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हिन्दी साहित्य का इतिहास – आधुनिक काल BAHLT Major T-7-104

RTMNU BA Semester 4 · Hindi Literature (हिन्दी साहित्य) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Literature (हिन्दी साहित्य)
SemesterSemester IV
Paper codeBAHLT Major T-7-104
Paper titleहिन्दी साहित्य का इतिहास – आधुनिक काल
CategoryMajor T-7 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits4 credits (theory, 4 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा 3 घंटे: 80 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 20 अंक = 100; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 40
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Literature Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: आधुनिक काल का सामान्य परिचयNotes
  2. 2इकाई II: आधुनिक काल के प्रमुख युग एवं साहित्यकारNotes
  3. 3इकाई III: छायावादोत्तर युगNotes
  4. 4इकाई IV: आधुनिक गद्य साहित्य – सामान्य परिचयNotes

RTMNU BA Sem 4 · BAHLT Major T-7-104 · इकाई I

इकाई I: आधुनिक काल का सामान्य परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • आधुनिक काल की पृष्ठभूमि और विशेषताएँ
  • हिन्दी गद्य का आविर्भाव
  • हिन्दी नवजागरण

आधुनिक काल की पृष्ठभूमि और विशेषताएँ

हिन्दी साहित्य के इतिहास का चौथा और सबसे नया काल आधुनिक काल है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसका आरंभ संवत् 1900 (लगभग सन् 1843) से माना और गद्य की प्रधानता के कारण इसे गद्यकाल कहा। इस काल में पहली बार खड़ी बोली साहित्य की मुख्य भाषा बनी।

पृष्ठभूमि

  • राजनीतिक: अंग्रेज़ी शासन की स्थापना, 1857 का स्वाधीनता संग्राम, 1885 में कांग्रेस की स्थापना और आगे स्वतंत्रता आंदोलन।
  • सामाजिक-धार्मिक: ब्रह्म समाज (राजा राममोहन राय), आर्य समाज (स्वामी दयानंद, 1875), प्रार्थना समाज, थियोसोफिकल सोसायटी, रामकृष्ण मिशन आदि सुधार आंदोलनों ने बाल-विवाह, छुआछूत, अंधविश्वास और स्त्री की दुर्दशा पर प्रश्न उठाए।
  • आर्थिक: अंग्रेज़ों की शोषण नीति से देश का धन बाहर गया, उद्योग-धंधे नष्ट हुए, गरीबी और अकाल बढ़े। यह पीड़ा साहित्य में दिखी।
  • शैक्षिक-तकनीकी: छापाखाना (प्रेस), समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, अंग्रेज़ी शिक्षा और रेल-डाक ने विचारों को तेज़ी से फैलाया।

प्रमुख विशेषताएँ

  1. गद्य का विकास और गद्य की अनेक विधाओं (उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, आलोचना) का जन्म।
  2. ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली का काव्य-भाषा बनना।
  3. राष्ट्रीयता और देशप्रेम की भावना।
  4. समाज सुधार, यथार्थ चित्रण और सामान्य मनुष्य को साहित्य का विषय बनाना।
  5. भक्ति और शृंगार की जगह तर्क, विज्ञान और मानवतावाद।
  6. पत्रकारिता का साहित्य से गहरा संबंध।
  7. पश्चिमी साहित्य के प्रभाव से नए प्रयोग।
युगलगभग समय
भारतेन्दु युग1850–1900
द्विवेदी युग1900–1920
छायावाद युग1918–1936
छायावादोत्तर (प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, समकालीन कविता)1936 के बाद
याद रखें: युगों की तिथियाँ विद्वानों में थोड़ी अलग-अलग मिलती हैं; परीक्षा में "लगभग" लिखना सुरक्षित है।

हिन्दी गद्य का आविर्भाव

हिन्दी गद्य के कुछ पुराने नमूने ब्रजभाषा और राजस्थानी में मिलते हैं, पर खड़ी बोली गद्य का व्यवस्थित विकास उन्नीसवीं सदी में हुआ।

प्रारंभिक चार गद्यकार

लेखकरचना
मुंशी सदासुखलालसुखसागर
इंशा अल्ला खाँरानी केतकी की कहानी
लल्लूलालप्रेमसागर
सदल मिश्रनासिकेतोपाख्यान

लल्लूलाल और सदल मिश्र ने कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज (1800 में स्थापित) के लिए गद्य लिखा। ईसाई मिशनरियों ने धर्म प्रचार के लिए सरल हिन्दी में पुस्तकें छापीं। 1826 में कलकत्ता से पहला हिन्दी समाचार पत्र "उदन्त मार्तण्ड" (संपादक – जुगल किशोर शुक्ल) निकला।

बाद में राजा शिवप्रसाद "सितारेहिन्द" ने उर्दू-मिश्रित हिन्दी का और राजा लक्ष्मण सिंह ने संस्कृत-निष्ठ शुद्ध हिन्दी का पक्ष लिया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने दोनों के बीच का संतुलित, सरल और जीवंत गद्य दिया, इसलिए उन्हें आधुनिक हिन्दी गद्य का जनक माना जाता है। आगे महावीर प्रसाद द्विवेदी ने "सरस्वती" पत्रिका के माध्यम से भाषा का व्याकरण और वर्तनी सुधारकर उसे मानक रूप दिया।

हिन्दी नवजागरण

नवजागरण का अर्थ है – नई चेतना का जागना। उन्नीसवीं सदी में भारत में अंधविश्वास, रूढ़ि और गुलामी के विरुद्ध जो बौद्धिक और सांस्कृतिक जागृति आई, उसे भारतीय नवजागरण कहा जाता है। हिन्दी क्षेत्र में यह चेतना भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से फैली, इसे हिन्दी नवजागरण कहते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा ने 1857 के संग्राम को हिन्दी नवजागरण का आरंभिक बिंदु माना और भारतेन्दु तथा द्विवेदी युग को इसके प्रमुख चरण बताया।

हिन्दी नवजागरण की विशेषताएँ

  • अंग्रेज़ी शासन की शोषण नीति की आलोचना और देशप्रेम।
  • मातृभाषा हिन्दी के प्रति गर्व – भारतेन्दु का विचार "निज भाषा उन्नति" इसका सूत्र है।
  • सामाजिक बुराइयों – बाल-विवाह, छुआछूत, विधवाओं की दुर्दशा, नशा – का विरोध।
  • स्त्री शिक्षा और वैज्ञानिक सोच का समर्थन।
  • पत्र-पत्रिकाओं (कविवचनसुधा, हिन्दी प्रदीप, ब्राह्मण, सरस्वती) द्वारा जनजागरण।
  • अतीत के गौरव को याद कर वर्तमान को सुधारने की प्रेरणा।

नवजागरण का साहित्य पर प्रभाव

नवजागरण के कारण साहित्य राजदरबार से निकलकर जनता के बीच आया। कविता, नाटक और निबंध में देश की दुर्दशा, किसान, स्त्री और गरीब का जीवन चित्रित होने लगा। भाषा सरल हुई और साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन के साथ जनजागरण भी बन गया।

परीक्षा टिप: नवजागरण पर उत्तर लिखते समय – अर्थ, कारण (अंग्रेज़ी शिक्षा, सुधार आंदोलन, प्रेस, 1857), प्रमुख व्यक्तित्व (भारतेन्दु, बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी) और साहित्य पर प्रभाव – इस क्रम में लिखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) आधुनिक काल की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए इस काल की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी नवजागरण से आप क्या समझते हैं? हिन्दी साहित्य पर उसके प्रभाव की विवेचना कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) फोर्ट विलियम कॉलेज और हिन्दी गद्य – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) खड़ी बोली गद्य के प्रारंभिक चार गद्यकारों का परिचय दीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) आधुनिक काल को 'गद्यकाल' क्यों कहा जाता है?

RTMNU BA Sem 4 · BAHLT Major T-7-104 · इकाई II

इकाई II: आधुनिक काल के प्रमुख युग एवं साहित्यकार

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • भारतेन्दु युग- प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार
  • द्विवेदी युग- प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार
  • छायावाद युग- प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

भारतेन्दु युग – प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (1850–1885) के नाम पर इस युग को भारतेन्दु युग कहा जाता है। इसे आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रवेश द्वार या जागरण काल भी कहते हैं। इस युग में कविता ब्रजभाषा में और गद्य खड़ी बोली में लिखा गया।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  1. राष्ट्रीयता और देशप्रेम: देश की दुर्दशा पर दुःख और अंग्रेज़ी शोषण की आलोचना (भारत दुर्दशा)।
  2. समाज सुधार: बाल-विवाह, छुआछूत, अशिक्षा, नशाखोरी पर व्यंग्य।
  3. भक्ति और शृंगार: पुरानी परंपरा भी चलती रही; भारतेन्दु की प्रेम-माधुरी जैसी रचनाएँ।
  4. हास्य-व्यंग्य: प्रहसनों और लेखों में तीखा व्यंग्य।
  5. गद्य विधाओं का आरंभ: नाटक, निबंध, उपन्यास, पत्रकारिता।
  6. मातृभाषा प्रेम: "निज भाषा उन्नति" का संदेश।

भारतेन्दु का महत्व: वे कवि, नाटककार, निबंधकार और पत्रकार – सब एक साथ थे। उन्होंने हिन्दी को एक सरल, सहज और लोकप्रिय गद्य दिया। उनके साथ लिखने वाले लेखकों का समूह "भारतेन्दु मंडल" कहलाता है। उन्हें 1880 में "भारतेन्दु" की उपाधि दी गई। आज भी उन्हें आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक कहा जाता है।

प्रमुख साहित्यकार

साहित्यकारयोगदान / रचनाएँ
भारतेन्दु हरिश्चन्द्रभारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, सत्य हरिश्चन्द्र; कविवचनसुधा, हरिश्चन्द्र मैगज़ीन
प्रतापनारायण मिश्र"ब्राह्मण" पत्र; हास्य-व्यंग्य निबंध
बालकृष्ण भट्ट"हिन्दी प्रदीप" पत्र; निबंधकार
बदरीनारायण चौधरी "प्रेमघन""आनंद कादंबिनी" पत्रिका; कवि
लाला श्रीनिवास दासपरीक्षा गुरु (उपन्यास)
ठाकुर जगमोहन सिंह, अंबिकादत्त व्यासकविता और गद्य
याद रखें: भारतेन्दु मंडल के लेखकों ने साहित्य को जनता से जोड़ा। इस युग में कविता की भाषा अधिकतर ब्रजभाषा ही रही।

द्विवेदी युग – प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1903 से "सरस्वती" पत्रिका का संपादन किया। उन्होंने भाषा को शुद्ध किया, लेखकों को दिशा दी और खड़ी बोली को कविता की भाषा बनाया। इसलिए लगभग 1900 से 1920 तक के समय को द्विवेदी युग या जागरण-सुधार काल कहते हैं।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  • खड़ी बोली का कविता में पूर्ण प्रतिष्ठा पाना।
  • राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक गौरव – भारत के अतीत का गौरवगान।
  • आदर्शवाद और नैतिकता – कविता का उद्देश्य उपदेश और सुधार।
  • इतिवृत्तात्मकता – कथा या घटना का सीधा वर्णन; भावुकता कम।
  • पौराणिक-ऐतिहासिक विषयों को नए अर्थ देना; उपेक्षित पात्रों (उर्मिला, यशोधरा) पर ध्यान।
  • भाषा-व्याकरण की शुद्धता, गद्य का परिष्कार।

द्विवेदी जी का योगदान: वे लेखकों की रचनाओं को सुधारकर छापते थे, व्याकरण और विराम चिह्नों पर ज़ोर देते थे, और नए विषयों – इतिहास, विज्ञान, अर्थशास्त्र – पर लेख लिखवाते थे। इसी कारण हिन्दी गद्य में स्थिरता आई। मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों को उन्होंने आगे बढ़ाया।

प्रमुख साहित्यकार

साहित्यकारप्रमुख रचनाएँ
मैथिलीशरण गुप्तभारत-भारती, साकेत, यशोधरा
अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध"प्रियप्रवास (खड़ी बोली का प्रसिद्ध महाकाव्य)
श्रीधर पाठकखड़ी बोली कविता के आरंभिक कवि
रामनरेश त्रिपाठीपथिक, मिलन, स्वप्न
नाथूराम शर्मा "शंकर", गयाप्रसाद शुक्ल "सनेही"राष्ट्रीय-सामाजिक कविता

छायावाद युग – प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

लगभग 1918 से 1936 तक की कविता को छायावाद कहा जाता है। द्विवेदी युग की रूखी, उपदेशात्मक कविता की प्रतिक्रिया में भावुक, कल्पनाशील और सौंदर्यपूर्ण कविता का जन्म हुआ। आचार्य शुक्ल ने इसे काव्य-शैली की दृष्टि से देखा, जबकि बाद के आलोचकों ने इसे स्वच्छंदतावादी कविता माना। यह खड़ी बोली कविता का स्वर्ण युग माना जाता है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  1. आत्माभिव्यक्ति और व्यक्तिवाद – कवि अपने सुख-दुःख को खुलकर कहता है।
  2. प्रकृति का मानवीकरण – प्रकृति को सजीव, चेतन रूप में देखना।
  3. प्रेम और सौंदर्य – सूक्ष्म, मानसिक और आदर्श प्रेम।
  4. रहस्यवाद – अज्ञात प्रियतम (ईश्वर) के प्रति जिज्ञासा और वेदना (महादेवी)।
  5. वेदना और करुणा।
  6. नारी के प्रति सम्मान – "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो" जैसी भावना।
  7. लाक्षणिकता, प्रतीक, चित्रात्मक भाषा, संस्कृत-निष्ठ कोमल शब्दावली, मुक्त छंद का प्रयोग (निराला)।

छायावाद के चार स्तंभ

कविप्रमुख रचनाएँ
जयशंकर प्रसादकामायनी, आँसू, लहर, झरना
सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"परिमल, अनामिका, राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति
सुमित्रानंदन पंतपल्लव, गुंजन, ग्राम्या
महादेवी वर्मानीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत, दीपशिखा (यामा संकलन)
परीक्षा टिप: तीनों युगों की तुलना एक तालिका में करें – भाषा (ब्रज → खड़ी बोली → कोमल खड़ी बोली), स्वर (जागरण → सुधार/आदर्श → भावुकता/कल्पना), प्रमुख कवि।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भारतेन्दु युग की प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन करते हुए इस युग के प्रमुख साहित्यकारों का परिचय दीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) छायावाद से क्या अभिप्राय है? छायावादी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) महावीर प्रसाद द्विवेदी और 'सरस्वती' पत्रिका – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) द्विवेदी युग की इतिवृत्तात्मकता को स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) छायावाद के चार स्तंभ और उनकी प्रमुख रचनाएँ बताइए।

RTMNU BA Sem 4 · BAHLT Major T-7-104 · इकाई III

इकाई III: छायावादोत्तर युग

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार
  • प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार
  • समकालीन कविता- प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

प्रगतिवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

छायावाद के बाद, लगभग 1936 से, हिन्दी कविता में जो सामाजिक और यथार्थवादी धारा आई उसे प्रगतिवाद कहते हैं। 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ का पहला अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की। प्रगतिवाद पर मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव है। इसे राजनीति में साम्यवाद और साहित्य में प्रगतिवाद कहा गया।

परिभाषा (सरल): जो कविता शोषित, गरीब, किसान और मज़दूर के पक्ष में खड़ी होकर समाज में समानता और परिवर्तन की बात करे, वह प्रगतिवादी कविता है।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  1. शोषितों के प्रति सहानुभूति – किसान, मज़दूर, गरीब का यथार्थ चित्रण।
  2. पूँजीवाद और शोषण का विरोध – धनी-निर्धन की खाई पर प्रहार।
  3. क्रांति और परिवर्तन का स्वर।
  4. धर्म, रूढ़ि और भाग्यवाद का विरोध; वैज्ञानिक दृष्टि।
  5. यथार्थवाद – कल्पना और रहस्य की जगह जीवन की ठोस सच्चाई।
  6. मानवतावाद और अंतरराष्ट्रीयता।
  7. सरल, बोलचाल की भाषा; लोकगीतों की लय; व्यंग्य।

प्रमुख साहित्यकार

कविप्रमुख रचनाएँ / पहचान
नागार्जुनयुगधारा, सतरंगे पंखों वाली; जनकवि
केदारनाथ अग्रवालयुग की गंगा, फूल नहीं रंग बोलते हैं; बुंदेलखंड के किसान
त्रिलोचनधरती, ताप के ताये हुए दिन; सॉनेट
रामविलास शर्माकवि और प्रमुख मार्क्सवादी आलोचक
शिवमंगल सिंह "सुमन"हिल्लोल, जीवन के गान
रांगेय राघवकविता के साथ कथा-साहित्य

पंत की "ग्राम्या" और निराला की "कुकुरमुत्ता", "भिक्षुक", "वह तोड़ती पत्थर" जैसी कविताओं में भी प्रगतिशील स्वर मिलता है।

सीमाएँ: कुछ कविताएँ नारेबाज़ी और प्रचार जैसी हो गईं; कलात्मकता कहीं-कहीं कम हुई।

प्रयोगवाद की प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

1943 में अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) के संपादन में "तार सप्तक" प्रकाशित हुआ। इसमें सात कवियों की कविताएँ थीं। अज्ञेय ने इन कवियों को "राहों के अन्वेषी" कहा। इन्होंने कविता के विषय, भाषा, शिल्प और प्रतीकों में नए प्रयोग किए, इसलिए इसे प्रयोगवाद कहा गया।

सप्तकप्रमुख कवि
तार सप्तक (1943)अज्ञेय, मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा
दूसरा सप्तक (1951)भवानीप्रसाद मिश्र, शमशेर बहादुर सिंह, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय आदि
तीसरा सप्तक (1959)कुँवर नारायण, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह आदि

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  • नए प्रयोग – भाषा, बिंब, प्रतीक, छंद सबमें नयापन।
  • व्यक्तिवाद और अहं – व्यक्ति के अकेलेपन, कुंठा, तनाव की अभिव्यक्ति।
  • बौद्धिकता – भावुकता की जगह विचार और तर्क।
  • क्षणवाद – जीवन के छोटे-छोटे क्षणों का महत्व।
  • मुक्त छंद, नए उपमान – पुराने उपमानों को "मैले" बताकर नए उपमानों की खोज।
  • यथार्थ और लघु मानव – सामान्य मनुष्य का संघर्ष।

1950 के आसपास यही धारा नई कविता के रूप में आगे बढ़ी। 1954 में "नई कविता" नामक पत्रिका भी निकली। मुक्तिबोध ("चाँद का मुँह टेढ़ा है"), अज्ञेय ("हरी घास पर क्षण भर", "बावरा अहेरी"), शमशेर, भवानीप्रसाद मिश्र इसके प्रमुख कवि हैं।

समकालीन कविता – प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं साहित्यकार

लगभग 1960 के बाद से आज तक की कविता को व्यापक रूप में समकालीन कविता कहा जाता है। इस बीच अकविता, विद्रोही कविता, जनवादी कविता जैसे कई आंदोलन आए। मोहभंग (स्वतंत्रता के बाद सपनों का टूटना), भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, महँगाई और राजनीतिक पाखंड इसके प्रमुख विषय बने। बाद में दलित, स्त्री और आदिवासी स्वर भी इसमें प्रमुख हुए।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  1. मोहभंग और आक्रोश – व्यवस्था के प्रति तीखा असंतोष।
  2. राजनीतिक चेतना और व्यंग्य।
  3. आम आदमी की पीड़ा – रोज़मर्रा का जीवन, शहर और गाँव का यथार्थ।
  4. सपाटबयानी – सीधी, बोलचाल की भाषा; अलंकार कम।
  5. अस्मितामूलक स्वर – स्त्री, दलित, आदिवासी चेतना।
  6. बाज़ारवाद और वैश्वीकरण पर प्रश्न।

प्रमुख साहित्यकार

कविप्रमुख रचना
सुदामा पांडेय "धूमिल"संसद से सड़क तक
रघुवीर सहायआत्महत्या के विरुद्ध, हँसो हँसो जल्दी हँसो
केदारनाथ सिंहअकाल में सारस, बाघ
कुँवर नारायणआत्मजयी, कोई दूसरा नहीं
सर्वेश्वरदयाल सक्सेनाकुआनो नदी, खूँटियों पर टँगे लोग
राजेश जोशी, अरुण कमल, मंगलेश डबरालनई पीढ़ी के प्रमुख कवि
परीक्षा टिप: प्रगतिवाद = समाज/मार्क्सवाद; प्रयोगवाद = व्यक्ति/शिल्प के प्रयोग; समकालीन कविता = मोहभंग और आम आदमी। इस एक पंक्ति से तीनों का अंतर याद रखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) प्रगतिवाद से आप क्या समझते हैं? प्रगतिवादी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों और कवियों का परिचय दीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) प्रयोगवाद की प्रमुख विशेषताएँ बताते हुए 'तार सप्तक' के महत्व पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) तार सप्तक – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) समकालीन कविता में मोहभंग का स्वर स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) प्रगतिवाद और प्रयोगवाद में अंतर बताइए।

RTMNU BA Sem 4 · BAHLT Major T-7-104 · इकाई IV

इकाई IV: आधुनिक गद्य साहित्य – सामान्य परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध, संस्मरण
  • रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रा वृत्तांत
  • जीवनी और आत्मकथा- परिचय एवं विकास

उपन्यास, कहानी, नाटक, एकांकी, निबंध, संस्मरण

1. उपन्यास

उपन्यास जीवन की विस्तृत कथा है जिसमें अनेक पात्र और घटनाएँ होती हैं। आचार्य शुक्ल ने लाला श्रीनिवास दास के "परीक्षा गुरु" (1882) को अंग्रेज़ी ढंग का पहला हिन्दी मौलिक उपन्यास माना। आरंभ में देवकीनंदन खत्री (चंद्रकांता) के तिलस्मी-ऐयारी और किशोरीलाल गोस्वामी के सामाजिक उपन्यास लोकप्रिय हुए।

  • प्रेमचंद युग: प्रेमचंद ने उपन्यास को यथार्थ और जनजीवन से जोड़ा – सेवासदन, रंगभूमि, गबन, कर्मभूमि, गोदान।
  • प्रेमचंदोत्तर: जैनेन्द्र (त्यागपत्र), अज्ञेय (शेखर: एक जीवनी) – मनोवैज्ञानिक उपन्यास; यशपाल (झूठा सच) – यथार्थवादी; फणीश्वरनाथ रेणु (मैला आँचल) – आंचलिक उपन्यास।
  • स्वातंत्र्योत्तर: हजारीप्रसाद द्विवेदी (बाणभट्ट की आत्मकथा), भीष्म साहनी (तमस), श्रीलाल शुक्ल (राग दरबारी), मन्नू भंडारी (आपका बंटी)।

2. कहानी

कहानी जीवन के किसी एक प्रसंग या संवेदना पर केंद्रित छोटी कथा है। आरंभिक कहानियों में किशोरीलाल गोस्वामी की "इंदुमती" (सरस्वती, 1900) की चर्चा होती है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी की "उसने कहा था" (1915) शिल्प की दृष्टि से बहुत प्रसिद्ध है। प्रेमचंद (पूस की रात, कफ़न, ईदगाह) और जयशंकर प्रसाद (आकाशदीप, पुरस्कार) ने कहानी को ऊँचाई दी। 1950 के बाद "नई कहानी" आंदोलन में मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, निर्मल वर्मा प्रमुख रहे। बाद में सचेतन, समांतर, जनवादी कहानी आदि धाराएँ आईं।

3. नाटक

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी नाटक के वास्तविक प्रवर्तक हैं (भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी)। जयशंकर प्रसाद ने ऐतिहासिक नाटक लिखे – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी। लक्ष्मीनारायण मिश्र ने समस्या नाटक लिखे। स्वतंत्रता के बाद मोहन राकेश (आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे), धर्मवीर भारती (अंधा युग – गीतिनाट्य), जगदीशचंद्र माथुर (कोणार्क) और सुरेन्द्र वर्मा ने रंगमंच को नई दिशा दी।

4. एकांकी

एकांकी एक अंक का छोटा नाटक है जिसमें एक ही घटना और सीमित पात्र होते हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा को हिन्दी एकांकी का जनक माना जाता है (पृथ्वीराज की आँखें, दीपदान, रेशमी टाई)। भुवनेश्वर (ताँबे के कीड़े), उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्ट, सेठ गोविंददास, विष्णु प्रभाकर प्रमुख एकांकीकार हैं। रेडियो के कारण एकांकी का बहुत विकास हुआ।

5. निबंध

निबंध किसी विषय पर लेखक के विचारों की व्यवस्थित गद्य अभिव्यक्ति है। भारतेन्दु युग में बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र ने हल्के-फुल्के, व्यंग्यपूर्ण निबंध लिखे। सरदार पूर्णसिंह के भावात्मक निबंध (मज़दूरी और प्रेम) प्रसिद्ध हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का "चिंतामणि" विचारात्मक निबंध का शिखर है। हजारीप्रसाद द्विवेदी (अशोक के फूल, कुटज) ललित निबंध के प्रमुख लेखक हैं; विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय ने यह परंपरा आगे बढ़ाई। हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य निबंध को लोकप्रिय बनाया।

6. संस्मरण

संस्मरण में लेखक अपनी स्मृति के आधार पर किसी व्यक्ति, घटना या स्थान का भावपूर्ण चित्र देता है। महादेवी वर्मा (अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी), बनारसीदास चतुर्वेदी, रामवृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र "प्रभाकर" प्रमुख संस्मरणकार हैं।

रेखाचित्र, रिपोर्ताज, यात्रा वृत्तांत

रेखाचित्र

रेखाचित्र शब्दों से बनाया गया किसी व्यक्ति या वस्तु का चित्र है – जैसे चित्रकार रेखाओं से चित्र बनाता है। इसमें कथा कम, चित्रण अधिक होता है। रामवृक्ष बेनीपुरी (माटी की मूरतें), महादेवी वर्मा, श्रीराम शर्मा और प्रकाशचंद्र गुप्त प्रमुख रेखाचित्रकार हैं।

संस्मरणरेखाचित्र
स्मृति पर आधारित, लेखक स्वयं उपस्थितवर्णन पर आधारित, लेखक तटस्थ हो सकता है
घटनाओं का क्रम महत्वपूर्णव्यक्तित्व की रेखाएँ महत्वपूर्ण

रिपोर्ताज

रिपोर्ताज (फ्रांसीसी शब्द) किसी घटना का आँखों देखा, साहित्यिक और भावपूर्ण विवरण है। इसमें पत्रकारिता की सच्चाई और साहित्य की संवेदना दोनों होती हैं। रांगेय राघव का बंगाल अकाल पर आधारित "तूफ़ानों के बीच" प्रसिद्ध है। प्रकाशचंद्र गुप्त, फणीश्वरनाथ रेणु और धर्मवीर भारती ने भी रिपोर्ताज लिखे।

यात्रा वृत्तांत

यात्रा के अनुभव, स्थान, लोग और संस्कृति का रोचक वर्णन यात्रा वृत्तांत कहलाता है। भारतेन्दु ने आरंभिक यात्रा-लेख लिखे। राहुल सांकृत्यायन को यात्रा साहित्य का शिखर पुरुष माना जाता है (मेरी तिब्बत यात्रा, घुमक्कड़ शास्त्र)। अज्ञेय (अरे यायावर रहेगा याद), निर्मल वर्मा (चीड़ों पर चाँदनी), मोहन राकेश (आख़िरी चट्टान तक) प्रमुख हैं।

जीवनी और आत्मकथा – परिचय एवं विकास

जीवनी

जब कोई लेखक किसी दूसरे महान व्यक्ति के जीवन का प्रामाणिक वर्णन करता है, तो वह जीवनी है। इसमें तथ्य, निष्पक्षता और रोचकता ज़रूरी हैं। अमृतराय की "कलम का सिपाही" (प्रेमचंद की जीवनी) और विष्णु प्रभाकर की "आवारा मसीहा" (शरतचंद्र की जीवनी) हिन्दी की श्रेष्ठ जीवनियाँ हैं। रामविलास शर्मा की "निराला की साहित्य साधना" भी महत्वपूर्ण है।

आत्मकथा

जब लेखक स्वयं अपने जीवन की कहानी लिखता है, तो वह आत्मकथा है। इसमें ईमानदारी और आत्म-स्वीकृति सबसे बड़ा गुण है। बनारसीदास जैन का "अर्धकथानक" हिन्दी की पहली आत्मकथा मानी जाती है (पद्य में)। आधुनिक काल में श्यामसुंदर दास (मेरी आत्मकहानी), बाबू गुलाबराय (मेरी असफलताएँ), राहुल सांकृत्यायन (मेरी जीवन यात्रा) और हरिवंशराय बच्चन (क्या भूलूँ क्या याद करूँ – चार खंडों में) की आत्मकथाएँ प्रसिद्ध हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की "जूठन" दलित आत्मकथा के रूप में चर्चित है; मन्नू भंडारी की "एक कहानी यह भी" स्त्री आत्मकथा का अच्छा उदाहरण है।

जीवनीआत्मकथा
दूसरे व्यक्ति के जीवन परस्वयं के जीवन पर
शोध और तथ्य संग्रह आवश्यकस्मृति और आत्म-अनुभव पर आधारित
अन्य पुरुष मेंउत्तम पुरुष ("मैं") में
परीक्षा टिप: हर विधा के लिए – परिभाषा, दो-तीन विशेषताएँ, प्रमुख लेखक और उनकी एक-एक रचना – इसी ढाँचे में उत्तर लिखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी उपन्यास के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी निबंध अथवा हिन्दी नाटक के विकास का परिचय दीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) रेखाचित्र और संस्मरण में अंतर स्पष्ट कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) रिपोर्ताज – टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) जीवनी और आत्मकथा में अंतर बताते हुए दो प्रसिद्ध आत्मकथाओं के नाम लिखिए।