पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- हिन्दी गद्य का स्वरूप, परंपरा एवं विकास
- कहानी का स्वरूप, परंपरा एवं विकास
- उपन्यास का स्वरूप एवं परंपरा
- निबंध का स्वरूप एवं प्रकार
1. हिन्दी गद्य का स्वरूप, परंपरा एवं विकास
गद्य का अर्थ एवं स्वरूप
गद्य वह भाषा-रूप है जो छंद, लय और तुक के बंधन से मुक्त होता है। इसमें विचार सीधे, क्रमबद्ध और तर्कपूर्ण ढंग से व्यक्त किए जाते हैं। संस्कृत में कहा गया है कि गद्य कवियों की कसौटी (निकष) है। आधुनिक युग को इसीलिए गद्य-युग कहा जाता है।
- विशेषताएँ: स्पष्टता, तर्कशीलता, व्याकरण-सम्मत वाक्य-रचना, विचार-प्रधानता, सामान्य जीवन से निकटता।
- प्रमुख विधाएँ: कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, एकांकी, जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रा-वृत्तांत, रिपोर्ताज।
परंपरा एवं विकास
- प्रारंभिक गद्य: राजस्थानी, मैथिली और ब्रजभाषा में गद्य के आरंभिक रूप मिलते हैं। ब्रजभाषा में वैष्णव ‘वार्ता’ साहित्य उल्लेखनीय है।
- खड़ी बोली गद्य का आरंभ: कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज (1800) के प्रभाव से खड़ी बोली गद्य को गति मिली। चार आरंभिक गद्यकार माने जाते हैं: मुंशी सदासुखलाल (सुखसागर), इंशा अल्ला खाँ (रानी केतकी की कहानी), लल्लूलाल (प्रेमसागर), सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान)।
- भाषा-विवाद काल: राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ ने उर्दू-मिश्रित तथा राजा लक्ष्मण सिंह ने संस्कृत-निष्ठ हिन्दी का समर्थन किया।
- भारतेन्दु युग: भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने गद्य को परिष्कृत और जनोन्मुख बनाया। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से निबंध, नाटक और उपन्यास का विकास हुआ। बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र इस युग के प्रमुख गद्यकार हैं।
- द्विवेदी युग: महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से भाषा का शुद्धीकरण, व्याकरणिक एकरूपता और मानकीकरण किया।
- शुक्ल युग / छायावाद युग: इस युग में आलोचना और निबंध (रामचन्द्र शुक्ल) तथा कथा-साहित्य (प्रेमचंद, प्रसाद) का उत्कर्ष हुआ।
- शुक्लोत्तर एवं स्वातंत्र्योत्तर युग: नई विधाओं का विस्तार हुआ और दलित, स्त्री तथा आदिवासी विमर्श सामने आए।
2. कहानी का स्वरूप, परंपरा एवं विकास
परिभाषा
कहानी गद्य की वह लघु कथात्मक विधा है जिसमें जीवन की किसी एक घटना, एक मनोभाव या एक पक्ष का एकाग्र और प्रभावपूर्ण चित्रण होता है। प्रेमचंद के अनुसार कहानी में लेखक का उद्देश्य जीवन के किसी एक अंग या मनोभाव को प्रकट करना होता है।
कहानी के तत्त्व
- कथावस्तु: संक्षिप्त, सुगठित और एक ही केंद्र पर टिकी हुई।
- पात्र एवं चरित्र-चित्रण: पात्र कम हों, पर सजीव हों।
- कथोपकथन (संवाद): छोटे, स्वाभाविक और कथा को आगे बढ़ाने वाले।
- देशकाल एवं वातावरण।
- भाषा-शैली।
- उद्देश्य: पाठक पर एक प्रभाव (प्रभावान्विति) छोड़ना।
विकास-क्रम
- आरंभिक कहानियाँ: ‘इन्दुमती’ (किशोरीलाल गोस्वामी), ‘ग्यारह वर्ष का समय’ (रामचन्द्र शुक्ल), ‘दुलाईवाली’ (बंग महिला)। हिन्दी की पहली कहानी कौन-सी है, इस पर विद्वानों में मतभेद है।
- प्रेमचंद युग: चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ (1915) एक कालजयी कहानी है। जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ भाव-प्रधान हैं। प्रेमचंद ने कहानी को आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से जोड़ा; ‘पंच परमेश्वर’ और ‘कफ़न’ उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
- प्रेमचंदोत्तर युग: जैनेन्द्र और अज्ञेय (मनोवैज्ञानिक कहानी), यशपाल (प्रगतिवादी कहानी)।
- नई कहानी (स्वतंत्रता के बाद): मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव। इसमें भोगा हुआ यथार्थ और शहरी मध्यवर्ग प्रमुख है। नामवर सिंह की पुस्तक ‘कहानी नई कहानी’ इसी विषय पर है।
- बाद के आंदोलन: सचेतन कहानी, अकहानी, समांतर कहानी, जनवादी कहानी तथा दलित और स्त्री कहानी।
3. उपन्यास का स्वरूप एवं परंपरा
परिभाषा एवं स्वरूप
उपन्यास (Novel) गद्य की विस्तृत कथात्मक विधा है, जिसमें जीवन का व्यापक और बहुआयामी चित्र प्रस्तुत किया जाता है। प्रेमचंद ने उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र माना है।
- तत्त्व: कथावस्तु (मुख्य एवं प्रासंगिक कथाएँ), पात्र, संवाद, देशकाल, भाषा-शैली और उद्देश्य।
- प्रकार: सामाजिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, आंचलिक, तिलिस्मी-ऐयारी, जासूसी।
परंपरा
- आरंभ: आचार्य शुक्ल ने लाला श्रीनिवासदास के ‘परीक्षा गुरु’ को अंग्रेज़ी ढंग का पहला मौलिक उपन्यास माना है। श्रद्धाराम फुल्लौरी के ‘भाग्यवती’ का भी उल्लेख होता है।
- तिलिस्मी-जासूसी उपन्यास: देवकीनंदन खत्री (‘चंद्रकांता’), गोपालराम गहमरी।
- प्रेमचंद युग: सेवासदन, रंगभूमि, गोदान (1936)। इनमें किसान-जीवन और सामाजिक यथार्थ का चित्रण है। प्रसाद ने ‘कंकाल’ और ‘तितली’ लिखे।
- प्रेमचंदोत्तर युग: जैनेन्द्र (‘त्यागपत्र’), अज्ञेय (‘शेखर: एक जीवनी’), भगवतीचरण वर्मा (‘चित्रलेखा’, जिसमें पाप-पुण्य की समस्या उठाई गई है), वृन्दावनलाल वर्मा (ऐतिहासिक उपन्यास), यशपाल (‘झूठा सच’)।
- स्वातंत्र्योत्तर युग: फणीश्वरनाथ रेणु (‘मैला आँचल’, आंचलिक उपन्यास), श्रीलाल शुक्ल (‘राग दरबारी’), भीष्म साहनी (‘तमस’)। समकालीन लेखकों में भगवान दास मोरवाल आदि उल्लेखनीय हैं।
| आधार | कहानी | उपन्यास |
|---|---|---|
| आकार | लघु | विस्तृत |
| जीवन-चित्रण | एक पक्ष या घटना | समग्र, बहुआयामी |
| पात्र | कम | अनेक |
| कथानक | एकरेखीय | मुख्य और प्रासंगिक कथाएँ |
| प्रभाव | एक प्रभाव (प्रभावान्विति) | व्यापक और समग्र प्रभाव |
4. निबंध का स्वरूप एवं प्रकार
परिभाषा एवं स्वरूप
निबंध (Essay) का अर्थ है अच्छी तरह बँधी हुई रचना। यह गद्य की वह विधा है जिसमें लेखक किसी विषय पर अपने विचार और भाव सीमित आकार में, क्रमबद्ध तथा व्यक्तिगत शैली में प्रकट करता है। आचार्य शुक्ल के अनुसार, यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है।
- विशेषताएँ: व्यक्तित्व की छाप, विचारों की कसावट, संक्षिप्तता, एकसूत्रता, रोचक शैली।
निबंध के प्रकार
- वर्णनात्मक: स्थान, वस्तु या दृश्य का वर्णन।
- विवरणात्मक (कथात्मक): घटना या यात्रा का क्रमिक विवरण।
- विचारात्मक: तर्क और चिंतन की प्रधानता; जैसे रामचन्द्र शुक्ल का ‘चिंतामणि’ (‘भाव या मनोविकार’)।
- भावात्मक: भावना की प्रधानता; जैसे सरदार पूर्ण सिंह के निबंध।
- ललित निबंध: व्यक्तिगत, सरस और आत्मीय शैली; जैसे हजारीप्रसाद द्विवेदी (‘कुटज’), विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय।
प्रमुख निबंधकार
भारतेन्दु युग: बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र। द्विवेदी युग: महावीरप्रसाद द्विवेदी, बालमुकुंद गुप्त, सरदार पूर्ण सिंह। शुक्ल युग: रामचन्द्र शुक्ल। शुक्लोत्तर युग: हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, हरिशंकर परसाई (व्यंग्य)।
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी गद्य के उद्भव और विकास पर विस्तार से प्रकाश डालिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) कहानी की परिभाषा देते हुए उसके तत्त्वों का विवेचन कीजिए तथा हिन्दी कहानी के विकास-क्रम को स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) कहानी और उपन्यास में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) निबंध का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उसके प्रकारों पर टिप्पणी लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) हिन्दी उपन्यास के विकास में प्रेमचंद के योगदान पर टिप्पणी लिखिए।