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भाषा: व्याकरण एवं संवाद कौशल BAHIN T2-101

RTMNU BA Semester 1 · Hindi Language (हिन्दी भाषा) · 2 units · हर इकाई के नोट्स

UniversityRTMNU – राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय, नागपुर
CourseB.A. (Four Year UG Programme, NEP 2020) – Hindi Language (हिन्दी भाषा)
SemesterSemester I
Paper codeBAHIN T2-101
Paper titleभाषा: व्याकरण एवं संवाद कौशल
CategoryMajor T-2 · Major (DSC) – मुख्य विषय
Credits2 credits (theory, 2 घंटे प्रति सप्ताह)
Marksसैद्धांतिक परीक्षा: 40 अंक + आंतरिक मूल्यांकन (CIE) 10 अंक = 50; उत्तीर्ण होने के लिए न्यूनतम 20
Syllabusas per official RTMNU NEP 2020 syllabus 2024-25 (B.A. Hindi Language Sem I to IV, लागू सत्र 2024-25 से)

इकाइयों के विषय आधिकारिक RTMNU पाठ्यक्रम के अनुसार हैं। Official RTMNU syllabus page · All RTMNU BA Hindi papers

Units

  1. 1इकाई I: व्याकरणNotes
  2. 2इकाई II: संवाद कौशलNotes

RTMNU BA Sem 1 · BAHIN T2-101 · इकाई I

इकाई I: व्याकरण

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • संधि
  • समास
  • रस
  • छंद
  • अलंकार
  • शुद्ध लेखन

संधि

परिभाषा: दो निकटवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है, उसे संधि कहते हैं। जैसे - विद्या + आलय = विद्यालय। संधि को अलग करना 'संधि-विच्छेद' कहलाता है।

भेदउपभेद / नियमउदाहरण
स्वर संधिदीर्घविद्या + आलय = विद्यालय
स्वर संधिगुणदेव + इन्द्र = देवेन्द्र
स्वर संधिवृद्धिसदा + एव = सदैव
स्वर संधियणइति + आदि = इत्यादि
स्वर संधिअयादिने + अन = नयन
व्यंजन संधिव्यंजन का स्वर या व्यंजन से मेलजगत् + ईश = जगदीश, सत् + जन = सज्जन
विसर्ग संधिविसर्ग का स्वर या व्यंजन से मेलनिः + चल = निश्चल, मनः + योग = मनोयोग

समास

परिभाषा: दो या अधिक शब्दों को मिलाकर एक नया संक्षिप्त शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं। बने हुए शब्द को 'समस्त पद' और उसे तोड़ने को 'समास-विग्रह' कहते हैं।

समासपहचानउदाहरण (विग्रह)
अव्ययीभावपहला पद अव्यय और प्रधानयथाशक्ति (शक्ति के अनुसार), प्रतिदिन
तत्पुरुषदूसरा पद प्रधान, कारक-चिह्न लुप्तराजपुत्र (राजा का पुत्र), रसोईघर
कर्मधारयविशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेयनीलकमल (नीला है जो कमल), चरणकमल
द्विगुपहला पद संख्यावाचकत्रिभुवन (तीन भुवनों का समूह), चौराहा
द्वंद्वदोनों पद प्रधानमाता-पिता (माता और पिता)
बहुव्रीहिकोई अन्य पद प्रधानदशानन (दस हैं आनन जिसके - रावण), लंबोदर
याद रखें: संधि में वर्णों का मेल होता है, समास में शब्दों का।

रस

परिभाषा: काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक देखने से हृदय में जो आनंद उत्पन्न होता है, उसे रस कहते हैं। रस को 'काव्य की आत्मा' कहा गया है। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में बताया कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

रस के अंग

  • स्थायी भाव - मन में स्थायी रूप से रहने वाला भाव (जैसे रति, क्रोध)।
  • विभाव - भाव जगाने का कारण। आलंबन (जिसके कारण भाव जागे) और उद्दीपन (जो भाव को बढ़ाए)।
  • अनुभाव - भाव जागने पर शरीर की चेष्टाएँ, जैसे आँसू, कंपन।
  • संचारी (व्यभिचारी) भाव - थोड़ी देर के लिए आने वाले भाव। इनकी संख्या 33 मानी गई है।
रसस्थायी भावरसस्थायी भाव
श्रृंगाररतिभयानकभय
हास्यहासवीभत्सजुगुप्सा
करुणशोकअद्भुतविस्मय
रौद्रक्रोधशांतनिर्वेद
वीरउत्साहवात्सल्यवत्सलता

भक्ति रस को भी बाद में मान्यता मिली, जिसका स्थायी भाव ईश्वर-विषयक रति है।

छंद

परिभाषा: वर्ण, मात्रा, यति, गति और तुक के नियमों में बँधी रचना को छंद कहते हैं। छंद से कविता में लय और संगीत आता है।

  • मात्रा - लघु (।) की एक और गुरु (ऽ) की दो मात्राएँ।
  • चरण - छंद की पंक्ति का भाग; यति - पढ़ते समय विराम; तुक - चरणों के अंत की ध्वनि-समानता।
  • भेद - मात्रिक छंद (मात्राओं की गिनती) और वर्णिक छंद (वर्णों की गिनती)।
छंदप्रकारनियम
दोहामात्रिकविषम चरण 13, सम चरण 11 मात्राएँ
सोरठामात्रिकदोहे का उल्टा - विषम 11, सम 13
चौपाईमात्रिकप्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ
रोलामात्रिकप्रत्येक पंक्ति में 24 मात्राएँ (11 - 13)
कुंडलियामात्रिकएक दोहा और एक रोला मिलकर
सवैयावर्णिकप्रत्येक चरण में 22 से 26 वर्ण

अलंकार

परिभाषा: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों को अलंकार कहते हैं। जैसे आभूषण शरीर को सजाते हैं, वैसे अलंकार काव्य को।

शब्दालंकार (शब्द से चमत्कार)

  • अनुप्रास - एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति। जैसे - 'चारु चंद्र की चंचल किरणें' (च की आवृत्ति)।
  • यमक - एक शब्द बार-बार आए, पर अर्थ अलग हो। जैसे - 'कनक कनक' (सोना और धतूरा)।
  • श्लेष - एक शब्द के एक साथ अनेक अर्थ। जैसे - 'पानी' (चमक, सम्मान, जल)।

अर्थालंकार (अर्थ से चमत्कार)

  • उपमा - समानता बताना; वाचक शब्द सा, सम, सरिस, समान। जैसे - मुख चंद्रमा के समान सुंदर है।
  • रूपक - उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप। जैसे - चरण-कमल।
  • उत्प्रेक्षा - उपमेय में उपमान की संभावना; वाचक शब्द मानो, मनु, जनु। जैसे - उसका मुख मानो चाँद हो।
  • अतिशयोक्ति - बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना।

शुद्ध लेखन

भाषा को वर्तनी (spelling) और व्याकरण के नियमों के अनुसार लिखना शुद्ध लेखन है। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय ने मानक वर्तनी के नियम तय किए हैं।

अशुद्धशुद्धअशुद्धशुद्ध
परिक्षापरीक्षाउज्वलउज्ज्वल
अत्याधिकअत्यधिकआशिर्वादआशीर्वाद
कवियत्रीकवयित्रीव्यवहारिकव्यावहारिक
इतिहासिकऐतिहासिकश्रीमतिश्रीमती

वाक्य संबंधी अशुद्धियाँ

  • मेरे को घर जाना है। → मुझे घर जाना है।
  • उसने मुझे पुस्तक दिया। → उसने मुझे पुस्तक दी।
  • कृपया करके बैठिए। → कृपया बैठिए।
परीक्षा टिप: हर व्याकरण बिंदु में परिभाषा, भेद और कम से कम दो उदाहरण अवश्य लिखें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) संधि किसे कहते हैं? संधि के भेदों को उदाहरण सहित समझाइए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) रस की परिभाषा देते हुए रस के अंगों और प्रमुख रसों का परिचय दीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) समास के भेद उदाहरण सहित लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) दोहा और चौपाई छंद के लक्षण लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) उपमा और रूपक अलंकार में अंतर स्पष्ट कीजिए।

RTMNU BA Sem 1 · BAHIN T2-101 · इकाई II

इकाई II: संवाद कौशल

पाठ्यक्रम (RTMNU Syllabus)

  • संवाद कला : स्वरूप एवं प्रकार
  • संवाद की संरचना
  • वक्तृत्व कला के गुण

संवाद कला : स्वरूप एवं प्रकार

संवाद का अर्थ: 'संवाद' शब्द 'सम् + वाद' से बना है, जिसका अर्थ है - आपस में बातचीत करना। दो या अधिक व्यक्तियों के बीच विचारों, भावों और सूचनाओं के आदान-प्रदान को संवाद कहते हैं।

संवाद कला: अपनी बात को स्पष्ट, प्रभावी, शिष्ट और परिस्थिति के अनुकूल ढंग से कहने तथा दूसरे की बात ध्यान से सुनने की क्षमता को संवाद कला या संवाद कौशल कहते हैं।

संवाद का स्वरूप (विशेषताएँ)

  • संवाद दोतरफ़ा प्रक्रिया है - इसमें बोलना और सुनना दोनों शामिल हैं।
  • इसका उद्देश्य होता है - सूचना देना, समझाना, प्रभावित करना या संबंध बनाना।
  • संवाद में शब्दों के साथ लहजा, हाव-भाव और शारीरिक भाषा भी अर्थ देते हैं।
  • अच्छा संवाद परिस्थिति, व्यक्ति और समय के अनुसार बदलता है।
  • संवाद कौशल सीखा और अभ्यास से निखारा जा सकता है।

संवाद के प्रकार

आधारप्रकारउदाहरण
माध्यममौखिक, लिखित, अशाब्दिकभाषण; पत्र, ई-मेल; मुस्कान, इशारा
औपचारिकताऔपचारिक, अनौपचारिकसाक्षात्कार, कार्यालय बैठक; मित्रों से बातचीत
व्यक्तियों की संख्याअंतर्वैयक्तिक, समूह, जनसंचारदो मित्रों की बात; कक्षा-चर्चा; रेडियो, टीवी
दिशाएकतरफ़ा, दोतरफ़ाघोषणा; वाद-विवाद, प्रश्नोत्तर

अशाब्दिक संवाद में चेहरे के भाव, आँखों का संपर्क, हाथों की मुद्रा, बैठने-खड़े होने का ढंग और आवाज़ का उतार-चढ़ाव आता है। कई बार ये शब्दों से भी अधिक प्रभाव डालते हैं।

संवाद की संरचना

हर संवाद कुछ निश्चित तत्वों से मिलकर बनता है। इन्हें संवाद प्रक्रिया के घटक कहते हैं।

  1. वक्ता (प्रेषक) - जो संदेश भेजता है या बात शुरू करता है।
  2. संदेश - विचार, सूचना या भाव, जिसे पहुँचाना है।
  3. कूटबद्धता (एनकोडिंग) - विचार को शब्दों, संकेतों या चित्रों में ढालना।
  4. माध्यम - संदेश पहुँचाने का साधन - आमने-सामने बातचीत, फ़ोन, पत्र, मोबाइल संदेश।
  5. श्रोता (प्राप्तकर्ता) - जो संदेश ग्रहण करता है और उसका अर्थ समझता है।
  6. प्रतिपुष्टि (फ़ीडबैक) - श्रोता की प्रतिक्रिया, जिससे पता चलता है कि संदेश सही समझा गया या नहीं।
  7. संदर्भ - स्थान, समय, परिस्थिति और संबंध, जिनमें संवाद होता है।

सरल रूप में संवाद की प्रक्रिया इस प्रकार है: वक्ता → संदेश → माध्यम → श्रोता → प्रतिपुष्टि → वक्ता।

संवाद के चरण

  • आरंभ - अभिवादन, परिचय और विषय की ओर संकेत।
  • मध्य - मुख्य बात, तर्क, उदाहरण, प्रश्न और उत्तर।
  • अंत - सार, निष्कर्ष और धन्यवाद।

संवाद की बाधाएँ

  • भौतिक बाधा - शोर, दूरी, ख़राब नेटवर्क।
  • भाषिक बाधा - कठिन शब्द, अलग भाषा, अस्पष्ट उच्चारण।
  • मानसिक बाधा - पूर्वाग्रह, ध्यान न देना, क्रोध या तनाव।
  • सांस्कृतिक बाधा - अलग रीति-रिवाज और मान्यताएँ।
याद रखें: अच्छे संवाद में सुनना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बोलना।

वक्तृत्व कला के गुण

वक्तृत्व कला का अर्थ है - श्रोताओं के सामने प्रभावशाली ढंग से भाषण देने की कला। अच्छा वक्ता अपनी वाणी से श्रोताओं को सोचने और कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। स्वामी विवेकानंद का शिकागो (1893) का भाषण इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।

अच्छे वक्ता के गुण

  1. विषय का ज्ञान - विषय की पूरी जानकारी और अच्छी तैयारी।
  2. आत्मविश्वास - बिना घबराए, सहज भाव से बोलना।
  3. स्पष्ट उच्चारण - शब्दों का शुद्ध और साफ़ उच्चारण।
  4. आवाज़ का उतार-चढ़ाव - भाव के अनुसार स्वर ऊँचा-नीचा करना, उचित गति और विराम।
  5. सरल और प्रभावी भाषा - श्रोताओं के स्तर के अनुसार शब्द चुनना, छोटे वाक्य।
  6. हाव-भाव और नेत्र संपर्क - श्रोताओं की ओर देखना, उचित मुद्राएँ।
  7. उदाहरण और प्रसंग - कहानी, उद्धरण, घटनाएँ और हल्का हास्य।
  8. क्रमबद्धता - भूमिका, मुख्य भाग और उपसंहार का सही क्रम।
  9. समय का पालन - निर्धारित समय में बात पूरी करना।
  10. श्रोताओं का सम्मान - विनम्रता, शिष्टता और श्रोताओं की प्रतिक्रिया पर ध्यान।

वक्तृत्व कौशल कैसे विकसित करें

  • दर्पण के सामने या मित्रों के सामने अभ्यास करें।
  • महाविद्यालय की वाद-विवाद और भाषण प्रतियोगिताओं में भाग लें।
  • अच्छे वक्ताओं के भाषण सुनें और समाचारपत्र, पुस्तकें पढ़ें।
  • अपने भाषण को रिकॉर्ड करके कमियाँ सुधारें।
परीक्षा टिप: वक्तृत्व कला के प्रश्न में गुणों को क्रमांक देकर लिखें और अंत में किसी प्रसिद्ध वक्ता का उदाहरण दें।

संभावित परीक्षा प्रश्न

  1. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) संवाद कला का अर्थ और स्वरूप स्पष्ट करते हुए संवाद के विभिन्न प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
  2. (दीर्घोत्तरी प्रश्न) वक्तृत्व कला किसे कहते हैं? एक अच्छे वक्ता के गुणों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
  3. (लघूत्तरी प्रश्न) संवाद की संरचना के प्रमुख घटक लिखिए।
  4. (लघूत्तरी प्रश्न) अशाब्दिक संवाद - टिप्पणी लिखिए।
  5. (लघूत्तरी प्रश्न) संवाद की बाधाएँ - टिप्पणी लिखिए।