पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- सौंदर्य चित्रण
- बहुज्ञता
- संयोग वियोग निरूपण
- काव्य सौंदर्य, अलंकार योजना, भाषा शैली
बिहारी : जीवन परिचय और रचना संसार
बिहारी रीतिकाल के सबसे लोकप्रिय कवि हैं और 'रीतिसिद्ध' कवियों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म संवत 1652 (सन 1595) के आसपास ग्वालियर के पास हुआ। उनका बचपन बुंदेलखंड में और युवावस्था मथुरा में बीती। वे जयपुर (आमेर) के राजा मिर्जा राजा जयसिंह के आश्रित कवि थे।
रचना: बिहारी की एकमात्र रचना 'बिहारी सतसई' है। इसमें लगभग सात सौ दोहे हैं (विभिन्न प्रतियों में संख्या थोड़ी अलग मिलती है)। एक ही रचना से अमर हो जाने वाले कवि के रूप में बिहारी का नाम लिया जाता है। सतसई पर अनेक टीकाएँ लिखी गईं; जगन्नाथदास 'रत्नाकर' की 'बिहारी रत्नाकर' प्रसिद्ध टीका है।
रचना दृष्टि: बिहारी का मुख्य विषय शृंगार है, परंतु उनके दोहों में भक्ति और नीति भी है। उनकी दृष्टि कलात्मक है – कम शब्दों में अधिक अर्थ भरना उनकी विशेषता है। इसी कारण उनके दोहों के बारे में कहा गया कि वे 'गागर में सागर' भरते हैं और 'देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर'।
भक्ति और नीति पक्ष
बिहारी केवल शृंगारी कवि नहीं हैं। सतसई के आरंभ में ही राधा की वंदना है। उनके भक्ति दोहों में राधा-कृष्ण के प्रति समर्पण और ईश्वर पर पूरा भरोसा दिखाई देता है। नीति दोहों में वे संगति, विनम्रता, धन के मद, दिखावे की भक्ति और दुष्ट स्वभाव जैसे विषयों पर जीवन के अनुभव से भरी सीख देते हैं। पाठ्यक्रम के दस दोहे इसी भक्ति और नीति पक्ष से लिए गए हैं।
सौंदर्य चित्रण
- बिहारी नायिका के रूप-सौंदर्य के कुशल चितेरे हैं। नायिका के अंगों की कांति, चाल, मुस्कान, लज्जा और हाव-भाव का सूक्ष्म चित्रण करते हैं।
- वे सौंदर्य को स्थिर नहीं, गतिशील रूप में दिखाते हैं – पल-पल बदलती छवि।
- सौंदर्य वर्णन में ऊहात्मकता (कल्पना की ऊँची उड़ान) भी मिलती है।
- प्रकृति सौंदर्य प्रायः उद्दीपन रूप में आता है – ऋतुएँ, चाँदनी, वसंत।
बहुज्ञता
बिहारी अनेक विषयों के ज्ञाता थे। उनके दोहों में ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद (वैद्यक), दर्शन, पुराण, इतिहास, संगीत, चित्रकला और लोक-व्यवहार का ज्ञान झलकता है। उदाहरण के लिए एक नीति दोहे में बुरे ग्रहों की शांति के लिए जप-दान की परंपरा का उल्लेख है, तो दूसरे में पानी के नल का वैज्ञानिक-सा दृष्टांत। इसी बहुज्ञता के कारण उनके दोहे विद्वानों को भी चमत्कृत करते हैं।
संयोग और वियोग निरूपण
संयोग शृंगार
संयोग में बिहारी ने नायक-नायिका की चेष्टाओं, आँखों के संकेत, हँसी-मज़ाक, लुका-छिपी और प्रेम-क्रीड़ा का चित्रण किया है। भरी सभा में केवल आँखों से बात करने जैसे प्रसंग उनकी सूक्ष्म दृष्टि के उदाहरण हैं।
वियोग (विप्रलंभ) शृंगार
वियोग वर्णन में बिहारी ने विरहिणी की दुर्बलता, ताप और व्याकुलता का अतिशयोक्तिपूर्ण चित्र खींचा है। कहीं विरहिणी इतनी दुबली हो गई है कि साँस के साथ आगे-पीछे झूलती है, कहीं उसके ताप से गुलाबजल सूख जाता है। आलोचकों का मत है कि इन वर्णनों में चमत्कार अधिक और सच्ची वेदना कम है।
काव्य सौंदर्य, अलंकार योजना एवं भाषा शैली
काव्य सौंदर्य
- भाव पक्ष और कला पक्ष का सुंदर संतुलन।
- समास शक्ति (कम शब्दों में अधिक अर्थ) और कल्पना की समाहार शक्ति।
- मुक्तक शैली – हर दोहा अपने आप में पूर्ण।
अलंकार योजना
बिहारी अलंकारों के बादशाह कहे जा सकते हैं। उनके दोहों में श्लेष, यमक, अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, विरोधाभास और असंगति अलंकार स्वाभाविक रूप से आए हैं। उदाहरण: 'कनक-कनक' में यमक, 'नहिं पराग...' में अन्योक्ति, 'मेरी भव बाधा हरौ' में श्लेष।
भाषा शैली
- भाषा साहित्यिक, परिष्कृत ब्रजभाषा है, जिसमें बुंदेली के शब्द और कहीं-कहीं अरबी-फ़ारसी शब्द भी हैं।
- छंद – दोहा (कुछ सोरठे भी)।
- मुहावरों और लोकोक्तियों का सटीक प्रयोग।
- चित्रात्मकता, नाद-सौंदर्य और वक्रता।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| काल | रीतिकाल |
| वर्ग | रीतिसिद्ध कवि |
| आश्रयदाता | मिर्जा राजा जयसिंह (आमेर/जयपुर) |
| रचना | बिहारी सतसई |
| भाषा / छंद | ब्रजभाषा / दोहा |
| विषय | शृंगार, भक्ति, नीति |
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है' – इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) बिहारी के काव्य में संयोग और वियोग शृंगार का निरूपण स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी की बहुज्ञता – टिप्पणी लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी की अलंकार योजना – टिप्पणी लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी सतसई – टिप्पणी लिखिए।