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मध्यकालीन हिन्दी काव्य (Medieval Hindi Poetry) BAHIN ME-2-105

RTMNU BA Semester 5 · Hindi Language (हिन्दी भाषा) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Language (हिन्दी भाषा)
SemesterSemester V
Paper codeBAHIN-ME-2-105
Paper titleमध्यकालीन हिन्दी काव्य (Medieval Hindi Poetry)
CategoryMajor Elective 02 (choose one)
Credits04
MarksTheory 80 + CIE 20 = 100 (Passing 40)
पाठ्यपुस्तकReference: साहित्य चंद्रिका - रा. तु. म. नागपुर विश्वविद्यालय; हिन्दी साहित्य का इतिहास - रामचन्द्र शुक्ल; कबीर - हजारीप्रसाद द्विवेदी; सूर साहित्य - हजारीप्रसाद द्विवेदी; हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ; बिहारी सतसई; पद्मावत - मलिक मोहम्मद जायसी
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2026-27 (Semester V–VI)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं; नोट्स और प्रश्न PadhaiNotes द्वारा सरल हिन्दी में लिखे गए हैं। RTMNU BA Hindi – All papers

Units

  1. 1इकाई I: मध्यकालीन हिन्दी काव्य : सामान्य परिचयNotes
  2. 2इकाई II: निर्गुण भक्ति काव्यNotes
  3. 3इकाई III: सगुण भक्ति काव्यNotes
  4. 4इकाई IV: रीतिबद्ध, रीतिमुक्त तथा रीतिसिद्ध काव्यNotes

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN ME-2-105 · इकाई I

इकाई I: मध्यकालीन हिन्दी काव्य : सामान्य परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • निर्गुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
  • सगुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
  • रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
  • रीतिमुक्त काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ

1. निर्गुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ

भक्तिकाल : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल) का समय संवत 1375 से 1700 तक माना है। इसे हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल की भक्ति की दो धाराएँ हैं: निर्गुण और सगुण।

अर्थ : निर्गुण का अर्थ है गुणों और आकार से रहित। निर्गुण भक्ति में ईश्वर को निराकार, अजन्मा, सर्वव्यापक और घट-घट में बसने वाला माना गया है। इसमें अवतार और मूर्ति-पूजा का विरोध है।

निर्गुण भक्ति की दो शाखाएँ

  • ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य) : ज्ञान और गुरु के माध्यम से ईश्वर-प्राप्ति। प्रमुख कवि: कबीर, रैदास (रविदास), गुरु नानक, दादू दयाल, सुंदरदास, मलूकदास।
  • प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य) : प्रेम के माध्यम से ईश्वर-प्राप्ति। प्रमुख कवि और रचनाएँ: मलिक मुहम्मद जायसी (पद्मावत), कुतुबन (मृगावती), मंझन (मधुमालती), उसमान (चित्रावली)।

ज्ञानाश्रयी (संत) काव्य की विशेषताएँ

  • निर्गुण ब्रह्म की उपासना : राम, हरि आदि नाम निराकार ब्रह्म के लिए हैं, दशरथ-पुत्र के लिए नहीं।
  • गुरु की महिमा : गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया।
  • नाम-स्मरण : सच्चे मन से प्रभु का नाम जपने पर बल।
  • बाह्याडंबरों का विरोध : माला फेरना, तीर्थ, व्रत, मूर्ति-पूजा, रोजा-नमाज़ जैसे दिखावों की आलोचना।
  • जाति-पाँति का विरोध : सभी मनुष्य समान हैं। कबीर और रैदास इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  • रहस्यवाद (Mysticism) : आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति।
  • समाज-सुधार और हिन्दू-मुस्लिम एकता।
  • भाषा-शैली : सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा, साखी (दोहा), सबद (पद), रमैनी और उलटबाँसियाँ।

प्रेमाश्रयी (सूफी) काव्य की विशेषताएँ

  • लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से अलौकिक (ईश्वरीय) प्रेम का संकेत।
  • ईश्वर को प्रियतमा और साधक को प्रेमी के रूप में चित्रित किया गया।
  • प्रेम की पीर अर्थात विरह-वेदना की प्रधानता। इसका उदाहरण पद्मावत का नागमती वियोग खंड है।
  • मसनवी शैली, अवधी भाषा और दोहा-चौपाई छंद।
  • हिन्दू घरों में प्रचलित लोक-कथाओं को आधार बनाया गया, जिससे सांस्कृतिक समन्वय हुआ।

2. सगुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ

अर्थ : सगुण का अर्थ है गुणों और आकार सहित। इसमें ईश्वर के अवतार रूप (राम और कृष्ण) की उपासना की गई है। भगवान लीला करने के लिए और भक्तों की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।

सगुण भक्ति की दो शाखाएँ

  • रामभक्ति शाखा : तुलसीदास (रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली), अग्रदास, नाभादास। इसमें मर्यादा, लोकमंगल और दास्य भाव की प्रधानता है।
  • कृष्णभक्ति शाखा : सूरदास (सूरसागर), मीराबाई, रसखान और अष्टछाप के कवि। इसमें माधुर्य, सख्य और वात्सल्य भाव की प्रधानता है।
अष्टछाप : वल्लभ संप्रदाय के आठ कवि हैं: सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी और चतुर्भुजदास। इनकी स्थापना गोस्वामी विट्ठलनाथ ने की थी।

सगुण काव्य की विशेषताएँ

  • अवतारवाद और लीला-गान : राम और कृष्ण की लीलाओं का वर्णन।
  • भक्ति के विविध भाव : दास्य (तुलसी), वात्सल्य और सख्य (सूर), माधुर्य या दांपत्य भाव (मीरा)।
  • समन्वय की भावना : तुलसी ने शैव-वैष्णव, ज्ञान-भक्ति और निर्गुण-सगुण में समन्वय किया।
  • लोकमंगल : रामकाव्य में आदर्श परिवार, समाज और राज्य (रामराज्य) का चित्र मिलता है।
  • वात्सल्य और शृंगार : सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट माना जाता है। उनके भ्रमरगीत में सगुण द्वारा निर्गुण का खंडन किया गया है।
  • भाषा : रामकाव्य मुख्यतः अवधी में और कृष्णकाव्य ब्रजभाषा में है। मीरा की भाषा में राजस्थानी का मेल है।
  • शैली : प्रबंध (रामचरितमानस) और मुक्तक (गेय पद) दोनों। संगीतात्मकता इसकी प्रमुख विशेषता है।

निर्गुण और सगुण भक्ति की तुलना

आधारनिर्गुण भक्तिसगुण भक्ति
ईश्वर का स्वरूपनिराकारसाकार (अवतार)
मूर्ति-पूजाविरोधस्वीकार
साधनज्ञान, गुरु, प्रेमभक्ति, लीला-गान
भाषासधुक्कड़ी, अवधी (सूफी)अवधी, ब्रजभाषा
प्रमुख कविकबीर, रैदास, जायसीतुलसी, सूर, मीरा

3. रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ

रीतिकाल : आचार्य शुक्ल ने उत्तर मध्यकाल (संवत 1700 से 1900) को रीतिकाल कहा है। यहाँ 'रीति' का अर्थ है काव्यशास्त्र की पद्धति, यानी रस, अलंकार, छंद और नायिका-भेद के लक्षण। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल को शृंगारकाल कहा और इसके कवियों को तीन वर्गों में बाँटा: रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त।

(क) रीतिबद्ध काव्य

जिन कवियों ने काव्यशास्त्रीय लक्षण-ग्रंथ लिखे और उनके उदाहरण स्वयं कविता में रचे, वे रीतिबद्ध या आचार्य कवि कहलाते हैं।

  • प्रमुख कवि : केशवदास (रामचंद्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया), चिंतामणि, मतिराम, भूषण (शिवराजभूषण), देव, भिखारीदास (काव्यनिर्णय), पद्माकर।
  • केशवदास को रीति-परंपरा का आरंभिक आचार्य माना जाता है। उनकी कठिन शैली के कारण उन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' भी कहा गया।

(ख) रीतिसिद्ध काव्य

जिन कवियों ने लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखे, परंतु काव्यशास्त्र का पूरा ज्ञान रखते हुए उसके अनुसार कविता रची, वे रीतिसिद्ध कहलाते हैं। इनमें सबसे प्रमुख कवि बिहारी हैं। उनकी बिहारी सतसई लगभग सात सौ दोहों का संग्रह है, जिसमें 'गागर में सागर' भरा गया है। अन्य कवियों में रसनिधि का नाम लिया जाता है।

रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य की विशेषताएँ

  • शृंगार रस की प्रधानता : संयोग और वियोग दोनों पक्ष, नायिका-भेद और नख-शिख वर्णन।
  • लक्षण-उदाहरण पद्धति (रीतिबद्ध में)।
  • अलंकार-प्रियता और चमत्कार-प्रदर्शन।
  • राजाश्रय : कवि दरबारों में रहकर आश्रयदाताओं की प्रशंसा करते थे।
  • मुक्तक शैली : दोहा, कवित्त और सवैया छंद।
  • ब्रजभाषा का परिष्कृत और कोमल रूप।
  • भक्ति और नीति की प्रवृत्ति गौण रूप में मिलती है। वीर रस भूषण में दिखता है।

4. रीतिमुक्त काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ

अर्थ : जिन कवियों ने रीति के बंधनों (लक्षण-ग्रंथ, नायिका-भेद, चमत्कार) से मुक्त होकर अपने हृदय की सच्ची अनुभूति को स्वच्छंद रूप से व्यक्त किया, वे रीतिमुक्त या स्वच्छंद कवि कहलाते हैं।

  • प्रमुख कवि : घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर, द्विजदेव।
  • घनानंद : वे मुगल दरबार से जुड़े माने जाते हैं। 'सुजान' नामक नर्तकी से उनका प्रेम उनकी कविता का मूल है। आचार्य शुक्ल ने उन्हें 'साक्षात रसमूर्ति' कहा है।

रीतिमुक्त काव्य की विशेषताएँ

  • स्वच्छंद प्रेम : व्यक्तिगत और सच्चे प्रेम की अभिव्यक्ति।
  • वियोग की प्रधानता : 'प्रेम की पीर' और एकनिष्ठ प्रेम।
  • आत्मानुभूति : कवि अपनी ही वेदना गाता है, आश्रयदाता की प्रशंसा नहीं।
  • शास्त्रीय बंधनों का त्याग : लक्षण-ग्रंथ और नायिका-भेद से दूरी।
  • लाक्षणिक भाषा : ब्रजभाषा का भावपूर्ण और मुहावरेदार प्रयोग, विरोधाभास।
  • छंद : मुख्यतः कवित्त और सवैया।
  • प्रेम में भक्ति का पुट मिलता है। लौकिक प्रेम आगे चलकर भक्ति में बदलता है।

रीतिकाव्य की तीनों धाराओं की तुलना

आधाररीतिबद्धरीतिसिद्धरीतिमुक्त
लक्षण-ग्रंथलिखेनहीं लिखे, पर रीति का पालन कियारीति से मुक्त
मुख्य प्रवृत्तिआचार्यत्व, चमत्कारकलात्मकता, सूक्ष्मताभावुकता, स्वच्छंदता
प्रमुख कविकेशव, चिंतामणि, देवबिहारीघनानंद, बोधा, आलम
प्रिय छंदकवित्त, सवैया, दोहादोहाकवित्त, सवैया
परीक्षा टिप : हर धारा का उत्तर इस क्रम में लिखें: अर्थ, शाखाएँ, प्रमुख कवि और रचनाएँ, फिर 6 से 8 विशेषताएँ शीर्षक सहित। अंत में तुलना-तालिका दें। उदाहरण के लिए Unit 2 से 4 के पाठ्य कवियों (कबीर, सूर, बिहारी, घनानंद) का उल्लेख अवश्य करें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) निर्गुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय देते हुए ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखाओं की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिकाल की रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त काव्यधाराओं का परिचय देते हुए उनकी विशेषताओं का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) सगुण भक्ति काव्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: अष्टछाप।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) रीतिमुक्त काव्य की विशेषताएँ बताते हुए घनानंद का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN ME-2-105 · इकाई II

इकाई II: निर्गुण भक्ति काव्य

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • निर्गुण भक्तिशाखा के प्रमुख कवियों का परिचय
  • कबीर के दोहे - बुरा जो देखन, माला फेरत जुग भया, कबीरा खड़ा बाज़ार में, तिनका कबहूँ ना निंदिये, जाति ना पूछो साधु की, दुख में सुमिरन, साधु भूखा भाव का, पानी केरा बुदबुदा, सबसे लघुताई भली, ऊंचे पानी ना टिकै
  • रविदास के पद - जनम जात ना पूछिये, रैदास इक ही बूंद सो, पराधीनता पाप है, जात पात के फेर महिं, रैदास सोई सूरा भला, नीच नीच कह मारहि, अंतर गति राचै नहीं, बेद पढ़ई पंडित बन्यों, सब घट मेरा साइयाँ, रैदास जनम के कारनै होत न कोए नीच
  • नागमती वियोग खंड

निर्गुण भक्तिशाखा के प्रमुख कवियों का परिचय

निर्गुण भक्ति में ईश्वर को निराकार, अजन्मा, सर्वव्यापी और गुणों से परे माना जाता है। इसमें अवतार, मूर्ति-पूजा और कर्मकांड का विरोध है। इसकी दो धाराएँ हैं:

  • ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य): इसका आधार ज्ञान, गुरु-महिमा, नाम-स्मरण और सामाजिक सुधार है।
  • प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य): इसमें प्रेम के द्वारा ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। लौकिक प्रेम-कथाओं के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना की गई है।
शाखाप्रमुख कविप्रमुख रचना / विशेषता
ज्ञानाश्रयीकबीरबीजक (साखी, सबद, रमैनी); सधुक्कड़ी भाषा
ज्ञानाश्रयीरैदास (रविदास)पद व साखियाँ; कुछ पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित
ज्ञानाश्रयीगुरु नानक, दादू दयाल, सुंदरदास, मलूकदाससंत वाणी, गुरु-महिमा, नाम-भक्ति
प्रेमाश्रयीमुल्ला दाऊद, कुतुबन, मंझनचंदायन, मृगावती, मधुमालती
प्रेमाश्रयीमलिक मुहम्मद जायसीपद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम

कबीर

परंपरा के अनुसार कबीर काशी के जुलाहा परिवार में पले-बढ़े और रामानंद को अपना गुरु मानते थे। वे समाज-सुधारक, निर्भीक और व्यंग्यकार कवि थे। उनकी वाणी का संकलन बीजक है। उनकी भाषा को आचार्य शुक्ल ने 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें 'वाणी का डिक्टेटर' कहा है।

रैदास

रैदास कबीर के समकालीन और काशी के संत थे। उन्हें रामानंद की शिष्य-परंपरा से जोड़ा जाता है। उनके काव्य की मुख्य विशेषताएँ जाति-विरोध, विनम्रता, आंतरिक भक्ति और मानव-समानता हैं। परंपरा में मीरा को उनकी शिष्या माना जाता है।

जायसी

जायसी जायस (अवध क्षेत्र) के सूफी कवि थे। उनका पद्मावत अवधी भाषा में दोहा-चौपाई शैली में लिखा गया प्रबंध काव्य है। इसकी रचना सामान्यतः सोलहवीं शताब्दी के मध्य की मानी जाती है।

निर्गुण काव्य की विशेषताएँ: निराकार ब्रह्म, गुरु-महिमा, नाम-स्मरण, आडंबर-विरोध, जाति-पाँति का खंडन, रहस्यवाद, माया से सावधानी, जनभाषा और मुक्तक शैली (संत) तथा प्रबंध शैली (सूफी)।

कबीर के दोहे

नीचे निर्धारित दोहों का भावार्थ अपने शब्दों में दिया गया है:

  1. बुरा जो देखन… – कवि दूसरों में बुराई खोजने निकला, पर कोई बुरा नहीं मिला। जब उसने अपने भीतर झाँका तो स्वयं को ही सबसे बुरा पाया। संदेश: आत्म-निरीक्षण करो।
  2. माला फेरत जुग भया… – युगों तक हाथ की माला फेरने से भी मन का फेर नहीं मिटा। हाथ की माला छोड़कर मन की माला फेरनी चाहिए। संदेश: बाहरी आडंबर का विरोध।
  3. कबीरा खड़ा बाज़ार में… – कबीर संसार रूपी बाज़ार में सबका भला चाहते हैं। उनकी न किसी से दोस्ती है, न दुश्मनी। संदेश: समभाव और निष्पक्षता।
  4. तिनका कबहूँ ना निंदिये… – पैरों के नीचे दबे तिनके की भी निंदा मत करो। यदि वही उड़कर आँख में पड़ जाए तो बहुत पीड़ा देता है। संदेश: छोटे-से-छोटे को भी तुच्छ न समझो।
  5. जाति ना पूछो साधु की… – साधु की जाति नहीं, उसका ज्ञान पूछो। जैसे तलवार का मूल्य होता है, म्यान का नहीं। संदेश: जाति-भेद का खंडन।
  6. दुख में सुमिरन… – सब लोग दुख में ईश्वर को याद करते हैं, सुख में नहीं। यदि सुख में भी स्मरण करें तो दुख आए ही नहीं। संदेश: निरंतर भक्ति।
  7. साधु भूखा भाव का… – सच्चा साधु धन का नहीं, प्रेम-भाव का भूखा होता है। जो धन का लोभी है, वह साधु नहीं। संदेश: भाव की प्रधानता।
  8. पानी केरा बुदबुदा… – मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा क्षणभंगुर है। वह सुबह के तारे की तरह देखते-देखते छिप जाता है। संदेश: जीवन की नश्वरता।
  9. सबसे लघुताई भली… – विनम्रता सबसे अच्छी है। जैसे द्वितीया का छोटा चाँद सब लोग सिर झुकाकर देखते हैं। संदेश: नम्रता की महिमा।
  10. ऊंचे पानी ना टिकै… – ऊँचाई पर पानी नहीं ठहरता, नीचे ही रुकता है। जो झुकता है वही तृप्त होता है, अहंकारी प्यासा रह जाता है। संदेश: अहंकार-त्याग।

काव्य-सौंदर्य: दोहा छंद, दृष्टांत और उपमा अलंकार, सधुक्कड़ी भाषा, लोक-जीवन से लिए गए उदाहरण और उपदेशात्मक व व्यंग्यपूर्ण शैली।

रविदास के पद

  1. जनम जात ना पूछिये… – किसी से जन्म या जाति न पूछो। सब मनुष्य प्रभु की संतान हैं, कोई ऊँची-नीची जाति का नहीं।
  2. रैदास इक ही बूंद सो… – पूरी सृष्टि एक ही मूल (बूँद) से फैली है। इसलिए वर्ण-अवर्ण का भेद करना मूर्खता है।
  3. पराधीनता पाप है… – पराधीनता पाप है। पराधीन व्यक्ति से कोई सच्चा प्रेम नहीं करता। संदेश: स्वाधीनता और आत्मसम्मान।
  4. जात पात के फेर महिं… – लोग जाति-पाँति के चक्कर में उलझे हैं। जाति का रोग मनुष्यता को खा रहा है।
  5. रैदास सोई सूरा भला… – सच्चा वीर वही है जो धर्म और सत्य के लिए संघर्ष करे।
  6. नीच नीच कह मारहि… – नासमझ लोग दूसरों को नीच कहकर सताते हैं। वे यह नहीं जानते कि सबका रचयिता एक ही भगवान है।
  7. अंतर गति राचै नहीं… – जिसका मन भीतर से प्रभु में रमा नहीं और जो केवल बाहर से वैराग्य की बातें करता है, वह पाखंडी है।
  8. बेद पढ़ई पंडित बन्यों… – केवल वेद पढ़कर पंडित बन जाने से कुछ नहीं होता। जब तक भीतर का अहंकार और अज्ञान न मिटे, सच्चा ज्ञान नहीं मिलता।
  9. सब घट मेरा साइयाँ… – प्रभु हर हृदय (घट) में बसता है। इसलिए किसी से घृणा करना ईश्वर का अपमान है।
  10. रैदास जनम के कारनै होत न कोए नीच – जन्म से कोई नीच नहीं होता। मनुष्य को उसके बुरे कर्म नीच बनाते हैं।
रैदास की मुख्य विचारधारा: जन्म नहीं, कर्म प्रधान है; मानव-समानता; स्वाधीनता; अंतःकरण की शुद्धता; सरल ब्रजमिश्रित जनभाषा; विनम्र और शांत स्वर। कबीर की तुलना में उनका स्वर कम आक्रामक है।

नागमति वियोग खंड

स्रोत: यह खंड जायसी कृत पद्मावत का अंश है।

प्रसंग: चित्तौड़ का राजा रत्नसेन, हीरामन तोते से पद्मावती के सौंदर्य का वर्णन सुनकर, उसे पाने के लिए जोगी बनकर सिंहल द्वीप चला जाता है। उसकी पहली रानी नागमती चित्तौड़ में अकेली रह जाती है और पति के वियोग में तड़पती है।

विषय-वस्तु (अपने शब्दों में)

  • नागमती पति की प्रतीक्षा में दिन-रात दुखी रहती है। उसका शरीर सूखकर कमजोर हो जाता है।
  • बारहमासा के रूप में वर्ष के बारह महीनों का चित्रण है। हर ऋतु के प्राकृतिक दृश्य उसकी विरह-वेदना को और बढ़ाते हैं; जैसे वर्षा, बिजली, शीत, वसंत आदि।
  • वह पशु-पक्षियों से अपना दुख कहती है और पक्षी के द्वारा पति तक संदेश भेजती है।
  • रानी होकर भी वह एक साधारण भारतीय गृहिणी की तरह व्याकुल दिखती है। यही इस खंड की सबसे बड़ी विशेषता है।

काव्यगत विशेषताएँ

  • रस: विप्रलंभ (वियोग) श्रृंगार।
  • प्रकृति-चित्रण: उद्दीपन रूप में; प्रकृति विरहिणी के साथ सहानुभूति रखती दिखाई देती है।
  • भाषा-छंद: ठेठ अवधी, दोहा-चौपाई (मसनवी शैली का प्रबंध)।
  • अलंकार: अतिशयोक्ति, उत्प्रेक्षा, उपमा।
  • लोक-तत्व: किसान-जीवन, घरेलू जीवन और ऋतु-संबंधी लोक-विश्वास।
  • सूफी व्यंजना: विरह को ईश्वर-प्रेम की तड़प के रूप में भी पढ़ा जाता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने नागमती के विरह-वर्णन को हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ विरह-वर्णनों में गिना है।

आधारकबीररैदासजायसी
शाखाज्ञानाश्रयीज्ञानाश्रयीप्रेमाश्रयी
स्वरव्यंग्यपूर्ण, आक्रामकविनम्र, शांतभावुक, प्रेमपूर्ण
शैलीमुक्तक (साखी)मुक्तक (पद, साखी)प्रबंध
भाषासधुक्कड़ीब्रजमिश्रित जनभाषाअवधी

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) निर्गुण भक्ति काव्य की ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखाओं का परिचय देते हुए उनके प्रमुख कवियों और विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'नागमति वियोग खंड' के आधार पर जायसी के विरह-वर्णन और प्रकृति-चित्रण की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) कबीर के दोहों में व्यक्त सामाजिक चेतना और आडंबर-विरोध पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) रैदास के पदों में जाति-पाँति विरोध और मानव-समानता का भाव स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) 'बारहमासा' पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN ME-2-105 · इकाई III

इकाई III: सगुण भक्ति काव्य

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • सगुण भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का परिचय
  • तुलसीदास - श्रीराम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
  • सूरदास रचित बाल लीला वर्णन - गोकुल प्रकट भए हरि आए, जसोदा हरि पालना झुलावै, सिखवती चलन जसोदा मैया, कहन लागे मोहन मैया मैया, मैया मैं नहीं माखन खायो
  • मीरा के पद - हेरी मैं तो प्रेम दिवाणी, बंसीवारों आयो म्हारे देस, पायो जी मैंने राम रतन धन, मेरे तो गिरधर गोपाल, मीरा मगन भई हरि के गुण गाय

1. सगुण भक्ति शाखा के प्रमुख कवियों का परिचय

अर्थ : सगुण भक्ति में ईश्वर को साकार (रूप, गुण और लीला वाला) मानकर उसकी उपासना की जाती है। ईश्वर अवतार लेकर संसार में आता है, यह इसकी मूल मान्यता है। सगुण भक्ति की दो प्रमुख शाखाएँ हैं: रामभक्ति शाखा और कृष्णभक्ति शाखा।

प्रमुख विशेषताएँ

  • अवतारवाद और ईश्वर के रूप-सौंदर्य का वर्णन।
  • भक्ति के विविध भाव, जैसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य।
  • गुरु की महिमा और नाम-स्मरण।
  • लोक-जीवन और लोक-भाषाओं का प्रयोग। अवधी और ब्रजभाषा इसकी प्रमुख भाषाएँ हैं।
  • गेय पद-शैली और संगीतात्मकता।
आधाररामभक्ति शाखाकृष्णभक्ति शाखा
आराध्यमर्यादा पुरुषोत्तम रामलीलाधारी कृष्ण
भक्ति-भावमुख्यतः दास्य भावसख्य, वात्सल्य, माधुर्य भाव
प्रमुख भाषाअवधी (ब्रज भी)ब्रजभाषा
प्रमुख कवितुलसीदास, नाभादास, अग्रदाससूरदास, मीराबाई, नंददास, रसखान
दृष्टिलोकमंगल और मर्यादालोकरंजन और प्रेम

प्रमुख कवि (संक्षेप में)

  • तुलसीदास : रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनकी रचनाएँ हैं: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, हनुमानबाहुक आदि। उन्हें समन्वयवादी और लोकमंगल के कवि के रूप में जाना जाता है।
  • सूरदास : अष्टछाप के प्रमुख कवि और वल्लभाचार्य के शिष्य थे। उनकी रचनाएँ हैं: सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी। उन्हें वात्सल्य और शृंगार का श्रेष्ठ कवि माना जाता है।
  • मीराबाई : कृष्ण की अनन्य उपासिका थीं। उनके पद राजस्थानी-मिश्रित ब्रजभाषा में हैं और उनमें माधुर्य भाव की भक्ति है।
  • अष्टछाप : वल्लभाचार्य और गोसाईं विट्ठलनाथ के आठ शिष्य कवि थे: सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी और चतुर्भुजदास।
  • रसखान : मुस्लिम होते हुए भी वे कृष्ण-प्रेम के रसिक कवि थे और सवैयों के लिए प्रसिद्ध हैं।

2. तुलसीदास : श्री राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

स्रोत : यह प्रसंग रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। इसकी भाषा अवधी है और छंद चौपाई-दोहा हैं।

प्रसंग का सार

  • जनक की सभा में राम शिव-धनुष तोड़ देते हैं। धनुष टूटने का समाचार सुनकर परशुराम क्रोध में सभा में पहुँचते हैं और तोड़ने वाले को दंड देने की बात कहते हैं।
  • राम विनम्रता से कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा।
  • लक्ष्मण व्यंग्य करते हैं कि बचपन में हमने ऐसे बहुत से धनुष तोड़े, तब आपने क्रोध नहीं किया। यह पुराना धनुष तो छूते ही टूट गया।
  • परशुराम अपने बाल-ब्रह्मचारी होने, क्षत्रियों के संहार और अपने फरसे का बखान करते हैं। लक्ष्मण उन्हें ताने देते हैं कि वीर युद्ध में पराक्रम दिखाते हैं, अपनी डींग नहीं हाँकते।
  • विश्वामित्र मन ही मन मुस्कराते हैं। राम की शीतल वाणी क्रोध को शांत करती है। अंत में परशुराम राम के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर उनकी स्तुति करते हैं और वन को लौट जाते हैं।

पात्र-चित्रण

  • राम : वे विनम्र, धैर्यवान और मर्यादाशील हैं।
  • लक्ष्मण : वे निर्भीक, वाक्पटु, उग्र और व्यंग्यप्रिय हैं।
  • परशुराम : वे क्रोधी और आत्मप्रशंसक हैं, पर अंत में विवेकी सिद्ध होते हैं।

काव्य-सौंदर्य

इस प्रसंग में वीर और रौद्र रस हैं, साथ में व्यंग्य और हास्य भी है। संवाद नाटकीय हैं और अनुप्रास, उपमा तथा वक्रोक्ति अलंकारों का प्रयोग हुआ है। इसका संदेश है कि विनय से क्रोध जीता जा सकता है।

3. सूरदास रचित बाल लीला वर्णन

सूरदास ने ब्रजभाषा में कृष्ण की बाल-लीलाओं का अत्यंत स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उन्हें वात्सल्य के क्षेत्र का अद्वितीय कवि माना है।

  • गोकुल प्रकट भए हरि आए : कृष्ण-जन्म पर गोकुल में आनंद-उत्सव मनाया जाता है। नंद बधाइयाँ बाँटते हैं और ग्वाल-गोपियाँ भेंट लेकर आती हैं। पूरा ब्रज उल्लास में डूब जाता है।
  • जसोदा हरि पालना झुलावै : यशोदा पालना झुलाती हैं, लोरी गाती हैं और नींद को बुलाती हैं। कृष्ण कभी पलकें मूँदते हैं, कभी होंठ फड़काते हैं। जो सुख देवताओं और मुनियों को भी दुर्लभ है, वह यशोदा को सहज ही मिल रहा है।
  • सिखवती चलन जसोदा मैया : यशोदा उँगली पकड़कर कृष्ण को चलना सिखाती हैं। लड़खड़ाते कदमों और देहरी लाँघने के प्रयास का सजीव चित्र है।
  • कहाँ लागे मोहन मैया मैया : कृष्ण तुतलाती बोली में मैया, बाबा और भैया कहना सीखते हैं। इससे माता-पिता के आनंद की अभिव्यक्ति होती है।
  • मैया मैं नहीं माखन खायो : इस पद में कृष्ण चतुर तर्कों से माखन-चोरी को नकारते हैं। वे कहते हैं कि सखाओं ने मुख पर माखन लगा दिया और मैं छोटा हूँ, छींके तक कैसे पहुँचूँ। उनकी भोली चतुराई पर यशोदा हँसकर उन्हें गले लगा लेती हैं।
परीक्षा बिंदु : सूर के वात्सल्य में संयोग वात्सल्य का पक्ष प्रमुख है। उनकी विशेषताएँ हैं: बाल-मनोविज्ञान की गहरी पकड़, स्वाभाविकता, गेयता, ब्रजभाषा का माधुर्य, तथा उपमा, रूपक और स्वभावोक्ति अलंकार।

4. मीरा के पद

परिचय : मीराबाई राजस्थान के मेड़ता के राठौड़ राजपरिवार से थीं और उनका विवाह मेवाड़ राजघराने में हुआ। वे बचपन से ही गिरधर गोपाल को अपना पति मानती थीं। उन्होंने लोकलाज और राजकुल की परवाह न करके साधु-संगति और भजन को अपनाया। उनकी भाषा राजस्थानी-मिश्रित ब्रजभाषा है।

  • हेरी मैं तो प्रेम दिवाणी : इस पद में प्रेम की पीड़ा और विरह-वेदना है। उनका दर्द कोई नहीं जानता, क्योंकि घायल की गति घायल ही जानता है। यह पीड़ा तभी मिटेगी जब साँवरिया स्वयं वैद्य बनकर आएँगे।
  • बंसीवारों आयो म्हारे देस : इस पद में बंसी वाले कृष्ण के आगमन की उत्कंठा और आनंद का भाव है, जिसमें प्रिय-मिलन की आतुरता प्रकट होती है।
  • पायो जी मैंने राम रतन धन : सद्गुरु की कृपा से नाम रूपी अमूल्य धन मिला है। यह धन न चोर चुरा सकता है, न खर्च करने से घटता है, बल्कि दिन-दिन बढ़ता है। सत्य की नाव और सद्गुरु रूपी खेवनहार की सहायता से भवसागर पार होता है।
  • मेरे तो गिरधर गोपाल : यह अनन्य भक्ति का पद है। इसमें गिरधर के सिवा कोई अपना न होने की घोषणा है। मीरा ने कुल और लोकलाज छोड़ी और साधुओं के बीच बैठकर आँसुओं से प्रेम की बेल सींची।
  • मीरा मगन भई हरि के गुण गाय : इस पद में भक्ति में तल्लीनता का वर्णन है। राणा द्वारा भेजे गए विष और सर्प जैसे कष्ट भी प्रभु-कृपा से निष्फल हो गए।

मीरा की काव्यगत विशेषताएँ

  • माधुर्य भाव और दांपत्य प्रेम की भक्ति।
  • आत्मानुभूति, विरह-वेदना और समर्पण।
  • सामाजिक बंधनों के प्रति विद्रोह।
  • गेयता, सरलता और रूपक अलंकार का प्रयोग।
आधारसूरदासमीराबाई
भाववात्सल्य, सख्यमाधुर्य (पति-भाव)
अनुभूतिदृष्टा और वर्णनकर्ता कीआत्मानुभूति, निजी पीड़ा
भाषासाहित्यिक ब्रजभाषाराजस्थानी-मिश्रित ब्रज

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रामचरितमानस के 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद' का सार लिखते हुए राम, लक्ष्मण और परशुराम का चरित्र-चित्रण कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) सूरदास के बाल-लीला वर्णन के आधार पर उनके वात्सल्य-चित्रण की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) सगुण भक्ति काव्य की रामभक्ति और कृष्णभक्ति शाखा का अंतर स्पष्ट कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) मीरा की भक्ति-भावना पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) 'मैया मैं नहीं माखन खायो' पद का भावार्थ लिखिए।

RTMNU BA Sem 5 · BAHIN ME-2-105 · इकाई IV

इकाई IV: रीतिबद्ध, रीतिमुक्त तथा रीतिसिद्ध काव्य

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • रीतिबद्ध, रीतिमुक्त तथा रीतिसिद्ध शाखा के प्रमुख कवि
  • केशवदास - अंगद-रावण संवाद - रामचंद्रिका
  • घनानन्द के सवैया - घनानंद जीवन मूल सुजान, लै ही रहे हौं सदा मन, क्यों हँसि हेरि, पाप के पुंज सकेलि सुकोन, चंद चकोर की चाह करै
  • बिहारी के दोहे - कहत नटत रीझत खिझत, मेरी भव-बाधा हरौ, नहिं परागु नहिं मधुर मधु, तंत्री नाद कबित्त रस, सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर, मोर मुकुट कटि काछनी, चिरजीवौ जोरी जुरै, नीकी लागि अनाकनी, कब को टेरत दीन है, या अनुरागी चित्त की

1. रीतिबद्ध, रीतिमुक्त तथा रीतिसिद्ध शाखा के प्रमुख कवि

रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल): आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने संवत् 1700 से 1900 तक के काल को रीतिकाल कहा है। 'रीति' का अर्थ है काव्य-रचना की पद्धति या काव्यशास्त्रीय नियम, जैसे रस, अलंकार, नायिका-भेद और छंद। इस काल का अधिकांश काव्य राजदरबारों में लिखा गया। काव्य की मुख्य भाषा ब्रजभाषा रही और मुख्य रस शृंगार रहा।

(क) रीतिबद्ध काव्य

रीतिबद्ध कवि वे हैं जिन्होंने लक्षण-ग्रंथ लिखे। वे पहले काव्यांग का लक्षण (परिभाषा) देते थे और फिर उसका उदाहरण अपनी कविता में देते थे। इन्हें 'आचार्य कवि' भी कहा जाता है।

  • प्रमुख कवि: केशवदास, चिंतामणि, मतिराम, भूषण, देव, कुलपति मिश्र, भिखारीदास, पद्माकर।
  • विशेषताएँ: शास्त्र-निरूपण, अलंकार-प्रियता, नायिका-भेद, दरबारी प्रवृत्ति और चमत्कार-प्रदर्शन।

(ख) रीतिसिद्ध काव्य

रीतिसिद्ध कवियों ने लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखे, किंतु वे काव्यशास्त्र में पारंगत थे। उनकी कविता में रीति के नियम अपने-आप दिखाई देते हैं।

  • प्रमुख कवि: बिहारी (सबसे प्रमुख), सेनापति, रसनिधि।
  • विशेषताएँ: मुक्तक शैली, कम शब्दों में गहरा अर्थ, अलंकार और व्यंजना का सुंदर प्रयोग।

(ग) रीतिमुक्त काव्य

रीतिमुक्त कवियों ने रीति के बंधन को नहीं माना। उन्होंने स्वच्छंद होकर अपने हृदय के प्रेम और विरह को व्यक्त किया।

  • प्रमुख कवि: घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर, द्विजदेव।
  • विशेषताएँ: व्यक्तिगत प्रेम-पीड़ा, विरह की प्रधानता, भाव की सच्चाई और सरल किंतु मार्मिक भाषा।
आधाररीतिबद्धरीतिसिद्धरीतिमुक्त
लक्षण-ग्रंथलिखेनहीं लिखे, पर रीति का ज्ञान थानहीं लिखे, रीति का विरोध किया
प्रधान तत्वशास्त्र और चमत्कारकला और व्यंजनाभाव और प्रेम-पीड़ा
प्रमुख कविकेशव, देव, मतिरामबिहारीघनानंद, बोधा
प्रेम का स्वरूपपरंपरागतकलात्मकव्यक्तिगत और स्वच्छंद

2. केशवदास - अंगद-रावण संवाद (रामचंद्रिका)

कवि-परिचय: केशवदास ओरछा (बुंदेलखंड) के राज-दरबार से जुड़े संस्कृत-परंपरा के विद्वान कवि थे। उन्हें रीतिकाल का प्रथम आचार्य माना जाता है। शुक्ल जी के अनुसार रीति-ग्रंथों की अखंड परंपरा चिंतामणि से चली।

  • प्रमुख रचनाएँ: रामचंद्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया, विज्ञानगीता, वीरसिंहदेव चरित, रतनबावनी।
  • उनकी कठिन और पांडित्यपूर्ण शैली के कारण उन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' कहा गया।

रामचंद्रिका: यह राम-कथा पर आधारित प्रबंध काव्य है। इसमें अनेक प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है, इसलिए इसे 'छंदों का अजायबघर' भी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति इसके संवाद हैं।

अंगद-रावण संवाद का सार: युद्ध से पहले श्रीराम अंगद को दूत बनाकर रावण की सभा में भेजते हैं। रावण अहंकार से अंगद का परिचय पूछता है और उसका उपहास करता है। अंगद बताता है कि वह बालि का पुत्र है। वह रावण को याद दिलाता है कि बालि ने कभी उसे अपनी काँख में दबा लिया था। अंगद तीखे व्यंग्य से रावण की पुरानी पराजयों का उल्लेख करता है, राम की शक्ति का बखान करता है और सीता को लौटाने की सलाह देता है। रावण अपना गर्व नहीं छोड़ता।

  • नाटकीयता: छोटे-छोटे प्रश्नोत्तर संवाद को मंच जैसा जीवंत बनाते हैं।
  • वाक्चातुर्य और व्यंग्य: अंगद की हाज़िरजवाबी और कटाक्ष इस प्रसंग की विशेषता है।
  • रस: वीर और रौद्र रस प्रधान हैं, साथ में हास्य-व्यंग्य भी है।
  • चरित्र: अंगद निर्भीक, स्वामिभक्त और बुद्धिमान दूत है; रावण अहंकारी और दंभी है।
  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ ब्रजभाषा, जिसमें ओज गुण है।
परीक्षा-टिप: केशव को 'संवाद-योजना का कुशल कवि' कहा जाता है। अंगद-रावण संवाद इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

3. घनानंद के सवैया

कवि-परिचय: घनानंद रीतिमुक्त धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। वे मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के दरबार में मीर मुंशी थे। दरबार की नर्तकी 'सुजान' से उन्हें प्रेम था। प्रेम में असफलता के बाद वे वृंदावन चले गए। कहा जाता है कि एक विदेशी आक्रमण के समय मथुरा क्षेत्र में उनकी हत्या हुई। उनकी कविता में 'सुजान' शब्द लौकिक प्रेमिका और बाद में श्रीकृष्ण, दोनों अर्थों में आता है।

  • रचनाएँ: सुजानहित, वियोगबेलि, इश्कलता, कृपाकंद आदि।
  • उन्हें 'प्रेम की पीर का कवि' और 'साक्षात् रसमूर्ति' कहा गया है।

निर्धारित सवैयों का भाव

  • घनानंद जीवन मूल सुजान: कवि सुजान को अपने जीवन का आधार मानता है। उसके बिना जीवन सूना है और उसके दर्शन की प्यास कभी नहीं बुझती।
  • लै ही रहे हौं सदा मन: कवि प्रिय को उलाहना देता है कि तुम सदा दूसरों का मन लेना ही जानते हो, बदले में देना नहीं जानते। यहाँ एकपक्षीय प्रेम की वेदना है।
  • क्यों हँसि हेरि: कवि पूछता है कि पहले हँसकर देखा, मीठे वचनों से मन में चाह बढ़ाई, तो अब निष्ठुर क्यों हो गए। इसमें प्रेम में छले जाने की पीड़ा है।
  • पाप के पुंज सकेलि: इस सवैये में प्रिय की निष्ठुरता और प्रेमी के दुर्भाग्य की वेदना व्यक्त हुई है। विद्यार्थी पाठ्यपुस्तक से मूल पंक्तियाँ अवश्य पढ़ें।
  • चंद चकोर की चाह करै: चकोर-चंद्र और पपीहा-स्वाति जैसे परंपरागत उदाहरणों से अनन्य और निःस्वार्थ प्रेम दिखाया गया है। प्रेमी सदा चाहता है, जबकि प्रिय निर्मोही बना रहता है।

काव्यगत विशेषताएँ

  • वियोग शृंगार और प्रेम की गहरी अनुभूति।
  • विरोधाभास और लाक्षणिकता का प्रयोग।
  • शुद्ध, मुहावरेदार और कोमल ब्रजभाषा।
  • सवैया और कवित्त छंदों का प्रयोग।
  • भाव-पक्ष प्रधान है, चमत्कार गौण है।

4. बिहारी के दोहे

कवि-परिचय: बिहारी रीतिसिद्ध धारा के सबसे प्रमुख कवि हैं। वे जयपुर के मिर्ज़ा राजा जयसिंह के आश्रित कवि थे। उनकी एकमात्र रचना बिहारी सतसई है, जिसमें लगभग सात सौ दोहे हैं। उनकी कला के लिए 'गागर में सागर भरना' कहा जाता है। सतसई में शृंगार, भक्ति और नीति तीनों प्रकार के दोहे मिलते हैं।

निर्धारित दोहों का भाव

  1. कहत, नटत, रीझत, खिझत: भरे घर में नायक और नायिका आँखों के इशारों से ही कहना, मना करना, रीझना, खीझना और मिलना जैसी सारी बातें कर लेते हैं। यह संयोग शृंगार और अनुभाव-योजना का श्रेष्ठ उदाहरण है।
  2. मेरी भव-बाधा हरौ: यह सतसई का मंगलाचरण है। इसमें चतुर राधा से सांसारिक कष्ट दूर करने की प्रार्थना है। इसमें श्लेष अलंकार है।
  3. नहिं परागु नहिं मधुर मधु: यह अन्योक्ति है। अधखिली कली पर मोहित भौंरे के बहाने कवि ने नई रानी के मोह में राजकाज भूले राजा जयसिंह को सचेत किया। कहा जाता है कि यह दोहा पढ़कर राजा सचेत हुए।
  4. तंत्री नाद, कबित्त रस: संगीत, काव्य-रस और प्रेम में जो पूरा डूब जाता है, वही पार होता है। जो आधा डूबता है, वह डूब जाता है। इसमें विरोधाभास अलंकार है।
  5. सतसइया के दोहरा: सतसई के दोहे नावक के तीर जैसे हैं। ये देखने में छोटे लगते हैं, पर गहरा घाव करते हैं। यह बिहारी की संक्षिप्त और प्रभावशाली शैली पर प्रसिद्ध उक्ति है।
  6. मोर मुकुट कटि काछनी: मोर-मुकुट, काछनी, मुरली और माला धारण किए श्रीकृष्ण का यही रूप कवि के मन में सदा बसा रहे। यह भक्ति और रूप-वर्णन का दोहा है।
  7. चिरजीवौ जोरी जुरै: राधा-कृष्ण की जोड़ी को आशीर्वाद दिया गया है। 'वृषभानुजा' और 'हलधर के बीर' शब्दों में श्लेष के द्वारा सुंदर हास्य उत्पन्न हुआ है।
  8. नीकी लगि अनाकनी: भक्त भगवान को उलाहना देता है कि आपको अनसुनी करना अच्छा लगने लगा है। लगता है गज का एक बार उद्धार करके आपने 'तारनहार' का विरद ही छोड़ दिया।
  9. कब को टेरत दीन ह्वै: भक्त कहता है कि वह कब से दीन होकर पुकार रहा है, पर श्याम सहायता नहीं करते। लगता है जगद्गुरु को भी संसार की हवा लग गई है। यह व्यंग्यपूर्ण भक्ति का दोहा है।
  10. या अनुरागी चित्त की: प्रेमी मन की गति कोई नहीं समझता। यह जितना श्याम (कृष्ण/काले) रंग में डूबता है, उतना ही उज्ज्वल होता है। इसमें विरोधाभास और श्लेष अलंकार हैं।

बिहारी की काव्यगत विशेषताएँ

  • समास-शैली और अर्थ-गांभीर्य।
  • श्लेष, अन्योक्ति, विरोधाभास और यमक जैसे अलंकारों का कुशल प्रयोग।
  • शृंगार, भक्ति और नीति का समन्वय।
  • परिष्कृत और कसी हुई ब्रजभाषा।
  • मुक्तक काव्य और दोहा छंद।
स्मरण सूत्र: केशव = आचार्य और संवाद; बिहारी = गागर में सागर; घनानंद = प्रेम की पीर।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त काव्यधाराओं का परिचय देते हुए उनके प्रमुख कवियों और विशेषताओं का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) बिहारी के निर्धारित दोहों के आधार पर उनकी काव्य-कला (भाव-पक्ष और कला-पक्ष) की समीक्षा कीजिए। 'बिहारी ने गागर में सागर भरा है' - इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) केशवदास के 'अंगद-रावण संवाद' की विशेषताएँ लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) घनानंद को 'प्रेम की पीर का कवि' क्यों कहा जाता है? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: 'या अनुरागी चित्त की' दोहे का भाव और अलंकार।