पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- नाटक का उद्भव तथा विकास
- नाटक के तत्व
- नाटक का स्वरूप तथा प्रकार
नाटक का उद्भव तथा विकास
नाटक दृश्य काव्य है – इसे पढ़ने के साथ-साथ मंच पर देखा जाता है। भारतीय परंपरा में भरतमुनि के "नाट्यशास्त्र" को नाटक का आधार-ग्रंथ माना जाता है। इसमें नाटक को "पंचम वेद" कहा गया है, जिसे सभी वर्णों के लोग देख-सुन सकें।
विकास की यात्रा
- संस्कृत नाटक: भास, कालिदास (अभिज्ञानशाकुंतलम्), शूद्रक (मृच्छकटिकम्), भवभूति (उत्तररामचरितम्), विशाखदत्त (मुद्राराक्षस) आदि।
- लोकनाट्य: मध्यकाल में रामलीला, रासलीला, नौटंकी, स्वाँग, ख्याल, यक्षगान जैसे लोकनाट्य जनता में लोकप्रिय रहे।
- ब्रजभाषा के आरंभिक नाटक: रीतिकाल में कुछ पद्यबद्ध नाटक लिखे गए, जैसे रीवा नरेश विश्वनाथ सिंह का "आनंद रघुनंदन"। भारतेन्दु ने अपने पिता गोपालचंद्र "गिरिधरदास" के "नहुष" को हिन्दी का पहला नाटक माना है।
- पारसी रंगमंच: उन्नीसवीं सदी में पारसी नाटक कंपनियाँ लोकप्रिय हुईं; इनमें मनोरंजन और चमत्कार अधिक था।
- भारतेन्दु युग: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी नाटक को साहित्यिक और सामाजिक उद्देश्य दिया; मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के नाटक लिखे। इसलिए वे हिन्दी नाटक के जनक माने जाते हैं।
- प्रसाद युग: जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी।
- प्रसादोत्तर और स्वातंत्र्योत्तर: लक्ष्मीनारायण मिश्र (समस्या नाटक), जगदीशचंद्र माथुर, मोहन राकेश (आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे), धर्मवीर भारती (अंधा युग) आदि।
भारतेन्दु का विशेष योगदान
भारतेन्दु ने केवल नाटक लिखे ही नहीं, उन्हें मंच पर खेला भी और स्वयं अभिनय भी किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी नाटकों के अनुवाद किए, "नाटक" नामक निबंध में नाट्य-सिद्धांत समझाए और पारसी रंगमंच की सस्ती चमक के स्थान पर उद्देश्यपूर्ण, जनजागरण करने वाला रंगमंच खड़ा किया। उनके नाटकों में देशप्रेम, समाज सुधार और व्यंग्य – तीनों मिलते हैं।
नाटक के तत्व
भारतीय आचार्यों ने नाटक के तीन मुख्य तत्व माने – वस्तु, नेता और रस। आधुनिक (पाश्चात्य प्रभाव वाली) दृष्टि से नाटक के छह-सात तत्व माने जाते हैं:
| तत्व | अर्थ |
|---|---|
| कथावस्तु | नाटक की कहानी; आधिकारिक (मुख्य) और प्रासंगिक (सहायक) कथा |
| पात्र एवं चरित्र-चित्रण | नायक, नायिका, प्रतिनायक, सहायक पात्र; उनके स्वभाव का विकास |
| संवाद (कथोपकथन) | पात्रों की बातचीत; छोटे, सजीव, पात्रानुकूल संवाद |
| देशकाल एवं वातावरण | समय, स्थान, वेशभूषा, रीति-रिवाज का सही चित्रण |
| भाषा-शैली | सरल, प्रभावशाली, पात्र और स्थिति के अनुकूल भाषा |
| उद्देश्य | नाटक का संदेश या जीवन-दृष्टि |
| अभिनेयता / रंगमंचीयता | मंच पर खेले जाने की क्षमता – नाटक का विशेष तत्व |
नाटक का स्वरूप तथा प्रकार
स्वरूप
नाटक में कथा को पात्रों के संवाद और अभिनय के माध्यम से दर्शकों के सामने प्रत्यक्ष किया जाता है। इसमें लेखक स्वयं कुछ नहीं कहता; सब कुछ पात्रों और रंग-निर्देशों से व्यक्त होता है। नाटक अंकों और दृश्यों में बँटा होता है। यह सामूहिक कला है – इसमें लेखक, निर्देशक, अभिनेता, मंच-सज्जा और दर्शक सब जुड़े होते हैं।
- दृश्य और श्रव्य दोनों – आँख और कान से अनुभव।
- संघर्ष (द्वंद्व) नाटक का प्राण है।
- सीमित समय में प्रभाव उत्पन्न करना।
- भारतीय नाटक प्रायः सुखांत, पाश्चात्य नाटकों में दुखांत (ट्रेजडी) भी।
प्रकार
(क) शास्त्रीय दृष्टि से: संस्कृत आचार्यों ने दृश्य काव्य को रूपक और उपरूपक में बाँटा। रूपक के दस भेद हैं – नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अंक, वीथी और प्रहसन (हास्य-प्रधान)। भारतेन्दु ने भी अपने निबंध "नाटक" में इन भेदों की चर्चा की है।
(ख) विषय के आधार पर:
- पौराणिक नाटक – सत्य हरिश्चन्द्र
- ऐतिहासिक नाटक – चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त
- सामाजिक / समस्या नाटक – लक्ष्मीनारायण मिश्र के नाटक
- प्रतीकात्मक नाटक – भारत दुर्दशा
- हास्य-व्यंग्य (प्रहसन) – अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति
(ग) रूप के आधार पर: पूर्णकालिक नाटक, एकांकी, गीतिनाट्य (अंधा युग), नुक्कड़ नाटक, रेडियो नाटक, नृत्य-नाटिका।
(घ) अंत के आधार पर: सुखांत, दुखांत और प्रसादांत (मिश्रित)।
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी नाटक के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाटक के प्रमुख तत्वों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) रूपक के दस भेद लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) नाटक में अभिनेयता का महत्व स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) विषय के आधार पर नाटक के प्रकार बताइए।