पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)
- नाटक – बकरी – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना: जीवन परिचय
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में हुआ और निधन 23 सितंबर 1983 को दिल्ली में हुआ। वे कवि, कहानीकार, नाटककार, पत्रकार और बाल-साहित्यकार थे। वे ‘तीसरा सप्तक’ के कवि थे। उन्होंने ‘दिनमान’ साप्ताहिक में काम किया और उनका स्तंभ ‘चरचे और चरखे’ बहुत लोकप्रिय था। वे बच्चों की पत्रिका ‘पराग’ के संपादक भी रहे। उनके काव्य संग्रह ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
प्रमुख रचनाएँ
| विधा | रचनाएँ |
|---|---|
| काव्य | काठ की घंटियाँ, बाँस का पुल, गर्म हवाएँ, कुआनो नदी, जंगल का दर्द, खूँटियों पर टँगे लोग |
| नाटक | बकरी, लड़ाई, अब गरीबी हटाओ |
| उपन्यास | सोया हुआ जल, पागल कुत्तों का मसीहा |
| बाल-साहित्य | बतूता का जूता, महँगू की टाई |
उनकी रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा, व्यवस्था के प्रति आक्रोश और तीखा राजनीतिक व्यंग्य मिलता है।
नाटक: परिभाषा और तत्व
परिभाषा: नाटक वह साहित्यिक विधा है जो रंगमंच पर अभिनेताओं द्वारा अभिनय करके दर्शकों के सामने प्रस्तुत की जाती है। इसे ‘दृश्य काव्य’ कहा जाता है, क्योंकि इसे पढ़ने के साथ-साथ देखा भी जाता है।
नाटक के प्रमुख तत्व
- कथावस्तु
- पात्र और चरित्र-चित्रण
- संवाद (कथोपकथन)
- देशकाल और वातावरण
- भाषा-शैली
- उद्देश्य
- अभिनेयता (रंगमंचीयता)
नाटक की पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद जनता को आशा थी कि गांधी जी के आदर्शों पर चलकर देश में ईमानदार शासन आएगा। पर धीरे-धीरे नेताओं ने गांधी के नाम को केवल वोट और सत्ता पाने का साधन बना लिया। सादगी, सत्य और सेवा की जगह दिखावा, भ्रष्टाचार और स्वार्थ बढ़ गया। ‘बकरी’ इसी मोहभंग की उपज है। गांधी जी के साथ बकरी का प्रसिद्ध संबंध था, इसलिए नाटककार ने बकरी को प्रतीक बनाकर गांधीवाद के दुरुपयोग पर करारा व्यंग्य किया।
बकरी: कथावस्तु (कथासार)
नाटक की शुरुआत नौटंकी की तरह सूत्रधार, गीत और नगाड़े के साथ होती है। कथा एक गरीब गाँव की है। गाँव में विपती नाम की एक गरीब स्त्री रहती है। उसकी बकरी ही उसकी एकमात्र पूँजी और सहारा है।
गाँव में तीन चालाक और स्वार्थी लोग आते हैं — दुर्जन सिंह, कर्मवीर और सत्यवीर। वे विपती की बकरी छीन लेते हैं और घोषणा करते हैं कि यह कोई साधारण बकरी नहीं, बल्कि गांधी जी की बकरी की वंशज है। भोले-भाले गाँव वाले इस बात पर विश्वास कर लेते हैं।
अब बकरी को पूज्य बना दिया जाता है। उसके नाम पर आश्रम बनाया जाता है, पूजा होती है और गाँव वालों से चंदा व चढ़ावा वसूला जाता है। ‘गांधी’ और ‘बकरी’ के नाम पर तीनों का धंधा खूब चलता है। विपती रोती-गिड़गिड़ाती है, पर उसकी कोई नहीं सुनता।
धीरे-धीरे यह धार्मिक पाखंड राजनीति में बदल जाता है। बकरी के नाम पर जनता की भावनाओं का उपयोग करके दुर्जन सिंह चुनाव लड़ता है और सत्ता प्राप्त कर लेता है। पुलिस और व्यवस्था भी इन ठगों का ही साथ देती है।
नाटक में एक युवक है, जो इस पाखंड को पहचानता है। वह गाँव वालों को समझाता है कि उनके नाम पर, गांधी के नाम पर, उन्हें ही लूटा जा रहा है। अंत में गाँव वालों में जागरूकता आती है और वे इस शोषण और पाखंड के विरुद्ध एकजुट होकर खड़े होते हैं। नाटक जन-जागरण और विरोध के स्वर के साथ समाप्त होता है।
कथावस्तु की विशेषताएँ
- सरल, छोटी और प्रतीकात्मक कथा।
- हास्य और व्यंग्य के साथ गंभीर संदेश।
- गीत, नगाड़ा, सूत्रधार — लोकनाट्य की पूरी छटा।
- घटनाएँ तेज़ी से आगे बढ़ती हैं और दर्शक को बाँधे रखती हैं।
संभावित परीक्षा प्रश्न
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का परिचय देते हुए ‘बकरी’ नाटक की कथावस्तु लिखिए।
- (दीर्घोत्तरी प्रश्न) नाटक के तत्वों के आधार पर ‘बकरी’ नाटक की समीक्षा कीजिए।
- (लघूत्तरी प्रश्न) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की प्रमुख रचनाएँ
- (लघूत्तरी प्रश्न) नाटक की परिभाषा और तत्व
- (लघूत्तरी प्रश्न) ‘बकरी’ में ‘गांधी जी की बकरी’ का प्रसंग