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मध्यकालीन काव्य BAHLT Major T-5-103

RTMNU BA Semester 3 · Hindi Literature (हिन्दी साहित्य) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Literature (हिन्दी साहित्य)
SemesterSemester III
Paper codeBAHLT Major T-5-103
Paper titleमध्यकालीन काव्य
CategoryMajor T-5 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits4 credits (theory, 4 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा 3 घंटे: 80 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 20 अंक = 100; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 40
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Literature Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: मध्यकाल के प्रमुख कवियों का जीवन परिचयNotes
  2. 2इकाई II: निर्गुण भक्तिकाव्य धाराNotes
  3. 3इकाई III: सगुण भक्ति काव्यधाराNotes
  4. 4इकाई IV: रीतिकालीन काव्यNotes

RTMNU BA Sem 3 · BAHLT Major T-5-103 · इकाई I

इकाई I: मध्यकाल के प्रमुख कवियों का जीवन परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • कबीरदास, जायसी, तुलसीदास, सूरदास – सामान्य परिचय, जीवन दर्शन, सामाजिक चिंतन

कबीरदास : सामान्य परिचय, जीवन दर्शन, सामाजिक चिंतन

जीवन परिचय: कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के सबसे बड़े कवि हैं। परंपरा के अनुसार उनका जन्म संवत 1455 (सन 1398) में काशी में और निधन मगहर में हुआ। उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपति ने किया। स्वामी रामानंद को उनका गुरु माना जाता है। पत्नी का नाम लोई तथा पुत्र-पुत्री के नाम कमाल और कमाली बताए जाते हैं।

रचना: कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उनकी वाणी का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने बीजक नाम से किया। इसके तीन भाग हैं – साखी, सबद और रमैनी।

जीवन दर्शन

  • ईश्वर निर्गुण, निराकार और घट-घट में व्याप्त है।
  • सच्ची भक्ति प्रेम और आत्मज्ञान से होती है, बाहरी आडंबर से नहीं।
  • गुरु ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है।
  • माया, अहंकार और विषय-वासना भक्ति के सबसे बड़े बाधक हैं।

सामाजिक चिंतन

कबीर समाज सुधारक कवि थे। उन्होंने जाति-पाँति, ऊँच-नीच, छुआछूत, मूर्तिपूजा, तीर्थ, रोज़ा-नमाज़ जैसे बाहरी कर्मकांड का खुलकर विरोध किया। हिंदू और मुसलमान दोनों के पाखंड पर उन्होंने समान रूप से व्यंग्य किया। वे मानवता, समानता और सच्चे आचरण के पक्षधर थे।

मलिक मुहम्मद जायसी : सामान्य परिचय, जीवन दर्शन, सामाजिक चिंतन

जीवन परिचय: जायसी भक्तिकाल की निर्गुण प्रेमाश्रयी (सूफी) शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। वे उत्तर प्रदेश के जायस नगर के निवासी थे, इसलिए 'जायसी' कहलाए। वे सूफी संतों की परंपरा से जुड़े थे।

प्रमुख रचनाएँ: पद्मावत (प्रसिद्ध प्रेमाख्यान महाकाव्य), अखरावट, आखिरी कलाम।

जीवन दर्शन

  • सूफी मत के अनुसार ईश्वर की प्राप्ति प्रेम से होती है। ईश्वर को प्रियतम (स्त्री रूप) और साधक को प्रेमी माना गया है।
  • लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से अलौकिक (आध्यात्मिक) प्रेम का संकेत दिया गया है।
  • प्रेम-मार्ग में विरह, त्याग और कष्ट सहना साधना का अंग है।

सामाजिक चिंतन

जायसी ने हिंदू घरों की कथा को लेकर हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। उनकी रचनाओं में लोक-जीवन, रीति-रिवाज, पर्व, ऋतुएँ और ग्रामीण संस्कृति का सजीव चित्र मिलता है। भाषा ठेठ अवधी है।

गोस्वामी तुलसीदास : सामान्य परिचय, जीवन दर्शन, सामाजिक चिंतन

जीवन परिचय: तुलसीदास सगुण भक्ति की रामभक्ति शाखा के शिरोमणि कवि हैं। प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म संवत 1589 (सन 1532) में हुआ और निधन संवत 1680 (सन 1623) में काशी में हुआ। पिता आत्माराम दुबे, माता हुलसी, गुरु नरहरिदास और पत्नी रत्नावली मानी जाती हैं। कहा जाता है कि पत्नी की फटकार से ही उनके मन में वैराग्य जागा।

प्रमुख रचनाएँ: रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्ण गीतावली, बरवै रामायण, जानकी मंगल, पार्वती मंगल।

जीवन दर्शन

  • राम सगुण-साकार ब्रह्म हैं; दास्य भाव की भक्ति श्रेष्ठ है।
  • ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय; शैव-वैष्णव, सगुण-निर्गुण का समन्वय।
  • मर्यादा, धर्म और लोकमंगल पर बल।

सामाजिक चिंतन

तुलसी ने आदर्श परिवार, आदर्श राजा और आदर्श समाज की कल्पना 'रामराज्य' के रूप में की। राम आदर्श पुत्र और राजा हैं, भरत आदर्श भाई, सीता आदर्श पत्नी। उन्होंने कलियुग के दोषों का वर्णन करके नैतिक जीवन की प्रेरणा दी। इसीलिए वे 'लोकनायक' कवि कहे जाते हैं।

सूरदास : सामान्य परिचय, जीवन दर्शन, सामाजिक चिंतन

जीवन परिचय: सूरदास कृष्णभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म संवत 1535 (सन 1478) में हुआ। वे वल्लभाचार्य के शिष्य थे और पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए। वे 'अष्टछाप' के प्रमुख कवि थे। वे नेत्रहीन थे, परंतु जन्मांध थे या नहीं, इस पर विद्वानों में मतभेद है।

प्रमुख रचनाएँ: सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी।

जीवन दर्शन

  • पुष्टिमार्ग : भगवान की कृपा (पुष्टि) ही मुक्ति का साधन है।
  • सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव की भक्ति।
  • ज्ञान और योग की तुलना में प्रेम-भक्ति श्रेष्ठ है (भ्रमरगीत इसका प्रमाण है)।

सामाजिक चिंतन

सूर ने ब्रज के ग्रामीण, सरल, प्रेममय जीवन का चित्र खींचा। गोप-गोपियों के सहज जीवन के माध्यम से उन्होंने बताया कि भक्ति के लिए शास्त्रज्ञान नहीं, निर्मल हृदय चाहिए। वात्सल्य और शृंगार के वे बेजोड़ कवि हैं।

कविधारा / शाखाप्रमुख रचनाभाषा
कबीरदासनिर्गुण – ज्ञानाश्रयीबीजकसधुक्कड़ी
जायसीनिर्गुण – प्रेमाश्रयी (सूफी)पद्मावतअवधी
तुलसीदाससगुण – रामभक्तिरामचरितमानसअवधी, ब्रज
सूरदाससगुण – कृष्णभक्तिसूरसागरब्रजभाषा
परीक्षा टिप: कवि पर प्रश्न आए तो क्रम रखें – जीवन परिचय, रचनाएँ, जीवन दर्शन, सामाजिक चिंतन, भाषा-शैली और अंत में साहित्य में स्थान।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भक्तिकाल के प्रमुख कवियों – कबीर, जायसी, तुलसी और सूर – के जीवन दर्शन की तुलनात्मक विवेचना कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) तुलसीदास के जीवन परिचय एवं सामाजिक चिंतन पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) कबीर का सामाजिक चिंतन – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) जायसी का सूफी दर्शन – टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) सूरदास और पुष्टिमार्ग – टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 3 · BAHLT Major T-5-103 · इकाई II

इकाई II: निर्गुण भक्तिकाव्य धारा

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • कबीर – हजारीप्रसाद द्विवेदी – पद संख्या 03, 19, 22, 24, 25, 28, 29, 59, 62, 67
  • जायसी – पद्मावत – नागमती वियोग खंड, संपादक – रामचन्द्र शुक्ल

कबीर – (संपादक: हजारीप्रसाद द्विवेदी) – पद संख्या 03, 19, 22, 24, 25, 28, 29, 59, 62, 67

पाठ्य पुस्तक: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की प्रसिद्ध पुस्तक 'कबीर' कबीर के अध्ययन की आधार पुस्तक है। इसमें द्विवेदी जी ने कबीर के व्यक्तित्व, विचार और काव्य की गहरी समीक्षा की है और पुस्तक के अंत में कबीर के चुने हुए पद दिए हैं। पाठ्यक्रम के दस पद इसी संकलन से हैं। विद्यार्थी इन पदों को मूल पुस्तक से पढ़ें; यहाँ उनकी मुख्य विषयवस्तु और व्याख्या के सूत्र दिए गए हैं।

निर्दिष्ट पदों के प्रमुख भाव-विषय

  • निर्गुण राम: कबीर के राम दशरथ-पुत्र नहीं, बल्कि निराकार, अजन्मा और सर्वव्यापी ब्रह्म हैं। वे बाहर नहीं, मन के भीतर खोजने योग्य हैं।
  • गुरु महिमा: सद्गुरु ही अज्ञान का अँधेरा दूर करके 'शब्द' का ज्ञान देता है।
  • नाम स्मरण और प्रेम: राम-नाम का जाप और प्रेम ही सच्ची साधना है। आत्मा को 'विरहिणी' और परमात्मा को 'प्रियतम' मानकर रहस्यात्मक प्रेम व्यक्त हुआ है।
  • माया का विरोध: माया को ठगिनी कहा गया है जो धन, काम, मोह के जाल में फँसाती है।
  • बाह्याडंबर का खंडन: मूर्तिपूजा, तीर्थ, व्रत, माला-तिलक, रोज़ा-नमाज़ आदि दिखावे पर तीखा व्यंग्य।
  • शरीर और संसार की नश्वरता: जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए समय रहते भक्ति कर लेनी चाहिए।

पद की व्याख्या कैसे लिखें

  1. प्रसंग – कवि, पुस्तक और संपादक का नाम (कबीर, सं. हजारीप्रसाद द्विवेदी)।
  2. भावार्थ – पद का अर्थ सरल गद्य में।
  3. विशेष – निर्गुण भक्ति, रहस्यवाद, उलटबाँसी, प्रतीक, रूपक अलंकार, सधुक्कड़ी भाषा, गेयता।

कबीर के पदों का काव्य सौंदर्य

कबीर के पद राग-रागिनियों में गाए जाने योग्य हैं। भाषा में अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, राजस्थानी और पंजाबी के शब्द मिलते हैं, इसलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा। द्विवेदी जी ने कबीर को 'वाणी का डिक्टेटर' कहा, क्योंकि वे भाषा से जो चाहते थे, कहलवा लेते थे। उनकी उलटबाँसियाँ (उल्टी दिखने वाली रहस्यमय उक्तियाँ) और प्रतीक (चदरिया, हंस, जुलाहा, घट) बहुत प्रसिद्ध हैं।

जायसी – पद्मावत – नागमती वियोग खंड (संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल)

पद्मावत का परिचय: पद्मावत जायसी का प्रसिद्ध प्रेमाख्यानक महाकाव्य है, जो अवधी भाषा में दोहा-चौपाई शैली में लिखा गया। इसमें चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेम कथा है। हीरामन तोता पद्मावती के रूप का वर्णन करता है, जिसे सुनकर रत्नसेन योगी बनकर सिंहल जाता है। पूर्वार्द्ध काल्पनिक है और उत्तरार्द्ध में अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण का प्रसंग है। आचार्य शुक्ल ने 'जायसी ग्रंथावली' का संपादन किया और उसकी भूमिका में जायसी की विस्तृत समीक्षा की।

नागमती वियोग खंड : कथासार

नागमती राजा रत्नसेन की पहली रानी है। रत्नसेन पद्मावती को पाने के लिए सिंहल चला जाता है और बहुत समय तक नहीं लौटता। नागमती चित्तौड़ में अकेली रह जाती है। पति के वियोग में वह दिन-रात रोती है। वर्ष के बारह महीने बीतते हैं और हर महीने की प्रकृति उसके दुख को और बढ़ाती है। वह पशु-पक्षियों और वृक्षों से अपना दुख कहती है और प्रियतम के लौटने की राह देखती है।

प्रमुख विशेषताएँ

इस खंड को पद्मावत का सबसे मार्मिक अंश माना जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  • बारहमासा: आषाढ़ से लेकर ज्येष्ठ तक बारह महीनों का वर्णन विरह की दृष्टि से किया गया है। यह हिंदी का सबसे प्रसिद्ध बारहमासा माना जाता है।
  • रानी का साधारण नारी रूप: वियोग में नागमती रानी नहीं, एक साधारण विरहिणी स्त्री बन जाती है। शुक्ल जी ने इस विशेषता की बहुत प्रशंसा की है।
  • प्रकृति का उद्दीपन रूप: बादल, वर्षा, बिजली, कोयल, पपीहा सब विरह को भड़काते हैं।
  • पशु-पक्षियों से सहानुभूति: विरहिणी की पीड़ा से पूरी प्रकृति दुखी दिखाई गई है।
  • अतिशयोक्ति और ऊहात्मकता: विरह की तीव्रता बताने के लिए कहीं-कहीं बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन है।
  • आध्यात्मिक संकेत: सूफी दृष्टि से यह आत्मा की परमात्मा के लिए तड़प का प्रतीक भी है।
याद रखें: नागमती वियोग वर्णन विप्रलंभ शृंगार का श्रेष्ठ उदाहरण है। भाषा ठेठ अवधी, छंद दोहा-चौपाई, शैली मसनवी (सूफी काव्य-शैली)।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) कबीर के पदों के आधार पर उनकी निर्गुण भक्ति और रहस्य भावना की विवेचना कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) 'नागमती वियोग खंड' हिंदी साहित्य का अनुपम विरह वर्णन है – इस कथन की समीक्षा कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) कबीर की भाषा – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) नागमती का बारहमासा – टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) पद्मावत की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।

RTMNU BA Sem 3 · BAHLT Major T-5-103 · इकाई III

इकाई III: सगुण भक्ति काव्यधारा

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • सूरदास – भ्रमरगीत सार – संपादक रामचन्द्र शुक्ल – पद संख्या 10, 12, 13, 18, 19, 24, 25, 26, 27, 37
  • तुलसीदास – राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

सूरदास – भ्रमरगीत सार (संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल) – पद संख्या 10, 12, 13, 18, 19, 24, 25, 26, 27, 37

भ्रमरगीत का अर्थ: 'भ्रमर' का अर्थ है भौंरा। भ्रमरगीत वह काव्य है जिसमें गोपियाँ उद्धव को भौंरे के बहाने उलाहना देती हैं। इसका मूल स्रोत श्रीमद्भागवत पुराण का दशम स्कंध है। सूरदास ने सूरसागर में इस प्रसंग को बहुत विस्तार और मार्मिकता से गाया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरसागर से इन पदों को चुनकर 'भ्रमरगीत सार' नाम से संपादित किया और भूमिका में सूर की विस्तृत समीक्षा की।

कथा-प्रसंग

कृष्ण मथुरा चले गए और वापस गोकुल नहीं लौटे। गोपियाँ और यशोदा उनके वियोग में व्याकुल हैं। कृष्ण अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को गोकुल भेजते हैं। उद्धव को अपने निर्गुण ब्रह्म के ज्ञान और योग पर गर्व है। वे गोपियों को समझाते हैं कि कृष्ण को भूलकर निराकार ब्रह्म का ध्यान करो और योग-साधना करो। उसी समय एक भौंरा वहाँ उड़ता हुआ आता है। गोपियाँ उसे संबोधित करके उद्धव और कृष्ण दोनों पर व्यंग्य करती हैं। अंत में गोपियों का सच्चा प्रेम देखकर उद्धव का ज्ञान-गर्व टूट जाता है और वे स्वयं प्रेम-भक्ति के रंग में रंगकर मथुरा लौटते हैं।

निर्दिष्ट पदों के प्रमुख भाव

  • निर्गुण पर सगुण की विजय: गोपियाँ कहती हैं कि जिसका रूप, रंग, गुण नहीं, उससे प्रेम कैसे करें? उनका मन तो साकार कृष्ण में रमा है।
  • योग का उपहास: गोपियाँ योग को कड़वी ककड़ी या ऐसा सौदा बताती हैं जिसका ब्रज में कोई ग्राहक नहीं।
  • मन एक ही है: मन तो कृष्ण के साथ चला गया, अब दूसरे की आराधना किस मन से करें – यह तर्क अत्यंत प्रसिद्ध है।
  • विरह वेदना: आँखें दिन-रात बरसती हैं, ब्रज की हर वस्तु कृष्ण की याद दिलाती है।
  • व्यंग्य और उलाहना: भौंरा काला और रस का लोभी है, कृष्ण भी काले और छलिया हैं – दोनों पर एक साथ व्यंग्य।
  • उद्धव का हृदय परिवर्तन: ज्ञान पर प्रेम की जीत।

काव्यगत विशेषताएँ

  • विप्रलंभ (वियोग) शृंगार की प्रधानता।
  • वाग्विदग्धता – गोपियों की चतुर, तर्कपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण वाणी।
  • सरस, कोमल ब्रजभाषा; गेय पद शैली; राग-रागिनियों का प्रयोग।
  • उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और श्लेष अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग।
परीक्षा टिप: 'भ्रमरगीत में ज्ञान पर प्रेम की और निर्गुण पर सगुण की विजय दिखाई गई है' – यह वाक्य उत्तर में अवश्य लिखें। शुक्ल जी ने सूर को वात्सल्य और शृंगार का सर्वश्रेष्ठ कवि माना है।

तुलसीदास – राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

स्रोत: यह प्रसंग रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया है। भाषा अवधी और छंद दोहा-चौपाई है।

कथासार

राजा जनक की सभा में सीता स्वयंवर हो रहा है। राम शिवजी का धनुष उठाते हैं और वह टूट जाता है। धनुष टूटने की आवाज़ सुनकर शिवभक्त परशुराम क्रोध में सभा में आते हैं। वे पूछते हैं कि धनुष किसने तोड़ा और तोड़ने वाले को सहस्रबाहु के समान शत्रु बताते हैं। राम विनम्रता से कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका कोई दास ही होगा। लक्ष्मण को परशुराम का अहंकार अच्छा नहीं लगता। वे व्यंग्य करते हैं कि बचपन में हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब तो आप कभी नाराज़ नहीं हुए। परशुराम अपने फरसे, अपनी वीरता और क्षत्रियों के संहार की बात करते हैं। लक्ष्मण हर बात का चुटीला उत्तर देते हैं। सभा में लोग घबरा जाते हैं। अंत में राम की शीतल, मधुर वाणी से परशुराम का क्रोध शांत होता है। (आगे की कथा में परशुराम राम को विष्णु का अवतार पहचानकर वन को चले जाते हैं।)

चरित्र-चित्रण

पात्रमुख्य गुण
रामविनम्र, धीर, शांत, मर्यादा पालक
लक्ष्मणनिडर, तेजस्वी, व्यंग्यप्रिय, उग्र स्वभाव
परशुरामक्रोधी, अहंकारी, शिवभक्त, वीर, बाद में विवेकी

काव्य सौंदर्य

  • रौद्र और वीर रस के साथ हास्य-व्यंग्य का सुंदर मेल।
  • संवाद नाटकीय, सजीव और चुटीले हैं।
  • राम के शांत और लक्ष्मण के उग्र स्वभाव का विरोध (कंट्रास्ट) प्रसंग को रोचक बनाता है।
  • मुहावरे, लोकोक्तियाँ और अनुप्रास, उपमा, रूपक अलंकार।
याद रखें: इस प्रसंग का संदेश है – क्रोध और अहंकार का उत्तर विनम्रता से देना श्रेष्ठ है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भ्रमरगीत में निर्गुण पर सगुण की विजय और ज्ञान पर प्रेम की प्रतिष्ठा हुई है – निर्दिष्ट पदों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद की कथावस्तु लिखकर उसके काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) गोपियों की वाग्विदग्धता – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण (परशुराम संवाद के आधार पर)।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) भ्रमरगीत परंपरा – टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 3 · BAHLT Major T-5-103 · इकाई IV

इकाई IV: रीतिकालीन काव्य

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • सामान्य परिचय
  • कालनिर्धारण
  • प्रमुख प्रवृत्तियाँ
  • रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त कवि

रीतिकाल : सामान्य परिचय

हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल के बाद का समय रीतिकाल या उत्तर मध्यकाल कहलाता है। 'रीति' का अर्थ है काव्य रचना की पद्धति या नियम – जैसे रस, अलंकार, नायिका भेद, छंद आदि के लक्षण। इस काल के अधिकांश कवियों ने संस्कृत काव्यशास्त्र के आधार पर लक्षण ग्रंथ लिखे और उनके उदाहरण के रूप में कविताएँ रचीं, इसलिए इसे रीतिकाल कहा गया।

नामकरण

विद्वानदिया गया नाम
आचार्य रामचंद्र शुक्लरीतिकाल
मिश्रबंधुअलंकृत काल
आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्रशृंगार काल

सबसे अधिक मान्य नाम शुक्ल जी का दिया हुआ 'रीतिकाल' ही है।

पृष्ठभूमि

  • राजनीतिक: मुगल साम्राज्य का वैभव और फिर पतन; छोटे-छोटे राजाओं और दरबारों का उदय।
  • सामाजिक: सामंती व्यवस्था, विलासिता, आम जनता की दयनीय दशा, स्त्री को भोग की वस्तु मानने की प्रवृत्ति।
  • साहित्यिक: कवि राजदरबारों के आश्रय में रहते थे और आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए शृंगारी कविता करते थे।

रीतिकाल का कालनिर्धारण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में रीतिकाल की अवधि संवत 1700 से संवत 1900 तक मानी है, जो लगभग सन 1643 से 1843 के बीच पड़ती है। कुछ विद्वान केशवदास से इसकी शुरुआत मानते हैं, क्योंकि उन्होंने भक्तिकाल में ही 'रसिकप्रिया' और 'कविप्रिया' जैसे रीति ग्रंथ लिख दिए थे। परंतु शुक्ल जी के अनुसार रीति ग्रंथों की अखंड परंपरा चिंतामणि त्रिपाठी से चली।

कालशुक्ल जी के अनुसार अवधि
आदिकाल (वीरगाथाकाल)संवत 1050 – 1375
भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल)संवत 1375 – 1700
रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल)संवत 1700 – 1900
आधुनिक काल (गद्यकाल)संवत 1900 से आगे

रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ

  1. रीति निरूपण / लक्षण ग्रंथों की रचना: रस, अलंकार, नायिका भेद, छंद पर ग्रंथ लिखे गए।
  2. शृंगार रस की प्रधानता: संयोग और वियोग दोनों का विस्तृत वर्णन; नायक-नायिका भेद।
  3. आश्रयदाताओं की प्रशंसा: राजाओं की वीरता, दान और वैभव का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन।
  4. अलंकारप्रियता और चमत्कार: शब्द और अर्थ के चमत्कार पर अधिक ध्यान।
  5. मुक्तक काव्य की प्रधानता: दोहा, कवित्त, सवैया जैसे छोटे छंद; प्रबंध काव्य कम।
  6. ब्रजभाषा का चरम विकास: ब्रजभाषा अत्यंत मधुर, कोमल और परिष्कृत बनी।
  7. भक्ति और नीति: राधा-कृष्ण के नाम से शृंगार; साथ ही नीति और भक्ति के दोहे भी।
  8. प्रकृति का उद्दीपन रूप: षड्ऋतु और बारहमासा का वर्णन, प्रायः नायक-नायिका के भावों को उभारने के लिए।
  9. वीर काव्य: भूषण जैसे कवियों ने शिवाजी और छत्रसाल की वीरता का गान किया।

रीतिकाल का मूल्यांकन

रीतिकाल पर अक्सर यह आरोप लगता है कि इसमें शृंगार और दरबारी चाटुकारिता अधिक है और जनजीवन का चित्रण कम है। फिर भी इस काल का महत्व कम नहीं है। इसी काल में ब्रजभाषा अपने सबसे सुंदर रूप में पहुँची, हिंदी में काव्यशास्त्र की परंपरा बनी और कवित्त-सवैया जैसे छंद निखरे। बिहारी की कलात्मकता, घनानंद की प्रेम-वेदना और भूषण की ओजस्वी वाणी इस काल की अमूल्य देन हैं।

रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त कवि

1. रीतिबद्ध कवि

वे कवि जिन्होंने रीति (काव्यशास्त्र) के नियमों में बँधकर लक्षण ग्रंथ लिखे और लक्षण के साथ उदाहरण के रूप में कविताएँ रचीं। इन्हें आचार्य कवि भी कहते हैं।

प्रमुख कवि: केशवदास (रसिकप्रिया, कविप्रिया, रामचंद्रिका), चिंतामणि त्रिपाठी, मतिराम, भूषण (शिवराज भूषण), देव, भिखारीदास (काव्य निर्णय), पद्माकर।

2. रीतिसिद्ध कवि

वे कवि जिन्होंने लक्षण ग्रंथ नहीं लिखे, परंतु काव्यशास्त्र का पूरा ज्ञान रखकर उसी के अनुसार कविता की। रीति उनके काव्य में छिपी रूप से सिद्ध है।

प्रमुख कवि: बिहारी (बिहारी सतसई) इस वर्ग के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। सेनापति, रसनिधि आदि भी इसी वर्ग में गिने जाते हैं।

3. रीतिमुक्त कवि

वे कवि जो रीति के बंधन से पूरी तरह मुक्त रहे। इन्होंने हृदय की सच्ची प्रेम-भावना को स्वच्छंद रूप से व्यक्त किया। इन्हें स्वच्छंद काव्यधारा के कवि भी कहते हैं। इनके काव्य में प्रेम की पीर (वेदना) प्रमुख है।

प्रमुख कवि: घनानंद (सबसे प्रमुख), आलम, बोधा, ठाकुर, द्विजदेव।

आधाररीतिबद्धरीतिसिद्धरीतिमुक्त
लक्षण ग्रंथलिखेनहीं लिखे, पर रीति का ज्ञाननहीं लिखे
मुख्य भावशास्त्रीयता, चमत्कारकलात्मकता, शृंगारसच्ची प्रेम-वेदना
प्रमुख कविकेशव, चिंतामणि, देवबिहारीघनानंद
परीक्षा टिप: तीनों वर्गों का अंतर तालिका बनाकर लिखें और हर वर्ग के दो-तीन कवि उनकी रचना सहित बताएँ।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिकाल के नामकरण और कालनिर्धारण पर विचार करते हुए उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त कवियों का अंतर स्पष्ट करते हुए प्रत्येक वर्ग के प्रमुख कवियों का परिचय दीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) रीतिकाल की राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि – टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) रीतिमुक्त काव्यधारा – टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) केशवदास – टिप्पणी लिखिए।