पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- निर्गुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
- सगुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
- रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
- रीतिमुक्त काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
1. निर्गुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
भक्तिकाल : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल) का समय संवत 1375 से 1700 तक माना है। इसे हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। इस काल की भक्ति की दो धाराएँ हैं: निर्गुण और सगुण।
अर्थ : निर्गुण का अर्थ है गुणों और आकार से रहित। निर्गुण भक्ति में ईश्वर को निराकार, अजन्मा, सर्वव्यापक और घट-घट में बसने वाला माना गया है। इसमें अवतार और मूर्ति-पूजा का विरोध है।
निर्गुण भक्ति की दो शाखाएँ
- ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य) : ज्ञान और गुरु के माध्यम से ईश्वर-प्राप्ति। प्रमुख कवि: कबीर, रैदास (रविदास), गुरु नानक, दादू दयाल, सुंदरदास, मलूकदास।
- प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य) : प्रेम के माध्यम से ईश्वर-प्राप्ति। प्रमुख कवि और रचनाएँ: मलिक मुहम्मद जायसी (पद्मावत), कुतुबन (मृगावती), मंझन (मधुमालती), उसमान (चित्रावली)।
ज्ञानाश्रयी (संत) काव्य की विशेषताएँ
- निर्गुण ब्रह्म की उपासना : राम, हरि आदि नाम निराकार ब्रह्म के लिए हैं, दशरथ-पुत्र के लिए नहीं।
- गुरु की महिमा : गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया।
- नाम-स्मरण : सच्चे मन से प्रभु का नाम जपने पर बल।
- बाह्याडंबरों का विरोध : माला फेरना, तीर्थ, व्रत, मूर्ति-पूजा, रोजा-नमाज़ जैसे दिखावों की आलोचना।
- जाति-पाँति का विरोध : सभी मनुष्य समान हैं। कबीर और रैदास इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- रहस्यवाद (Mysticism) : आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति।
- समाज-सुधार और हिन्दू-मुस्लिम एकता।
- भाषा-शैली : सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा, साखी (दोहा), सबद (पद), रमैनी और उलटबाँसियाँ।
प्रेमाश्रयी (सूफी) काव्य की विशेषताएँ
- लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से अलौकिक (ईश्वरीय) प्रेम का संकेत।
- ईश्वर को प्रियतमा और साधक को प्रेमी के रूप में चित्रित किया गया।
- प्रेम की पीर अर्थात विरह-वेदना की प्रधानता। इसका उदाहरण पद्मावत का नागमती वियोग खंड है।
- मसनवी शैली, अवधी भाषा और दोहा-चौपाई छंद।
- हिन्दू घरों में प्रचलित लोक-कथाओं को आधार बनाया गया, जिससे सांस्कृतिक समन्वय हुआ।
2. सगुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
अर्थ : सगुण का अर्थ है गुणों और आकार सहित। इसमें ईश्वर के अवतार रूप (राम और कृष्ण) की उपासना की गई है। भगवान लीला करने के लिए और भक्तों की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
सगुण भक्ति की दो शाखाएँ
- रामभक्ति शाखा : तुलसीदास (रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली), अग्रदास, नाभादास। इसमें मर्यादा, लोकमंगल और दास्य भाव की प्रधानता है।
- कृष्णभक्ति शाखा : सूरदास (सूरसागर), मीराबाई, रसखान और अष्टछाप के कवि। इसमें माधुर्य, सख्य और वात्सल्य भाव की प्रधानता है।
सगुण काव्य की विशेषताएँ
- अवतारवाद और लीला-गान : राम और कृष्ण की लीलाओं का वर्णन।
- भक्ति के विविध भाव : दास्य (तुलसी), वात्सल्य और सख्य (सूर), माधुर्य या दांपत्य भाव (मीरा)।
- समन्वय की भावना : तुलसी ने शैव-वैष्णव, ज्ञान-भक्ति और निर्गुण-सगुण में समन्वय किया।
- लोकमंगल : रामकाव्य में आदर्श परिवार, समाज और राज्य (रामराज्य) का चित्र मिलता है।
- वात्सल्य और शृंगार : सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट माना जाता है। उनके भ्रमरगीत में सगुण द्वारा निर्गुण का खंडन किया गया है।
- भाषा : रामकाव्य मुख्यतः अवधी में और कृष्णकाव्य ब्रजभाषा में है। मीरा की भाषा में राजस्थानी का मेल है।
- शैली : प्रबंध (रामचरितमानस) और मुक्तक (गेय पद) दोनों। संगीतात्मकता इसकी प्रमुख विशेषता है।
निर्गुण और सगुण भक्ति की तुलना
| आधार | निर्गुण भक्ति | सगुण भक्ति |
|---|---|---|
| ईश्वर का स्वरूप | निराकार | साकार (अवतार) |
| मूर्ति-पूजा | विरोध | स्वीकार |
| साधन | ज्ञान, गुरु, प्रेम | भक्ति, लीला-गान |
| भाषा | सधुक्कड़ी, अवधी (सूफी) | अवधी, ब्रजभाषा |
| प्रमुख कवि | कबीर, रैदास, जायसी | तुलसी, सूर, मीरा |
3. रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
रीतिकाल : आचार्य शुक्ल ने उत्तर मध्यकाल (संवत 1700 से 1900) को रीतिकाल कहा है। यहाँ 'रीति' का अर्थ है काव्यशास्त्र की पद्धति, यानी रस, अलंकार, छंद और नायिका-भेद के लक्षण। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल को शृंगारकाल कहा और इसके कवियों को तीन वर्गों में बाँटा: रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त।
(क) रीतिबद्ध काव्य
जिन कवियों ने काव्यशास्त्रीय लक्षण-ग्रंथ लिखे और उनके उदाहरण स्वयं कविता में रचे, वे रीतिबद्ध या आचार्य कवि कहलाते हैं।
- प्रमुख कवि : केशवदास (रामचंद्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया), चिंतामणि, मतिराम, भूषण (शिवराजभूषण), देव, भिखारीदास (काव्यनिर्णय), पद्माकर।
- केशवदास को रीति-परंपरा का आरंभिक आचार्य माना जाता है। उनकी कठिन शैली के कारण उन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' भी कहा गया।
(ख) रीतिसिद्ध काव्य
जिन कवियों ने लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखे, परंतु काव्यशास्त्र का पूरा ज्ञान रखते हुए उसके अनुसार कविता रची, वे रीतिसिद्ध कहलाते हैं। इनमें सबसे प्रमुख कवि बिहारी हैं। उनकी बिहारी सतसई लगभग सात सौ दोहों का संग्रह है, जिसमें 'गागर में सागर' भरा गया है। अन्य कवियों में रसनिधि का नाम लिया जाता है।
रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य की विशेषताएँ
- शृंगार रस की प्रधानता : संयोग और वियोग दोनों पक्ष, नायिका-भेद और नख-शिख वर्णन।
- लक्षण-उदाहरण पद्धति (रीतिबद्ध में)।
- अलंकार-प्रियता और चमत्कार-प्रदर्शन।
- राजाश्रय : कवि दरबारों में रहकर आश्रयदाताओं की प्रशंसा करते थे।
- मुक्तक शैली : दोहा, कवित्त और सवैया छंद।
- ब्रजभाषा का परिष्कृत और कोमल रूप।
- भक्ति और नीति की प्रवृत्ति गौण रूप में मिलती है। वीर रस भूषण में दिखता है।
4. रीतिमुक्त काव्य का सामान्य परिचय तथा विशेषताएँ
अर्थ : जिन कवियों ने रीति के बंधनों (लक्षण-ग्रंथ, नायिका-भेद, चमत्कार) से मुक्त होकर अपने हृदय की सच्ची अनुभूति को स्वच्छंद रूप से व्यक्त किया, वे रीतिमुक्त या स्वच्छंद कवि कहलाते हैं।
- प्रमुख कवि : घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर, द्विजदेव।
- घनानंद : वे मुगल दरबार से जुड़े माने जाते हैं। 'सुजान' नामक नर्तकी से उनका प्रेम उनकी कविता का मूल है। आचार्य शुक्ल ने उन्हें 'साक्षात रसमूर्ति' कहा है।
रीतिमुक्त काव्य की विशेषताएँ
- स्वच्छंद प्रेम : व्यक्तिगत और सच्चे प्रेम की अभिव्यक्ति।
- वियोग की प्रधानता : 'प्रेम की पीर' और एकनिष्ठ प्रेम।
- आत्मानुभूति : कवि अपनी ही वेदना गाता है, आश्रयदाता की प्रशंसा नहीं।
- शास्त्रीय बंधनों का त्याग : लक्षण-ग्रंथ और नायिका-भेद से दूरी।
- लाक्षणिक भाषा : ब्रजभाषा का भावपूर्ण और मुहावरेदार प्रयोग, विरोधाभास।
- छंद : मुख्यतः कवित्त और सवैया।
- प्रेम में भक्ति का पुट मिलता है। लौकिक प्रेम आगे चलकर भक्ति में बदलता है।
रीतिकाव्य की तीनों धाराओं की तुलना
| आधार | रीतिबद्ध | रीतिसिद्ध | रीतिमुक्त |
|---|---|---|---|
| लक्षण-ग्रंथ | लिखे | नहीं लिखे, पर रीति का पालन किया | रीति से मुक्त |
| मुख्य प्रवृत्ति | आचार्यत्व, चमत्कार | कलात्मकता, सूक्ष्मता | भावुकता, स्वच्छंदता |
| प्रमुख कवि | केशव, चिंतामणि, देव | बिहारी | घनानंद, बोधा, आलम |
| प्रिय छंद | कवित्त, सवैया, दोहा | दोहा | कवित्त, सवैया |
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) निर्गुण भक्ति काव्य का सामान्य परिचय देते हुए ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी शाखाओं की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिकाल की रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त काव्यधाराओं का परिचय देते हुए उनकी विशेषताओं का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) सगुण भक्ति काव्य की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए: अष्टछाप।
- (लघूत्तरी प्रश्न) रीतिमुक्त काव्य की विशेषताएँ बताते हुए घनानंद का संक्षिप्त परिचय दीजिए।