पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा
- हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन एवं नामकरण
- पुनर्लेखन की आवश्यकता एवं समस्याएँ
हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा
साहित्य का इतिहास केवल कवियों और रचनाओं की सूची नहीं होता। उसमें यह भी बताया जाता है कि किस समय की परिस्थितियों ने किस प्रकार के साहित्य को जन्म दिया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, किसी देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। जनता की चित्तवृत्ति बदलने के साथ साहित्य का स्वरूप भी बदलता है।
प्रारंभिक प्रयास
हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हुई। इससे पहले भक्तमाल, वार्ता साहित्य और कवि-वृत्त संग्रहों में कवियों के परिचय मिलते हैं, जैसे नाभादास का भक्तमाल और चौरासी वैष्णवन की वार्ता। ये इतिहास नहीं थे, पर इतिहास के लिए सामग्री का आधार बने।
| इतिहासकार | ग्रंथ | विशेषता |
|---|---|---|
| गार्सा द तासी | इस्त्वार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐ ऐंदुस्तानी (फ्रेंच, 1839) | हिन्दी साहित्य के इतिहास का पहला प्रयास; कवियों का वर्णक्रम से परिचय |
| शिवसिंह सेंगर | शिवसिंह सरोज (1883) | लगभग एक हज़ार कवियों का परिचय; हिन्दी में लिखा पहला प्रयास |
| जॉर्ज ग्रियर्सन | द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान | पहली बार काल-क्रम के अनुसार विभाजन का प्रयास |
| मिश्रबंधु | मिश्रबंधु विनोद | विशाल कवि-वृत्त संग्रह; काल विभाजन का विस्तृत प्रयास |
| आचार्य रामचंद्र शुक्ल | हिन्दी साहित्य का इतिहास (1929) | वैज्ञानिक और व्यवस्थित इतिहास; आज तक सबसे प्रामाणिक माना जाता है |
| डॉ. रामकुमार वर्मा | हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (1938) | आलोचनात्मक दृष्टि, विशेषकर आदिकाल और भक्तिकाल पर |
| आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी | हिन्दी साहित्य की भूमिका (1940), हिन्दी साहित्य का आदिकाल | सांस्कृतिक और परंपरा-आधारित दृष्टि |
| डॉ. नगेन्द्र (संपादक) | हिन्दी साहित्य का इतिहास | अनेक विद्वानों का सामूहिक प्रयास |
हिन्दी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन एवं नामकरण
काल विभाजन का अर्थ है लगभग एक हज़ार वर्षों के साहित्य को प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर अलग-अलग कालखंडों में बाँटना। नामकरण का आधार उस काल की प्रधान प्रवृत्ति होती है। आचार्य शुक्ल ने कहा कि जिस काल में जिस प्रवृत्ति की रचनाएँ अधिक और प्रसिद्ध हों, उसी के आधार पर उस काल का नाम रखा जाए।
आचार्य शुक्ल का काल विभाजन
| काल | अन्य नाम | समय (विक्रम संवत्) |
|---|---|---|
| आदिकाल | वीरगाथाकाल | 1050 – 1375 |
| पूर्व मध्यकाल | भक्तिकाल | 1375 – 1700 |
| उत्तर मध्यकाल | रीतिकाल | 1700 – 1900 |
| आधुनिक काल | गद्यकाल | 1900 से आगे |
आदिकाल के विभिन्न नाम
- चारणकाल – जॉर्ज ग्रियर्सन
- प्रारंभिक काल – मिश्रबंधु
- वीरगाथाकाल – आचार्य रामचंद्र शुक्ल
- सिद्ध-सामंत काल – राहुल सांकृत्यायन
- बीजवपन काल – आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी
- संधिकाल एवं चारणकाल – डॉ. रामकुमार वर्मा
- आदिकाल – आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
आज सबसे अधिक मान्य नाम आदिकाल है, क्योंकि इस काल में केवल वीरगाथाएँ ही नहीं, बल्कि सिद्ध, नाथ, जैन, लौकिक और श्रृंगारी रचनाएँ भी मिलती हैं। "आदि" शब्द से आरंभ का बोध होता है और यह किसी एक प्रवृत्ति तक सीमित नहीं है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता एवं समस्याएँ
पुनर्लेखन की आवश्यकता
- नई सामग्री की खोज – हस्तलिखित ग्रंथों की खोज से अनेक नए कवि और रचनाएँ सामने आई हैं, जो पुराने इतिहासों में नहीं हैं।
- नई दृष्टि – समाजशास्त्रीय, मार्क्सवादी, स्त्री और दलित दृष्टि से साहित्य को देखने की आवश्यकता बढ़ी है।
- पुराने निष्कर्षों में संशोधन – जैसे वीरगाथाकाल के कई ग्रंथ बाद में अप्रामाणिक या परवर्ती सिद्ध हुए।
- उपेक्षित साहित्य – लोकसाहित्य, स्त्री रचनाकार और क्षेत्रीय बोलियों का साहित्य पहले कम महत्व पाता था।
- आधुनिक साहित्य का विस्तार – शुक्ल जी के बाद का साहित्य भी इतिहास में व्यवस्थित रूप से जुड़ना चाहिए।
पुनर्लेखन की समस्याएँ
- प्रामाणिक सामग्री का अभाव – कई ग्रंथों की तिथि और लेखक विवादित हैं।
- काल विभाजन की समस्या – कालों की सीमा रेखा तय करना कठिन है, क्योंकि प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे में घुली-मिली रहती हैं।
- नामकरण की समस्या – एक नाम से पूरे काल की सभी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट नहीं होतीं।
- हिन्दी की सीमा का प्रश्न – अपभ्रंश, डिंगल, मैथिली आदि को हिन्दी में शामिल करें या नहीं, यह विवाद का विषय है।
- दृष्टिकोण की भिन्नता – हर इतिहासकार की अपनी विचारधारा निष्कर्षों को प्रभावित करती है।
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन की परंपरा का परिचय देते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान का मूल्यांकन कीजिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल विभाजन और नामकरण की समस्या पर विचार करते हुए आदिकाल के नामकरण पर अपना मत स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) गार्सा द तासी के इतिहास ग्रंथ पर टिप्पणी लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) आचार्य शुक्ल का काल विभाजन तालिका सहित लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) हिन्दी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता स्पष्ट कीजिए।