पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- नाट्य विधा का अर्थ, स्वरूप, परिभाषा, तत्व तथा प्रकार
1. नाट्य विधा का अर्थ
नाटक शब्द संस्कृत की ‘नट्’ धातु से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है अभिनय करना या नाचना। ‘नट’ अर्थात अभिनेता जो प्रस्तुत करता है, वही नाटक है। संस्कृत आचार्यों ने काव्य के दो भेद बताए हैं: श्रव्य काव्य, जिसे सुना या पढ़ा जाता है, और दृश्य काव्य, जिसे देखा जाता है। नाटक दृश्य काव्य है।
संस्कृत में नाटक के लिए रूपक शब्द का भी प्रयोग होता है। इसका कारण यह है कि अभिनेता पर किसी दूसरे व्यक्ति, जैसे राम या दुष्यंत, के रूप का आरोप किया जाता है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाट्य को ‘पंचम वेद’ कहा गया है, जो सभी वर्णों के लिए सुलभ है। संस्कृत में प्रचलित उक्ति ‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’ नाटक की श्रेष्ठता बताती है।
- सरल अर्थ: वह साहित्यिक रचना जिसमें कथा को पात्रों के संवाद और अभिनय द्वारा रंगमंच पर दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाए।
- अंग्रेज़ी में इसे ड्रामा (Drama) कहते हैं। यह यूनानी शब्द से आया है, जिसका अर्थ है ‘करना’ या ‘क्रिया’।
2. नाट्य विधा का स्वरूप
नाटक साहित्य की सबसे सामूहिक और जीवंत विधा है। इसका स्वरूप इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- दृश्य और श्रव्य दोनों: नाटक पढ़ा भी जाता है और मंच पर देखा-सुना भी जाता है।
- अभिनेयता: नाटक की सबसे बड़ी कसौटी है कि वह मंच पर खेला जा सके।
- सामूहिक कला: इसमें लेखक, निर्देशक, अभिनेता, संगीत, प्रकाश, वेशभूषा और दर्शक सभी का योगदान होता है।
- संवाद पर आधारित: नाटक में लेखक स्वयं कुछ नहीं कहता। कथा पात्रों के संवाद से आगे बढ़ती है।
- अनुकरण: यह मानव-जीवन की अवस्थाओं और कार्यों का अनुकरण है।
- समय-सीमा: नाटक को सीमित समय और स्थान में प्रस्तुत करना होता है, इसलिए उसमें कसाव आवश्यक है।
- रस और लोकरंजन: भारतीय दृष्टि से इसका लक्ष्य रस की अनुभूति कराना और साथ ही लोकशिक्षा देना है।
3. नाट्य विधा की परिभाषा
भारतीय आचार्य
- भरतमुनि (नाट्यशास्त्र): नाट्य लोक-चरित्र, अर्थात संसार के व्यवहार, का अनुकरण है। इसमें अनेक भावों और अवस्थाओं का समावेश होता है।
- धनंजय (दशरूपक): ‘अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्’, अर्थात किसी अवस्था का अनुकरण ही नाट्य है।
पाश्चात्य विद्वान
- अरस्तू (Aristotle), ‘काव्यशास्त्र’ (Poetics): त्रासदी किसी गंभीर और पूर्ण कार्य का अनुकरण है, जो कथन से नहीं बल्कि अभिनय से प्रस्तुत होता है।
निष्कर्ष रूप परिभाषा: नाटक वह दृश्य काव्य है जिसमें जीवन की किसी घटना या अवस्था को पात्रों के संवाद और अभिनय के माध्यम से रंगमंच पर इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि दर्शकों को रस और विचार दोनों प्राप्त हों।
4. नाटक के तत्व
(क) भारतीय दृष्टि: तीन तत्व
दशरूपक के अनुसार नाटक के तीन मुख्य तत्व हैं: वस्तु, नेता और रस।
- वस्तु (कथानक): इसके दो प्रकार हैं, आधिकारिक (मुख्य कथा) और प्रासंगिक (सहायक कथा)। प्रासंगिक कथा के दो भेद हैं: पताका और प्रकरी। स्रोत के आधार पर कथा प्रख्यात, उत्पाद्य या मिश्र होती है।
- कार्य की पाँच अवस्थाएँ: आरंभ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति, फलागम।
- पाँच अर्थप्रकृतियाँ: बीज, बिंदु, पताका, प्रकरी, कार्य।
- पाँच संधियाँ: मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण।
- नेता (नायक): नायक के चार भेद हैं: धीरोदात्त, धीरललित, धीरप्रशांत, धीरोद्धत।
- रस: नाटक का अंतिम लक्ष्य रस है। प्रायः शृंगार या वीर रस अंगी (प्रधान) रस होता है।
(ख) पाश्चात्य और आधुनिक दृष्टि
अरस्तू ने त्रासदी के छह तत्व बताए: कथानक, चरित्र, विचार, पद-रचना (भाषा), गीत और दृश्य-विधान। आधुनिक हिंदी आलोचना में नाटक के प्रायः ये तत्व माने जाते हैं:
- कथावस्तु: यह सुसंगठित, रोचक और संघर्षपूर्ण हो।
- पात्र और चरित्र-चित्रण: पात्र स्वाभाविक हों और उनका विकास क्रमिक हो।
- संवाद (कथोपकथन): संवाद संक्षिप्त, पात्रानुकूल और गतिशील हों। स्वगत कथन भी इसी में आता है।
- देशकाल और वातावरण: युग, स्थान और परिस्थितियों का सही चित्रण हो।
- भाषा-शैली: भाषा सरल हो, पात्र के अनुरूप हो और अभिनय योग्य हो।
- उद्देश्य: नाटक के माध्यम से कोई संदेश या जीवन-दृष्टि दी जाए।
- अभिनेयता और रंगमंचीयता: मंच-सज्जा, प्रकाश, संगीत और रंग-निर्देश इसमें शामिल हैं।
| आधार | भारतीय नाट्य दृष्टि | पाश्चात्य नाट्य दृष्टि |
|---|---|---|
| प्रमुख ग्रंथ | नाट्यशास्त्र, दशरूपक | अरस्तू का काव्यशास्त्र |
| लक्ष्य | रस-निष्पत्ति | विरेचन (Catharsis) |
| अंत | प्रायः सुखांत | त्रासदी (दुखांत) को महत्त्व |
| केंद्र | रस और नायक | कार्य और संघर्ष |
5. नाटक के प्रकार
(क) संस्कृत परंपरा
- रूपक के दस भेद: नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अंक, वीथी, प्रहसन।
- उपरूपक: इसके अठारह भेद बताए गए हैं। नाटिका और सट्टक इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
(ख) आधुनिक वर्गीकरण
- विषय के आधार पर: ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, राजनीतिक, समस्या-प्रधान, मनोवैज्ञानिक।
- अंत के आधार पर: सुखांत (कॉमेडी), दुखांत (ट्रेजेडी), प्रसादांत।
- रूप और शिल्प के आधार पर: पूर्णांकी नाटक, एकांकी, गीतिनाट्य या काव्य नाटक, प्रहसन, रेडियो (ध्वनि) नाटक, नुक्कड़ नाटक।
- लोक नाट्य: रामलीला, रासलीला, नौटंकी, तमाशा (महाराष्ट्र), यक्षगान आदि।
परीक्षा टिप: लंबे उत्तर में ये बातें अवश्य लिखें: अर्थ, भरत और धनंजय की परिभाषा, भारतीय तथा पाश्चात्य तत्व, तुलना-तालिका और निष्कर्ष। आधुनिक हिंदी नाटक की चर्चा में भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी नाटक का प्रवर्तक माना जाता है।
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाटक का अर्थ और स्वरूप स्पष्ट करते हुए भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर उसकी विशेषताएँ लिखिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाटक के प्रमुख तत्वों का सविस्तार विवेचन कीजिए तथा नाटक के विविध प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: दृश्य काव्य के रूप में नाटक।
- (लघूत्तरी प्रश्न) कार्य की पाँच अवस्थाएँ और पाँच संधियाँ संक्षेप में समझाइए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: रूपक के दस भेद।