के प्रतीक। संजय की विवशता यह है कि वह सब देखता है, पर कुछ कर नहीं सकता।
  • दो प्रहरी: साधारण जनता के प्रतिनिधि। वे यूनानी नाटकों के ‘कोरस’ जैसी भूमिका निभाते हैं।
  • वृद्ध याचक: भविष्यवाणी करने वाला, जिसकी हत्या अश्वत्थामा करता है। बाद में वह प्रेत-रूप में आता है।

7. शिल्प और भाषा

  • मुक्त छंद: संवाद काव्यात्मक हैं, फिर भी नाटकीय गति बनी रहती है।
  • कथा-गायन: अंकों के बीच कथा-गायन से कथा का क्रम जोड़ा जाता है। यह लोक-नाट्य और सूत्रधार परंपरा जैसा है।
  • प्रतीक और बिंब: अंधापन, पट्टी, ब्रह्मास्त्र, घाव और पशु जैसे प्रतीकों का गहरा प्रयोग है।
  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली, पर सरल और प्रभावशाली। प्रहरियों की भाषा बोलचाल के करीब है।
  • मंचीयता: कम दृश्य-सज्जा में भी इसे खेला जा सकता है। इब्राहीम अल्काज़ी जैसे निर्देशकों ने इसे प्रसिद्धि दिलाई।
  • शैली: पौराणिक कथा की आधुनिक व्याख्या। पूरे नाटक में त्रासदी (Tragedy) का भाव है।

8. शीर्षक की सार्थकता

‘अंधायुग’ केवल धृतराष्ट्र के अंधेपन का नाम नहीं है। यह उस पूरे युग का नाम है जिसमें विवेक, मर्यादा और करुणा खो गए हैं। लेखक का संकेत है कि आधुनिक युग भी वैसा ही अंधा है। इसलिए शीर्षक पूरी तरह सार्थक और प्रतीकात्मक है।

परीक्षा टिप: उत्तर में हमेशा तीन बातें जोड़ें: (1) महाभारत और आधुनिक युद्ध की तुलना, (2) अश्वत्थामा और कृष्ण का विरोधी प्रतीकार्थ, (3) गीतिनाट्य की विशेषताएँ।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) ‘अंधायुग’ की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए और उसकी आधुनिक प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) गीतिनाट्य के रूप में ‘अंधायुग’ के शिल्प और भाषा-शैली की विवेचना कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) अश्वत्थामा का चरित्र-चित्रण कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) ‘अंधायुग’ शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) ‘अंधायुग’ में प्रहरियों की भूमिका पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN Major T-9-105 · इकाई IV

इकाई IV: कोर्ट मार्शल - नाटक - स्वदेश दीपक

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • कोर्ट मार्शल - नाटक - स्वदेश दीपक
नोट: इस इकाई के उप-विषय पाठ्यक्रम में अलग से छपे नहीं हैं। इसलिए यहाँ परीक्षा की दृष्टि से नाटक के सभी मुख्य पक्ष दिए गए हैं: लेखक परिचय, कथासार, पात्र, समस्याएँ, शिल्प, भाषा और शीर्षक।

1. नाटककार स्वदेश दीपक का परिचय

  • स्वदेश दीपक हिंदी के प्रसिद्ध नाटककार और कथाकार हैं। उनका जन्म 1942 में रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में माना जाता है।
  • वे लंबे समय तक अंबाला (हरियाणा) में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे।
  • प्रमुख नाटक: कोर्ट मार्शल, बाल भगवान, काल कोठरी आदि।
  • संस्मरण: 'मैंने मांडू नहीं देखा'। इसमें उन्होंने अपने मानसिक संघर्ष का मार्मिक चित्रण किया है।
  • उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। सन् 2006 में वे घर से निकले और फिर कभी लौटे नहीं।
  • साहित्य की विशेषता: उनके साहित्य में सामाजिक अन्याय, सत्ता का दमन, मनुष्य की पीड़ा और तीखा यथार्थ मिलता है।

2. नाटक का परिचय एवं कथासार

'कोर्ट मार्शल' 1990 के दशक के आरंभ में लिखा गया। यह हिंदी के सबसे अधिक मंचित आधुनिक नाटकों में गिना जाता है। पूरा नाटक सेना की एक अदालत (कोर्ट मार्शल) की कार्यवाही के रूप में चलता है।

  • घटना: सेना का एक सिपाही रामचंदर अपने दो अधिकारियों पर गोली चलाता है। इसमें एक अधिकारी की मृत्यु हो जाती है और कैप्टन बी.डी. कपूर घायल हो जाते हैं।
  • मुकदमा: सेना के नियमों के अनुसार रामचंदर पर हत्या का मुकदमा चलता है। अदालत के अध्यक्ष कर्नल सूरत सिंह हैं। बचाव पक्ष के वकील कैप्टन बिकास राय हैं।
  • सामान्य दृष्टि: पहली नज़र में मामला सीधा लगता है। अपराधी ने अपराध स्वीकार कर लिया है और गवाह मौजूद हैं।
  • सच की परतें: बचाव पक्ष की जिरह से धीरे-धीरे पता चलता है कि रामचंदर को उसकी जाति के कारण लगातार अपमानित किया जाता था। उसके परिवार के लिए भी गालियाँ दी जाती थीं।
  • केंद्रीय प्रश्न: सुनवाई के अंत तक यह स्पष्ट हो जाता है कि असली अपराध केवल गोली चलाना नहीं है। उस मानसिकता का भी अपराध है जिसने एक अनुशासित सिपाही को इस हद तक पहुँचाया। नाटक यही प्रश्न उठाता है कि सच्चा न्याय क्या है।

3. प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

पात्रभूमिकामुख्य विशेषताएँ
सिपाही रामचंदरअभियुक्तदलित वर्ग से, सीधा-सादा और कर्तव्यनिष्ठ। लंबे समय तक अपमान सहने वाला। शोषित वर्ग के आक्रोश का प्रतीक।
कर्नल सूरत सिंहअदालत के अध्यक्षअनुभवी, संवेदनशील और न्यायप्रिय। नियम और मानवता के बीच संतुलन खोजने वाले।
कैप्टन बिकास रायबचाव पक्ष के वकीलतर्कशील, निडर और सत्य के खोजी। इन्हीं की जिरह से छिपा सच सामने आता है।
कैप्टन बी.डी. कपूरघायल अधिकारी, मुख्य गवाहअहंकारी और जातिगत श्रेष्ठता की भावना से ग्रस्त। सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक।

4. नाटक की मूल समस्याएँ / संवेदना

  • जातिवाद: आधुनिक और अनुशासित संस्था में भी जाति-भेद गहराई तक मौजूद है।
  • न्याय बनाम कानून: कानून केवल घटना देखता है, जबकि न्याय उसके कारणों को भी देखता है।
  • सत्ता और शोषण: ऊँचे पद का अहंकार निचले वर्ग का मानसिक शोषण करता है।
  • मानवीय गरिमा: मनुष्य का आत्मसम्मान किसी भी अनुशासन से बड़ा है।
  • व्यवस्था पर प्रश्न: नाटक अप्रत्यक्ष रूप से पूरे समाज की व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है।

5. नाट्य शिल्प (Dramatic Craft)

  • एक ही दृश्य-स्थल: पूरा नाटक अदालत के कमरे में घटित होता है। इससे स्थान की एकता बनी रहती है।
  • अदालती (Courtroom) शैली: गवाही, जिरह और बहस के द्वारा कथा आगे बढ़ती है। यह शैली रहस्य और जिज्ञासा बनाए रखती है।
  • क्रमिक उद्घाटन: सच परत-दर-परत खुलता है। इससे नाटक में तनाव लगातार बढ़ता जाता है।
  • द्वंद्व (Conflict): नाटक में दो स्तर पर द्वंद्व है। बाहरी द्वंद्व अभियोजन और बचाव पक्ष के बीच है। आंतरिक द्वंद्व नियम और विवेक के बीच है।
  • यथार्थवाद: वेशभूषा, सैनिक अनुशासन और अदालती प्रक्रिया का सजीव चित्रण किया गया है।
  • सरल मंच-सज्जा: कम साधनों में मंचन संभव है। यही कारण है कि यह नाटक अनेक नाट्य-मंडलियों द्वारा बार-बार खेला गया।

6. भाषा-शैली एवं संवाद

  • भाषा सरल, बोलचाल की हिंदी है। इसमें आवश्यकतानुसार सेना और कानून के अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे कोर्ट, ऑर्डर, सर।
  • संवाद छोटे, चुस्त, तीखे और नाटकीय हैं। जिरह के संवाद विशेष रूप से प्रभावशाली हैं।
  • पात्रों के अनुसार भाषा बदलती है। अधिकारियों की भाषा औपचारिक है, जबकि रामचंदर की भाषा सहज और भावुक है।
  • व्यंग्य, करुणा और आक्रोश, तीनों का सुंदर मेल मिलता है।
  • कहीं-कहीं गालियों और अपमानजनक शब्दों का यथार्थ प्रयोग है। यह शोषण की कठोरता दिखाने के लिए किया गया है।

7. शीर्षक की सार्थकता एवं उद्देश्य

  • 'कोर्ट मार्शल' का अर्थ है सेना की अदालत। पूरा नाटक इसी अदालत में घटित होता है, इसलिए शीर्षक घटना के आधार पर सार्थक है।
  • प्रतीकात्मक अर्थ: यहाँ केवल रामचंदर पर मुकदमा नहीं चलता। समाज की जातिवादी मानसिकता का भी 'कोर्ट मार्शल' होता है।
  • उद्देश्य: जाति-भेद का विरोध, मानवीय गरिमा की स्थापना और कानून से ऊपर सच्चे न्याय की माँग।
स्मरणीय बिंदु: नाटक: कोर्ट मार्शल | लेखक: स्वदेश दीपक | रचनाकाल: 1990 के दशक का आरंभ | स्थल: सैनिक अदालत | अभियुक्त: सिपाही रामचंदर | अध्यक्ष: कर्नल सूरत सिंह | बचाव पक्ष के वकील: कैप्टन बिकास राय | मूल समस्या: जातिवाद और न्याय।

सुझाव: मूल पाठ अवश्य पढ़ें। उत्तर में पात्रों के कथनों के भाव अपने शब्दों में लिखें। लंबे उद्धरण रटने की आवश्यकता नहीं है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'कोर्ट मार्शल' नाटक की कथावस्तु लिखिए तथा इसमें उठाई गई जातिवाद की समस्या पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाट्य शिल्प और भाषा-शैली की दृष्टि से 'कोर्ट मार्शल' नाटक की समीक्षा कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) सिपाही रामचंदर का चरित्र-चित्रण कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) कैप्टन बिकास राय अथवा कर्नल सूरत सिंह की भूमिका पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) 'कोर्ट मार्शल' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।