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भाषा विज्ञान BAHIN Major T-5-103

RTMNU BA Semester 3 · Hindi Language (हिन्दी भाषा) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Language (हिन्दी भाषा)
SemesterSemester III
Paper codeBAHIN Major T-5-103
Paper titleभाषा विज्ञान
CategoryMajor T-5 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits4 credits (theory, 4 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा 3 घंटे: 80 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 20 अंक = 100; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 40
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Language Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: भाषा विज्ञानNotes
  2. 2इकाई II: स्वन विज्ञानNotes
  3. 3इकाई III: रूप विज्ञान एवं वाक्य विज्ञानNotes
  4. 4इकाई IV: अर्थ विज्ञानNotes

RTMNU BA Sem 3 · BAHIN Major T-5-103 · इकाई I

इकाई I: भाषा विज्ञान

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • भाषा की परिभाषा, लक्षण, भाषा विज्ञान स्वरूप और व्याप्ति
  • भाषिक संरचना, उद्देश्य
  • भाषा विज्ञान की विभिन्न अध्ययन पद्धतियाँ

भाषा की परिभाषा, लक्षण, भाषा विज्ञान : स्वरूप और व्याप्ति

भाषा का अर्थ

'भाषा' शब्द संस्कृत की 'भाष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है – बोलना या कहना। अतः भाषा वह साधन है जिससे मनुष्य बोलकर अपने विचार, भाव और अनुभव दूसरों तक पहुँचाता है।

परिभाषाएँ

  • कामताप्रसाद गुरु के अनुसार भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर प्रकट करता है और दूसरों के विचार स्वयं समझता है।
  • हेनरी स्वीट के अनुसार ध्वनियों (उच्चरित शब्दों) के द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति ही भाषा है।
  • सरल परिभाषा – भाषा मुख से उच्चरित यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा एक समाज के लोग आपस में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।

भाषा के लक्षण (विशेषताएँ)

  1. भाषा सामाजिक वस्तु है – भाषा समाज में जन्म लेती है, समाज में ही सीखी और प्रयोग की जाती है।
  2. भाषा अर्जित संपत्ति है – भाषा पैतृक (जन्मजात) नहीं होती। बच्चा जिस समाज में पलता है, वही भाषा सीखता है।
  3. भाषा परिवर्तनशील है – संस्कृत से पालि, प्राकृत, अपभ्रंश होते हुए हिन्दी बनी। यह परिवर्तन का ही प्रमाण है।
  4. भाषा परंपरागत है – भाषा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है।
  5. भाषा यादृच्छिक है – शब्द और अर्थ का संबंध मनमाना (समाज द्वारा माना हुआ) है। 'पानी' को अंग्रेज़ी में 'वॉटर' कहते हैं।
  6. भाषा का कोई अंतिम रूप नहीं – वह सदा विकसित होती रहती है।
  7. भाषा कठिनता से सरलता की ओर जाती है – जैसे 'कर्म' से 'काम'।
  8. भाषा व्यवस्थित (संरचनात्मक) होती है – ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य के नियम होते हैं।

भाषा विज्ञान का स्वरूप

भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन ही भाषा विज्ञान (Linguistics) है। इसमें भाषा की उत्पत्ति, विकास, संरचना, ध्वनि, शब्द, वाक्य और अर्थ का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। हिन्दी में इसे भाषाशास्त्र, शब्दशास्त्र, तुलनात्मक भाषाशास्त्र आदि नामों से भी पुकारा गया।

  • भाषा विज्ञान विज्ञान है, क्योंकि यह निरीक्षण, वर्गीकरण और निष्कर्ष की पद्धति अपनाता है।
  • यह कला नहीं है, क्योंकि इसका उद्देश्य सुंदर रचना करना नहीं, बल्कि तथ्य जानना है।
  • यह भौतिक विज्ञान जैसा पूर्ण निश्चित विज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक विज्ञान है, क्योंकि भाषा मनुष्य के व्यवहार पर निर्भर है।

भाषा विज्ञान की व्याप्ति (क्षेत्र)

अंगअध्ययन का विषय
ध्वनि / स्वन विज्ञानभाषा की ध्वनियाँ, उच्चारण, ध्वनि परिवर्तन
रूप विज्ञानशब्द से पद बनने की प्रक्रिया, रूपिम
वाक्य विज्ञानवाक्य की रचना, पदक्रम, वाक्य के भेद
अर्थ विज्ञानशब्द-अर्थ संबंध, अर्थ परिवर्तन
शब्द विज्ञान / व्युत्पत्तिशब्दों का इतिहास और स्रोत
अन्य क्षेत्रभाषा की उत्पत्ति, भाषाओं का वर्गीकरण, लिपि, बोली विज्ञान, समाज भाषा विज्ञान

भाषिक संरचना, उद्देश्य

हर भाषा एक व्यवस्था है। छोटी इकाइयाँ मिलकर बड़ी इकाई बनाती हैं। इसी क्रम को भाषिक संरचना कहते हैं।

  1. स्वन / ध्वनि – सबसे छोटी उच्चरित इकाई, जैसे क्, अ।
  2. अक्षर – एक साँस के झटके में बोली गई ध्वनि-इकाई, जैसे 'क', 'मल'।
  3. रूपिम / शब्द – अर्थ वाली सबसे छोटी इकाई, जैसे 'लड़का'।
  4. पद – वाक्य में प्रयुक्त शब्द, जैसे 'लड़के ने'।
  5. पदबंध – पदों का समूह, जैसे 'मेरा छोटा भाई'।
  6. उपवाक्य और वाक्य – पूरा विचार प्रकट करने वाली इकाई।
  7. प्रोक्ति – वाक्यों का संबद्ध समूह (अनुच्छेद, संवाद)।

इन सब स्तरों पर अर्थ जुड़ा रहता है। इसलिए भाषा की संरचना के दो पक्ष माने जाते हैं – अभिव्यक्ति पक्ष (ध्वनि, शब्द, वाक्य) और कथ्य पक्ष (अर्थ)।

भाषा विज्ञान के उद्देश्य

  • भाषा की उत्पत्ति और विकास की जानकारी प्राप्त करना।
  • भाषा की ध्वनि, शब्द, वाक्य और अर्थ की व्यवस्था समझना।
  • भाषाओं की तुलना करके उनके परिवार (भाषा-परिवार) तय करना।
  • शुद्ध उच्चारण, भाषा शिक्षण, अनुवाद और कोश निर्माण में सहायता करना।
  • प्राचीन ग्रंथों और संस्कृति को समझने में सहायता करना।

भाषा विज्ञान की विभिन्न अध्ययन पद्धतियाँ

भाषा का अध्ययन कई दृष्टियों से किया जाता है। प्रमुख पद्धतियाँ ये हैं –

  1. वर्णनात्मक पद्धति – किसी एक भाषा का, किसी एक समय पर, जैसा है वैसा वर्णन। जैसे आज की खड़ी बोली हिन्दी की ध्वनियों का अध्ययन। इसे एककालिक अध्ययन भी कहते हैं।
  2. ऐतिहासिक पद्धति – किसी भाषा के विकास का अलग-अलग कालों में अध्ययन। जैसे संस्कृत → प्राकृत → अपभ्रंश → हिन्दी। इसे कालक्रमिक अध्ययन भी कहते हैं।
  3. तुलनात्मक पद्धति – दो या अधिक भाषाओं की तुलना करके समानता खोजना। जैसे संस्कृत 'पितृ', फ़ारसी 'पिदर', अंग्रेज़ी 'फ़ादर' – इससे भारोपीय परिवार का पता चला।
  4. व्यतिरेकी पद्धति – दो भाषाओं के अंतर पर ध्यान, जैसे हिन्दी और मराठी के लिंग-प्रयोग का अंतर। भाषा शिक्षण और अनुवाद में उपयोगी।
  5. संरचनात्मक पद्धति – भाषा की इकाइयों (स्वनिम, रूपिम, वाक्य) के आपसी संबंधों का अध्ययन।
  6. प्रायोगिक / अनुप्रयुक्त पद्धति – भाषा ज्ञान का प्रयोग शिक्षण, अनुवाद, कंप्यूटर आदि में।
परीक्षा टिप: भाषा के लक्षण वाले प्रश्न में कम से कम 6–8 लक्षण उदाहरण सहित लिखें। अध्ययन पद्धतियों में वर्णनात्मक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक पद्धति अनिवार्य रूप से लिखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भाषा की परिभाषा देते हुए उसके प्रमुख लक्षणों पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भाषा विज्ञान का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उसकी व्याप्ति और अध्ययन पद्धतियों का विवेचन कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) भाषिक संरचना पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) भाषा विज्ञान के उद्देश्य लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) तुलनात्मक अध्ययन पद्धति पर टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 3 · BAHIN Major T-5-103 · इकाई II

इकाई II: स्वन विज्ञान

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • वाग्यंत्र और उसके कार्य
  • स्वन विज्ञान की अवधारणा और उसका वर्गीकरण
  • स्वन गुण, स्वनिक परिवर्तन, स्वनिम की अवधारणा

वाग्यंत्र (वागवयव) और उसके कार्य

ध्वनि उत्पन्न करने में शरीर के जो अंग सहायता करते हैं, उन्हें वाग्यंत्र या वागवयव (Speech organs) कहते हैं। बोलने के लिए फेफड़ों से निकली वायु इन अंगों से टकराकर या रुककर ध्वनि बनाती है।

वागवयवकार्य
फेफड़ेवायु देते हैं; ध्वनि की ऊर्जा का स्रोत।
श्वासनलीवायु को ऊपर स्वरयंत्र तक ले जाती है।
स्वरयंत्र और स्वरतंत्रियाँस्वरतंत्रियों में कंपन होने पर घोष ध्वनि (ग, ज, द, ब), कंपन न होने पर अघोष ध्वनि (क, च, त, प)।
अभिकाकलभोजन निगलते समय श्वासनली का मुख ढक देता है।
कोमल तालु और अलिजिह्वानासिका मार्ग खोलते-बंद करते हैं; खुलने पर नासिक्य ध्वनि (म, न)।
कठोर तालुतालव्य ध्वनियों (च, छ, ज, श, य) में सहायक।
मूर्धामूर्धन्य ध्वनियाँ (ट, ठ, ड, ष)।
वर्त्स (मसूड़ा)वर्त्स्य ध्वनियाँ (न, र, ल, स)।
दाँतदंत्य ध्वनियाँ (त, थ, द, ध)।
होंठओष्ठ्य ध्वनियाँ (प, फ, ब, म); स्वरों में होंठों की गोलाई।
जीभ (जिह्वा)सबसे सक्रिय अंग; जिह्वाग्र, जिह्वामध्य और जिह्वापश्च से अलग-अलग ध्वनियाँ।
नासिका विवरअनुनासिक और नासिक्य ध्वनियों के लिए वायु मार्ग।

जो अंग हिलते हैं (जीभ, निचला होंठ) उन्हें चल और जो स्थिर रहते हैं (तालु, दाँत) उन्हें अचल वागवयव कहते हैं।

स्वन विज्ञान की अवधारणा और उसका वर्गीकरण

स्वन विज्ञान (Phonetics) भाषा विज्ञान की वह शाखा है जिसमें भाषा की ध्वनियों के उत्पादन, संचरण और ग्रहण का अध्ययन होता है। इसे ध्वनि विज्ञान भी कहते हैं। स्वन भाषा की सबसे छोटी उच्चरित इकाई है।

स्वन विज्ञान की शाखाएँ

  • औच्चारणिक – ध्वनि कैसे बोली जाती है।
  • सांवहनिक (भौतिक) – ध्वनि तरंगें वायु में कैसे चलती हैं।
  • श्रावणिक – कान ध्वनि को कैसे सुनता और ग्रहण करता है।

स्वनों का वर्गीकरण

(क) स्वर – जिनके उच्चारण में वायु बिना रुकावट निकलती है। आधार –

  • जीभ की ऊँचाई : संवृत (इ, उ), अर्धसंवृत (ए, ओ), अर्धविवृत (ऐ, औ), विवृत (आ)।
  • जीभ का भाग : अग्र (इ, ए), मध्य (अ), पश्च (उ, ओ, आ)।
  • होंठों की आकृति : वृत्ताकार (उ, ओ), अवृत्ताकार (इ, ए)।
  • मात्रा : ह्रस्व (अ, इ, उ), दीर्घ (आ, ई, ऊ)।

(ख) व्यंजन – जिनके उच्चारण में वायु कहीं न कहीं रुकती या घर्षण करती है। आधार –

  • उच्चारण स्थान : कंठ्य (क वर्ग), तालव्य (च वर्ग), मूर्धन्य (ट वर्ग), दंत्य (त वर्ग), ओष्ठ्य (प वर्ग), दंतोष्ठ्य (व, फ़), काकल्य (ह)।
  • उच्चारण प्रयत्न : स्पर्श (क, ट, प), स्पर्श-संघर्षी (च, ज), संघर्षी (स, श), नासिक्य (ङ, ञ, ण, न, म), पार्श्विक (ल), लुंठित/प्रकंपित (र), उत्क्षिप्त (ड़, ढ़), अर्धस्वर (य, व)।
  • घोषत्व : घोष और अघोष।
  • प्राणत्व : अल्पप्राण (क, ग) और महाप्राण (ख, घ) – महाप्राण में वायु अधिक निकलती है।

स्वन गुण, स्वनिक परिवर्तन, स्वनिम की अवधारणा

स्वन गुण

ध्वनि के साथ जुड़ी वे विशेषताएँ जो अर्थ या भाव बदल देती हैं, स्वन गुण (खंडेतर स्वनिम) कहलाती हैं।

  • मात्रा (दीर्घता) – 'दिन' और 'दीन' में अर्थ भेद।
  • बलाघात – किसी अक्षर या शब्द पर ज़ोर देना।
  • सुर / अनुतान – आवाज़ का उतार-चढ़ाव; 'तुम जाओगे।' और 'तुम जाओगे?' में भाव भेद।
  • संगम (विराम) – रुकने का स्थान; 'रोको, मत जाने दो' और 'रोको मत, जाने दो'।
  • अनुनासिकता – 'सास' और 'साँस' में भेद।

स्वनिक परिवर्तन (ध्वनि परिवर्तन) की दिशाएँ

दिशाउदाहरण
आगम (ध्वनि जुड़ना)स्कूल → इस्कूल, स्त्री → इस्त्री
लोप (ध्वनि हटना)स्टेशन → टेसन
विपर्यय (क्रम बदलना)लखनऊ → नखलऊ, चिह्न → चिन्ह
समीकरण (ध्वनि समान होना)कर्म → कम्म, धर्म → धम्म
घोषीकरणशाक → साग, काक → काग
महाप्राणीकरणगृह → घर

कारण – उच्चारण में सुविधा (मुख-सुख), शीघ्रता, अनुकरण की अपूर्णता, भौगोलिक प्रभाव, अन्य भाषाओं का प्रभाव, अशिक्षा।

स्वनिम की अवधारणा

स्वनिम (Phoneme) किसी भाषा की वह सबसे छोटी ध्वनि-इकाई है जो अर्थ में भेद करती है। जैसे 'काल' और 'गाल' में केवल /क/ और /ग/ का अंतर है, पर अर्थ बदल गया; अतः हिन्दी में /क/ और /ग/ अलग स्वनिम हैं। ऐसे शब्द-युग्मों को न्यूनतम युग्म कहते हैं (पल–फल, दान–धान)।

  • एक स्वनिम के उच्चारण के थोड़े अलग रूप उपस्वन (Allophone) कहलाते हैं; उनसे अर्थ नहीं बदलता।
  • स्वनिम निर्धारण के आधार – व्यतिरेक (अर्थ भेद), परिपूरक वितरण, स्वनिक समानता।
  • स्वनिम मानसिक इकाई है, स्वन उसका उच्चरित रूप है।
याद रखें: स्वन = उच्चरित ध्वनि; स्वनिम = अर्थ भेदक ध्वनि-इकाई; उपस्वन = स्वनिम के उच्चारण भेद।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) वाग्यंत्र का सचित्र परिचय देते हुए विभिन्न वागवयवों के कार्य स्पष्ट कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) स्वन विज्ञान की अवधारणा स्पष्ट करते हुए स्वरों और व्यंजनों का वर्गीकरण कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) स्वनिम की अवधारणा पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) स्वनिक परिवर्तन की दिशाएँ उदाहरण सहित लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) स्वन गुण से क्या अभिप्राय है?

RTMNU BA Sem 3 · BAHIN Major T-5-103 · इकाई III

इकाई III: रूप विज्ञान एवं वाक्य विज्ञान

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • रूप प्रक्रिया का स्वरूप और शाखाएँ
  • रूपिम की अवधारणा, रूपिम के भेद
  • वाक्य विज्ञान – वाक्य की अवधारणा, वाक्य के अंग, वाक्य परिवर्तन की दिशाएँ

रूप प्रक्रिया का स्वरूप और शाखाएँ

भाषा में शब्द अपने मूल रूप में कोशों में मिलता है, पर वाक्य में प्रयोग होते समय उसमें विभक्ति, प्रत्यय या परसर्ग जुड़ जाते हैं। तब वह पद या रूप बन जाता है। जैसे 'लड़का' शब्द है, पर 'लड़के ने', 'लड़कों को' रूप (पद) हैं। शब्द से रूप बनने की इसी प्रक्रिया को रूप प्रक्रिया कहते हैं और इसके अध्ययन को रूप विज्ञान (Morphology)।

रूप के दो तत्व

  • अर्थ तत्व – मूल अर्थ देने वाला भाग, जैसे 'लड़क-', 'पढ़-'।
  • संबंध तत्व – वाक्य के अन्य शब्दों से संबंध जोड़ने वाला भाग, जैसे '-ने', '-ओं', '-ता है'।

संस्कृत में संबंध तत्व शब्द से जुड़ा रहता है (रामेण), जबकि हिन्दी में प्रायः अलग परसर्ग से (राम ने)। इसलिए संस्कृत को संयोगात्मक और हिन्दी को वियोगात्मक भाषा कहा जाता है।

रूप प्रक्रिया / रूप विज्ञान की शाखाएँ

  1. व्युत्पादक (शब्द-निर्माण) रूप प्रक्रिया – उपसर्ग, प्रत्यय, समास से नए शब्द बनाना: सुंदर → सुंदरता, लिख → लेखक।
  2. रूपसाधक (विभक्तिपरक) रूप प्रक्रिया – लिंग, वचन, कारक, काल के अनुसार एक ही शब्द के रूप: लड़का–लड़के–लड़कों; जाता–जाती–जाएगा।
  3. अध्ययन की दृष्टि से – वर्णनात्मक रूप विज्ञान (एक काल के रूप), ऐतिहासिक रूप विज्ञान (रूपों का विकास), तुलनात्मक रूप विज्ञान (दो भाषाओं के रूपों की तुलना)।

हिन्दी में रूप परिवर्तन के मुख्य आधार हैं – लिंग, वचन, कारक, पुरुष, काल, वाच्य और पक्ष।

रूपिम की अवधारणा, रूपिम के भेद

रूपिम (Morpheme) भाषा की वह सबसे छोटी इकाई है जिसका अपना अर्थ या व्याकरणिक कार्य हो। इसे और तोड़ने पर अर्थ नष्ट हो जाता है। जैसे 'लड़कों' में दो रूपिम हैं – 'लड़क' (अर्थ) + 'ओं' (बहुवचन तथा तिर्यक रूप)। 'असफलता' में तीन – अ + सफल + ता।

याद रखें: स्वनिम अर्थ भेद करता है, पर उसका अपना अर्थ नहीं होता; रूपिम का अपना अर्थ या व्याकरणिक कार्य होता है।

रूपिम के भेद

भेदपहचानउदाहरण
मुक्त रूपिमअकेले भी प्रयोग हो सकता हैघर, पानी, सुंदर
बद्ध रूपिमअकेले प्रयोग नहीं होता, दूसरे से जुड़कर आता हैअ-, -ता, -ओं, -इक
अर्थदर्शी रूपिममूल अर्थ बताता हैपढ़, खेल
संबंधदर्शी (व्याकरणिक) रूपिमवचन, लिंग, काल आदि बताता है-ए, -ई, -गा
शून्य रूपिमरूप में दिखाई नहीं देता, पर अर्थ देता है'एक घर'–'चार घर' में बहुवचन का कोई चिह्न नहीं

बद्ध रूपिम के दो प्रमुख भाग – उपसर्ग (शब्द से पहले: प्र-, अनु-, बे-) और प्रत्यय (शब्द के बाद: -पन, -आई, -वाला)।

उपरूप (संरूप)

एक ही रूपिम के अलग-अलग परिस्थितियों में आने वाले रूप उपरूप (Allomorph) कहलाते हैं। जैसे हिन्दी में बहुवचन के लिए -ए (लड़के), -एँ (बातें), -याँ (लड़कियाँ), -ओं (घरों) – ये सब बहुवचन रूपिम के उपरूप हैं।

वाक्य विज्ञान – वाक्य की अवधारणा, वाक्य के अंग, वाक्य परिवर्तन की दिशाएँ

वाक्य की अवधारणा

शब्दों का वह सार्थक समूह जो एक पूरा विचार प्रकट करे, वाक्य कहलाता है। संस्कृत आचार्य विश्वनाथ के अनुसार योग्यता, आकांक्षा और आसत्ति से युक्त पद-समूह वाक्य है।

  • योग्यता – शब्दों में अर्थ की संगति हो। 'वह पानी से आग जलाता है' में योग्यता नहीं है।
  • आकांक्षा – वाक्य अधूरा न लगे; सुनने वाले को और जानने की इच्छा न रहे।
  • आसत्ति (निकटता) – पद पास-पास बोले जाएँ, बीच में लंबा अंतर न हो।
  • इसके साथ पदक्रम और अन्वय (लिंग-वचन-पुरुष का मेल) भी आवश्यक है।

वाक्य के अंग

  1. उद्देश्य – जिसके बारे में कहा जाए। 'मेरा छोटा भाई पढ़ता है' में 'भाई' उद्देश्य, 'मेरा छोटा' उद्देश्य का विस्तार।
  2. विधेय – उद्देश्य के बारे में जो कहा जाए। 'रोज़ सुबह किताब पढ़ता है' में 'पढ़ता है' विधेय; 'किताब' कर्म और 'रोज़ सुबह' विधेय का विस्तार।

वाक्य परिवर्तन की दिशाएँ

  • संयोगात्मकता से वियोगात्मकता – संस्कृत 'रामः गृहं गच्छति' की विभक्तियाँ हिन्दी में परसर्गों में बदलीं।
  • पदक्रम का निश्चित होना – हिन्दी में सामान्यतः कर्ता–कर्म–क्रिया क्रम।
  • अन्वय में परिवर्तन – लिंग, वचन के नियम सरल होना; द्विवचन का लोप।
  • सहायक क्रियाओं का बढ़ना – 'पढ़ रहा है', 'पढ़ चुका है'।
  • दूसरी भाषाओं का प्रभाव – अंग्रेज़ी प्रभाव से 'कि' वाले लंबे वाक्य, कर्मवाच्य का बढ़ता प्रयोग।
  • संक्षिप्तता – बोलचाल में छोटे वाक्य, शब्दों का लोप।

कारण – सरलता की प्रवृत्ति, अन्य भाषाओं का संपर्क, भावात्मक बल, नवीनता की इच्छा, सामाजिक परिवर्तन।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रूपिम की अवधारणा स्पष्ट करते हुए उसके भेदों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) वाक्य की परिभाषा देते हुए वाक्य के अंगों और वाक्य परिवर्तन की दिशाओं पर प्रकाश डालिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) रूप प्रक्रिया का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) उपरूप (संरूप) पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) योग्यता, आकांक्षा और आसत्ति को समझाइए।

RTMNU BA Sem 3 · BAHIN Major T-5-103 · इकाई IV

इकाई IV: अर्थ विज्ञान

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • अर्थ की अवधारणा, शब्द और अर्थ का संबंध
  • विलोमता और अनेकार्थ
  • अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ और कारण

अर्थ की अवधारणा, शब्द और अर्थ का संबंध

किसी शब्द को सुनकर या पढ़कर मन में जो भाव, वस्तु या विचार उभरता है, वही उसका अर्थ है। अर्थ के अध्ययन को अर्थ विज्ञान (Semantics) कहते हैं। भाषा का अंतिम उद्देश्य अर्थ का संप्रेषण ही है; बिना अर्थ के ध्वनि केवल शोर है।

अर्थ की अवधारणा के मुख्य बिंदु

  • अर्थ मानसिक होता है – वक्ता के मन से श्रोता के मन तक जाता है।
  • अर्थ संदर्भ पर निर्भर करता है – 'गाड़ी छूट गई' में 'छूटना' का अर्थ प्रसंग से तय होता है।
  • अर्थ समाज द्वारा स्वीकार किया हुआ होता है (सामाजिक परंपरा)।
  • अर्थ के स्तर – शब्द का अर्थ, वाक्य का अर्थ, प्रसंग का अर्थ।

शब्द और अर्थ का संबंध

भारतीय चिंतन में शब्द और अर्थ को अभिन्न माना गया है। कालिदास ने 'रघुवंश' के आरंभ में शिव-पार्वती की तुलना वाणी और अर्थ के मेल (वागर्थ) से की है। फिर भी भाषा विज्ञान के अनुसार यह संबंध स्वाभाविक नहीं, बल्कि यादृच्छिक और सामाजिक है। यदि संबंध स्वाभाविक होता, तो एक वस्तु के लिए सभी भाषाओं में एक ही शब्द होता।

  • प्रतीकात्मक संबंध – शब्द वस्तु का प्रतीक है, वस्तु नहीं।
  • परंपरागत संबंध – यह संबंध समाज की परंपरा से सीखा जाता है।
  • परिवर्तनशील संबंध – समय के साथ अर्थ बदलता है।

संकेत ग्रहण (अर्थ जानने) के साधन

भारतीय आचार्यों ने शब्द का अर्थ जानने के आठ साधन बताए हैं – व्याकरण, उपमान, कोश, आप्तवाक्य, व्यवहार, वाक्यशेष, विवृति (व्याख्या) और सिद्धपद का सान्निध्य। जैसे बच्चा बड़ों का व्यवहार देखकर 'पानी लाओ' का अर्थ सीख लेता है।

विलोमता और अनेकार्थ

विलोमता

जब दो शब्द एक-दूसरे का उल्टा अर्थ देते हैं, तो उनके संबंध को विलोमता (Antonymy) कहते हैं। जैसे – दिन–रात, सुख–दुःख, आना–जाना।

प्रकारविशेषताउदाहरण
पूरक विलोमएक को मानें तो दूसरा अपने आप नकारा जाता है; बीच की स्थिति नहींजीवित–मृत, सच–झूठ
श्रेणीबद्ध (सापेक्ष) विलोमबीच में कई स्तर होते हैं; तुलना से अर्थगरम–ठंडा, लंबा–छोटा
संबंधवाची विलोमएक संबंध के दो छोरपति–पत्नी, गुरु–शिष्य, खरीदना–बेचना
दिशावाची विलोमगति या दिशा उल्टीऊपर–नीचे, आना–जाना

विलोम शब्द प्रायः उपसर्ग से भी बनते हैं – ज्ञान–अज्ञान, मान–अपमान, सफल–असफल।

अनेकार्थ

जब एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं, तो उसे अनेकार्थता (Polysemy) कहते हैं। सही अर्थ संदर्भ से तय होता है।

  • कर – हाथ, टैक्स, किरण।
  • अंबर – आकाश, वस्त्र।
  • कल – बीता दिन, आने वाला दिन, मशीन, चैन।
  • पत्र – चिट्ठी, पत्ता, पंख।
  • हार – पराजय, माला।

अनेकार्थता के कारण – अर्थ का विस्तार, लाक्षणिक प्रयोग, अलग-अलग स्रोतों से समान ध्वनि वाले शब्दों का आ जाना, सामाजिक-व्यावसायिक प्रयोग। साहित्य में श्लेष अलंकार इसी पर आधारित है।

अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ और कारण

अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ

दिशाअर्थउदाहरण
अर्थ विस्तारसीमित अर्थ का व्यापक हो जाना'तेल' – पहले तिल का, अब हर प्रकार का; 'प्रवीण' – पहले वीणा बजाने में कुशल, अब किसी भी काम में कुशल
अर्थ संकोचव्यापक अर्थ का सीमित हो जाना'मृग' – पहले कोई भी वन्य पशु, अब हिरण
अर्थादेशपुराने अर्थ की जगह नया अर्थ'असुर' – वैदिक काल में शक्तिशाली/देववाची, बाद में राक्षस
अर्थोत्कर्षअर्थ का अच्छा हो जाना'साहस' – पहले बुरा/दुस्साहसी कर्म, अब हिम्मत
अर्थापकर्षअर्थ का हीन हो जाना'महाराज' – राजा, अब रसोइया भी; 'पाखंड' – एक संप्रदाय, अब ढोंग

अर्थ परिवर्तन के कारण

  1. सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन – रहन-सहन बदलने से शब्दों के अर्थ बदलते हैं।
  2. विनम्रता / शिष्टाचार – 'मर गया' के लिए 'स्वर्गवास हो गया'।
  3. भय और अंधविश्वास – चेचक को 'माता' कहना।
  4. व्यंग्य – मूर्ख व्यक्ति को 'बड़े विद्वान आए' कहना।
  5. लाक्षणिक प्रयोग – 'गधा' का प्रयोग मूर्ख के लिए।
  6. बल का अपसरण – शब्द के मुख्य भाव से ध्यान हटकर गौण भाव पर टिकना।
  7. नवीनता की चाह और अज्ञान – नए प्रयोग और गलत प्रयोग धीरे-धीरे मान्य हो जाते हैं।
  8. अन्य भाषाओं का प्रभाव – विदेशी शब्दों के अर्थ अपनाना।
परीक्षा टिप: अर्थ परिवर्तन के प्रश्न में हर दिशा का एक उदाहरण अवश्य दें – विस्तार (तेल), संकोच (मृग), आदेश (असुर), उत्कर्ष (साहस), अपकर्ष (महाराज)।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) अर्थ की अवधारणा स्पष्ट करते हुए शब्द और अर्थ के संबंध पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) अर्थ परिवर्तन की विभिन्न दिशाओं और कारणों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) विलोमता के प्रकार उदाहरण सहित लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) अनेकार्थता पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) अर्थ विस्तार और अर्थ संकोच में अंतर स्पष्ट कीजिए।