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हिन्दी साहित्य का इतिहास – आदिकाल से भक्तिकाल तक BAHLT Major T-3-102

RTMNU BA Semester 2 · Hindi Literature (हिन्दी साहित्य) · 4 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Literature (हिन्दी साहित्य)
SemesterSemester II
Paper codeBAHLT Major T-3-102
Paper titleहिन्दी साहित्य का इतिहास – आदिकाल से भक्तिकाल तक
CategoryMajor T-3 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits4 credits (theory, 4 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा 3 घंटे: 80 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 20 अंक = 100; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 40
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Literature Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: हिन्दी साहित्य का इतिहास [आदिकाल] – इतिहास लेखन, काल विभाजन एवं पुनर्लेखनNotes
  2. 2इकाई II: आदिकाल की प्रमुखता – पृष्ठभूमि, सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य, रासो साहित्यNotes
  3. 3इकाई III: भक्तिकाल – पृष्ठभूमि, भक्ति आंदोलन, सगुण एवं निर्गुण काव्यधाराNotes
  4. 4इकाई IV: भक्तिकाल के प्रतिनिधि कवियों का सामान्य परिचयNotes

RTMNU BA Sem 2 · BAHLT Major T-3-102 · इकाई I

इकाई I: हिन्दी साहित्य का इतिहास [आदिकाल] – इतिहास लेखन, काल विभाजन एवं पुनर्लेखन

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा
  • हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन एवं नामकरण
  • पुनर्लेखन की आवश्यकता एवं समस्याएँ

हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा

साहित्य का इतिहास केवल कवियों और रचनाओं की सूची नहीं होता। उसमें यह भी बताया जाता है कि किस समय की परिस्थितियों ने किस प्रकार के साहित्य को जन्म दिया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, किसी देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। जनता की चित्तवृत्ति बदलने के साथ साहित्य का स्वरूप भी बदलता है।

प्रारंभिक प्रयास

हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हुई। इससे पहले भक्तमाल, वार्ता साहित्य और कवि-वृत्त संग्रहों में कवियों के परिचय मिलते हैं, जैसे नाभादास का भक्तमाल और चौरासी वैष्णवन की वार्ता। ये इतिहास नहीं थे, पर इतिहास के लिए सामग्री का आधार बने।

इतिहासकारग्रंथविशेषता
गार्सा द तासीइस्त्वार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी (फ्रेंच, 1839)हिन्दी साहित्य के इतिहास का पहला प्रयास; कवियों का वर्णक्रम से परिचय
शिवसिंह सेंगरशिवसिंह सरोज (1883)लगभग एक हज़ार कवियों का परिचय; हिन्दी में लिखा पहला प्रयास
जॉर्ज ग्रियर्सनद मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तानपहली बार काल-क्रम के अनुसार विभाजन का प्रयास
मिश्रबंधुमिश्रबंधु विनोदविशाल कवि-वृत्त संग्रह; काल विभाजन का विस्तृत प्रयास
आचार्य रामचंद्र शुक्लहिन्दी साहित्य का इतिहास (1929)वैज्ञानिक और व्यवस्थित इतिहास; आज तक सबसे प्रामाणिक माना जाता है
डॉ. रामकुमार वर्माहिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (1938)आलोचनात्मक दृष्टि, विशेषकर आदिकाल और भक्तिकाल पर
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीहिन्दी साहित्य की भूमिका (1940), हिन्दी साहित्य का आदिकालसांस्कृतिक और परंपरा-आधारित दृष्टि
डॉ. नगेन्द्र (संपादक)हिन्दी साहित्य का इतिहासअनेक विद्वानों का सामूहिक प्रयास
याद रखें: गार्सा द तासी ने पहला इतिहास लिखा, पर हिन्दी साहित्य का पहला व्यवस्थित और वैज्ञानिक इतिहास आचार्य रामचंद्र शुक्ल का माना जाता है।

हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन एवं नामकरण

काल विभाजन का अर्थ है लगभग एक हज़ार वर्षों के साहित्य को प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर अलग-अलग कालखंडों में बाँटना। नामकरण का आधार उस काल की प्रधान प्रवृत्ति होती है। आचार्य शुक्ल ने कहा कि जिस काल में जिस प्रवृत्ति की रचनाएँ अधिक और प्रसिद्ध हों, उसी के आधार पर उस काल का नाम रखा जाए।

आचार्य शुक्ल का काल विभाजन

कालअन्य नामसमय (विक्रम संवत्)
आदिकालवीरगाथाकाल1050 – 1375
पूर्व मध्यकालभक्तिकाल1375 – 1700
उत्तर मध्यकालरीतिकाल1700 – 1900
आधुनिक कालगद्यकाल1900 से आगे

आदिकाल के विभिन्न नाम

  • चारणकाल – जॉर्ज ग्रियर्सन
  • प्रारंभिक काल – मिश्रबंधु
  • वीरगाथाकाल – आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • सिद्ध-सामंत काल – राहुल सांकृत्यायन
  • बीजवपन काल – आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी
  • संधिकाल एवं चारणकाल – डॉ. रामकुमार वर्मा
  • आदिकाल – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी

आज सबसे अधिक मान्य नाम आदिकाल है, क्योंकि इस काल में केवल वीरगाथाएँ ही नहीं, बल्कि सिद्ध, नाथ, जैन, लौकिक और श्रृंगारी रचनाएँ भी मिलती हैं। "आदि" शब्द से आरंभ का बोध होता है और यह किसी एक प्रवृत्ति तक सीमित नहीं है।

परीक्षा टिप: काल विभाजन वाले प्रश्न में शुक्ल जी की तालिका अवश्य बनाइए और आदिकाल के नामकरण पर अपना मत तर्क सहित लिखिए।

हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता एवं समस्याएँ

पुनर्लेखन की आवश्यकता

  • नई सामग्री की खोज – हस्तलिखित ग्रंथों की खोज से अनेक नए कवि और रचनाएँ सामने आई हैं, जो पुराने इतिहासों में नहीं हैं।
  • नई दृष्टि – समाजशास्त्रीय, मार्क्सवादी, स्त्री और दलित दृष्टि से साहित्य को देखने की आवश्यकता बढ़ी है।
  • पुराने निष्कर्षों में संशोधन – जैसे वीरगाथाकाल के कई ग्रंथ बाद में अप्रामाणिक या परवर्ती सिद्ध हुए।
  • उपेक्षित साहित्य – लोकसाहित्य, स्त्री रचनाकार और क्षेत्रीय बोलियों का साहित्य पहले कम महत्व पाता था।
  • आधुनिक साहित्य का विस्तार – शुक्ल जी के बाद का साहित्य भी इतिहास में व्यवस्थित रूप से जुड़ना चाहिए।

पुनर्लेखन की समस्याएँ

  • प्रामाणिक सामग्री का अभाव – कई ग्रंथों की तिथि और लेखक विवादित हैं।
  • काल विभाजन की समस्या – कालों की सीमा रेखा तय करना कठिन है, क्योंकि प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे में घुली-मिली रहती हैं।
  • नामकरण की समस्या – एक नाम से पूरे काल की सभी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट नहीं होतीं।
  • हिन्दी की सीमा का प्रश्न – अपभ्रंश, डिंगल, मैथिली आदि को हिन्दी में शामिल करें या नहीं, यह विवाद का विषय है।
  • दृष्टिकोण की भिन्नता – हर इतिहासकार की अपनी विचारधारा निष्कर्षों को प्रभावित करती है।
याद रखें: इतिहास का पुनर्लेखन पुराने इतिहासों को नकारना नहीं, बल्कि नई सामग्री और नई दृष्टि से उन्हें पूर्ण बनाना है।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा का परिचय देते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल विभाजन और नामकरण की समस्या पर विचार करते हुए आदिकाल के नामकरण पर अपना मत स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) गार्सा द तासी के इतिहास ग्रंथ पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) आचार्य शुक्ल का काल विभाजन तालिका सहित लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिए।

RTMNU BA Sem 2 · BAHLT Major T-3-102 · इकाई II

इकाई II: आदिकाल की प्रमुखता – पृष्ठभूमि, सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य, रासो साहित्य

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • आदिकाल की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक पृष्ठभूमि
  • सिद्ध, नाथ, जैन प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं कवि
  • रासो साहित्य की विशेषताएँ एवं कवि

आदिकाल की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक पृष्ठभूमि

आदिकाल (लगभग दसवीं से चौदहवीं शताब्दी) हिन्दी साहित्य का आरंभिक काल है। इस समय की परिस्थितियों को समझे बिना इस काल के साहित्य को नहीं समझा जा सकता।

राजनैतिक पृष्ठभूमि

  • हर्षवर्धन के बाद उत्तर भारत में कोई बड़ी केंद्रीय सत्ता नहीं रही। देश अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया।
  • राजपूत राजाओं में आपसी युद्ध और शत्रुता बहुत थी। छोटी-छोटी बातों पर युद्ध हो जाते थे।
  • पश्चिमोत्तर से विदेशी आक्रमण (महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी) होने लगे। तराइन के युद्ध के बाद दिल्ली पर तुर्कों का अधिकार हुआ।
  • इस अशांत वातावरण में राजाओं के आश्रित कवियों ने वीरता और युद्ध का वर्णन किया।

सामाजिक पृष्ठभूमि

  • समाज जाति-पाँति और ऊँच-नीच में बँटा था। सामान्य जनता की दशा दयनीय थी।
  • स्त्रियों की स्थिति कमज़ोर थी। सुंदर राजकुमारियों के लिए भी युद्ध होते थे।
  • युद्धों के कारण जनता में असुरक्षा और निराशा का भाव था।

सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि

  • बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा में तंत्र-मंत्र और चमत्कार बढ़ गए थे। इसी से सिद्ध साहित्य निकला।
  • नाथ पंथ ने हठयोग और शारीरिक-मानसिक संयम पर बल दिया।
  • जैन धर्म का पश्चिम भारत (गुजरात, राजस्थान) में प्रभाव था।
  • शैव, वैष्णव और शाक्त मत भी प्रचलित थे। इस्लाम का प्रवेश भी हो चुका था।

साहित्यिक पृष्ठभूमि

इस काल में संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश की परंपरा चल रही थी। अपभ्रंश से धीरे-धीरे पुरानी हिन्दी का विकास हुआ। साहित्य में वीर, श्रृंगार, धार्मिक, नीतिपरक और लौकिक – सभी प्रकार की रचनाएँ हुईं। डिंगल (राजस्थानी) और पिंगल (ब्रज मिश्रित) शैलियाँ प्रचलित थीं।

सिद्ध, नाथ, जैन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं कवि

(क) सिद्ध साहित्य

बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के साधकों को सिद्ध कहा गया। परंपरा में चौरासी सिद्ध माने जाते हैं। प्रमुख सिद्ध कवि – सरहपा, लुइपा, शबरपा, कण्हपा, डोम्भिपा। राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा को हिन्दी का पहला कवि माना है।

  • बाहरी आडंबर, कर्मकांड और वेद-शास्त्र का खंडन।
  • गुरु की महिमा और सहज मार्ग पर बल।
  • रहस्यात्मक अनुभूति; प्रतीकों का प्रयोग।
  • संधा भाषा (उलटबाँसी जैसी प्रतीकात्मक भाषा) का प्रयोग।
  • दोहा और चर्यापद (गेय पद) शैली।

(ख) नाथ साहित्य

नाथ पंथ के प्रवर्तक मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) और उनके शिष्य गोरखनाथ माने जाते हैं। परंपरा में नौ नाथ प्रसिद्ध हैं। गोरखनाथ की वाणियों का संग्रह गोरखबानी नाम से मिलता है।

  • हठयोग, इंद्रिय-निग्रह और ब्रह्मचर्य पर बल।
  • सिद्धों के भोग-प्रधान मार्ग का विरोध; चरित्र की शुद्धता।
  • गुरु की महत्ता, मूर्तिपूजा और बाह्याचार का विरोध।
  • नाड़ी, चक्र, कुंडलिनी जैसी योग-शब्दावली।
  • संत काव्य (विशेषकर कबीर) पर गहरा प्रभाव।

(ग) जैन साहित्य

जैन मुनियों ने अपभ्रंश और पुरानी हिन्दी में धार्मिक तथा चरित-काव्य लिखे। प्रमुख कवि – स्वयंभू (पउमचरिउ), पुष्पदंत, हेमचंद्र (व्याकरण ग्रंथ में अपभ्रंश दोहे), शालिभद्र सूरि (भरतेश्वर बाहुबली रास)।

  • जैन धर्म के सिद्धांतों (अहिंसा, संयम, वैराग्य) का प्रचार।
  • रास, फागु, चरित और चउपई जैसे काव्य-रूप।
  • राम-कथा और कृष्ण-कथा का जैन रूप।
  • शांत रस की प्रधानता; उपदेशात्मकता।
याद रखें: सिद्ध – वज्रयान, सहज मार्ग, सरहपा; नाथ – हठयोग, गोरखनाथ; जैन – रास काव्य, स्वयंभू, हेमचंद्र।

रासो साहित्य की विशेषताएँ एवं कवि

"रासो" शब्द की व्युत्पत्ति पर विद्वानों में मतभेद है। कुछ इसे "रसायण" से, कुछ "रहस्य" से और कुछ "रास" से जोड़ते हैं। रासो ग्रंथ प्रायः राजाओं के आश्रित चारण या भाट कवियों द्वारा लिखे गए चरित-काव्य हैं।

ग्रंथकविविषय
पृथ्वीराज रासोचंदबरदाईपृथ्वीराज चौहान का जीवन और युद्ध; हिन्दी का पहला महाकाव्य माना जाता है
बीसलदेव रासोनरपति नाल्हबीसलदेव और राजमती की प्रेम-विरह कथा
परमाल रासो (आल्हखंड)जगनिकआल्हा-ऊदल की वीरता; लोक में गाया जाता है
खुमाण रासोदलपति विजयमेवाड़ के राजा खुमाण
हम्मीर रासोशार्ङ्गधर (माना जाता है)रणथंभौर के हम्मीर

रासो साहित्य की विशेषताएँ

  • वीर और श्रृंगार रस की प्रधानता – युद्ध के साथ प्रेम और विवाह के प्रसंग।
  • आश्रयदाताओं की प्रशंसा – अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन।
  • ऐतिहासिकता का अभाव – तिथियों और घटनाओं में कल्पना का मिश्रण।
  • प्रामाणिकता का संदेह – अनेक ग्रंथों में बाद में अंश जोड़े गए (प्रक्षेप)।
  • युद्धों का सजीव वर्णन – सेना, अस्त्र-शस्त्र, रणभूमि के चित्र।
  • भाषा – डिंगल और पिंगल; छप्पय, दोहा, तोमर, त्रोटक आदि छंद।
  • राष्ट्रीय भावना का अभाव – वीरता अपने राजा तक सीमित।
परीक्षा टिप: पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर प्रश्न अक्सर आता है – इसके तीन मत लिखिए: पूर्ण प्रामाणिक, पूर्ण अप्रामाणिक और अर्ध-प्रामाणिक (मूल अंश पुराना, बाद में प्रक्षेप)।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) आदिकाल की राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का वर्णन करते हुए बताइए कि उन्होंने तत्कालीन साहित्य को कैसे प्रभावित किया।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रासो साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए प्रमुख रासो ग्रंथों का परिचय दीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) सिद्ध साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) नाथ साहित्य और गोरखनाथ पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर टिप्पणी लिखिए।

RTMNU BA Sem 2 · BAHLT Major T-3-102 · इकाई III

इकाई III: भक्तिकाल – पृष्ठभूमि, भक्ति आंदोलन, सगुण एवं निर्गुण काव्यधारा

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • भक्तिकाल की पृष्ठभूमि, काल निर्धारण, नामकरण
  • भक्ति आंदोलन, प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं विशेषताएँ
  • सगुण काव्यधारा, निर्गुण काव्यधारा

भक्तिकाल की पृष्ठभूमि, काल निर्धारण, नामकरण

काल निर्धारण

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल का समय संवत् 1375 से 1700 तक माना है, जिसे वे पूर्व मध्यकाल भी कहते हैं। ईसवी सन् में यह लगभग चौदहवीं शताब्दी के मध्य से सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक का समय है। कुछ विद्वान इसकी सीमाओं में थोड़ा अंतर मानते हैं, पर अधिकतर शुक्ल जी का काल निर्धारण ही स्वीकार करते हैं।

नामकरण

इस काल में भक्ति-भावना से भरी रचनाओं की प्रधानता रही। इसलिए इसका नाम भक्तिकाल पड़ा। कबीर, जायसी, सूर और तुलसी जैसे महान कवियों के कारण इसे हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग भी कहा जाता है।

पृष्ठभूमि

  • राजनैतिक – दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल शासन। सत्ता संघर्ष और युद्धों से जनता परेशान थी। अकबर के समय कुछ शांति और समन्वय का वातावरण बना।
  • सामाजिक – जाति-भेद, छुआछूत और ऊँच-नीच। सामान्य जनता शोषित थी। हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों का आपसी संपर्क बढ़ा।
  • धार्मिक – कर्मकांड और आडंबर बढ़े थे। दक्षिण से आई भक्ति की लहर ने जनता को सरल मार्ग दिखाया। सूफी संतों ने प्रेम का संदेश दिया।
  • साहित्यिक – लोकभाषाओं (अवधी, ब्रज) में रचना की परंपरा मज़बूत हुई। संस्कृत के स्थान पर जनभाषा में काव्य रचा गया।

भक्ति आंदोलन, प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं विशेषताएँ

भक्ति आंदोलन का उदय

भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण भारत में आलवार (वैष्णव) और नायनार (शैव) संतों से हुआ। बाद में रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य और वल्लभाचार्य जैसे आचार्यों ने इसे दार्शनिक आधार दिया। रामानंद इसे उत्तर भारत में लाए। लोक में प्रसिद्ध है कि भक्ति द्रविड़ (दक्षिण) में उपजी और रामानंद उसे उत्तर में लाए।

उदय के कारणों पर विद्वानों के मत

विद्वानमत
जॉर्ज ग्रियर्सनभक्ति आंदोलन बिजली की चमक की तरह अचानक फैला; इस पर ईसाइयत का प्रभाव था।
आचार्य रामचंद्र शुक्लपराजित और निराश हिन्दू जनता ने ईश्वर की शरण ली।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीयह भारतीय चिंतन-परंपरा का स्वाभाविक विकास था, किसी पराजय की प्रतिक्रिया नहीं।

भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ एवं विशेषताएँ

  • भक्ति-भावना की प्रधानता – सभी धाराओं में ईश्वर-प्रेम केंद्र में है।
  • गुरु की महिमा – गुरु को ईश्वर तक पहुँचाने वाला माना गया।
  • नाम-स्मरण का महत्व – राम, कृष्ण या ईश्वर के नाम का जप।
  • आडंबर और कर्मकांड का विरोध – विशेषकर संत कवियों में।
  • समन्वय की भावना – धर्म, समाज, दर्शन और भाषा में समन्वय; तुलसी इसके श्रेष्ठ उदाहरण।
  • लोकभाषा का प्रयोग – अवधी, ब्रज, सधुक्कड़ी में रचना।
  • लोकमंगल की भावना – साहित्य जनता के कल्याण के लिए।
  • विविध काव्य-रूप – मुक्तक (पद, साखी, दोहा) और प्रबंध (रामचरितमानस, पद्मावत)।
  • राज्याश्रय से मुक्ति – अधिकतर कवि राजदरबार से दूर रहे।

सगुण काव्यधारा, निर्गुण काव्यधारा

ईश्वर के स्वरूप की दृष्टि से भक्तिकाल की दो मुख्य धाराएँ हैं – निर्गुण (निराकार ईश्वर) और सगुण (साकार, अवतारी ईश्वर)। दोनों की दो-दो शाखाएँ हैं।

धाराशाखाप्रमुख कविप्रमुख विशेषता
निर्गुणज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्य)कबीर, रैदास, गुरु नानक, दादूदयालज्ञान, गुरु, आडंबर-विरोध, सामाजिक सुधार
प्रेमाश्रयी शाखा (सूफी काव्य)जायसी, कुतुबन, मंझन, उसमानप्रेमाख्यान, लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम
सगुणरामभक्ति शाखातुलसीदास, अग्रदास, नाभादासमर्यादा, लोकमंगल, दास्य भाव
कृष्णभक्ति शाखासूरदास, अष्टछाप के कवि, मीराबाई, रसखानवात्सल्य, सख्य, माधुर्य भाव; लीला-गान

निर्गुण काव्यधारा की विशेषताएँ

  • ईश्वर निराकार, अजन्मा और घट-घट में व्याप्त है।
  • मूर्तिपूजा, तीर्थ, व्रत और जाति-भेद का विरोध।
  • सूफी कवियों ने प्रेम-कहानियों के माध्यम से आत्मा-परमात्मा के मिलन को दिखाया; भाषा अवधी, छंद दोहा-चौपाई।
  • संतों की भाषा मिली-जुली सधुक्कड़ी; रहस्यवाद और उलटबाँसियाँ।

सगुण काव्यधारा की विशेषताएँ

  • ईश्वर के अवतार (राम, कृष्ण) की लीलाओं का गान।
  • भक्ति के नवधा रूपों का चित्रण; दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भाव।
  • रामकाव्य में मर्यादा और आदर्श; कृष्णकाव्य में प्रेम और आनंद।
  • अवधी और ब्रजभाषा का उत्कर्ष; पद, दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया।
  • वल्लभाचार्य और विट्ठलनाथ के आठ शिष्य कवि अष्टछाप कहलाए – सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास।
परीक्षा टिप: "भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग है" – इस प्रश्न में चारों शाखाएँ, प्रमुख कवि, भाषा, लोकमंगल और समन्वय के बिंदु अवश्य लिखिए।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भक्ति आंदोलन के उदय के कारणों पर विभिन्न विद्वानों के मतों का उल्लेख करते हुए भक्तिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियों का विवेचन कीजिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) "भक्तिकाल हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग है।" इस कथन की सगुण और निर्गुण काव्यधाराओं के आधार पर समीक्षा कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) भक्तिकाल के नामकरण और काल निर्धारण पर टिप्पणी लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) अष्टछाप पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) सूफी (प्रेमाश्रयी) काव्य की विशेषताएँ लिखिए।

RTMNU BA Sem 2 · BAHLT Major T-3-102 · इकाई IV

इकाई IV: भक्तिकाल के प्रतिनिधि कवियों का सामान्य परिचय

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • कबीरदास
  • तुलसीदास
  • सूरदास
  • जायसी

भक्तिकाल की चारों शाखाओं के एक-एक प्रतिनिधि कवि हैं – ज्ञानाश्रयी शाखा के कबीर, रामभक्ति शाखा के तुलसी, कृष्णभक्ति शाखा के सूर और प्रेमाश्रयी शाखा के जायसी।

कबीरदास

जीवन परिचय

कबीर का जन्म काशी में माना जाता है। परंपरा के अनुसार उनका जन्म संवत् 1455 (सन् 1398) में हुआ। उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपती ने किया। वे स्वामी रामानंद को अपना गुरु मानते थे। उनका निधन मगहर में हुआ। वे पढ़े-लिखे नहीं थे; उनकी वाणी उनके शिष्यों ने संकलित की।

रचना

उनकी वाणियों का संग्रह बीजक कहलाता है, जिसके तीन भाग हैं – साखी (दोहे), सबद (गेय पद) और रमैनी (दोहा-चौपाई)। गुरु ग्रंथ साहिब में भी उनकी वाणी संकलित है।

काव्यगत विशेषताएँ

  • निर्गुण, निराकार ब्रह्म की उपासना; ईश्वर हर हृदय में है।
  • मूर्तिपूजा, तीर्थ, रोज़ा-नमाज़ और जाति-भेद पर तीखा व्यंग्य; हिन्दू-मुस्लिम दोनों के आडंबरों का खंडन।
  • गुरु की महिमा को ईश्वर से भी बढ़कर बताया।
  • रहस्यवाद – आत्मा और परमात्मा के मिलन का भाव; उलटबाँसियाँ।
  • भाषा सधुक्कड़ी; आचार्य शुक्ल ने इसे "पंचमेल खिचड़ी" कहा। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें "वाणी का डिक्टेटर" कहा।

तुलसीदास

जीवन परिचय

तुलसीदास रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनके जन्म के वर्ष और स्थान पर मतभेद है; राजापुर (बाँदा) और सोरों दोनों का उल्लेख मिलता है। बचपन कठिनाइयों में बीता। गुरु नरहरिदास से उन्हें राम-कथा का ज्ञान मिला। पत्नी रत्नावली की बात से वैराग्य होने की कथा प्रसिद्ध है। उनका निधन संवत् 1680 (सन् 1623) में काशी में हुआ।

प्रमुख रचनाएँ

रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्ण गीतावली, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू, वैराग्य संदीपनी और रामाज्ञा प्रश्न – ये बारह ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं। रामचरितमानस सात कांडों में अवधी में रचा गया महाकाव्य है।

काव्यगत विशेषताएँ

  • राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं; दास्य भाव की भक्ति।
  • समन्वय की भावना – सगुण-निर्गुण, शैव-वैष्णव, ज्ञान-भक्ति, लोक-शास्त्र का समन्वय।
  • लोकमंगल और आदर्श समाज (रामराज्य) की कल्पना; इसलिए उन्हें लोकनायक कहा जाता है।
  • अवधी और ब्रज दोनों पर समान अधिकार; दोहा, चौपाई, कवित्त, सवैया, पद, बरवै – सभी शैलियों में रचना।

सूरदास

जीवन परिचय

सूरदास कृष्णभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं। परंपरा के अनुसार उनका जन्म लगभग संवत् 1535 (सन् 1478) में हुआ। वे वल्लभाचार्य के शिष्य बने और पुष्टिमार्ग में दीक्षित हुए। गोवर्धन के श्रीनाथ मंदिर में कीर्तन करते थे। वे अष्टछाप के सबसे प्रमुख कवि हैं। उनके जन्मांध होने पर विद्वानों में मतभेद है।

रचनाएँ

सूरसागर (प्रसिद्धतम), सूरसारावली और साहित्य लहरी।

काव्यगत विशेषताएँ

  • वात्सल्य रस के सम्राट – बाल कृष्ण की लीलाओं, माखन चोरी, यशोदा के स्नेह का अनुपम चित्रण।
  • श्रृंगार रस – संयोग और वियोग दोनों; राधा-कृष्ण प्रेम।
  • भ्रमरगीत – उद्धव-गोपी संवाद में ज्ञान पर प्रेम (भक्ति) की विजय।
  • सख्य और माधुर्य भाव की भक्ति।
  • मधुर ब्रजभाषा; गेय पद शैली; संगीतात्मकता।

जायसी

जीवन परिचय

मलिक मुहम्मद जायसी प्रेमाश्रयी (सूफी) शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। वे जायस (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे, इसलिए "जायसी" कहलाए। वे सूफी संत परंपरा से जुड़े थे।

रचनाएँ

पद्मावत (प्रसिद्ध प्रेमाख्यान महाकाव्य), अखरावट और आखिरी कलाम।

पद्मावत का संक्षेप

चित्तौड़ के राजा रत्नसेन हीरामन तोते से सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती के सौंदर्य के बारे में सुनते हैं। अनेक कठिनाइयाँ पार कर वे पद्मावती से विवाह करते हैं। पहली रानी नागमती का विरह-वर्णन (नागमती वियोग खंड) हिन्दी का श्रेष्ठ विरह-काव्य माना जाता है। बाद में अलाउद्दीन के आक्रमण और रत्नसेन की मृत्यु के बाद रानियाँ सती हो जाती हैं।

काव्यगत विशेषताएँ

  • लौकिक प्रेम-कथा के माध्यम से अलौकिक (ईश्वरीय) प्रेम का संकेत – कथा में प्रतीकात्मकता।
  • इतिहास और कल्पना का मिश्रण।
  • प्रेम की पीर और विरह का मार्मिक चित्रण; बारहमासा।
  • ठेठ अवधी भाषा; दोहा-चौपाई (मसनवी शैली)।
  • हिन्दू लोकजीवन और संस्कृति का सहृदय चित्रण।
कविशाखाप्रमुख रचनाभाषा
कबीरज्ञानाश्रयीबीजकसधुक्कड़ी
जायसीप्रेमाश्रयीपद्मावतअवधी
तुलसीरामभक्तिरामचरितमानसअवधी, ब्रज
सूरकृष्णभक्तिसूरसागरब्रज
परीक्षा टिप: किसी भी कवि पर प्रश्न हो तो क्रम रखें – जीवन परिचय, रचनाएँ, भक्ति-भावना, प्रमुख विशेषताएँ, भाषा-शैली और साहित्य में स्थान।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) कबीरदास के जीवन और काव्य का परिचय देते हुए उनकी सामाजिक चेतना पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) तुलसीदास को लोकनायक क्यों कहा जाता है? उनकी समन्वय भावना और प्रमुख रचनाओं के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट क्यों कहा जाता है?
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) जायसी के पद्मावत पर टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) कबीर की भाषा पर टिप्पणी लिखिए।