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बिहारी BAHLT Major T-6-103

RTMNU BA Semester 3 · Hindi Literature (हिन्दी साहित्य) · 2 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Literature (हिन्दी साहित्य)
SemesterSemester III
Paper codeBAHLT Major T-6-103
Paper titleबिहारी
CategoryMajor T-6 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits2 credits (theory, 2 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा: 40 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 10 अंक = 50; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 20
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Literature Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: रचना दृष्टि और रचना संसारNotes
  2. 2इकाई II: बिहारी के दोहेNotes

RTMNU BA Sem 3 · BAHLT Major T-6-103 · इकाई I

इकाई I: रचना दृष्टि और रचना संसार

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • सौंदर्य चित्रण
  • बहुज्ञता
  • संयोग वियोग निरूपण
  • काव्य सौंदर्य, अलंकार योजना, भाषा शैली

बिहारी : जीवन परिचय और रचना संसार

बिहारी रीतिकाल के सबसे लोकप्रिय कवि हैं और 'रीतिसिद्ध' कवियों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म संवत 1652 (सन 1595) के आसपास ग्वालियर के पास हुआ। उनका बचपन बुंदेलखंड में और युवावस्था मथुरा में बीती। वे जयपुर (आमेर) के राजा मिर्जा राजा जयसिंह के आश्रित कवि थे।

रचना: बिहारी की एकमात्र रचना 'बिहारी सतसई' है। इसमें लगभग सात सौ दोहे हैं (विभिन्न प्रतियों में संख्या थोड़ी अलग मिलती है)। एक ही रचना से अमर हो जाने वाले कवि के रूप में बिहारी का नाम लिया जाता है। सतसई पर अनेक टीकाएँ लिखी गईं; जगन्नाथदास 'रत्नाकर' की 'बिहारी रत्नाकर' प्रसिद्ध टीका है।

रचना दृष्टि: बिहारी का मुख्य विषय शृंगार है, परंतु उनके दोहों में भक्ति और नीति भी है। उनकी दृष्टि कलात्मक है – कम शब्दों में अधिक अर्थ भरना उनकी विशेषता है। इसी कारण उनके दोहों के बारे में कहा गया कि वे 'गागर में सागर' भरते हैं और 'देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर'।

भक्ति और नीति पक्ष

बिहारी केवल शृंगारी कवि नहीं हैं। सतसई के आरंभ में ही राधा की वंदना है। उनके भक्ति दोहों में राधा-कृष्ण के प्रति समर्पण और ईश्वर पर पूरा भरोसा दिखाई देता है। नीति दोहों में वे संगति, विनम्रता, धन के मद, दिखावे की भक्ति और दुष्ट स्वभाव जैसे विषयों पर जीवन के अनुभव से भरी सीख देते हैं। पाठ्यक्रम के दस दोहे इसी भक्ति और नीति पक्ष से लिए गए हैं।

सौंदर्य चित्रण

  • बिहारी नायिका के रूप-सौंदर्य के कुशल चितेरे हैं। नायिका के अंगों की कांति, चाल, मुस्कान, लज्जा और हाव-भाव का सूक्ष्म चित्रण करते हैं।
  • वे सौंदर्य को स्थिर नहीं, गतिशील रूप में दिखाते हैं – पल-पल बदलती छवि।
  • सौंदर्य वर्णन में ऊहात्मकता (कल्पना की ऊँची उड़ान) भी मिलती है।
  • प्रकृति सौंदर्य प्रायः उद्दीपन रूप में आता है – ऋतुएँ, चाँदनी, वसंत।

बहुज्ञता

बिहारी अनेक विषयों के ज्ञाता थे। उनके दोहों में ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद (वैद्यक), दर्शन, पुराण, इतिहास, संगीत, चित्रकला और लोक-व्यवहार का ज्ञान झलकता है। उदाहरण के लिए एक नीति दोहे में बुरे ग्रहों की शांति के लिए जप-दान की परंपरा का उल्लेख है, तो दूसरे में पानी के नल का वैज्ञानिक-सा दृष्टांत। इसी बहुज्ञता के कारण उनके दोहे विद्वानों को भी चमत्कृत करते हैं।

संयोग और वियोग निरूपण

संयोग शृंगार

संयोग में बिहारी ने नायक-नायिका की चेष्टाओं, आँखों के संकेत, हँसी-मज़ाक, लुका-छिपी और प्रेम-क्रीड़ा का चित्रण किया है। भरी सभा में केवल आँखों से बात करने जैसे प्रसंग उनकी सूक्ष्म दृष्टि के उदाहरण हैं।

वियोग (विप्रलंभ) शृंगार

वियोग वर्णन में बिहारी ने विरहिणी की दुर्बलता, ताप और व्याकुलता का अतिशयोक्तिपूर्ण चित्र खींचा है। कहीं विरहिणी इतनी दुबली हो गई है कि साँस के साथ आगे-पीछे झूलती है, कहीं उसके ताप से गुलाबजल सूख जाता है। आलोचकों का मत है कि इन वर्णनों में चमत्कार अधिक और सच्ची वेदना कम है।

काव्य सौंदर्य, अलंकार योजना एवं भाषा शैली

काव्य सौंदर्य

  • भाव पक्ष और कला पक्ष का सुंदर संतुलन।
  • समास शक्ति (कम शब्दों में अधिक अर्थ) और कल्पना की समाहार शक्ति।
  • मुक्तक शैली – हर दोहा अपने आप में पूर्ण।

अलंकार योजना

बिहारी अलंकारों के बादशाह कहे जा सकते हैं। उनके दोहों में श्लेष, यमक, अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, विरोधाभास और असंगति अलंकार स्वाभाविक रूप से आए हैं। उदाहरण: 'कनक-कनक' में यमक, 'नहिं पराग...' में अन्योक्ति, 'मेरी भव बाधा हरौ' में श्लेष।

भाषा शैली

  • भाषा साहित्यिक, परिष्कृत ब्रजभाषा है, जिसमें बुंदेली के शब्द और कहीं-कहीं अरबी-फ़ारसी शब्द भी हैं।
  • छंद – दोहा (कुछ सोरठे भी)।
  • मुहावरों और लोकोक्तियों का सटीक प्रयोग।
  • चित्रात्मकता, नाद-सौंदर्य और वक्रता।
बिंदुविवरण
कालरीतिकाल
वर्गरीतिसिद्ध कवि
आश्रयदातामिर्जा राजा जयसिंह (आमेर/जयपुर)
रचनाबिहारी सतसई
भाषा / छंदब्रजभाषा / दोहा
विषयशृंगार, भक्ति, नीति
परीक्षा टिप: 'बिहारी गागर में सागर भरने वाले कवि हैं' – इस कथन पर प्रश्न बहुत आता है। उत्तर में समास शक्ति, अलंकार, बहुज्ञता और दोहों के उदाहरण दें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'बिहारी ने गागर में सागर भर दिया है' – इस कथन की सोदाहरण समीक्षा कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) बिहारी के काव्य में संयोग और वियोग शृंगार का निरूपण स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी की बहुज्ञता – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी की अलंकार योजना – टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी सतसई – टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 3 · BAHLT Major T-6-103 · इकाई II

इकाई II: बिहारी के दोहे

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • 1. मेरी भव बाधा हरो...
  • 2. नहि पराग नहि मधुर मधु...
  • 3. कनक-कनक ते सौ गुनी...
  • 4. नर की अरु...
  • 5. बसै बुराई जासु तन...
  • 6. जप माला छापा तिलक...
  • 7. संगति सुमति न पावई...
  • 8. कोऊ कोटिक संग्रही...
  • 9. गुनी गुनी सब कै...
  • 10. दीरघ साँस न लेहु...

पाठ्यक्रम में बिहारी सतसई के दस दोहे निर्धारित हैं। इनमें भक्ति और नीति दोनों प्रकार के दोहे हैं। नीचे हर दोहे का सरल भावार्थ और काव्यगत विशेषता दी गई है। मूल दोहे पाठ्य पुस्तक से कंठस्थ करें।

परीक्षा टिप: संदर्भ सहित व्याख्या में चार भाग लिखें – संदर्भ (कवि बिहारी, रचना बिहारी सतसई), प्रसंग, व्याख्या (भावार्थ), विशेष (अलंकार, भाषा ब्रज, छंद दोहा, रस)।

मेरी भव बाधा हरो...

विषय: भक्ति (मंगलाचरण)

भावार्थ: यह बिहारी सतसई का पहला दोहा है, जिसमें कवि राधा की वंदना करता है। कवि कहता है कि वे चतुर राधा मेरे सांसारिक कष्ट (भव-बाधा) दूर करें, जिनके गोरे शरीर की झलक पड़ते ही श्याम (कृष्ण) हरे-भरे अर्थात प्रसन्न हो जाते हैं।

विशेष: श्लेष अलंकार की छटा। 'हरित' के अर्थ हैं – हरा रंग और प्रसन्न; 'झाँईं' के अर्थ हैं – छाया/झलक और ध्यान। नीले (श्याम) रंग पर पीली (गोरी) आभा पड़ने से हरा रंग बनता है – यह बिहारी की बहुज्ञता (रंग-ज्ञान) का उदाहरण है। एक अर्थ यह भी लिया जाता है कि राधा के ध्यान से मन का श्यामपन (पाप) मिट जाता है।

नहि पराग नहि मधुर मधु...

विषय: अन्योक्ति / नीति

भावार्थ: न अभी कली में पराग है, न मीठा रस, न ही वह खिली है; भौंरा अभी से कली में ही उलझ गया है, तो आगे (फूल खिलने पर) उसका क्या हाल होगा?

विशेष: यह अन्योक्ति है। प्रसिद्ध है कि राजा जयसिंह अपनी नई, कम उम्र की रानी के प्रेम में डूबकर राजकाज भूल गए थे। बिहारी ने यह दोहा भेजकर उन्हें कर्तव्य की याद दिलाई। भौंरा = राजा, कली = नई रानी। सीख: मोह में कर्तव्य नहीं भूलना चाहिए।

कनक-कनक ते सौ गुनी...

विषय: नीति (धन का मद)

भावार्थ: सोने (कनक) में धतूरे (कनक) से सौ गुना अधिक नशा होता है। धतूरा खाने पर मनुष्य पागल होता है, पर सोना (धन) तो मिलने भर से मनुष्य बौरा जाता है।

विशेष: यमक अलंकार का प्रसिद्ध उदाहरण – 'कनक' शब्द दो बार, दो अलग अर्थों (सोना, धतूरा) में। व्यतिरेक भाव भी है। सीख: धन का घमंड सबसे बड़ा नशा है।

नर की अरु...

विषय: नीति (विनम्रता)

भावार्थ: मनुष्य और नल के पानी की गति एक जैसी है। नल का पानी जितना नीचे जाता है, उतना ही ऊँचा उठता है; उसी तरह मनुष्य जितना विनम्र होकर झुकता है, उतना ही ऊँचा (सम्मानित) होता है।

विशेष: दृष्टांत और उपमा का सुंदर प्रयोग। पानी के दबाव का यह वैज्ञानिक तथ्य बिहारी की बहुज्ञता दिखाता है। 'नीचौ' और 'ऊँचौ' में विरोध का चमत्कार है।

बसै बुराई जासु तन...

विषय: नीति (समाज का व्यवहार)

भावार्थ: जिसके स्वभाव में बुराई बसती है, संसार उसी का अधिक सम्मान करता है (डर के कारण)। भले व्यक्ति को लोग केवल 'भला है' कहकर छोड़ देते हैं, जैसे बुरे ग्रहों की शांति के लिए जप और दान किए जाते हैं, अच्छे ग्रहों के लिए नहीं।

विशेष: दृष्टांत अलंकार। ज्योतिष का ज्ञान (बहुज्ञता)। यह दोहा समाज की स्वार्थी और भयभीत मानसिकता पर व्यंग्य है।

जप माला छापा तिलक...

विषय: भक्ति / आडंबर विरोध

भावार्थ: जप, माला, छापा और तिलक से एक भी काम सिद्ध नहीं होता। कच्चे मन वाला व्यक्ति व्यर्थ ही नाचता है; राम तो सच्चे मन वाले पर ही प्रसन्न होते हैं।

विशेष: इस दोहे में बाहरी आडंबर का विरोध और मन की सच्चाई पर बल है – यह विचार कबीर की परंपरा से मेल खाता है। 'साँचै राँचै' में अनुप्रास।

संगति सुमति न पावई...

विषय: नीति (स्वभाव)

भावार्थ: जो लोग कुबुद्धि के धंधे में पड़ गए हैं, वे अच्छी संगति से भी सुबुद्धि नहीं पाते। हींग को कपूर में मिलाकर रख दो, फिर भी उसमें सुगंध नहीं आती।

विशेष: दृष्टांत अलंकार। सीख: दुष्ट का स्वभाव संगति से भी नहीं बदलता। हींग और कपूर का उदाहरण दैनिक जीवन से लिया गया है।

कोऊ कोटिक संग्रही...

विषय: भक्ति (ईश्वर ही धन)

भावार्थ: कोई करोड़ों का धन जोड़ता है, कोई लाखों-हज़ारों का। पर मेरी संपत्ति तो सदा विपत्ति का नाश करने वाले यदुपति (कृष्ण) ही हैं।

विशेष: भक्त का संतोष और ईश्वर पर पूरा भरोसा। सांसारिक धन नश्वर है, ईश्वर स्थायी धन है। 'बिपति-बिदारनहार' में अनुप्रास।

गुनी गुनी सब कै...

विषय: नीति (गुण की पहचान)

भावार्थ: सबके कहने से कोई गुणहीन व्यक्ति गुणी नहीं बन जाता। क्या कभी सुना है कि आक (अर्क) के पौधे से सूर्य (अर्क) जैसा प्रकाश निकला हो?

विशेष: यमक / श्लेष – 'अरक' का अर्थ आक का पौधा और सूर्य। दृष्टांत अलंकार। सीख: गुण नाम से नहीं, कर्म से आता है।

दीरघ साँस न लेहु...

विषय: भक्ति (ईश्वर पर भरोसा)

भावार्थ: दुख में लंबी साँसें मत लो और सुख में ईश्वर को मत भूलो। 'दई-दई' (हे भगवान) क्यों पुकारते हो? जो भगवान ने दिया है (दई), उसे स्वीकार कर लो।

विशेष: यमक अलंकार – 'दई' का अर्थ ईश्वर और 'दिया हुआ'। सुख-दुख में समभाव और ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने की सीख।

दोहामुख्य अलंकारसीख
मेरी भव बाधा हरोश्लेषराधा की वंदना
नहि पराग नहि मधुरअन्योक्तिमोह में कर्तव्य न भूलें
कनक-कनक ते सौ गुनीयमकधन का मद
नर की अरु नल-नीर कीदृष्टांतविनम्रता
गुनी गुनी सब कैयमक/श्लेषसच्चा गुण
दीरघ साँस न लेहुयमकईश्वर-इच्छा स्वीकार

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) पाठ्यक्रम में निर्धारित दोहों के आधार पर बिहारी के नीति काव्य की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) बिहारी के भक्ति संबंधी दोहों का भाव-सौंदर्य और कला-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) 'नहि पराग नहि मधुर मधु' दोहे का प्रसंग और भावार्थ लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) 'कनक-कनक ते सौ गुनी' दोहे में अलंकार स्पष्ट कीजिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) 'नर की अरु नल-नीर की' दोहे का भावार्थ लिखिए।