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हिन्दी साहित्य का इतिहास – रीतिकाल BAHLT Major T-4-102

RTMNU BA Semester 2 · Hindi Literature (हिन्दी साहित्य) · 2 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Literature (हिन्दी साहित्य)
SemesterSemester II
Paper codeBAHLT Major T-4-102
Paper titleहिन्दी साहित्य का इतिहास – रीतिकाल
CategoryMajor T-4 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits2 credits (theory, 2 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा: 40 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 10 अंक = 50; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 20
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Literature Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: सामान्य परिचय – रीतिकाल की पृष्ठभूमि, नामकरण एवं प्रमुख प्रवृत्तियाँNotes
  2. 2इकाई II: प्रतिनिधि कवि – सामान्य परिचयNotes

RTMNU BA Sem 2 · BAHLT Major T-4-102 · इकाई I

इकाई I: सामान्य परिचय – रीतिकाल की पृष्ठभूमि, नामकरण एवं प्रमुख प्रवृत्तियाँ

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • रीतिकाल – पृष्ठभूमि, काल निर्धारण, नामकरण
  • सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
  • प्रमुख प्रवृत्तियाँ – रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त

रीतिकाल – पृष्ठभूमि, काल निर्धारण, नामकरण

"रीति" शब्द का अर्थ

संस्कृत काव्यशास्त्र में आचार्य वामन ने "रीति" को काव्य की आत्मा कहा था। पर हिन्दी में "रीति" शब्द का अर्थ कुछ अलग है। हिन्दी में रीति का अर्थ है – काव्य रचना की पद्धति या नियम, यानी रस, अलंकार, नायिका-भेद, छंद आदि काव्यांगों का शास्त्रीय विवेचन। जिन ग्रंथों में काव्य के लक्षण और उदाहरण दिए गए, उन्हें रीति ग्रंथ या लक्षण ग्रंथ कहा गया।

काल निर्धारण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल का समय संवत् 1700 से 1900 तक माना है। इसे उत्तर मध्यकाल भी कहा जाता है। ईसवी सन् में यह लगभग सत्रहवीं शताब्दी के मध्य से उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक का समय है।

नामकरण

नामविद्वानआधार
रीतिकालआचार्य रामचंद्र शुक्लरीति ग्रंथों और लक्षण-उदाहरण पद्धति की प्रधानता
अलंकृत कालमिश्रबंधुअलंकारों और सजावट की प्रवृत्ति
श्रृंगार कालआचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्रश्रृंगार रस की प्रधानता
कलाकालडॉ. रमाशंकर शुक्ल "रसाल"कलात्मकता और चमत्कार पर बल

सबसे अधिक मान्य नाम रीतिकाल है, क्योंकि इस काल के अधिकांश कवियों ने रीति को ध्यान में रखकर ही रचना की। "श्रृंगार काल" नाम भी उचित माना जाता है, पर उसमें भूषण जैसे वीर रस के कवि और नीति कवि छूट जाते हैं।

राजनैतिक पृष्ठभूमि

  • शाहजहाँ के समय मुगल वैभव चरम पर था। औरंगज़ेब के बाद मुगल साम्राज्य कमज़ोर होने लगा।
  • छोटे-छोटे राजा और नवाब स्वतंत्र होने लगे। मराठा, सिख और जाट शक्तियाँ उभरीं।
  • नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण हुए। अंत में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व बढ़ा।
  • कवि राजदरबारों पर आश्रित थे। वे आश्रयदाता को प्रसन्न करने के लिए रचना करते थे।

सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

सामाजिक पृष्ठभूमि

  • समाज दो वर्गों में बँटा था – विलासी सामंत वर्ग और शोषित सामान्य जनता।
  • राजाओं और सामंतों का जीवन भोग-विलास में डूबा था। अनेक रानियाँ और रखैलें रखना सामान्य था।
  • स्त्री को भोग की वस्तु समझा जाने लगा था। इसका प्रभाव नायिका-भेद और नख-शिख वर्णन पर पड़ा।
  • जाति-प्रथा, अंधविश्वास और रूढ़ियाँ बढ़ी हुई थीं।

आर्थिक पृष्ठभूमि

  • किसानों और कारीगरों पर भारी कर थे। जनता गरीबी में जी रही थी।
  • धन का बड़ा भाग राजदरबारों की शान-शौकत पर खर्च होता था।
  • कवियों को आश्रयदाताओं से धन, जागीर और सम्मान मिलता था, इसलिए उनकी कविता दरबारी रुचि के अनुसार ढली।

सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि

  • भक्तिकाल की राधा-कृष्ण भक्ति धीरे-धीरे लौकिक श्रृंगार का साधन बन गई।
  • संगीत, चित्रकला (राजपूत और पहाड़ी शैली), स्थापत्य में भी अलंकरण और सजावट की प्रवृत्ति थी।
  • संस्कृत काव्यशास्त्र (रस, अलंकार, ध्वनि) का प्रभाव हिन्दी कवियों पर पड़ा।
  • ब्रजभाषा पूरे उत्तर भारत की काव्य-भाषा बन गई।

प्रमुख प्रवृत्तियाँ – रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त

रीति से संबंध के आधार पर रीतिकाल के कवियों को तीन वर्गों में बाँटा जाता है।

धाराअर्थप्रमुख कवि
रीतिबद्धजिन्होंने लक्षण ग्रंथ लिखे; पहले काव्यांग का लक्षण, फिर उदाहरण में अपनी कविताकेशवदास, चिंतामणि, मतिराम, देव, भिखारीदास, पद्माकर, जसवंत सिंह
रीतिसिद्धलक्षण ग्रंथ नहीं लिखे, पर रीति के पूरे ज्ञान के साथ कविता रचीबिहारी, सेनापति, रसनिधि
रीतिमुक्तरीति के बंधन से मुक्त होकर हृदय की सच्ची अनुभूति से कविता लिखीघनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर

रीतिकाल की सामान्य प्रवृत्तियाँ

  • श्रृंगार रस की प्रधानता – संयोग और वियोग, नायिका-भेद, नख-शिख वर्णन।
  • लक्षण ग्रंथों की रचना – रस, अलंकार, छंद, नायिका-भेद पर ग्रंथ।
  • आश्रयदाताओं की प्रशंसा – दरबारी कविता।
  • अलंकारों और चमत्कार पर बल – कलापक्ष प्रबल, भावपक्ष अपेक्षाकृत कमज़ोर।
  • मुक्तक शैली – कवित्त, सवैया और दोहा प्रमुख छंद।
  • ब्रजभाषा का उत्कर्ष – मधुर, कोमल और परिष्कृत भाषा।
  • वीर, नीति और भक्ति काव्य भी गौण रूप में – भूषण (वीर), वृंद और गिरिधर कविराय (नीति)।
  • प्रकृति चित्रण – प्रायः उद्दीपन रूप में; षड्ऋतु और बारहमासा वर्णन।
याद रखें: रीतिबद्ध = लक्षण + उदाहरण (केशव, देव); रीतिसिद्ध = लक्षण ग्रंथ नहीं, पर रीति में सिद्ध (बिहारी); रीतिमुक्त = स्वच्छंद प्रेम (घनानंद)।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिकाल की राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का वर्णन करते हुए रीतिकाल के नामकरण की समस्या पर विचार कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियों का परिचय देते हुए रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त काव्यधाराओं का अंतर स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) "रीति" शब्द का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) रीतिमुक्त काव्य की विशेषताएँ लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) रीतिकाल के विभिन्न नामों पर टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 2 · BAHLT Major T-4-102 · इकाई II

इकाई II: प्रतिनिधि कवि – सामान्य परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • बिहारी
  • घनानंद
  • भूषण

रीतिकाल की तीन अलग-अलग प्रवृत्तियों के तीन प्रतिनिधि कवि हैं – रीतिसिद्ध धारा के बिहारी, रीतिमुक्त धारा के घनानंद और वीर रस की धारा के भूषण।

बिहारी

जीवन परिचय

बिहारी (बिहारीलाल) रीतिकाल के सबसे लोकप्रिय कवि हैं। उनका जन्म ग्वालियर के आसपास माना जाता है। बचपन बुंदेलखंड में और युवावस्था ससुराल मथुरा में बीती। वे जयपुर के मिर्ज़ा राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। प्रसिद्ध कथा है कि राजा जयसिंह नई रानी के प्रेम में राजकाज भूल गए थे। तब बिहारी ने एक दोहा भेजा, जिसमें भौंरे और कली के माध्यम से राजा को कर्तव्य की याद दिलाई गई। इससे राजा सचेत हो गए।

रचना

बिहारी की एकमात्र रचना बिहारी सतसई है। इसमें लगभग सात सौ दोहे हैं (विभिन्न प्रतियों में संख्या थोड़ी अलग मिलती है)। इस पर अनेक टीकाएँ लिखी गईं।

काव्यगत विशेषताएँ

  • श्रृंगार रस की प्रधानता – संयोग में हाव-भाव, चेष्टाएँ; वियोग में ऊहात्मक (अतिशयोक्तिपूर्ण) वर्णन।
  • भक्ति और नीति के दोहे भी – राधा-कृष्ण भक्ति, जीवन के व्यावहारिक उपदेश।
  • गागर में सागर – छोटे से दोहे में गहरा अर्थ भरने की कला; इसे समास शैली कहते हैं।
  • अलंकारों का सुंदर प्रयोग – श्लेष, यमक, अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, विरोधाभास।
  • बहुज्ञता – ज्योतिष, गणित, वैद्यक, आयुर्वेद, लोक-व्यवहार का ज्ञान दोहों में झलकता है।
  • भाषा – परिष्कृत, मधुर और कसावट भरी ब्रजभाषा; छंद केवल दोहा।
याद रखें: बिहारी रीतिसिद्ध कवि हैं – उन्होंने लक्षण ग्रंथ नहीं लिखा, पर उनके दोहों में रस, अलंकार और नायिका-भेद का पूरा शास्त्रीय ज्ञान है।

घनानंद

जीवन परिचय

घनानंद रीतिमुक्त धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। वे दिल्ली के मुगल बादशाह मुहम्मदशाह के दरबार में मीर मुंशी थे और अच्छे गायक भी थे। दरबार की सुजान नामक नर्तकी से उन्हें गहरा प्रेम था। कहा जाता है कि दरबार में सुजान के कहने पर ही उन्होंने गाया, जिससे बादशाह नाराज़ हुए और उन्हें दरबार छोड़ना पड़ा। सुजान ने उनके साथ जाने से मना कर दिया। प्रेम में मिली इस ठेस से वे वृंदावन चले गए और निम्बार्क संप्रदाय में दीक्षित हुए। माना जाता है कि अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण के समय उनकी मृत्यु हुई।

रचनाएँ

सुजानहित, इश्कलता, वियोगबेलि, कृपाकंद, यमुनाजस, प्रीतिपावस आदि; उनके कवित्त-सवैये "घनआनंद कवित्त" के रूप में प्रसिद्ध हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

  • प्रेम की पीर के कवि – वियोग श्रृंगार की गहरी और सच्ची अनुभूति।
  • स्वच्छंद प्रेम – रीति के बंधन से मुक्त, हृदय की भाषा।
  • प्रेम का आलंबन "सुजान" – बाद में यही शब्द कृष्ण के लिए भी प्रयुक्त; लौकिक प्रेम का अलौकिक में रूपांतर।
  • विरोधाभास अलंकार का अद्भुत प्रयोग; लाक्षणिकता।
  • आचार्य शुक्ल ने उन्हें "साक्षात रसमूर्ति" और ब्रजभाषा के प्रवीण कवियों में अग्रणी माना।
  • भाषा – शुद्ध, सरस और मुहावरेदार ब्रजभाषा; कवित्त और सवैया छंद।

भूषण

जीवन परिचय

भूषण रीतिकाल के प्रमुख वीर रस के कवि हैं। उनका संबंध कानपुर के पास तिकवाँपुर से माना जाता है। परंपरा उन्हें चिंतामणि और मतिराम का भाई मानती है, पर इस पर मतभेद है। "भूषण" उनकी उपाधि थी। वे छत्रपति शिवाजी और बुंदेला राजा छत्रसाल के आश्रय में रहे।

रचनाएँ

शिवराज भूषण (अलंकार ग्रंथ, जिसमें उदाहरण शिवाजी की वीरता से दिए गए हैं), शिवा बावनी और छत्रसाल दशक।

काव्यगत विशेषताएँ

  • श्रृंगार प्रधान युग में वीर रस की प्रधानता – यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।
  • शिवाजी और छत्रसाल को धर्म और संस्कृति के रक्षक के रूप में चित्रित किया।
  • ओजपूर्ण वर्णन – युद्ध, सेना, तलवार, नगाड़ों की ध्वनि का सजीव चित्र।
  • रीतिबद्ध परंपरा – शिवराज भूषण में अलंकारों के लक्षण और उदाहरण।
  • अतिशयोक्ति और जातीय गौरव की भावना; कुछ आलोचक इसमें इतिहास से अधिक प्रशंसा देखते हैं।
  • भाषा – ओजगुण से युक्त ब्रजभाषा, जिसमें अरबी-फ़ारसी और बुंदेली शब्द भी हैं; कवित्त, सवैया, छप्पय छंद।
कविधाराप्रमुख रचनाप्रधान रसछंद
बिहारीरीतिसिद्धबिहारी सतसईश्रृंगारदोहा
घनानंदरीतिमुक्तसुजानहित, वियोगबेलिवियोग श्रृंगारकवित्त, सवैया
भूषणरीतिबद्ध / वीर काव्यशिवराज भूषण, शिवा बावनीवीरकवित्त, सवैया, छप्पय
परीक्षा टिप: "बिहारी गागर में सागर भरते हैं", "घनानंद प्रेम की पीर के कवि हैं", "भूषण श्रृंगार युग में वीर रस के कवि हैं" – ये तीनों कथन परीक्षा में अक्सर पूछे जाते हैं।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) बिहारी के काव्य की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट कीजिए कि उन्हें "गागर में सागर भरने वाला कवि" क्यों कहा जाता है।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) घनानंद को रीतिमुक्त धारा का प्रतिनिधि कवि सिद्ध करते हुए उनके प्रेम-निरूपण की विशेषताएँ लिखिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) भूषण के काव्य में वीर रस पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) बिहारी सतसई पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) घनानंद और सुजान पर टिप्पणी लिखिए।