पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- भारतेन्दु युग [सामान्य परिचय]
- द्विवेदी युग [सामान्य परिचय]
- छायावाद युग [सामान्य परिचय]
खड़ी बोली मूलतः दिल्ली, मेरठ और आसपास के क्षेत्र (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) की बोली है, जिसे ‘कौरवी’ भी कहा जाता है। आज की मानक हिन्दी इसी खड़ी बोली पर आधारित है। अमीर ख़ुसरो की पहेलियों और मुकरियों में इसके आरंभिक रूप मिलते हैं। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता, 1800) से जुड़े लल्लूलाल (प्रेमसागर) और सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) तथा इंशा अल्ला ख़ाँ (रानी केतकी की कहानी) और सदासुखलाल ने खड़ी बोली गद्य को आगे बढ़ाया। आधुनिक काल में खड़ी बोली पहले गद्य की और फिर कविता की भाषा बनी।
| युग | लगभग समय | खड़ी बोली की स्थिति |
|---|---|---|
| भारतेन्दु युग | लगभग 1850–1900 | गद्य में खड़ी बोली, कविता में प्रायः ब्रजभाषा |
| द्विवेदी युग | लगभग 1900–1920 | कविता में भी खड़ी बोली की प्रतिष्ठा; भाषा का परिष्कार |
| छायावाद युग | लगभग 1918–1936 | खड़ी बोली में कोमलता, लाक्षणिकता और काव्य-सौंदर्य |
भारतेन्दु युग [सामान्य परिचय]
इस युग का नाम भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–1885) के नाम पर पड़ा। उन्हें आधुनिक हिन्दी साहित्य का जनक माना जाता है। यह हिन्दी में नवजागरण का युग था।
प्रमुख विशेषताएँ
- गद्य का विकास – नाटक, निबंध, उपन्यास, पत्रकारिता का आरंभ। भारतेन्दु ने स्वयं लिखा कि उनके समय में ‘हिन्दी नई चाल में ढली’।
- पत्र-पत्रिकाएँ – कविवचनसुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन (बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका), बालाबोधिनी।
- राष्ट्रीयता और देशभक्ति – अंग्रेज़ी शासन से होने वाली आर्थिक लूट पर चिंता।
- समाज-सुधार – बाल-विवाह, छुआछूत, अंधविश्वास का विरोध; स्त्री-शिक्षा का समर्थन।
- भाषा – गद्य में खड़ी बोली, कविता में अधिकतर ब्रजभाषा। हास्य-व्यंग्य की प्रवृत्ति।
प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ
- भारतेन्दु हरिश्चंद्र – भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, सत्य हरिश्चंद्र (नाटक)।
- प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, राधाचरण गोस्वामी, श्रीनिवास दास (परीक्षा गुरु)।
इसी युग के अंत में 1893 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई, जिसने नागरी लिपि और हिन्दी के प्रचार, कोश-निर्माण और प्राचीन ग्रंथों की खोज का बड़ा काम किया। भारतेन्दु युग ने खड़ी बोली गद्य को जनता से जोड़ा, पर कविता की भाषा के रूप में खड़ी बोली अभी पूरी तरह स्वीकृत नहीं हुई थी। ब्रजभाषा बनाम खड़ी बोली का विवाद इसी समय शुरू हुआ।
द्विवेदी युग [सामान्य परिचय]
इस युग का नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864–1938) के नाम पर है। उन्होंने 1903 से ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन किया और हिन्दी भाषा को व्याकरण-सम्मत, शुद्ध और एकरूप बनाया।
प्रमुख विशेषताएँ
- खड़ी बोली कविता की भाषा बनी – ब्रजभाषा का स्थान खड़ी बोली ने लिया।
- भाषा-संस्कार – वर्तनी, व्याकरण और विराम-चिह्नों में एकरूपता।
- आदर्शवाद और नैतिकता – कर्तव्य, त्याग, सदाचार का संदेश।
- राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना – भारत के गौरवशाली अतीत का गान।
- इतिवृत्तात्मकता – कविता में वर्णन और कथा की प्रधानता; कुछ नीरसता।
- उपेक्षित पात्रों के प्रति सहानुभूति – जैसे उर्मिला, यशोधरा।
प्रमुख रचनाकार और रचनाएँ
- मैथिलीशरण गुप्त – भारत-भारती, साकेत, यशोधरा।
- अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ – प्रियप्रवास (खड़ी बोली का पहला महाकाव्य माना जाता है)।
- श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी (पथिक), नाथूराम शर्मा ‘शंकर’।
छायावाद युग [सामान्य परिचय]
छायावाद हिन्दी कविता का स्वर्ण युग माना जाता है। इसमें द्विवेदी युग की स्थूलता और इतिवृत्तात्मकता के स्थान पर सूक्ष्म भाव, कल्पना और सौंदर्य आए। छायावाद के चार स्तंभ – जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा।
प्रमुख विशेषताएँ
- व्यक्तिवाद और आत्माभिव्यक्ति – कवि के निजी सुख-दुःख।
- प्रकृति-चित्रण – प्रकृति पर मानवीय भावों का आरोप (मानवीकरण)।
- प्रेम और सौंदर्य – सूक्ष्म और मानसिक सौंदर्य।
- रहस्यवाद – अज्ञात सत्ता के प्रति जिज्ञासा, विशेषकर महादेवी में।
- राष्ट्रीय और मानवतावादी स्वर।
- भाषा – संस्कृतनिष्ठ, कोमल, लाक्षणिक, चित्रात्मक खड़ी बोली; प्रतीक और बिंब; मुक्त छंद (निराला)।
प्रमुख रचनाएँ
| कवि | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|
| जयशंकर प्रसाद | कामायनी, आँसू, लहर |
| सुमित्रानंदन पंत | पल्लव, गुंजन, ग्राम्या |
| सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | परिमल, अनामिका, राम की शक्तिपूजा |
| महादेवी वर्मा | नीहार, रश्मि, नीरजा, यामा |
छायावाद ने सिद्ध कर दिया कि खड़ी बोली में भी ब्रजभाषा जैसी मधुरता और कोमलता लाई जा सकती है। इसके बाद प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता में खड़ी बोली ही एकमात्र काव्य-भाषा रही।
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) भारतेन्दु युग की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए खड़ी बोली के विकास में इस युग के योगदान पर प्रकाश डालिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) द्विवेदी युग और छायावाद युग की प्रवृत्तियों की तुलना करते हुए खड़ी बोली हिन्दी के विकास को स्पष्ट कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का खड़ी बोली के परिष्कार में योगदान लिखिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) छायावाद के चार स्तंभ और उनकी प्रमुख रचनाएँ बताइए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) टिप्पणी लिखिए – खड़ी बोली का आरंभिक गद्य।